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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



शांति की खोज में बर्ट्रंड रसेल
सभी शांतिवादियों और मानवतावादियों को एकजुट हो कर नेहरू को उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई देनी चाहिए। बहुत कम लोग ही ऐसे महत्वपूर्ण सत्कार्यों में सफलता का प्रदर्शन कर सकते हैं, जिनमें कई बार विरोधी पक्ष अपराजेय दिखाई देता है।

मेरी मंशा मुख्यतः यहाँ नेहरू की विदेश नीति के बारे में लिखने की ही है, लेकिन उनकी घरेलू नीति के कुछ ऐसे पहलू हैं जिनकी मैं सराहना करना चाहूँगा। सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात तो यह है कि भारत एक संसदीय लोकतंत्र बनने की राह पर आरूढ़ हो चुका है – यह एक कठिन कार्य था, जैसाकि दुनिया के कई हिस्सों के अनुभवों से देखा जा सकता है जहाँ पुरानी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बदल कर लोकतंत्र की नई व्यवस्था की स्थापना करने के प्रयास किए गए हैं। एक दूसरा बड़ा काम जो नेहरू की सरकार ने किया है वह उन अप्रिय बातों के बिना औद्योगीकरण की शुरुआत करना है जो अक्सर औद्योगीकरण की आरम्भिक अवस्था के साथ जुड़ी होती हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ब्रिटेन में औद्योगीकरण से जुड़ी क्रूरताओं से सभी परिचित हैं, और यह भी सर्वविदित है कि मार्क्स के सिद्धान्त उनके बाल्यकाल के समय ब्रिटेन के कारखानों में घटित हो रही विभीषिकाओं से प्रेरित हैं। यह इतिहास की एक बड़ी उल्लेखनीय विडम्बना है कि जैसे ही मार्क्सवादियों को रूस में सत्ता मिली, उन्होंने वहाँ उससे भी बड़े पैमाने पर उन बुराइयों से भी बड़ी बुराइयों को फैलाया जिनके कारण उनके अपने पैगम्बर को सदमा पहुँचा था। संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी प्रान्तों को छोड़कर, जहाँ निराश्रित अप्रवासी आबादी का उपयोग किया जा सकता था और जिसकी गरीबी के लिए अमेरिका जिम्मेदार नहीं था, औद्योगीकरण की प्रारम्भिक अवस्था को सभी स्थानों में कठिनाइयों से जोड़ कर देखा जाता है। भारत में नेहरू की सरकार ने संतोष से काम लेते हुए औद्योगीकरण की प्रक्रिया की रफ्तार को समकालीन चीन की तुलना में धीमा रखा है ताकि यह प्रक्रिया कम तकलीफदेह और कम कठोर होगी। प्रत्येक मानवतावादी को इस प्रयास के साथ सहानुभूति रखनी चाहिए और इस बात को समझना चाहिए कि इससे हासिल होने वाला परिणाम, भले ही उसे प्राप्त करने में अधिक समय लगे, लेकिन यह परिणाम मानवजाति की खुशी की दृष्टि से कम मानवतावादी प्रक्रिया के परिणाम से बेहतर होगा।

एक और विषय है जहाँ नेहरू की सरकार ने पश्चिम की अधिकांश सरकारों की तुलना में अधिक बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया है: मेरा आशय आबादी की समस्या से है। बहुत से पश्चिमी देशों में इस नीति के लिए प्राचीन अंधविश्वासों पर बने धर्मसिद्धान्तों को आधार बनाया गया है। हम पश्चिम के लोगों को आशा करनी चाहिए कि कभी ये सरकारें इस मामले में तर्क के आधार पर कार्रवाई करने की दृष्टि से पूर्व का अनुसरण करेंगी।

