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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बारे में

1885 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई थी और जब कांग्रेस ने उसी वर्ष में अपने पहले सादगीपूर्ण अधिवेशन का आयोजन किया, तब शायद ही कोई उसके भविष्य के बारे में पूर्वानुमान लगा सकता था। उस समय किसी ने भी यह कल्पना न की होगी कि यह संगठन उस समय के सबसे बड़े साम्राज्य के शासन को ध्वस्त कर देगा, भारत के इतिहास को बदलकर नया इतिहास रचेगा, भारत की स्वतंत्रता का पक्ष-समर्थक और उसके भविष्य का संरक्षक बनेगा।

गिने-चुने राजनैतिक संगठन ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जीवन-इतिहास की बराबरी कर सकते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में इतना बड़ा राजनैतिक दल कोई दूसरा नहीं हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसकी सेवा का इतिहास बेजोड़ है।

कई दशकों तक इस संगठन ने प्रेरणादायी दृष्टिकोण, आदर्शपरायणता, रचनाशीलता, समर्पण भाव और संगठनात्मक कौशल की बदौलत अनेक उत्कृष्ट प्रतिभाओं को अपनी ओर आकृष्ट किया है। 20वीं सदी में भारत के सर्वाधिक लब्ध-प्रतिष्ठ पुरुषों और महिलाओं की सूची में कांग्रेसजन बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं, दूसरे अधिकांश लोगों से उनका कद बहुत ऊँचा है। ऐसे राजनैतिक दल बहुत कम होंगे जिन्हें इतने उत्कृष्ट नेतृत्व का आशीर्वाद इतने लम्बे समय तक मिला हो, या जिनके लिए इतने लाखों-लाख लोगों ने अपनी निष्ठा जताई हो और त्याग किए हों।

भारत से बाहर भी कांग्रेस ने अपने प्रभाव की स्थायी छाप छोड़ी है। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे घनी आबादी वाले उपनिवेश में स्वाधीनता के ध्वजवाहक के रूप में उसने राजनीति के क्षेत्र में नए क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए और अभूतपूर्व पैमाने पर उनकी प्रभावशीलता को सिद्ध करके भी दिखाया। विकाससील विश्व के दूसरे देशों ने भी कांग्रेस के उदाहरण से सबक लिया और उसके तौर-तरीकों से प्रेरणा ग्रहण की। महात्मा गाँधी के सत्याग्रह के सिद्धान्त और उसके साथ जुड़े अहिंसापूर्ण विरोध, सविनय अवज्ञा, और आर्थिक बहिष्कार जैसे तरीकों ने दुनिया भर को प्रभावित किया। भारत की सीमाओं से बहुत दूर के स्थानों में विभिन्न संघर्षों में अधिकारवंचितों को सबल बनाने के लिए इन्हीं तरीकों को सफलतापूर्वक अपनाया गया है। इस अर्थ में कांग्रेस की छाप दुनिया के कई हिस्सों में देखी जा सकती है।

ज़ाहिर है कि उसकी सबसे स्पष्ट छाप भारत में ही दिखाई देती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के एक प्रभावी सरकार वाले स्थिर लोकतांत्रिक देश के रूप में कायम रहने के चमत्कार के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह चमत्कार अनेक कारणों से सम्भव हुआ। इनमें से एक प्रमुख कारण यह था कि कांग्रेस ने अपने आप को एक विद्रोही दल से शासन-प्रणाली को संचालित करने वाले दल के रूप में रूपान्तरित कर लिया। देश के अन्दर के समीक्षकों (और शायद देश के भीतर के भी बहुत से समीक्षकों की भी) यह राय थी कि भारत जैसे गरीब, विविधतापूर्ण, और निरक्षरता वाले देश में सार्वजनिक मताधिकार को लागू करना केवल विश्वास के आधार पर उठाया गया एक साहसिक कदम होगा। निःसंदेह यह विश्वास के आधार पर लगाई गई छलांग थी, लेकिन कांग्रेस ने इसे सफल बनाने के लिए बहुत प्रयत्नपूर्वक योगदान दिया। अपने इस प्रयास में उसे अपने समावेशी स्वरूप से बहुत मदद मिली, क्योंकि उसके सदस्य सभी वर्गों, धर्मों, क्षेत्रों, और विचारों से सम्बद्ध थे।

