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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



जहाँ मिलते हैं दो संसार गमाल अब्दल नासर
जवाहरलाल नेहरू के बारे में लिखना किसी के लिए भी बड़ी खुशी का विषय है। इससे लिखने वाले को एक ऐसे व्यक्ति के जीवन के बारे में विचार करने का अवसर मिलता है जो अपनी 70 वर्ष की लम्बाई में अपनी लम्बाई से अधिक गहराई और विस्तार हासिल कर चुका है।

अपने विविध पहलुओं के साथ जवाहरलाल नेहरू का जीवन एक पूर्ण और समृद्ध जीवन रहा है।

अपनी गहराई की दृष्टि से उनका जीवन उन सीमाओं तक पहुँचा है जहाँ वे सदियों की छीज और इतिहास के उतार-चढ़ावों के पार भारत की आत्मा को छू सके।

अपने विस्तार की दृष्टि से उनका जीवन औपनिवेशिक शासन और उसकी विरासतों के बावजूद अपने आस-पास की दुनिया – एशिया और अफ्रीका के साथ संवाद कर सका है और एशिया तथा अफ्रीका के अलावा दूसरे स्थानों के लोगों के साथ भी व्यापक समझ-बूझ कायम कर सका है।

मैं अनेक अवसरों पर जवाहरलाल नेहरू से मिला हूँ। मेरा सौभाग्य है कि मैं उनके साथ मित्रता गाँठ सका और यह मित्रता अब प्रगाढ़ हो चुकी है, लेकिन यह मित्रता न भी होती तब भी उनके साथ हर मुलाकात एक उपयोगी मुलाकात रही है।

हमारी पहली लम्बी मुलाकात नाइल नदी पर एक स्टीमर में हुई थी। हमने अधिकांशतः योजना प्रक्रिया के बारे में चर्चा की थी। इस विषय पर नेहरू की जानकारी और आधुनिक समय में योजना प्रक्रिया की भूमिका के बारे में उनकी राय से यह बात निकल कर आई कि एशिया और अफ्रीका के देश एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। उनका मानना था कि इन दोनों महाद्वीपों के लोगों, जो अनेक प्रकार की ऐतिहासिक शक्तियों और परिस्थितियों के कारण दूसरों की तुलना में पिछड़े रहने के लिए मजबूर हो गए थे और फिर एक क्रान्तिकारी जागृति के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए प्रेरित हुए, के पास अपने से आगे निकले हुए लोगों के बराबर पहुँचने के लिए अपनी आगे की यात्रा की "योजना" बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उनके लिए योजना की प्रक्रिया केवल एक साधन ही नहीं है; बल्कि एक आवश्यकता है।

आयोजना का उद्देश्य केवल उत्पादन सम्बंधी आँकड़े जुटाना नहीं है। लोगों को प्रशिक्षित करना इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। मुझे उस समय कहे गए नेहरू के शब्द याद हैं: "याद रखिए, किसी भी देश के भविष्य का इस बात से बड़ा गहरा सम्बंध है कि उस देश में कैसे लोग रहते हैं।"

एक बार मुझे नई दिल्ली के विशाल रामलीला मैदान में नेहरू द्वारा सम्बोधित एक सभा में मौजूद रहने का अवसर मिला। उनका भाषण सुनने के लिए विविध प्रकार के लोगों का एक विशाल जनसमूह मौजूद था: उनमें युवा महिला-पुरुष शामिल थे जो बहुत छोटे-छोटे बच्चों के साथ ज़मीन पर बैठे थे; पास ही एक बड़ी उम्र का व्यक्ति बैठा था, वयोवृद्ध। नेहरू ने इस मिली-जुली भीड़ को सम्बोधित करना शुरू किया।

मैं जानता हूँ कि कोई भी वक्ता यदि अपने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करना चाहे तो उनकी भावनाओं उभाड़ कर ऐसा करना बहुत आसान होता है; लेकिन नेहरू ने ऐसा कुछ नहीं किया। एक बार भी उनका स्वर ऊँचा नहीं हुआ। न वे भावावेश में आए। जमा लोग बस उनकी बातों को सुनते रहे, पूरी उत्सुकता के साथ। बीच-बीच में वे लोग हँस देते थे, महिलाएं और पुरुष, बच्चे और बुज़ुर्ग भी।

अपने-अपने स्वभाव की विविधताओं के बावजूद वे सभी सुन रहे थे कि यह व्यक्ति क्या कह रहा है, एक व्यक्ति जिसने अपनी युवावस्था सुदूर पश्चिम के विश्वविद्यालयों में बिताई थी लेकिन फिर भी अपने लोगों से कभी अलग नहीं हुआ था और फिर प्रारब्ध ने उसके कंधों पर उन्हें नेतृत्व प्रदान करने का दायित्व रख दिया एक ऐसे समय में जब उनका देश बदलाव के एक महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा था।

