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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



नेहरू की याद में निकोलस नाबोकोव
जवाहरलाल नेहरू से मेरी पहली मुलाकात 1949 में न्यूयॉर्क के एक निजी आवास में एक पार्टी में हुई थी। वे अमेरिका की यात्रा पर आए थे – मेरे विचार से वह उनकी पहली यात्रा थी। आंशिक रूप से वह एक आधिकारिक राजकीय यात्रा थी, और अंशतः निजी यात्रा थी। उनकी आधिकारिक यात्रा वाला भाग पूरा हो चुका था और अब वे अपनी अनौपचारिक न्यूयॉर्क यात्रा पर थे। नेहरू भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद की क्रूर त्रासद घटनाओं और प्रधानमंत्री के पद का कार्यभार ग्रहण करने के कुछ समय बाद ही अमेरिका आए थे। वे दुनिया की सबसे मशहूर हस्तियों में से एक थे और अमेरिका में हर व्यक्ति उनके दौरे को लेकर उत्साहित था और हर कोई उन्हें देखना चाहता था।

हमारी मेज़बान – जो नेहरू की एक मित्र थीं, ने कुछ बुद्धिजीवियों के एक छोटे से समूह को ही आमंत्रित किया था लेकिन उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा लोग वहाँ पहुँचे थे, और जब मैं वहाँ पहुँचा तो उनके घर के पहले दो कमरे लोगों से खचाखच भरे हुए थे। नेहरू अपनी बेटी और बहन के साथ पार्टी में पधारे थे। दोनों महिलाएं उपकक्ष में एक सोफे पर गपशप में मशगूल मेहमानों से घिरी बैठी थीं। नेहरू ने गहरे रंग का बिज़नेस सूट पहन रखा था, वे बड़े सादा और थोड़े से व्यग्र दिखाई दे रहे थे। वे बैठक कक्ष में खड़े थे, बाँए हाथ में जूस का गिलास लिए, उनकी पीठ एक बड़ी सी आधुनिक खाँचा खिड़की की ओर थी।

नज़दीक पहुँचने पर मैंने उनके चेहरे पर गौर किया। उनका चेहरा सुन्दर था, तराशा हुआ, सुसंतुलित, मरदाना किन्तु बारीकी से सुसज्जित नैन-नक्श वाला। वह चेहरा कहीं दूर, विचारों में गुम – थोड़ा उदास और कुछ सख्त भी लगा। लेकिन जैसे ही उस चेहरे पर मुस्कुराहट आती, भले ही वह पारम्परिक अभिवादन की मुस्कुराहट की क्यों न हो (और वह मुस्कुराहट धीरे-धीरे खिलती), उनका चेहरा अचानक स्नेहयुक्त आभा से दमक उठता।

जब मेरा उनसे परिचय कराने की बारी आई तो मेज़बान महिला ने यह रस्म अदा की: " ये, श्रीमान प्रधानमंत्री, ... हैं" और साथ ही उन्होंने कुछ और शब्द यह बताने के लिए जोड़े कि मैं एक एक संगीतकार हूँ और रूसी मूल का हूँ। और उन्होंने रूसी शब्द पर वैसे ही बल दिया जैसे नयूयॉर्क में किराना वस्तुएं बेचने वाले 'आयातित' शब्द पर ज़ोर देते हैं।

नेहरू ने अपनी काली आँखों से मुझे देखा, मुस्कुराए और बोले: 'अफसोस, हम समान रुचि के ज़्यादा विषयों पर बात नहीं कर सकेंगे... मुझे संगीत का कोई ज्ञान नहीं है... मेरे लिए तो वह एक बन्द किताब है। और फिर उनकी आँखों ने मुझे देखा, पहले व्यंग्यपूर्वक और फिर विनम्र क्षमायाचक भाव से...

'लेकिन शायद हम रूस के बारे में तो बात कर ही सकते हैं, वहाँ के कुछ महानतम लोगों के बारे में'... फिर वे पंक्ति में खड़े अगले व्यक्ति की ओर मुड़ गए।

कुछ देर बाद श्री नेहरू को खाँचा खिड़की के पास रखी हत्थेदार कुर्सी पर बैठने के लिए अनुरोध किया गया और पार्टी में आए सभी मेहमान बैठक कक्ष में जमा हो गए। धीरे-धीरे गपशप बन्द हो गई। नेहरू के चरणों में बैठी मेज़बान महिला ने घोषणा की कि प्रधानमंत्रीजी बैठक को सम्बोधित करने और कुछ प्रश्नों का उत्तर देने के लिए राज़ी हो गए हैं।

