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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



श्रद्धांजलि यू. थांट
भारत के दिवंगत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए अपनी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करना मेरे लिए एक विशेष अवसर है। मेरी राय में प्रधानमंत्री नेहरू मानव जाति के इतिहास के सूत्रों के सबसे संवेदनशील विश्लेषकों में से एक थे, और वे एक महान नेता इसलिए बन सके क्योंकि उन्हें इतिहास के रुझानों की समझ थी। वे केवल एक महान व्यक्ति ही नहीं थे, बल्कि एक अच्छे इन्सान भी थे। अपने असाधारण गुणों के कारण वे न केवल भारत के लोगों के ही चहेते थे, बल्कि दुनिया भर में शांति, न्याय और मनुष्य जाति के लिए समानता का हृदय से सम्मान करने वाले सभी लोगों को भी प्रिय थे। मेरे विचार से उनकी महानता का एक कारण यह था कि उन्हें हाइड्रोजन बम की छाया में मानव जाति की स्थिति की समझ थी। वे नई समस्याओं के समाधान के लिए नई अवधारणाओं, नए दृष्टिकोण, नई सोच के पथप्रदर्शक थे। और लोगों से कहीं अधिक वे इस बात को समझते थे कि पुरानी अवधारणाओं, पुराने दष्टिकोण और यहाँ तक कि पुरानी सोच के सामने नई एकदम नई परिस्थितियों की चुनौतियाँ खड़ी थीं। इसलिए नेहरू ने मानवता को सदियों पुरानी अवधारणाओं से नई अवधारणाओं, नए दृष्टिकोण और नए सिद्धान्तों की ओर ले जाने का प्रयास किया ताकि वह हमारे युग की परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य कर सके। वे बड़े कुशाग्र बुद्धि थे, यह एक ऐसा गुण है जिसकी पश्चिम के समाजों में बड़ी कद्र है। साथ ही उनका व्यक्तित्व विवेक और नैतिक गुणों से परिपूर्ण था, ये ऐसे गुण हैं जिन्हें हमारे यहाँ पूर्व में बहुत सम्मान से देखा जाता है। लेकिन उनकी महानता इस बात में छिपी थी कि वे अपने आपको बड़ी आसानी से ढाल लेते थे, और नए वातावरण और नई परिस्थितियों में इस तरह घुल-मिल जाते थे कि वे अपनी बौद्धिक क्षमताओं और नैतिक गुणों के कारण सभी के लिए एक शक्तिपुंज थे।

यदि मैंने पश्चिम की अवधारणा को ठीक समझा है तो वहाँ मनुष्य के बौद्धिक विकास पर अधिक बल दिया जाता है। पूर्व में शिक्षा के प्रति पारम्परिक नज़रिया इससे अलग रहा है। वहाँ मनुष्य के नैतिक और आध्यात्मिक गुणों को विकसित करने पर ध्यान दिया जाता है। मेरी राय यह है कि तदनुरूपी नैतिक और आध्यात्मिक विकास के बिना शुद्ध बौद्धिक विकास निश्चित रूप से एक के बाद एक समस्या में डालेगा, जबकि आवश्यक बौद्धिक विकास से रहित केवल नैतिक और आध्यात्मिक विकास की मान्यता समय की आवश्यकता के अनुकूल नहीं है। पंडित नेहरू ने इस आधारभूत बात को समझा था। यदि मुझे किसी ऐसे महान व्यक्ति, मानव जाति के किसी महान नेता का नाम लेना हो जिसने मनुष्यों की बौद्धिक क्षमताओं को नैतिक और आध्यात्मिक गुणों के साथ सुमेलित करने की आवश्यकता को समझा तो पंडित नेहरू ही वह नेता थे।

जवाहरलाल नेहरू एक प्रतिबद्ध अन्तरराष्ट्रीयतावादी भी थे। वे अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की अवधारणा में सच्ची श्रद्धा रखते थे। नवम्बर 1961 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा को सम्बोधित किया था, और उस अवसर पर उन्होंने कहा था:

हम लगातार एक आतंक की व्यवस्था में जी रहे हैं। किस चीज़ का आतंक? आसन्न युद्ध जैसी विपत्ति के घटित होने का आतंक। एक ऐसी आपदा जो परमाणु शस्त्रों का प्रयोग किए जाने कि स्थिति में उत्पन्न होगी और जिससे दुनिया के अस्तित्व का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। दुनिया को चुनाव करना है कि वह आत्म-विनाश और उत्तरजीविता में से किसे चुनेगी। बहुत से लोग धरती में बिल बनाकर रहने वाले चूहों की तरह मांदें बनाकर छिप जाने को परमाणु युद्ध से अपने बचाव के ज़रिए के रूप में बताते हैं। निश्चित तौर पर यह प्रतिक्रिया हमारे युग की विडम्बना को दर्शाती है कि हम विभीषिका को टालने की दिशा में अपनी पूरी ऊर्जा को लगाने के बजाए इस तरह के निष्कर्षों पर पहुँचने के लिए मजबूर हैं।

इस स्थिति को बदलने के लिए उन्होंने सहयोग की पेशकश की।

इस दुनिया के लिए सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। दुनिया में चल रहे इस प्रकार के सहयोग के बारे में बहुत कम उल्लेख किया जाता है, लेकिन हर संघर्ष की खूब चर्चा होती है और इसलिए दुनिया में यह धारणा बन चुकी है कि झगड़े चलते ही रहते हैं और हम विभीषिका के कगार पर हैं। शायद स्थिति का सही चित्रांकन यह होगा कि दुनिया में सहयोगकारी शक्तियों को प्राथमिकता दी जाए और हम जैसे लोगों को यह बताया जाए कि दुनिया का भविष्य संघर्ष के बजाए सहयोग पर निर्भर करता है।

और फिर उन्होंने यह सुझाव दिया:

सम्भवतः इस सभा को सभी देशों का आह्वान करते हुए यह प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि वे एक वर्ष का समय केवल शांति के बारे में भाषणों को समर्पित करने के बजाए, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि वैसा करना मात्र ज्यादा उपयोगी है, राजनैतिक, सांस्कृतिक या और दूसरे क्षेत्रों में, और ऐसे हज़ारों क्षेत्र हो सकते हैं, सहयोग सम्बंधी कार्यकलापों को बढ़ावा देने के लिए समर्पित करें।

1965 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बीसवें वर्ष को हम अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के वर्ष के रूप में मनाने जा रहे हैं। इस आयोजन को संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के उस विचार के सम्मान के रूप में देखा जा सकता है जिसे जवाहरलाल नेहरू ने इतने अर्थपूर्ण ढंग से प्रतिपादित किया था।