भारत के हर भाग में प्रभावी ढंग से मौजूद और आन्तरिक मतभिन्नता को नियंत्रित करने के असाधारण कौशल के कारण भारत के लोकतांत्रिक जीवन के शुरुआती दशकों में जनसाधारण के संगठन के रूप में कांग्रेस का अनुभव बहुत उपयोगी साबित हुआ। कांग्रेस गर्व के साथ यह दावा कर सकती है कि भारत का लोकतंत्र उसकr सबसे टिकाऊ यादगार है।

कांग्रेस अपने एक महत्वपूर्ण आन्तरिक गुण – उसकी तर्क-वितर्क की परम्परा − के बिना हमारे लोकतंत्र का पोषण नहीं कर पाती। कांग्रेस कभी भी मतभिन्नता और परिवर्तन की विरोधी नहीं रही है, बल्कि वह एक ऐसी विशाल छतरी है जिसमें परस्पर प्रतिस्पर्धी विविध विचारों, दृष्टिकोणों और हितों को स्थान दिया जाता है। कांग्रेस का इतिहास विचारों के संघर्ष और व्यक्तित्वों के टकरावों, जिनके कारण कभी-कभी विखंडन तक हुआ है, से भरा हुआ है। पहली बार विभाजन 1907 में हुआ था। उसके बाद हमारे अपने जीवनकाल में और भी विभाजन हुए हैं। मेरा मानना है कि ये वाद-विवाद और मतान्तर हमारे दल के नवीनीकरण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग हैं जो दल की विचारधारा को प्रवाहमान रखते हैं और उसे बदलती परिस्थितियों के प्रति सजग और प्रासंगिक बनाए रखते हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी में अपने बिल्कुल शुरुआती वर्षों से लेकर वर्तमान समय तक कांग्रेस देश की आर्थिक समस्याओं के बारे में चिन्तामग्न रही है। यदि आज़ादी के आन्दोलन में भारत के लाखों-लाखों लोगों की अपमानजनक गरीबी और उनका शोषण प्रमुख मुद्दे थे, तो आज़ादी मिलने के बाद यह प्राथमिकता रही है कि उन्हें इस गरीबी से बाहर निकाला जाए। भारत के लिए हमारे नेताओं का एक साझा सपना था: पंथनिरपेक्षता के सिद्धान्त को कायम रखना, आर्थिक और सामाजिक आधुनिकीरण से माध्यम से देश से गरीबी का उन्मूलन करना, एक न्यायसंगत और समतामूलक आर्थिक व्यवस्था कायम करना, और इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भरपूर उपयोग करना। हम इस दिशा में कुछ आगे तो बढ़े हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य अभी दूर है। उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं ने इसमें अतिरिक्त खिंचावों, दबावों, और अवसरों का एक नया गतिबोधक जोड़ दिया है, लेकिन पार्टी के लिए आर्थिक विकास का समन्वय सामाजिक न्याय के साथ करना एक आधारभूत सिद्धान्त है जिससे पार्टी नहीं डिगेगी। भूख और गरीबी की समस्याएं आज भी हमारे देश में विद्यमान हैं। यदि गरीबी को पूरी तरह से खत्म करने में कुछ समय लगेगा, तो हमारा प्रयास है कि हम सबसे कमज़ोर वर्ग को गरीबी के सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाले प्रभावों से बचाएं।

जैसाकि स्वाभाविक है, कांग्रेस ने भी अपने लम्बे इतिहास में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उसने प्रतिष्ठा और पराजय दोनों को अनुभव किया है। राजनीति की उठा-पटक और लोकतांत्रिक समाज के अपरिहार्य समझौतों की अपनी कुछ मर्यादाएं हैं। फिर भी जब तक कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और सामाजिक समानता के लिए आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के अपने मूल सिद्धान्तों के प्रति निष्ठावान बनी रहेगी, तब तक वह भारत के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण घटक बनी रहेगी। उसे अखिल भारतीय चेतना का समर्थक और हिमायती भी बने रहना होगा। हमारे पड़ोस में चल रही उथल-पुथल और देश में व्याप्त राजनैतिक अशांति के इस समय में जब संकीर्ण जातीय पहचान, धर्म, और क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं, तब कांग्रेस का व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने के लिए पहले की अपेक्षा और अधिक प्रासंगिक और आवश्यक हो जाता है।

स्रोत : ‘जर्नी ऑफ ए नेशन... इंडियन नेशनल कांग्रेस: 125 इयर्स’ (एकेडेमिक फाउंडेशन, 2011) में सोनिया गाँधी द्वारा लिखित “प्रस्तावना” से सानुमति उद्धृत।