उनके शब्द तो मुझे ठीक-ठीक याद नहीं, लेकिन जो बात उन्होंने कही वह मुझे याद है। उन्होंने कई सदियों तक विदेशी शासन के बाद एक राष्ट्र के जन्म, स्वतंत्र भारत के जन्म की बात कही। उन्होंने उन शुरुआती तकलीफों और त्रासदियों का उल्लेख किया जिनका सामना किसी नवनिर्मित राष्ट्र को करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि लोग बड़ी आसानी से सामान्यीकरण कर देते हैं जिसके कारण भ्रम फैलता है। उन्होंने कहा, "हम भारतीय लोगों को अपनी सहिष्णुता के लिए जाना जाता है... अक्सर कहा जाता है कि यह हमारी ऐतिहासिक परम्परा रही है... और आप देखें कि जब हमें आज़ादी मिली और देश का विभाजन हुआ तो क्या हुआ। हमने दुनिया के सामने भयावह क्रूरता, असहिष्णुता और अन्याय का नज़ारा प्रस्तुत किया। फिर भी..." और यहाँ वे कुछ देर के लिए नीचे देखते हुए विचारमग्न हो गए, "फिर भी इस बात का सामान्यीकरण करना भी उतना ही गलत होगा। मेरा अभिप्राय यह है कि यह कहना गलत होगा कि भारत के लोग क्रूर और असहिष्णु होते हैं, कि वे सभी धार्मिक कट्टरपंथी होते हैं... मैं मानता हूँ कि वे दूसरे लोगों के जैसे ही हैं, और उन्होंने परिस्थितियों के आधार पर अच्छा या बुरा व्यवहार किया। शायद आप कह सकते हैं कि वे अज्ञानी हैं और सामाजिक विकास की दृष्टि से पिछड़े हुए हैं लेकिन इसमें उनका दोष नहीं है... देखिए," उन्होंने अपनी बात जारी रखी, "भारत को रहस्यवादी ढंग से प्रस्तुत करने का काम बहुत हो चुका है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम में... इस बात की बहुत कम जानकारी है कि हम कई सदियों तक असल में कैसी परिस्थितियों में रहे हैं, विदेशी शासन के अधीन किस प्रकार हमारे संसाधनों का दोहन किया गया और किस प्रकार हमारे अधिकांश लोगों की अनदेखी की गई...'

ये सभी बातें बड़े शांत, सभ्य और बोलचाल के अंदाज़ में कही गई थीं। उनके बोलने के ढंग में किसी बात पर विशेष बल नहीं दिया गया था, न ही किसी प्रकार का भावोत्तेजक भाषण दिया गया था, किसी प्रकार से श्रोताओं को अपने पक्ष में करने की प्रकट इच्छा भी नहीं थी। यह ईमानदारी से कही गई खरी बात थी, लेकिन उसमें कोई कड़वाहट या निन्दा करने का भाव नहीं था।

1940 के दशक के उस सुदूर दिन के बाद से मैं कई बार भारत जा चुका हूँ और चार या पाँच बार प्रधानमंत्री नेहरू से मिल चुका हूँ, उनका कृपापूर्ण आतिथ्य पा चुका हूँ। पहली बार मैं 1953 की सर्दियों में आया था। मैं दक्षिण-पूर्व एशिया के दौरे पर था और कांग्रेस के मित्रों मिल रहा था और बुद्धिजीवियों और कलाकारों से मुलाकातें कर रहा था। स्टीफन स्पेंडर भी वहाँ थे (मेरा खयाल है कि वे भारत में किसी व्याख्यान दौरे पर थे) और दिल्ली में हमारी मुलाकात हुई जहाँ मैं बम्बई से पहुँचा था।

प्रधानमंत्री को हमारे आगमन की सूचना दी गई थी और जब हम होटल में पहुँचे तो हमें उत्कीर्ण छपाई वाले कार्ड मिले जिनके माध्यम से हमें प्रधानमंत्री आवास पर दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया गया था।

स्पेंडर और मैं एक साथ प्रधानमंत्री आवास पहुँचे जहाँ श्री नेहरू के हाउसकीपर ने हमारी अगवानी की। हमने वहाँ पंजिका में अपना-अपना नाम लिखकर हस्ताक्षर किए और बगीचे की ओर चले गए जहाँ हरियाली के बीच दोपहर के भोजन की मेज सजाई गई थी। प्रधानमंत्री की पुत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी और एक विद्वान से दिखाई देने वाले सज्जन हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। हमें पेय (चैरी का रस) परोसे गए और बताया गया कि प्रधानमंत्री किसी काम के सिलसिले में संसद में रुके हुए हैं... लेकिन वे किसी भी पल पहुँचने ही वाले हैं, और वे पहुँच भी गए। हमने उनकी दुबली-पतली आकृति को लॉन में अपनी ओर आते हुए देखा। मेरा अभिवादन करते हुए उन्होंने कहा, "हाँ, मुझे याद है मैं आपसे मिल चुका हूँ। हम न्यूयॉर्क में श्रीमती एन के घर पर मिले थे, है न? ...और यहाँ आप हमारे यहाँ के संगीतकारों से मिलने और हमारे यहाँ का संगीत सुनने के लिए आए हैं?...या, आप किसी और काम के सिलसिले में आए हैं? और फिर उन्होंने स्पेंडर की ओर देखा जिनसे वे पहले से ही परिचित थे, उनके पास जाकर उनसे हाथ मिलाया।

