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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



जवाहरलाल नेहरू आर्नॉल्ड टॉइन्बी
मेरा नेहरू से कोई निकट परिचय नहीं था, दरअसल मैं उनसे ज़्यादा बार नहीं मिला था। लेकिन उनसे पहली मुलाकात में ही उनके व्यक्तित्व ने मुझे तुरन्त प्रभावित किया, और फिर साल-दर-साल उनके बारे में बनी वह राय फिर बदली नहीं। पहली मुलाकात का वह प्रभाव भी सिर्फ एक छवि मात्र नहीं था – दुनिया में मिलने वाले लोग बहुत हल्के और स्नेहहीन होते हैं। 'सम्मोहन' शब्द शायद सच्चाई को बेहतर ढंग से बयान करता है। वे ऐसे व्यक्ति थे जो व्यक्ति का दिल जीत लें और उसे अपने पास भी रख लें।

किसी भी क्षेत्र के किसी भी व्यक्ति में ऐसे गुण का होना एक उल्लेखनीय बात होगी; लेकिन सामान्य ओहदे वाले किसी ऐसे व्यक्ति में यह बात उतनी आश्चर्यजनक नहीं लगेगी जिसको लोग जानते न हों जितनी उस विश्व विख्यात राजनेता में जिसने न केवल अपने देश पर बल्कि दुनिया भर में गहरी छाप छोड़ी है। इस महान राजनेता के भीतर के इन्सान की आत्मीयता उसकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा के बोझ तले दबी नहीं थी। मैं तो कहूँगा कि नेहरू में तड़क-भड़क, अहंकार और संकोच लेशमात्र भी नहीं था। कई वर्षों तक अपने पद का गुरुतर बोझ उठाने के बाद भी उन्होंने अपनी युवावस्था की सहजता और प्रफुल्लता को बरकरार रखा था। अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में ही वे भारत और चीन के बीच अतिक्रमण की अप्रत्याशित घटना के बोझ से झुकने लगे थे।

नेहरू के साथ मेरी पहली मुलाकात में नेहरू के व्यक्तित्व इस प्रकार प्रकट हुआ जो एक प्रकार से रोचक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक, और उससे भी बढ़कर नैतिक दृष्टि से प्रभावित करने वाला था। बात उन दिनों की है जब युद्धों के बीच की अवधि चल रही थी और नेहरू हाल ही में ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए कारावास की अवधि काट कर लौटे थे। वे जेल से छूटे थे और छुट्टी बिताने के लिए इंग्लैंड आए थे। एक अंग्रेज़ महिला ने उनसे मिलने के लिए मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया था। जब मैं पहुँचा तो नेहरू वहाँ पहले से ही मौजूद थे, लेकिन जब अगले अतिथि के लिए दरवाजा खुला तो वरदी में एक ब्रिटिश जनरल ने प्रवेश किया, और जब उस जनरल ने नेहरू को देखा तो वह अवाक रह गया। ज़ाहिर है कि नेहरू हाल में जो सज़ा काट कर आए थे वह जनरल उसमें किसी प्रकार से लिप्त था। (मैं कभी यह नहीं जान सका कि हमारी मेज़बान ने उस जनरल और नेहरू को जानबूझकर मिलने के लिए बुलाया था, या अनजाने में ऐसा हुआ था। मैं तो कहूँगा कि यह अनजाने में हुआ था। उस महिला के पति का परिवार लम्बे समय से भारत से जुड़ा रहा था, और उसे लगा होगा कि भारत से किसी न किसी तौर पर जुड़े इन दोनों लोगों को दोपहर के भोजन पर आमंत्रित करना ठीक रहेगा।)

