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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



जवाहरलाल के प्रति श्री हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय
राष्ट्र का पोत धीर बढ़ चला चीरता--
पाकर हमारे युगद्रष्टा को कर्णधार--
काल की तमोमयी तरंगो को,
मुखर अगाध जल लहरें उलाँघता,
झेलता थपेड़े मदमत्त पारावार के।
उसने सँभाली पतवार, सब दावाँदोल
दिशा-कोण स्थिर हुएः क्योंकि वह एकनिष्ठ
स्वाभाविक नेता है, नेताओं में है अग्रणी।

धैर्य से, सहिष्णुता से, जागरुक, सावधान,
गढ़ता है राष्ट्र की नियति वह। जीवन ही उसका
मानों एक अविश्रान्त प्रार्थना हैः भारत-स्वतन्त्रता
पूर्णतः स्वतन्त्र हो! दक्ष हाथों कर्ण धारे लिए जा रहा है वह
आँधियाँ, तूफ़ान, वज्र, विद्युत को झेल, राष्ट्रपोत को
वहाँ, पार, सुरक्षित शान्ति के निकेत में।

वह है दीप-स्तम्भ: ज्योतिमय आँखें उसकी
घिरे आक्षितिज गहन तिमिर को
भेद रही हैं। यदपि चतुर्दिक गूँज रहा तूफ़ान
प्रलय का, काँप रहे आकाश-धरा।
चिर-तरुण भृकुटि पर उसकी
धीर, अगाध, ज्ञान-सम्भव आलोक खेलता
खंडित करता अन्धकार की महामृषा को।
जयति दिव्य, जय हे आलोक-निकेतन!
आज राष्ट्र की अगणित आँखें
लगी हुई हैं तुम पर, उर में यह विश्वास भरा है--
तुम्हीं, किरण पर किरण दिखाकर, सह कर
पवन, लहर, घन तमसा की दुर्दम ललकारें,
डगमग जीवन-नौका का उद्धार करोगे,
पहुँचा दोगे परा किनारे, शान्त सुरक्षित।