• होम
  • नेहरूः एक प्रतिबिंब
  • नेहरू के बारे में लेख और भाषण

नेहरू के बारे में लेख और भाषण



भारत का प्रथम नागिरक पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, 05 मार्च, 1949
भारत के स्वराज-आन्दोलन में जो नाम आदर और श्रद्धा के साथ लिये जाते हैं, उनमें भारत की स्वतन्त्रता के निर्माता महात्मा गाँधी का नाम सर्वप्रथम स्मरणीय है। राष्ट्र के दुर्भाग्य से महात्मा जी देश के स्वातन्त्र्य-लाभ के एक वर्ष के भीतर ही हमारे बीच से उठ गये। अब सद्यःप्राप्त स्वातन्त्र्य के अनुरूप भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढाँचे का पुनर्निर्माण उनके अनुयायियों के हाथों में है, जिनमें जवाहरलाल नेहरू प्रमुख हैं। यह तो अकसर कहा जाता है कि स्वाधीनता प्राप्त कर लेना एक बात है और उसकी रक्षा करना दूसरी। किन्तु स्वाधीनता को ऐसे रूप में बनाये रखना, कि उससे देश के सर्व-साधारण का हित हो, और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में राष्ट्र का नाम रौशन हो, यह तो और भी दूसरी बात है। यही कठिन कार्य हमारे वर्तमान केन्द्रीय मन्त्रिमंडल के कन्धों पर पड़ा है। यद्यपि कांग्रेस के प्रधान और उनकी कार्यकारिणी समिति कुछ मामलों में कुछ उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेने का साहस करती है, तथापि साधारण जनता केन्द्रीय मन्त्रिमंडल के दो विशिष्ट व्यक्तियों की ओर ही देखती है, और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् की दृष्टि में तो एक ही व्यक्ति है जिसे वह महात्मा गान्धी के बाद की राजनीतिक प्रगति का प्रतीक मानती है। देश की जनता हमारे शासन-यन्त्र की नाना प्रकार की बुराइयों के निराकरण की अपेक्षा प्रधान मन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उप-प्रधान मन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल दोनों से करती है, किन्तु इन दोनों में भी प्रधान मंत्री होने के नाते जवाहरलाल जी का दायित्व ही बड़ा है।

यह दायित्व साधारण कोटि का नहीं है। उन्हें जिन समस्यों का सामना करना पड़ा, उनमें केवल पराधीनता से स्वाधीनता के स्थिति-परिवर्तन की ही समस्याएँ नहीं थीं, बल्कि एक कुकल्पित, हड़बड़ी में आयोजित, और विपज्जनक ढंग से आरोपित देश के विभाजन से उत्पन्न होने वाली असंख्य अभूतपूर्व उलझनें भी थीं। यहाँ पर मैं प्रजाओं के उत्पाटन और स्थानान्तर-करण की, और शरणार्थियों की उस समस्या का उल्लेख नहीं करूँगा जिसकी तुलना संसार के इतिहास में न मिलेगीः मैं केवल नयी सरकार के सामने उपस्थिति आर्थिक समस्याओं की ही बात करूँगा। मार्च 1949 के आरम्भ तक भी भारत के खाद्य और कृषि मन्त्री ने देश की अव्यवस्थित स्थिति की स़फाई देते हुए भारतीय कृषि- अनुसन्धान परिषद् की अनुशासन समिति के आगे कहा थाः

“विभाजन के फल-स्वरूप देश के साधनों में भारी कमी आ गयी है। अविभाजित देश की जनसंख्या का 80 प्रतिशत उसे मिला है, किन्तु उसे खिलाने के लिए देश की चावल की उपज का केलव 65 प्रतिशत उसके पास रह गया। विभाजन का एक और दुष्परिणाम यह हुआ कि अनिश्चित मौसमी वर्षा पर निर्भर करने वाले प्रदेश का अनुपात से कहीं अधिक भाग हमारे पास रहा। जनसंख्या के 80 प्रतिशत के मुकाबले में नहरों से सिंची भूमि का केवल 66 प्रतिशत भारत में रहा, और गेहूँ की खेती का तो केवल 54 प्रतिशत। देश के विराट् बन्ध और नहरों की प्रणालियाँ सब आज पाकिस्तान में हैं, जिस पर अविभाजित भारत का केवल 20 प्रतिशत जनसंख्या को खाद्य सामग्री देने का भार है।”