मैं सोच रहा था कि इस स्थिति में नेहरू की क्या प्रतिक्रिया होगी। जनरल के आने से पहले के कुछ मिनटों की चर्चा से हमारे मन में नेहरू के आक्रामक रुख के बारे में कोई संदेह नहीं बचा था। ज़ाहिर था कि वे किसी भी हाल में भारत को ब्रिटेन से आज़ाद कराना चाहते थे; वे इसके लिए पूरी तरह कमर कसे हुए थे। क्या वे उलझन में फंसे उस ब्रिटिश जनरल का अभिवादन रूखे ढंग से करेंगे? क्या उनका रवैया सख्त होगा? इस प्रश्न का जवाब नेहरू की आँख में आई चमक से क्षण भर में ही मिल गया। उन्हें वह स्थिति बड़ी मज़ेदारी लगी और उन्होंने बात-बात पर जनरल को हलके से चिढ़ाते हुए हमारा मनोरंजन किया जिससे जनरल हर बार की शरारतपूर्ण छेड़-छाड़ से आकुल होकर मैत्रीपूर्ण बातें करने लगा। हालाँकि यह घटना अपने आप में छोटी थी, लेकिन इससे उनका एक पक्ष उद्घाटित हुआ। मैं एक ऐसे व्यक्ति के साथ था जो अपने विरोधियों से घृणा किए बिना उनसे लड़ सकता था, और पूरी ताकत से लड़ सकता था। ब्रिटिश लोगों के हाथों हुए बुरे व्यवहार के अनुभव के रूप में नेहरू के पास क्रोधित होने के लिए पर्याप्त कारण था। कारावास में बिताया समय किसी व्यक्ति के जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा छीन लेता है; और भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों को ब्रिटिश उन्हीं आदर्शों की प्रेरणा से कार्य करने के लिए कैद कर रहे थे जिनका ब्रिटिश लोग स्वयं समर्थन करते थे और अपने देश में अपने लाभ के लिए सम्मान की दृष्टि से देखते थे। यहाँ उनके प्रति कड़वाहट का कारण था, लेकिन नेहरू ने कोई कड़वाहट नहीं जताई। मैं जानता था कि घृणा किए बिना संघर्ष करना महात्मा गाँधी के सिद्धान्तों में से एक था। यहाँ मैं उनके एक प्रमुख सहयोगी को व्यावहारिक जीवन में पहाड़ पर यीशू की शिक्षाओं को लागू कर रहा था, और वह भी बिना किसी प्रकार के आत्मसंतुष्टि के भाव के, वह भी सहज रूप से। उनकी इस क्षमता ने मुझे चकित कर दिया था, और उस भोज की स्मृति मेरे मन में आज भी इस तरह तरोताज़ा है जैसे वह घटना तीस साल पहले घटित न हो कर कल ही हुई हो।

मुझे एक और निजी अनुभव की याद आती है जो एक दूसरी घटना से सम्बंधित है जो इतनी महत्वपूर्ण न होते हुए भी, सारगर्भित है। 1956 में एक दिन दिल्ली विश्वविद्यालय मुझे एक डिग्री प्रदान करके सम्मानित करने वाला था, और इसके लिए आयोजित कार्यक्रम के नियत समय पर मैं विश्वविद्यालय परिसर से काफी दूरी पर था। विश्वविद्यालय अशोक होटल से काफी दूरी पर दिल्ली के दूसरे छोर पर सिविल लाइंस में स्थित है, और हम शाहजहानाबाद की भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर यातायात में फँसे हुए थे। आखिरकार जब हम विश्वविद्यालय से करीब एक चौथाई मील की दूरी पर थे (लेकिन तब तक हमें पौन घंटे की देर हो चुकी थी), मुझे अचानक यह देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि नेहरू हमारी ओर दौड़े चले आ रहे थे। एक प्रधानमंत्री मुझे सम्मानित करने और खुश करने के लिए एक अकादमिक कार्यक्रम के लिए कैसे समय निकाल सकता था? और ऐसा क्यों था, कि इतने लोगों में से वे खुद मुझे ढूँढने के लिए निकले थे? मैंने पहले ही पौन घंटे का समय खराब कर दिया था, लेकिन वे नाराज़ नहीं थे। मुसीबत तो उनके सुरक्षाकर्मियों की थी। जब हम एक साथ विश्वविद्यालय पहुँचे, तो उन्हें इस बात के लिए झाड़ पड़ रही थी कि उन्होंने प्रधानमंत्री को सुरक्षा घेरे से बाहर जाने से रोका क्यों नहीं। इस बात को लेकर चिन्ता उचित ही थी। क्या महात्मा गाँधी की हत्या नहीं की गई थी? और क्या प्रधानमंत्री वह व्यक्ति नहीं थे जिन पर गाँधी के कार्य को करने का दायित्व था?