लेकिन हमारे इस युग में बाकी सभी समस्याएं युद्ध की समस्या के आगे बौनी पड़ गई हैं। दो शक्तिशाली राष्ट्र समूह मुकाबले के लिए आमने-सामने हैं, और प्रत्येक समूह के पास ऐसे हथियार हैं जो समूची मानवजाति का विनाश कर सकते हैं, और दोनों ही यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें सुलह कर लेने की आवश्यकता है। ऐसे राष्ट्रों में से जो इन दोनों में से किसी भी गुट में शामिल नहीं हैं, भारत सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण देश है। मैंने कभी यह नहीं चाहा कि भारत पश्चिमी गुट के साथ मिल जाए (और न ही यह चाहा है कि वह पूर्वी गुट में शामिल हो)। मैंने अपनी यह राय भारतीय पत्रकारों के सामने उस समय रखी थी जब मैं 1950 में कलकत्ता से होकर गुज़रा था, और मेरी राय कभी भी इससे अलग नहीं रही है। यह बात बड़ी फायदेमंद साबित हुई है कि भारत एक असम्बद्ध देश के रूप में कार्य कर रहा है, यह बात कोरिया के मामले में विशेषतया सही साबित हुई है। उत्तरी और दक्षिणी कोरिया के बीच सीमा रेखा के मामले में और कैदियों के प्रत्यावर्तन के मामले में समझौते भारत की मध्यस्थता के कारण ही हो सके। इस कार्य को करने के लिए बड़े साहस की आवश्यकता थी क्योंकि जब भी किसी एक पक्ष को थोड़ी रियायत दी जाती तो दूसरा पक्ष नाराज़ हो जाता था, इस प्रकार निष्पक्ष रहते हुए न्याय करने का नतीजा यह हुआ कि पूर्व और पश्चिम के दोनों ही गुट नाराज़ हुए। जहाँ तक मेरी राय का सवाल है, मैं मानता हूँ कि कोरिया के मामले में भारतीय अधिकारियों के निर्णय यथासम्भव निष्पक्ष ही थे।

भारत ने बड़ा योगदान दिया है, और आशा है कि वह विश्व युद्ध की स्थिति को उत्पन्न होने देने से रोकने के लिए और भी मदद करेगा। कूटनीति के कड़े से कड़े नियमों के अनुसार यह एक ऐसा मामला है जिसमें भारत की रुचि महत्वपूर्ण और न्यायसंगत है। परमाणु हथियारों से लड़े जाने वाले विश्व युद्ध में केवल युद्ध करने वाले पक्षों को ही नुकसान नहीं होगा। युद्ध से विरत देशों में भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा, या शायद पूरी आबादी ही युद्ध के परिणामस्वरूप होने वाले सम्पर्क प्रभाव से नष्ट हो जाएगी; इसलिए असम्बद्ध देशों को यह हक पहुँचता है कि वे, भले ही संकीर्ण राष्ट्रीय दृष्टिकोण से ही क्यों न हो, विश्व युद्ध को टालने के लिए जो कुछ सम्भव हो, करें। नेहरू की सरकार ने इस दृष्टि से एक बहुत उपयोगी कदम उठाया है, वह यह कि एक बहुत सावधानीपूर्वक तैयार की गई परमाणु विस्फोटों और उनके प्रभावों सम्बंधी रिपोर्ट के दो लगातार संस्करणों को प्रकाशित किया है जिसके लिए नेहरू ने 1956 में एक भूमिका भी लिखी थी जिसे 1958 के नए संस्करण में शामिल किया गया। किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो विवेकशून्य कट्टरता से प्रभावित न हो, इस बहुमूल्य रिपोर्ट के दूसरे संस्करण में नेहरू के अन्तिम शब्दों की सराहना करनी चाहिए जहाँ उन्होंने लिखा है: "मेरा विश्वास है कि बहुत परिश्रम से तैयार की गई यह पुस्तक लोगों को उन खतरों के प्रति आगाह करेगी जिनका सामना मनुष्य जाति को करना पड़ेगा और इस समझ की सहायता से ऐसे प्रभावी कदम उठाए जाएंगे जो उन खतरों को टाल सकेंगे।" मैं प्रार्थना करता हूँ कि पूर्वी और पश्चिमी गुटों के राजनेताओं को भी ऐसी ही सद्बुद्धि प्राप्त हो।

