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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



उनका आध्यात्मिक रुझान डा. राजेन्द्रप्रसाद, 14 नवम्बर, 1949
पिछले तीस वर्षों से कुछ अधिक से भारत का इतिहास जवाहरलाल नेहरु के जीवन और कार्यकलाप से अनिवार्यतः सम्बद्ध रहा है। देश के स्वतन्त्रता-युद्ध में वह अग्रगण्य रहे हैं। न जाने कितनी बार वह सजा पा चुके है; जेल में वह कितना समय रहे, यह बताना मेरे लिए कठिन है-पूछे जाने पर सहसा शायद वह स्वयं भी न बता सकें। अनेक वर्षों से कांग्रेस, उसकी अखिल भारतीय समिति और कार्यकारिणी समिति द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव उन्हीं के प्रस्तुत किये हुए रहे हैं, और कांग्रेस की मुख्य-मुख्य नीति-घोषणाओं के मसविदे भी उन्हीं ने तैयार किए हैं। कांग्रेस के तीन अधिवेशनों के वह सभापति रह चुके हैं। सभापति-पद से-तथा प्रारम्भिक दिनों में मन्त्री की हैसियत से-अपने अथक कार्य, अपूर्व संगठन-शक्ति, अनुशासन-पालन और विस्तृत दौरों से वह न केवल जनता की सोयी आत्मा को जगाने में सफल हुए, बल्कि साथ ही कांग्रेस जैसी महान् संस्था के निर्माण में भी योगदायक हुए। अनेक महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उन्होंने कांग्रेस की नीति को न केवल प्रभावित ही किया है, अपितु उसको निर्धारित भी किया है । इस सम्बन्ध में केवल एक उदाहरण यहाँ दिया जा सकता है। कांग्रेस ने ‘स्वराज्य प्राप्ति’ अपना ध्येय निश्चित किया था। ‘स्वराज्य’-शब्द बहुत प्रशस्त अर्थ रखता है, जिसे अंग्रेजी के किसी एक शब्द द्वारा पूर्णरूपेण प्रकट नहीं किया जा सकता। किन्तु बहुतों ने यह अनुभव किया कि यद्यपि इसका अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य से पृथक् और सम्पूर्ण स्वतन्त्रता है, तथापि उससे औपनिवेशिक पद का आशय भी लिया जा सकता है। इसी आधार पर वे लोग कांग्रेस-विधान की प्रथम धारा में कोई ऐसा शब्द रखना चाहते थे जिसमें औपनिवेशिक स्वराज्य का अर्थ भी आ जाय। सन् 1921 के कांग्रेस-अधिवेशन में इस आशय का प्रस्ताव रखा गया और तब से यह एक वार्षिक प्रथा-सी हो गयी। परन्तु दिसम्बर 1927 में कांग्रेस के मद्रास-अधिवेशन में जब जवाहरलाल ने इसे अपने हाथ में लिया, तब प्रस्ताव को बल मिला और वह व्यावहारिक समझा गया। दिसम्बर 1929 में कांग्रेस के लाहौर-अधिवेशन में, उन्हीं की अध्यक्षता में, विधान की पहली धारा में परिवर्तन भी किया गया। इसका यह आशय नहीं कि इस संशोधन में कांग्रेस के अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों का कुछ हाथ न था; परन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि कांग्रेस-विधान के इस परिवर्द्धन का अधिकतम श्रेय जवाहरलाल को ही है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि उन्होंने महात्मा गान्धी के उपदेशों को सहज बुद्धि से नहीं अपनाया। उनका जीवन और उनकी शिक्षा किसी ऐसे आकस्मिक परिवर्तन के अनुकूल नहीं थी। गान्धीजी के सिद्धान्तों को उन्होंने जितना भी स्वीकार किया, गहरे मानसिक संघर्ष और मन्थन के बाद। फिर