मंच पर नेहरू के पीछे बैठ कर मैं उस क्षण के महत्व को समझने का प्रयास कर रहा था। जिस भाषा में वे बोले, उसे मैं समझ न सका, लेकिन मैंने देखा कि उनके विचारों और शब्दों का उनके श्रोता समूह पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। मैंने गाँधी के बारे में कही गई उनकी बातों पर विचार किया जहाँ उन्होंने गाँधी को एक ऐसे नेताओं में से एक बताया था जिनका नाम इतिहास में इसलिए दर्ज नहीं हुआ कि उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए कुछ नया किया, बल्कि इसलिए क्योंकि वे लोगों के मन की गहराइयों तक पहुँचे और उनके भीतर के भावों को निकाल कर सतह पर रख दिया, उसे निर्मल किया और उसे ढंकने वाली काई को साफ करके चमका दिया।

और मैं मंच पर नेहरू के पीछे बैठा हुआ उन्हें अपने लोगों को सम्बोधित करते हुए देख रहा था और सोच रहा था कि जो कुछ उन्होंने गाँधी के विषय में कहा उसमें से कितना कुछ स्वयं उनके अपने ऊपर भी लागू होता था।

सच्चाई यह है कि नेहरू केवल भारत के लोगों के हृदय में बसने वाले सपनों के ही व्याख्याता नहीं हैं। वे समस्त मानव जाति की चेतना की आवाज़ हैं, विशेष तौर पर उन लोगों की जो कमोबेश इसी प्रकार के अनुभवों से होकर गुज़रे हैं और जिन्होंने भारत के लोगों के जैसी समस्याओं का सामना किया है।

यदि नेहरू ने एक ओर अपने लोगों के साथ-साथ एशिया और अफ्रीका के लोगों की आशाओं और अभिलाषाओं की व्याख्या की है, और निःसंदेह सटीक व्याख्या की है, तो साथ ही साथ उनका एक दूसरा योगतान भी है जो इससे कम महत्वपूर्ण नहीं है।

साथ ही साथ उन्होंने अपने देश के लोगों अलावा एशिया और अफ्रीका के लोगों के लिए शेष दुनिया के लोगों के सपनों और उनकी अभिलाषाओं की व्याख्या भी की है।

जिन लोगों को बांडुंग में अफ्रीका-एशिया सम्मेलन की बैठकों में भाग लेने का अवसर मिला वे मेरी बात का पूरा अर्थ समझ सकेंगे। इस सम्मेलन की राजनैतिक मामलों सम्बंधी समिति की बैठकों में, जिन्हें हमारे इतिहास के महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा सकता है, जवाहरलाल नेहरू ने, जो कभी अपनी बातों से सौन्दर्य का पुट देने से नहीं चूकते, और जो सौन्दर्य उनकी पोषाक में गुलाब के फूल के रूप में हमेशा सुशोभित रहता है, विचार और सिद्धान्त, समझबूझ और अनुभव, कला और संस्कृति, यहाँ तक कि दर्शन और इतिहास की दृष्टि से अनेक बार उस सौन्दर्य की अनुभूति कराई।

उन्होंने एशिया और अफ्रीका के लिए दूसरों के दृष्टिकोण की व्याख्या की और दूसरों के सामने एशिया और अफ्रीका का दृष्टिकोण रखा। आपस में एक दूसरे की बात को समझने और समझाने का वे उत्कृष्टतम उदाहरण थे।

कहते हैं कि सच्चा कलाकार कभी अपनी कला या अपने विचारों में गुम नहीं होता है। वस्तुतः नेहरू कर्म करने के लिए, अपने अपने विचारों और सिद्धान्तों की रक्षा करने के लिए उतने ही सक्षम हैं जितनी सक्षमता से वे उन्हें व्यक्त करते हैं।

उनके साथ अपने सम्बंधों की चर्चा करूँ तो मैं हमेशा उनके उस संदेश को याद रखूँगा जो मुझे मिस्र पर ब्रिटिश-फ्रांसीसी-इज़रायली आक्रमण के समय उनसे प्राप्त हुआ था। संदेश में उन्होंने कहा था:

"यदि उपनिवेशवाद मिस्र में वापस लौटने में कामयाब हुआ तो इससे पूरा इतिहास उलट जाएगा और उपनिवेशवाद हर उस देश में लौट आएगा जहाँ से उसे जाने के लिए बाध्य किया गया था। इसलिए, ... उपनिवेशवाद को मिस्र में लौटने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अन्यथा यह पूरे एशिया और अफ्रीका में एक नई और लम्बी लड़ाई का संकेत होगा।"

एक जटिल स्थिति को उन्होंने कितना जल्दी समझ लिया था। और कितने शानदार और साहसपूर्ण शब्दों में उन्होंने इसे अभिव्यक्त किया था! इससे हमें बल और साहस मिला और लड़ने की प्रेरणा भी।