• होम
  • नेहरूः एक प्रतिबिंब
  • नेहरू के बारे में लेख और भाषण

नेहरू के बारे में लेख और भाषण



महान आदर्शों का निर्भीक समर्थकडा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्, 15 अप्रैल, 1949
नेहरू निस्सन्देह संसार के महापुरुषों में से एक हैं। वह राजनीतिक नेता के नाते विख्यात हैं, परन्तु ऐसी ही ख्याति वाले अन्य कई देशवासियों की भाँति, राजनीतिक नेतापन से भी अधिक कुछ विशेषता उनमें है। अब तक उनका मुख्य कार्यक्षेत्र रहा है भारतीय जनता की राजनीतिक उन्नति, परन्तु वह तो उनके अपूर्व बहुमुखी और सम्पूर्ण व्यक्तित्व का एक अंग मात्र है। जो उन्हें निकट से जानते हैं वे उनकी व्यापक जिज्ञासा, और जीवन की प्रत्येक क्रिया के बारे में उनके तीव्र और भावना-युक्त कौतूहल की साक्षी देंगे। मैंने शायद ही और कोई व्यक्ति ऐसा देखा होगा जो इतने विविध विषयों में रूचि रखता हो और छोटी-बड़ी चीजों में रस ले सकता हो-विज्ञान और दर्शन, इतिहास और पुरातत्व, सामूहिक खेल और एकान्त भ्रमण। अवकाश से इतना प्रेम, और उनका सदुपयोग करने की इतनी योग्यता भी कम लोगों में पायी जाती है। वह ज्ञान-गरिमा-युक्त आचार्य नहीं हैं, मगर बहुत-सी चीज़ों के बारे में बहुत अधिक जानकारी रखते हैं। सफ़र में पुस्तकें उनके साथ रहती हैं। साठ वर्ष के बाद भी उनके प्रौढ़ चेहरे का सौम्य भाव, आँखों में वह खोजभरी दृष्टि, उनका हार्दिक और संवेदनशील कोमल स्वभाव, (यदि जीवन का अधिकांश राजनीति की कठोर धकापेल में बिताने वाले व्यक्ति को कोमल कहा जा सके।) - ये सब एक चिन्तनशील कलात्मक स्वभाव के सूचक हैं, जो दैनिक जीवन-कर्म में रस लेता है, वह कर्म चाहे भारत में विशाल जन-सभाओं में व्याख्यान देना हो, चाहे लन्दन में प्रधान मन्त्रियों के साथ विचार-विनिमय। मनुष्य के नाते वह भावुक, उदार और दयालु हैं। वे मैत्री निबाहते हैं, और यह निष्ठा कभी-कभी दोष तक बन जाती है। उनकी सचाई और खरापन पारदर्शी है; कभी-कभी वह ऐसी बातें कह जाते हैं जिन्हें न कहना ही अच्छा होता। उनकी कमजोरियाँ छिपी नहीं हैं, और उनके कारण वे अधिक प्रिय ही लगते हैं।

उनके मित्र बहुत थोड़े हैं। वे मूलतः एकाकी हैं। भीड़ उन्हें आकर्षित करती है और वह आकर्षित होते हैं; समाज में वह विनोदी और हँसमुख रहते हैं; लेकिन वे आन्तरिक एकाकीपन को ढँकने की सामान्य रीतियाँ हैं।