भी, मैं सोचता हूँ कि उनके सम्बन्ध में यह कहना अनुचित न होगा कि उन सिद्धान्तों को वह मनसा भी पूर्णतया स्वीकार न कर सके। विभिन्न विचारों और सिद्धान्तों में सत्य को पहचानने और परखने का यह गुण ही उनको महात्मजी के निरे श्रद्धालु भक्तों से भी और असहिष्णु या नासमझ आलोचकों से भी पृथक् करता है। अपनी सचाई और दूसरों का दृष्टिकोण समझने की क्षमता के कारण हमारे इतिहास के अनेक महत्त्वपूर्ण अवसरों पर वह अपनी नीति परिवर्तन कर के एक सम्मिलित कार्यक्रम में भाग ले सके हैं। यद्यपि किसी प्रस्ताव का विरोध वह अत्यन्त दृढ़तापूर्वक करते हैं, और कभी-कभी बिगड़ भी उठते हैं, तथापि किसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने के बाद वह पूरी लगन से उसे कार्यान्वित करते हैं। अपने मताग्रह के बावजूद उन्होंने कांग्रेस के भीतर किसी दल अथवा वर्ग के साथ अपने को सम्बद्ध नहीं किया है।

सितम्बर 1946 में पदग्रहण करने के बाद, और विशेष रूप से अगस्त 1947 से, शासन-सूत्र उनके हाथों में रहा है, और सरकार ने जो कुछ किया है, या नहीं किया है, उसके लिए वह किसी भी स्वाधीन राष्ट्र के प्रधान मन्त्री की भाँति ही उत्तरदायी हैं। देश को बड़े-बड़े और महत्त्वपूर्ण निर्णय करने पड़े और उन निर्णयों के दूरव्यापी परिणाम भोगने पड़े हैं। साधारण मनुष्य इतने बड़े दायित्व के भार के नीचे टूट जाता, लेकिन वह चट्टान की तरह दृढ़ खड़े रहे हैं, और अपने कुछ अन्तरंग सहयोगियों के बढ़ते हुए विरोध के बावजूद भी उस पथ से नहीं हटे जिसे उन्होंने ठीक समझा। अभी हम संकट से मुक्त नहीं हुए हैं। स्वाधीनता और विभाजन ने जो समस्याएँ, उत्पन्न कीं उनमें से कई अभी हल नहीं हुई हैं। स्वाधीनता हमने प्राप्त की है, लेकिन उसे दृढ़ बनाने के लिए, बाहरी आक्रमण और भीतरी अव्यवस्था का सामना करने के लिए, अनवरत जागरूकता और सावधानी की आवश्यकता है। उनके महान् साथी, सहकर्मी, और--कहा जा सकता है--पूरक, सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण में हमें सफलता दियाली है। लेकिन ग़रीबी, बीमारी और निरक्षरता पर विजय पाकर ऐसे समाज की स्थापना करना, जो हमारे विधान के शब्दों में न्याय, स्वाधीनता, समानता और मैत्री का रक्षक होगा, एक गुरुतर कार्य है जो अभी बाक़ी है। हमने स्वाधीनता की नौका असीम महासागर पर अभी ही उतारी है; भारत को अपने महान् अतीत और महत्तर भाविष्य के योग्य बनाने का कार्य अभी आरम्भ ही हुआ है। भविष्य में देखने के लिए गहरी दृष्टि चाहिए और उसकी साधना में वर्तमान को ढालने के लिए बड़ी दृढ़ता और योग्यता। जवाहरलाल में ये सभी हैं। उन्हें न केवल देशवासियों ने बल्कि दूसरों ने भी महान् जन-नेता और राजनीतिज्ञ स्वीकार किया है। हमारे पूरे सहयोग और समर्थन की उन्हें आवश्यकता है । देश को और दुनिया को अभी अनेक वर्षों तक उनकी सेवाओं की ज़रूरत रहेगी । वह चिरायु हों, हमारा नेतृत्व करते हुए हमें भारत के उस आदर्श की ओर ले जायें जिसका स्वप्न वे देखते हैं, तथा जिसका स्वप्न राष्ट्रपिता ने भी देखा था; उनकी इस साठवीं वर्षगाँठ पर असंख्य नर-नारियों की यह प्रार्थना है।