भोजन का समय बड़ी जीवंतता और रोचकता के माहौल में बीता। नेहरू बातचीत करने में बड़े निपुण थे लेकिन साथ ही दूसरों की बात को भी बड़ ध्यान से सुनते थे। लेकिन उस समय, और उसके बाद भी उनके साथ मेरी हर मुलाकात में उनकी जिस बात ने मुझे विशेष तौर पर प्रभावित किया वह उनकी सादगी थी, किसी प्रकार के आडम्बर या दिखावे से रहित उनका बर्ताव था।

नेहरू के साथ मेरी पाँच या छह मुलाकातों या मध्याह्न भोज के अवसरों पर (आखिरी बार मैं शायद उनसे 1961 में मिला था, और इस बार भी स्पेंडर मेरे साथ थे, लेकिन इस बार जयप्रकाश नारायण भी मौजूद थे) मुझे नेहरू के साथ कई विषयों पर चर्चा करने का अवसर मिला: इतिहास, राजनीति, कला और साहित्य, लेकिन अधिकांशतः चर्चा भारत और उसकी संस्कृति और कला की परम्परा के बारे में होती थी।

वे अक्सर मुझसे कहते थे कि उन्हें यह बात समझ नहीं आती कि मैं एक संगीतकार होने के बावजूद अपनी कला के दायरे से बाहर अन्तरराष्ट्रीय राजनैतिक तनावों जैसे विषयों में इतनी रुचि किस प्रकार दिखा पाता हूँ... फिर वे यह कहते हुए चर्चा का विषय बदल देते कि, "तुम्हें इसके बारे में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है... इसे हम राजनीतिज्ञों पर छोड़ दो।"

नेहरू की निगाह में एक ठहराव था, मानवीय संवेदना की गर्माहट थी। उनके साथ एक-दो घंटे की मुलाकात के बाद ऐसा लगता था कि जैसे आप कोई सौगात लेकर लौट रहे हों, मानवीय संसर्ग और स्नेह की सौगात। मैं समझता हूँ कि लोग इसी को नेहरू का जादू बताते थे। मैं जब भी उनसे मिला, हर बार मैंने इसे अनुभव किया। उनके साथ जुड़ने और उनके आकर्षण की प्रगाढ़ अनुभूति।

प्रधानमंत्री के रूप में उनसे मेरी अन्तिम बार मुलाकात उस समय हुई जब मैं अपनी पत्नी और गॉलब्रेथ दम्पत्ति के साथ नाश्ते पर उनके आवास पर गया था। मेरा खयाल है कि यह 1961 की वसन्त ऋतु की बात थी। वे बूढ़े और थके हुए दिखाई दिए, बातें भी बहुत कम कीं और लग रहा था कि वे चिन्तामग्न हैं। मुझे मन ही मन दुख हुआ कि मैंने नाश्ते के लिए उनके निमंत्रण को स्वीकार करके उनके ऊपर बोझ डाला था। लेकिन उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और बड़ी सहृदयता से बोले, "आप मेरे ऊपर बोझ नहीं हो सकते हैं, मुझे आपसे मिल कर हमेशा खुशी मिलती है... बात सिर्फ इतनी है कि इन दिनों में हमेशा हड़बड़ी में रहता हूँ... अब मैं पहले जैसा चुस्त-दुरुस्त, उतना स्फूर्तिवान नहीं रहा..."

पिछले साल के फरवरी माह में जब मैं पूर्व-पश्चिम संगीत सम्मेलन के सिलसिले में दिल्ली गया था तब उनकी बेटी से मुलाकात हुई, किन्तु उनके साथ भेंट न हो सकी। उन्हें अपनी इच्छानुसार मेहमानों से मिलने से मना किया गया था और वे लोगों से केवल आवश्यक कार्यों के सिलसिले में ही मिलते थे। फिर भी उनके पुराने मित्र येहुदी और डायना मेन्युहिन उनसे मिलने के लिए गए जहाँ उन्होंने नेहरू के साथ दोपहर का भोजन किया और उन्हें बहुत से मज़ेदार किस्से सुनाए जिन्हें सुनकर वे बहुत हँसे। लेकिन जब वे वापस लौटे तो वे उनकी सेहत की खराब हालत को देखकर व्यथित थे।

मुझे बताया गया कि डॉक्टरों ने उन्हें अपने जीवन की रक्षा करने के लिए इस्तीफा देकर कुछ समय आराम करने की सलाह दी थी... लेकिन यह समाधान मंज़ूर नहीं था। यह समाधान नेहरू की प्रकृति के अनुकूल नहीं था। यानी वे जानते थे, उनकी पुत्री को भी इसका आभास था, और उनके बहुत से नज़दीकी लोगों को भी इस बात का आभास था, कि उनकी मृत्यु सन्निकट है, ज्यादा से ज़्यादा इस शरद ऋतु तक... लेकिन उन्होंने उसी प्रकार जीवन त्यागने का फैसला किया जैसे उन्होंने जीवन को जिया था, पूरी तरह काम करते हुए और इस प्रकार अपनी पूरी ऊर्जा को अपने देश और अपने देशवासियों के हित में लगाते हुए।