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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



‘भारतीय स्वाधीनता-संग्राम की प्रतिमूर्ति’श्री गोविन्दवल्लभ पन्त, 25 अगस्त, 1949
पंडित जवाहरलाल नेहरू आज 60 वर्ष के हो गए। फिर भी वह 60 वर्ष के हो गये, यह मन को विश्वास नहीं होता। युवकों के इस हृदय-सम्राट् का सम्मान सदा युवक के रूप में ही किया जाता रहा है। स्फूर्ति और चेतना की इस चल प्रतिमा ने भारत के युवकों पर गहरी छाप डाली है। अपने जीवन का अधिकांश देश की स्वाधीनता की लड़ाई में लगा देने के कारण पंडित जवाहरलाल भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के प्रतिमूर्ति हो गये हैं। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो उन्हें शासन-भार वहन करना पड़ा। वह भारत के प्रथम प्रधान मन्त्री हुए। कल का युवक और विद्रोही नेता आज एकाएक भारत राष्ट्र का सिरमौर और प्रधान शासक हो गया। जिस जटिल और कठिन समय में उन्होंने भारत की नौका की पतवार सँभाली और जिस योग्यता, सहिष्णुता और सहृदयता से उन्होंने उसे आगे बढ़ाया उसकी सराहना विदेशियों ने भी मुक्तकंठ से की है। अत्यन्त योग्यता, निपुणता और अद्भुत कौशल के साथ उन्होंने उच्चतम पद की शोभा बढ़ायी है। सर्वोच्च कोटि का मानव-प्रेम, उदार भाव, सत्य और न्याय-निष्ठा जवाहरलालजी में प्रतिबिम्बित है।

मेरा यह सौभाग्य है कि जवाहरलाल से मेरा घनिष्ठतम सम्बन्ध रहा है। कई बार हमें एक साथ जेल-जीवन बिताना पड़ा। जितना अधिक मैंने उन्हें देखा, उनके प्रति स्नेह और आदर बढ़ता गया। जितना ही अधिक इस महापुरूष के निकट हम पहुँचते हैं उतना ही अधिक उसकी महत्ता हमें प्रज्वलित प्रतीत होती है। उनकी प्रगाढ़ विद्वत्ता, अदम्य साहस, उत्तम कर्तव्यनिष्ठा, अद्वितीय और अद्भुत त्याग, निस्सीम कर्मठता, ठोस राजनीतिज्ञता आदि गुण सर्व-विदित और सर्वत्र सम्मानित हैं। मेरी दृष्टि में उनकी विद्वत्ता और पांडित्य की अपेक्षा उनके हृदय की विशालता अधिक मोहक है। उनकी जैसी कोमल मानसिक भावना कम लोगों में देखी जाती है। और इस कोमल भावना में उदारता और दया समाविष्ट है। जिन्होंने उन्हें सार्वजनिक सभाओं के मंचों पर उत्तेजित देखा है वे उनके विचारों की कोमलता, आन्तरिक नम्रता और उदार वृत्ति तथा सहानुभूति की भावना की कल्पना स्यात् ही कर सकें।

जवाहरलाल का जीवन कलामय है। छोटी से छोटी बात से लेकर बड़ी से बड़ी समस्याओं तक पर वह यही दृष्टि डालते हैं और हर काम को लालित्य और माधुर्य से परिपूर्ण करना चाहते हैं, सरस बनाते हैं। साधारण से साधारण कार्य को भी वह पूर्ण मनोयोग से करना चाहते हैं और उनकी दृष्टि में जीवन की सार्थकता की माप यह है कि छोटे से छोटे काम को भी उत्तम और आदर्श रीति से निभाया जाय। श्रेष्ठ साधनों और उत्तम उपायों का प्रयोग वह केवल बड़े कार्यों के लिए ही करना पर्याप्त नहीं समझते। घर-बाहर की सफ़ाई, समाज और देश का छोटा-बड़ा काम, सब वह शुद्ध रीति से चाहते हैं। पवित्रता और शुचिता का ध्यान एक पल के लिए भी वह अपने मन से नहीं हटाते। जिन लोगों ने उनके साथ काम किया है वे भली भाँति जानते हैं कि जवाहरलालजी दूसरों का दृष्टिकोण समझने के लिए कितने तत्पर रहते हैं। अत्यन्त नाज़ुक समय में बड़ा से बड़ा संकट आ पड़ने पर भी वह एक क्षण के लिए सिद्धान्त से नहीं डिगते और साहसपूर्वक ऐसा क़दम उठाते हैं जिसे देख कर चकित रह जाना पड़ता है।

जवाहरलालजी की प्रतिभा बहुमुखी है । उनकी साहित्यिक कृतियों का संसार में ऊँचा स्थान है। आधुनिक दर्शन का उनका अध्ययन व्यापक और गहरा है। संसार की घटनाओं का ज्ञान अद्वितीय है। आधुनिक विज्ञान की प्रगति और गति-विधि में प्रति क्षण जो उन्नति हो रही है उसका वह अब भी, इतने बड़े कामों में व्यस्त होते हुए, अध्ययन करते रहते हैं। साहित्य, कविता, कला आदि को उन्होंने अब भी नहीं बिसराया है। प्रौढ़ और गम्भीर राजनीति में व्यस्त होते हुए भी वह स्फूर्ति, उत्साह और नवजीवन के स्रोत इस अवस्था में भी वैसे ही हैं जैसे युवावस्था में वे सबके जीवन में परिपूर्णता, सजीवता और सरसता चाहते हैं । योगासन करना, चंचल घोड़ों पर सवार होना, दुर्गम पहाड़ों पर विचरना, तैरना, स्केटिंग और शीइंग में उनकी स्वाभाविक रूचि है। ये कौशल उन्हें 60 वर्ष की अवस्था में स्वस्थ और प्रसन्न रखते हैं। वे साधारणतम कार्य में भी पूरा ध्यान देते हैं। उनका जीवन-क्रम अत्यन्त व्यवस्थित है।

हमारे राष्ट्र के लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि पंडित जवाहरलाल ऐसा नर-रत्न देश का कर्णधार है। हमारी आशाएँ और आकांशाएँ उनमें केन्द्रित हैं। आज़ संसार भारत को नेहरू के द्वारा जानता है। उनकी सफलता में हमारा वैभव है और उनकी शक्ति हमारा गौरव। ईश्वर उन्हें चिरायु करे, जिससे संसार को शक्ति और भारत को समृद्धि प्राप्त हो।