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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



एक स्थायी प्रभाव क्वामे एनक्रूमाह
उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले योद्धा के तौर पर मैं भारत को आज़ादी मिलने से पहले यहाँ चल रही क्रान्ति की प्रगति पर उत्सुकतापूर्वक नज़र टिकाए रहता था। जब मेरे अपने देश के लिए राजनैतिक आज़ादी हासिल करने के लिए कुछ करने की मेरी बारी आई तो स्वाभाविक तौर पर मैंने भारत और उसके नेताओं से प्रेरणा ली जिन्होंने कुछ समय पहले वैसी ही समस्याओं का सामना किया था जैसी समस्याएं मेरे अपने देशवासियों के सामने थीं। मेरे मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं था कि गाँधी की अहिंसा की नीति ही उपनिवेशवाद की समस्या से निपटने का एकमात्र प्रभावी तरीका है।

बहुत वर्षों से मैं जवाहरलाल नेहरू का प्रशंसक रहा हूँ, केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने दूसरे नेताओं के साथ मिलकर अपने देश के लिए बड़े-बड़े महान कार्य किए हैं, बल्कि इसलिए भी, और सम्भवतः उससे भी बढ़कर इसलिए क्योंकि मेरे मन में एक एकाग्र, साहसी और निश्चयी व्यक्ति और भारत के लिए सच्चे अर्थ में समर्पित व्यक्ति के रूप में उनके प्रति सम्मान का भाव था। किसी न किसी कारण से मेरी उनसे मुलाकात नहीं हो सकी और फिर 1957 की ग्रीष्म ऋतु में लंदन में राष्ट्रमंडल देशों के प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में हम दोनों की भेंट हुई। इंग्लैंड पहुँचने के कुछ समय बाद ही उन्होंने मुझे सुबह के नाश्ते पर आमंत्रित किया।

अक्सर ऐसा होता है कि आप समझते हैं कि आप किसी व्यक्ति को उसके लेखन के माध्यम से, उसके साथ हुए पत्राचार के माध्यम से और उसके नज़दीकी मित्रों से मिली जानकारी के आधार पर बहुत भली प्रकार से जानते हैं लेकिन आखिरकार जब आप उस व्यक्ति से आमने-सामने मुलाकात करते हैं तो उसे अपनी अपनी अपेक्षाओं पर खरा नहीं पाते हैं। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं उनके साथ अपनी इस मुलाकात का बड़ी उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा था, लेकिन जब मेरी कार लंदन के यातायात से गुज़रती केनिंग्स्टन पैलेस गार्डन्स की ओर दौड़ रही थी जहाँ नेहरू ठहरे हुए थे, तब दो विचार मेरे दिमाग में सबसे ऊपर थे। क्या वे उतने ही महान निकलेंगे जितना मैंने उन्हें हमेशा माना था? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि मैं उनके सामने अपनी अच्छी छवि न प्रस्तुत कर पाऊँ?

नेहरू ठीक वैसे ही थे जैसी मैंने उनके बारे में कल्पना की थी, और उससे भी बढ़कर। ज़ाहिर है कि दूसरे प्रश्न का जवाब मैं तलाश नहीं कर पाया, लेकिन एक बात में यकीन के साथ कह सकता हूँ: पहली बार उनसे हाथ मिलाने के उस क्षण में एक मज़बूत दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी।

मैं राष्ट्रमंडल देशों के प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में पहली बार भाग ले रहा था और मैं जिस किसी से मिला उसी ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया, लेकिन इस सबके बावजूद वहाँ नया होने के कारण मुझे किसी छोटे लड़के जैसी हिचक महसूस हो रही थी। एक नए आगंतुक के तौर पर मैंने निश्चय किया कि मैं बैठकों की कार्यवाही में भाग लेने के बजाए उन्हें चुपचाप देखना ही पसंद करूँगा – ताकि यह देख सकूँ कि पुराने सदस्य इन बैठकों में किस प्रकार से आचरण करते हैं, ऐसा करने से मेरा "नयापन" बहुत स्पष्ट नहीं दिखाई देगा और जब समय आएगा तो कार्यवाही में सक्रिय भागीदारी कर सकूँगा।

हर बैठक में नेहरू के लिए मेरा सम्मान बढ़ता ही गया। किसी-किसी दिन वे शायद ही कोई बात कहते, लेकिन केवल एक भंगिमा से, सिर हिलाकर या किसी दूसरे इशारे से वे स्पष्ट कर देते कि उन्होंने बात को समझ लिया है और जिस मुद्दे पर चर्चा चल रही है उससे वे सहमत हैं या नहीं। जब वे बोलते तो उनका भाषण सुनने लायक होता, भले ही आप उनकी कही बात से सहमत हों या न हों। वे बहुत कम शब्दों का प्रयोग करके और बहुत थोड़े समय में अपनी बात को कह देते, और अपने विचार बड़ी स्पष्टता से और दृढ़ता से प्रकट करते थे। मैंने जाना कि किसी व्यक्ति के बुद्धिमान होने का यही लक्षण है।

लेकिन नेहरू के साथ मेरी मित्रता का सबसे खुशी का समय वह था जब मैं हाल में भारत के दौरे पर गया था। मैं उनकी उदारता की सभी बातों को गिना नहीं सकता हूँ, लेकिन एक घटना मेरी स्मृति में स्पष्ट तौर पर अंकित है। उस रात मुझे रेल से उत्तर में किसी स्थान पर जाना था। मुझे आगाह किया गया था कि वहाँ बहुत सर्दी होगी और इस यात्रा के लिए मैंने वायुसेना की वर्दी का एक ओवर कोट उधार लिया था। हम निकलने ही वाले थे कि नेहरू अचानक स्टेशन पहुँचे, उन्होंने एक बहुत बड़ा सा ओवरकोट पहन रखा था जिसमें वे अजीब से दिखाई दे रहे थे। जब ऐसी दशा में मैंने उनका अभिवादन किया तो मैं अपने चेहरे पर आश्चर्य के भाव को नहीं छुपा सका।

"आइए, आइए!" वे बोले, और जल्दी-जल्दी मुझे रेल के डिब्बे में धकेलते हुए ले गए। "मुझे मालूम है कि मेरे लिए यह बहुत बड़ा है, लेकिन मेरा खयाल है कि आपके लिए इसका नाप एकदम सही रहेगा, और नांगल में आपको इसी की आवश्यकता होगी। इसे पहन कर देखिए।"

मैंने उसे पहन कर देखा, और जैसा उन्होंने कहा था, वह एकदम मेरे ही नाप का था, एकदम सही। मैंने गर्व से जेबों में हाथ डाले और वहाँ मेरे लिए कुछ और अचंभा था। एक जेब में एक गर्म ऊनी स्कार्फ था तो दूसरी जेब में गर्म दस्ताने।

इसके अलावा, दिल्ली में मेरे संक्षिप्त प्रवासों के दौरान कई बार मुझे नेहरू के घर के अपनेपन के माहौल में ठहरने का भी सम्मान मिला। वहाँ मैंने गृहस्थ नेहरू को जाना, भावुक और ज़्यादा तनावमुक्त नेहरू, जो अपने सर्वाधिक प्रियों – अपनी बेटी, अपने नातियों, अपने पालतू कुत्तों के साथ होते और अपने घर में होते।

इतने कम शब्दों में जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करना बहुत कठिन है। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि उनके साथ परिचय के कारण मैं स्वयं को एक बेहतर, अधिक जानकार और अधिक परिपूर्ण व्यक्ति अनुभव करता हूँ।