नेहरू से मैं अन्तिम बार 1960 में मिला था, और उन्हें देख कर दुख हुआ, उनका मिजाज़ तो नहीं बदला था, लेकिन यह साफ था कि वे अपने दायित्व के बोझ से दब रहे थे। उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया था, और हमारी मुलाकात के दौरान मैंने कोशिश की कि चीन के विषय पर कोई बात न की जाए, क्योंकि मैं जानता था कि उन दिनों यही बात उन्हें साल रही थी। लेकिन इस कोशिश का कोई फायदा नहीं हुआ। उन्होंने खुद यह विषय छेड़ दिया और ज़ाहिर था कि वे इससे बहुत दुखी थे और इस दुख ने उनके मन में घर कर लिया था। उनका यह रूप पिछली मुलाकातों से बिल्कुल अलग था; लेकिन फिर, जैसाकि पहले भी हर बार होता था, उनका वह मानवीय स्वरूप निकल कर प्रकट होता जो हैरान कर देने वाला होता था। मैं आज़ाद स्मारक व्याख्यानमाला की दूसरी श्रृंखला में व्याख्यान देने के सिलसिले में नई दिल्ली आया था (नेहरू स्वयं इसमें पहला व्याख्यान दे चुके थे)। मैं अपना पहला व्याख्यान देने के लिए अभी खड़ा ही हुआ था कि प्रधानमंत्री ने सभाकक्ष में प्रवेश किया। एक बार फिर उन्होंने अपने एक अतिथि की खुशी के लिए एक अकादमिक कार्यवाही में निजी तौर पर उपस्थित रहने के लिए समय निकाला था। किसी प्रधानमंत्री के लिए ऐसा करना बड़ी उदारता की बात थी, किन्तु यह घटना इसलिए भी बड़ी हृदयस्पर्शी थी क्योंकि उस दिन उस दिन उन्हें एक गम्भीर निजी क्षति पहुँची थी। उसी दिन लेडी माउंटबेटन की मृत्यु हुई थी। लेडी माउंटबेटन और पंडित नेहरू करीबी मित्र रहे थे। और, नेहरू के स्नेही हृदय के लिए मित्रों का हमसे भी अधिक महत्व था। एक बार फिर मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ था।

यह निश्चित दिखाई देता है कि आने वाले युगों में नेहरू को इतिहास पुरुष के रूप में याद किया जाएगा, लेकिन भविष्य में उनकी छवि कैसी होगी? उनके स्नेही स्वभाव, जिससे उनके नज़दीकी मित्र मुझसे अधिक परिचित थे, की छवि उनसे व्यक्तिगत तौर पर मिलने पर अंकित हो जाती थी। किसी और से सुनी हुई बात से वह छवि धुँधली हो सकती है और समय बीतने के साथ-साथ मिट भी सकती है।

क्या नेहरू को एक महान राजनेता के रूप में याद किया जाएगा? निःसंदेह वे एक महान राजनेता थे। लेकिन मैं यह कह चुका हूँ और मुझे लगता है कि मेरी यह धारणा सही है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी ख्याति उनकी सबसे बड़ी विशेषता नहीं थी। जब कोई महान आत्मा राजनैतिक नेतृत्व सम्भालने का दायित्व अपने ऊपर लेती है तो हमें उसका आभार मानना चाहिए, क्योंकि राजनीति को मुक्ति दिलाने की आवश्यकता हमेशा ही बनी रहती है। मानवीय कार्यकलाप का यह एक ऐसा पिछड़ा क्षेत्र है जहाँ हमारे व्यवहार का औसत मानक निश्चित तौर पर हमारे पारिवारिक जीवन या व्यावसायिक जीवन के मानक से निम्नतर होता है। ऐसी महान आत्माएं जोखिम उठाकर राजनीति में जाती हैं, क्योंकि राजनीति को मुक्त कराना उतना ही अधिक कठिन है जितनी अधिक उसे मुक्त कराए जाने की आवश्यकता है। राजनीति दुःसाध्य है। उच्च आदर्शों और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता को मिलाकर काम करने वाली असाधारण आत्माएं भी एक जन्म में राजनीति को उसकी बुराइयों से मुक्त नहीं करा सकती हैं। महानतम विचारों वाला राजनेता भी अपनी दंभपूर्ण परिस्थितियों का गुलाम होने से पूरी तरह नहीं बचा रह सकता है। इसके दुष्चक्र में फँसना वह वैयक्तिक मूल्य है जो सिद्धान्तवादी राजनेता को चुकाना पड़ता है। अपने सिद्धान्तों की रक्षा की खातिर कारावास काटना दूसरों को उन्हीं सिद्धान्तों के नाम पर असंगत रूप से बन्दी बनाने से कहीं बेहतर है। नेहरू दोनों अनुभवों से होकर गुज़रे। एक महान देश की सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी सम्भालने की यही नियति थी।

मैं मानता हूँ कि खुद नेहरू के लिए उनका राजनैतिक कैरियर विशिष्ट होने के बावजूद उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि नहीं था, क्योंकि उनकी दृष्टि में वह कोई साध्य नहीं था। उनके लिए यह एक साधन था जिसकी सहायता से वे साथी मनुष्यों – प्रथमतः अपने भारतीय देशवासियों, लेकिन केवल उनकी ही नहीं, सेवा कर सकते थे; उनकी सहानुभूति का विस्तार समस्त मानवजाति तक था। नेहरू ने कई बार इस बात का उल्लेख अपने सार्वजनिक भाषणों में किया है। वे मानवजाति के कल्याण और उसके भविष्य को लेकर चिन्तित रहते थे, और यदि इतिहास में उनके इस मूलभूत गुण को ईमानदारी से दर्शाया गया तो आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें उनके इसी दृष्टिकोण के लिए सम्मानपूर्वक याद करेंगी।