यह रिपोर्ट केवल इस कारण से ही उपयोगी नहीं है कि इसे बड़ी सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है, बल्कि इसलिए भी कि उन पूर्वाग्रहों से भी मुक्त है जिनसे दोनों ही गुटों के देशों में रहने वाले लोग प्रभावित हैं। जो लोग किसी सरकार की नौकरी करते हैं, वे उस सरकार की हाँ में हाँ मिलाने के लिए बाध्य होते हैं। जो लोग सत्य के पक्ष में कुछ बात कहते हैं उन पर "शत्रु" की सहायता करने का आरोप मढ़ा जाता है। यही कारण है कि जब तक कि ऐसी रिपोर्ट किसी असम्बद्ध सरकार की प्रेरणा से तैयार न की गई हो, उसके आधिकारिक तौर पर निष्पक्ष होने की उम्मीद करना कठिन होता है।

ऊपर बताए गए कारणों से विश्व के साथ-साथ भारत को भी नेहरू का आभार मानना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि उन्हें अभी जिन बातों का श्रेय मिल रहा है, वे उससे भी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करेंगे। अभी तक पूर्वी और पश्चिमी गुटों के बीच जितनी भी शांति वार्ताएं हुई हैं उनमें प्रत्येक पक्ष ने कुछ ऐसे प्रस्ताव रखे हैं जो दूसरे पक्ष को कतई स्वीकार नहीं हैं, और शांति वार्ताओं की शुरुआत दो अलग-अलग प्रकार के अतिवादी सुझावों के बीच के टकराव के साथ होती आई है। यदि हम सचमुच वार्ता के आधार पर कोई समझौता चाहते हैं तो इस ढंग से ऐसा करना सम्भव नहीं होगा। एक सम्भावित वार्तातय समझौते के लिए यह तरीका अपनाया जाना चाहिए कि ऐसी शक्तियाँ समझौते का मसौदा तैयार करें जो पूर्वी या पश्चिमी गुटों में से किसी का भी प्रतिनिधित्व न करते हों, और जहाँ तक सम्भव हो किसी भी एक पक्ष को किसी प्रकार का निवल लाभ पहुँचाए बिना टकराव को कम करने के उपाय किए जाने चाहिए। यदि पूर्व-पश्चिम के बीच शांति वार्ताओं के एजेंडा में ऐसे प्रस्ताव होंगे तो वार्ताएं टकराव के साथ शुरू नहीं होंगी और उनके सकारात्मक परिणाम की अधिक उम्मीद होगी। मैं चाहूँगा कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ को ऐसी किसी योजना का प्रस्ताव दे, और यदि ऐसा करना व्यावहारिक न समझा जाए तो ये प्रस्ताव भारत की पहल पर असम्बद्ध शक्तियों के किसी समूह द्वारा प्रस्तुत किए जाएं। दुनिया भर में शांति के समर्थक दोनों गुटों के बीच संघर्ष के सम्भावित समाधानों की ऐसी निष्पक्ष घोषणा से हर्षित होंगे। ऐसी योजना के अन्तर्गत किसी भी एक पक्ष को दूसरे पक्ष को दी गई रियायतों को निष्पक्ष विचार वाले समूह द्वारा दूसरी रियायतों से संतुलित किए जाने पर आपत्ति नहीं होगी।

मानवता के अस्तित्व को खतरा इसलिए उत्पन्न हो गया है क्योंकि दोनों ही ओर की महाशक्तियाँ व्यावहारिक तौर पर ऐसा मानती हैं, हालाँकि सैद्धान्तिक तौर पर उनकी ऐसी मान्यता नहीं है, कि उनकी प्रतिष्ठा का खत्म होना मानवजाति के विनाश से बड़ा खतरा है। ऐसी स्थिति में वे शक्तियाँ जिनकी प्रतिष्ठा दाँव पर नहीं लगी है, एक बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। इन शक्तियों में भारत एक प्रमुख शक्ति है। मानव इतिहास के इस महत्वपूर्ण दौर में नेहरू की ख्याति एक ऐसे व्यक्ति के रूप में है जो विवेकपूर्ण सोच और शांति के समर्थन में खड़ा हो सकता है। सम्भवतः वही हमें भय की इस अंधेरी रात से खुशनुमा दिन के उजाले तक की राह दिखाएंगे।