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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



सर्वथा विश्वसनीय एस.डब्ल्यू. आर. भंडारनायके
वैयक्तिक तौर पर नेहरू से मेरा परिचय 25 साल से अधिक समय से रहा है। मैं पहली बार उनके सम्पर्क में तब आई जब वे तीस के दशक के शुरुआती वर्षों में सीलोन के दौरे पर आए थे। उनकी जिस विशेषता ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा वह यह थी कि वे अपने महान नेता महात्मा गाँधी, जो कुछ समय पहले ही सीलोन के दौरे पर आए थे, से कितने अलग थे। ज़ाहिर है कि महात्मा स्पष्ट तौर पर आम लोगों की संतान थे। हालाँकि वे संत और आत्मसंयमी थे, वे बड़े मानवीय और विनोदी स्वभाव वाले भी थे। शरीर से भले ही वे क्षीणकाय दिखाई देते थे, लेकिन वे मज़बूत थे और उनमें ऊर्जा का समाप्त न होने वाला भंडार था। वहीं दूसरी ओर नेहरू जो अभिजात नज़ाकत के साथ पले-बढे हैं, वे भी ऊर्जा का अक्षय भंडार हैं, हालाँकि उनकी ऊर्जा का सम्बंध शारीरिक क्षमता की तुलना में स्नायविक ऊर्जा से अधिक है। यह सच है कि कई बार उनकी यह मानसिक ऊर्जा चुक जाती है और कभी कभी वे गुस्सैल और चिड़चिड़े हो जाते हैं। मुझे कई वर्ष पहले की सीलोन की उनकी यात्रा से जुड़ी एक घटना याद है। हम शहर से बाहर कुरुनेगाला नाम के एक स्थान पर दोपहर का भोजन कर रहे थे, और जमा प्रशंसकों की भीड़ हमें देखने के लिए दरवाज़ों और खिड़कियों से झाँक रही थी। नेहरू हमारी ओर मुड़े और बोले, "ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जिन्हें मैं लोगों के बीच सार्वजनिक तौर पर कर सकता हूँ लेकिन मैं लोगों की भीड़ के बीच भोजन नहीं कर सकता हूँ", या कुछ ऐसा ही उन्होंने कहा था। मुझे याद है कि मैंने विनोदपूर्वक ही अपने आप से कहा था, "यह एक संवेदनशील अभिजात बोल रहा है।" ज़ाहिर है कि हमने भीड़ को भोजन समाप्त हो जाने तक दूर हो जाने के लिए कहा था। मुझे लगता है कि किसी रूप में मैं नेहरू जैसे लोगों के स्वभाव को समझने की योग्यता रखती हूँ। हालाँकि कभी-कभी वे भड़क जाते हैं या चिड़चिड़े हो जाते हैं, लेकिन व्यक्तित्व बेहद आकर्षक है, और जितना अधिक आप उन्हें जानते जाते हैं, उतना ही उनके प्रति आपका आदर और प्रेम बढ़ता जाता है। हमारे व्यक्तिगत सम्बंधों में मैं उन्हें एक ऐसा मित्र मानती हूँ जिनके प्रति मेरे मन में ये दोनों भावनाएं हैं।

मैं नेहरू के व्यक्तित्व के एक दूसरे पक्ष के बारे में भी कुछ कहना चाहती हूँ: जनता के नेता के रूप में उनका स्थान। वे अपने देश के एक महान सेवक हैं और एशिया के और सामान्य दृष्टि से विश्व के एक महान राजनेता हैं। मुझे याद आता है कि मैंने उस समय किसी प्रमुख भारतीय नेता से यह प्रश्न पूछा था जब वे उतने बड़े नेता नहीं बने थे, कि महात्मा गाँधी के बार उनकी राय में सबसे उत्कृष्ट नेता कौन है। उन्होंने जवाब दिया, "जवाहरलाल नेहरू।" जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने नेहरू का ही नाम क्यों लिया जबकि मैंने कुछ और नेताओं के नामों का भी उल्लेख किया था, तो उनका जवाब था, "क्योंकि नेहरू सर्वथा भरोसे के लायक हैं।" मुझे लगता है कि इस भावना के कारण ही उनके देश की अधिकांश जनता लगातार उनमें विश्वास व्यक्त करती है। नेहरू दुनिया के उन इने-गिने राजनेताओं में से हैं जो संस्कृति और शिक्षा की पृष्ठभूमि से आते हैं, और कर्म में विश्वास रखने के साथ-साथ विचारक भी हैं। विश्व इतिहास के इस संकट भरे दौर में नेताओं के रूप में ऐसे व्यक्तियों की विशेष तौर पर आवश्यकता है जो किसी समस्या के केवल एक पहलू पर नहीं बल्कि उसके सभी पक्षों के बारे में समग्रता से विचार कर सकते हों और फैसले ले सकते हों, कभी-कभी केवल विगत और वर्तमान के आधार पर ही नहीं बल्कि भविष्य को भी ध्यान में रखते हुए कड़े फैसले लेने की क्षमता रखते हों। नेहरू इतिहास के जानकार तो हैं ही, और राजनेताओं के लिए इसका ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण होता है, उनकी जानकारी का दायरा इससे कहीं ज़्यादा बड़ा है। वे इतिहास के दर्शन को समझते हैं। और इसलिए वे वर्तमान समय और भविष्य के रुझानों के बारे में ठीक-ठीक आकलन कर सकते हैं। साथ ही वे एक साहसी व्यक्ति भी हैं। उन्होंने स्वयं कहा है, "हो सकता है कि मैं कभी-कभी अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता हूँ, लेकिन अपना होश कभी नहीं गँवाता।" उनके यही गुण उन्हें भारत का एक अमूल्य सेवक और विश्व का एक महान राजनेता बनाते हैं।

भारत में कभी-कभी उनके खिलाफ यह आरोप लगता है कि वे कमज़ोर हैं और कुछ अवसरों पर कार्रवाई करने में हिचकिचाते हैं। मैं उन्हें जितना जानती हूँ उसके आधार पर मैं कह सकती हूँ कि उनकी यह आलोचना उचित नहीं है। कुछ सतही प्रेक्षकों को जो उनकी कमज़ोरी या हिचक के रूप में दिखाई देता है वह सम्भवतः इस कारण से है कि वे किसी समस्या के सभी पक्षों और पहलुओं पर विचार करते हैं और वे न्याय के उस मूलभूत सिद्धान्त का पालन करने वालो में से हैं जिसके अनुसार वे किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले दूसरे व्यक्ति के नज़रिए और अपने नज़रिए का मूल्यांकन करते हैं और तब कोई निर्णय लेते हैं।

अब वे उस अवस्था में पहुँच चुके हैं जिसे औसत व्यक्ति के जीवन काल के रूप में देखा जा सकता है: सत्तर वर्ष। उनका कैरियर सम्पूर्णतायुक्त, विविधतापूर्ण और विशिष्ट रहा है। इतिहास में उनका स्थान सुनिश्चित है। वे अभी भी स्फूर्ति और ऊर्जा से भरपूर हैं और न तो भारत और न ही विश्व उनके जैसे व्यक्ति की सेवाओं से कभी वंचित होना चाहेगा। वे दीर्घायु हों ताकि आने वाले कई वर्षों तक भारत की और हम सभी की सेवा करते रहें।