मेरे लिए इस मानवीय शख्सियत को ऐसी किसी निर्वैयक्तिक श्रेणी में रखना कठिन है जिनका उपयोग इतिहासकार लोगों की श्रेणी निर्धारित करने के लिए करते हैं। लेकिन यदि ऐसा करना ही पड़े तो मैं कहूँगा कि नेहरू ने पश्चिम की सभ्यता और दूसरी समकालीन सभ्यताओं के बीच व्याख्याताओं और मध्यस्थों की श्रृंखला में अपने आप को सुस्थापित करके अपने साथी मनुष्यों की सबसे सार्थक ढंग से सेवा की। आधुनिक समय में पश्चिम की सभ्यता ने शेष दुनिया पर एक क्रान्तिकारी छाप छोड़ी है। यह प्रभाव इतना शक्तिशाली रहा है कि गैर-पश्चिमी लोगों के सामने यह स्थिति उत्पन्न हो गई कि वे या तो इसे स्वीकार कर लें या फिर हताशा में उस प्रभाव के पराभूत हो जाएं। इसके विपरीत पश्चिम को भी अब यह बात समझ में आने लगी है कि उसे भी गैर-पश्चिम के बहुसंख्यक मानवसमाज को स्वीकार करना होगा। दरअसल ऐसा प्रतीत होता है कि हम पूरी मानवजाति को एक मानने वाले एक ऐसे नए समाज के जन्म की पीड़ा के दौर से गुज़र रहे हैं जो पुराने समय की अलग-अलग खंडों की धारणाओं जैसी अनेक और परस्परविरोधी धारणाओं के बावजूद समस्त मानव जाति को एक मानता है। ऐसा दिखाई देता है कि पिछले चार या पाँच सौ सालों के इतिहास से दुनिया इसी लक्ष्य की ओर बढ़ती हुई दिखाई देती है। और यदि अनुमान सही है, तो फिर वर्तमान समय में व्याख्या करने और मध्यस्थता की भूमिका वर्तमान युग की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। यह भूमिका किसी राजनेता की भूमिका से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है; और दरअसल बहुत से बेहद प्रभावशाली टीकाकारों ने इस भूमिका को राजनीति के क्षेत्र से बाहर रहते हुए निभाया है। इन लोगों ने इस भूमिका को विद्वानों, लेखकों, कलाकारों, कवियों, और पैगम्बरों के रूप में निभाई है। नेहरू उन लोगों में से एक थे जिन्होंने यह भूमिका राजनीति के मंच पर निभाई; और एक सभ्यता के राजनेता-व्याख्याता के रूप में दूसरी सभ्यता के राजनेता-व्याख्याताओं के बीच निभाई, हम ऐसी कई श्रेणियाँ गिना सकते हैं। एक ऐसे निर्मम सार्जेन्ट मेजर का उदाहरण है जो अपने सैनिकों को सांस्कृतिक परिवर्तन की पीड़ादायी प्रक्रिया से गुज़रने के लिए मजबूर करता है; और एक ऐसा दृष्टा है जो अपने अनुयाइयों को उसी पीड़ादायी मार्ग पर स्वेच्छा से चलने के लिए प्रेरित करता है। इन दोनों में से पहले प्रकार के प्रसिद्ध उदाहरणों में पीटर महान, मोहम्मद अली, मुस्तफा कमाल अतातुर्क, और एक व्यंग्यार्थ में जापान की मेइजी क्रान्ति के प्रणेताओं को शामिल किया जा सकता है।

ज़ाहिर है कि जवाहरलाल नेहरू उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मानवजाति को बलप्रयोग से नहीं, बल्कि अनुनय-प्रोत्साहन से प्रेरित करती है, और इस श्रेणी के दूसरे नेताओं के जो नाम मुझे याद आते हैं वे भी नेहरू की ही भांति सभी भारतीय ही हैं। सम्राट अशोक उनमें से एक थे, जिनका मत परिवर्तन उनके जीवन के अनुभव के कारण हुआ था, जो एक नियंत्रणकारी शासक से धर्मप्रचारक बन गए थे, लेकिन उन्होंने भी अपने समस्त जीवन का कार्य राजनीति के मंच पर ही किया था। जिन दो अन्य लोगों का मैं उल्लेख करना चाहूँगा उनमें ब्रह्म समाज के संस्थापक राम मोहन रॉय और निःसंदेह नेहरू के नायक और मार्गदर्शक महात्मा गाँधी शामिल हैं।

नेहरू का स्थान इस श्रेणी के लोगों के बीच में है, और उन्हें इसी रूप में उनका स्मरण और गुणगान किया जाना चाहिए।