इसी प्रकार जूट की स्थिति यह है कि मिलें सब भारत में हैं, और कच्चा जूट-जिसे आज की संसारव्यापी परिस्थिति को देखते हुए सोने के समान मूल्यवान कहा जा सकता है-पाकिस्तान की अतिरिक्त पैदावार हो गया है। सूती कपड़े की अधिकांश मिलें भारत में आ गयी हैं, मगर सर्वोत्तम कपास पैदा करने वाले कुछ प्रदेश पाकिस्तान में चले गये हैं। दूसरी ओर यह भी है कि पाकिस्तान को अपनी सूती कपड़े की जरूरतें बाहर से पूरी करनी पड़ेगी, जब तक कि वह अपनी मिलें न स्थापित कर ले।

यह स्वीकार करना होगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू को किसी भी प्रधान मन्त्री के लिए संसार में अधिक से अधिक जटिल कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ा है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि ऐसी समस्याओं के बावजूद, जो किसी पुरानी सुस्थापित शासन-संस्था के लिए भी कष्ट-साध्य होतीं, भारत में शान्ति और व्यवस्था क़ायम रखी गयी और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ायी गयी। कई कठिन आर्थिक और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ अब भी बाक़ी हैं। इन समस्याओं में एक यह भी है कि भारत की जनता शासकों द्वारा-जो अन्ततोगत्वा मनुष्य ही हैं-की गयी किसी भूल-चूक को क्षमा कर देना कठिन पाती है।

पंडित नेहरू की शिक्षा-दीक्षा भारत जैसे लम्बी सांस्कृतिक परम्परा वाले राष्ट्र के नेता के योग्य ही हुई है। उन्होंने भारत की स्वतन्त्रता को अपने जीवन का ध्येय बनाया, और जीवन के आरम्भ में ही अपने को स्वाधीनता-संग्राम में लगा दिया। सुशिक्षित और ऐसी लगन वाले एक प्रतिभावन् युवक की ओर महात्मा गान्धी का ध्यान आकृष्ट होना स्वाभाविक था। दोनों का सम्बन्ध क्रमशः घनिष्ठतर होता गया, यहाँ तक कि पंडित नेहरू महात्माजी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में प्रसिद्ध होकर देश की कोटि-कोटि जनता की आस्था पाने वाले एकमात्र व्यक्ति हुए।

यहाँ तनिक विषयान्तर क्षम्य समझा जाए । भारत विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले विभिन्न सांस्कृतिक अवयवों का समूह है। ब्रितानी प्रभुत्व में इसकी भौगोलिक एकता क़ायम रखी गयी थी एक दूसरे प्रकार के नियन्त्रण से आज देश की सब से बड़ी आवश्यकता है किसी ऐसी शक्ति की, जो भारत की एकता को बनाए रख सके; और महात्माजी के निधन के बाद भी भारत के सौभाग्य से पंडित नेहरू के रूप में वह शक्ति विद्यमान है। ध्येय के प्रति उनकी निष्ठा में किसी को भी सन्देह नहीं है, और उनके कटुतम आलोचक भी स्वीकार करते हैं कि वे उनकी या उनके मन्त्रिमंडल की नीतियों में से कुछ का सुधार चाहते हैं, मन्त्रिमंडल को पदच्युत करना नहीं। यह स्वयमेव उनके प्रति विश्वास की अभिव्यक्ति है। महात्माजी की भाँति ही उनको साधारण जन पर ममत्व है, और महात्मा जी की भाँति ही उन्हें कभी-कभी स्वप्नदर्शी कहा जाता है।

आज के युद्ध-जर्जर विश्व में, और युद्ध से उत्पन्न सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं के बीच में, यह स्वाभाविक ही है कि पंडित नेहरू के साठ वर्ष पूरे करने पर प्रत्येक भारतवासी की मंगल कामनाएँ उनके साथ हों, और सब यह प्रार्थना करें कि वे चिरायु हों और पूरी लगन तथा अपनी अद्वितीय कर्तव्यनिष्ठा के साथ भारत की सेवा करते रहें।