उनके लेखन से मनुष्यता के प्रति उनकी गहरी आत्मीयता व्यक्त होती है। उसमें भावनाओं की गहराई है, कल्पना का व्यापक प्रसार भी है। वे बार-बार हमारी दृष्टि के सम्मुख विशद क्षितिज खड़े करते हैं, बड़ी-बड़ी दृश्य-परम्पराएँ उपस्थित करते हैं। इतिहास के उनके अंकन में विश्लेषण से अधिक अन्तर्दृष्टि है। उनके मन की गठन छोटी-छोटी बातों की अपेक्षा बड़ी समस्याओं से उलझने के लिए अनुकूल है। क्षणिक वाद-विवाद में निमित्तरूप तर्काभासों की अपेक्षा व्यापक सिद्धान्तों की चिन्ता वह अधिक करते हैं। क्षुद्र बातों की अनदेखी कर सकना नेतृत्व की प्रतिभा का एक पक्ष है। श्रेष्ठ लेखक का यदि यही लक्षण है कि वह अपनी आत्मा का कम्पन पाठकों तक पहुँचा सके, तो नेहरू एक श्रेष्ठ लेखक हैं। आधुनिक विज्ञान की खोज उन्हें आकर्षित करती है और उनको एक बौद्धिक सन्तुलन और स्थिरता देती है। हमारी यह मानवी सभ्यता-जिसकी परम्परा अधिक से अधिक छः हज़ार वर्ष होगी,-भावी अस्तित्व की, पृथ्वी पर जीव के विकास की, नक्षत्रों की, सौर-मंडल की, उस आकाशगंगा की जिसमें हमारा सौर-मंडल एक रजकण मात्र है; अथवा उससे भी कहीं अधिक विराट् और पुरातन सृष्टि की आयु की तुलना में आखि़रक्या चीज़ है?

उनके लेखन में जहाँ-जहाँ उनका व्यक्तिगत जीवन सामने आता है वहाँ एक बहुत प्रीतिकर विनम्रता है, मन को अस्थिर कर देने वाले कई प्रकार के विचारों और शंकाओं की स्वीकृति है, और परिवर्तन के लिए एक प्रकार की अधीरता है जिसे वह छिपाते नहीं।

मैंने सबसे पहले जब उन्हें सुना था, तब से सार्वजनिक वक्ता के नाते उन्होंने बहुत तरक्क़ी की है उनमें जो निष्ठा का बल, भावना का उत्साह और संवेदना की प्रामाणिकता है वह उन्हें सुनने के लिए एकत्रित समूह पर बहुत प्रभाव डालती है। उनके वे महान् भाषण, जो जीवन की उनकी बड़ी-बड़ी बातों के बारे में होते हैं जिन्हें वे अपने भीतर से अनुभव करते हैं, वक्तृव्य-कला के उत्कृष्ट नमूने होते हैं। ऐसे अवसरों पर वह अपने विचारों को तो क्रमबद्ध कर लते हैं, पर शब्दों को प्रत्युत्पन्न सूझ पर ही छोड़ देते हैं। प्रायः शिकायत सुनी जाती है कि नेहरू बहुत अधिक बोलते हैं। मगर नेताओं को अपने समय का बहुत बड़ा भाग जनता की कल्पना को प्रभावित करने में बिताना ही पड़ता है।

यह इस देश का सौभाग्य था कि अगस्त 15, 1947 के सत्तान्तर में शासन के सूत्रधार नेहरू बने। विभाजन द्वारा दो नयी डोमिनियनों का सूत्रपात होते ही देश के बड़े भाग में साम्प्रदायिक द्वेष की आग भड़क उठी। गान्धीजी ने बंगाल और दिल्ली के शान्ति-प्रयत्नों द्वारा उन ज्वालाओं के शमन का प्रयत्न किया और अन्त में उन्होंने साम्प्रदायिक एकता के दिव्य आदर्श के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। “इससे अधिक बड़ा प्रेम नहीं हो सकता कि मनुष्य अपने बन्धुओं के लिए अपने प्राण दे दे।”....नेहरू ने शान्ति लाने और पीडि़तों की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, और उन्हीं आदर्शों पर चले। गान्धीजी की प्रेरणा थीं परमात्मा की इच्छा और अन्तरात्मा की पुकार; नेहरू को एक उत्कट भावना और राजनीतिक विवेक प्रेरित करता है, दोनों के मार्ग भिन्न हैं, परन्तु मंजि़ल एक है।

दोनों मानते हैं कि अर्थशास्त्र और राजनीति ही जीवन का अथ और इति नहीं है। सब भौतिक स्वार्थों, पंथविग्रहों, सामूहिक और व्यक्तिगत अहंता के माया-जालों से परे प्रायः सभी व्यक्तियों में ऐसा नैतिक मूल्यों का, सामाजिक कर्तव्यों का, सौन्दर्य-संवेदन का बोध विद्यमान रहता है जो प्रश्नातीत है और जिन्हें मनुष्य जाति को खोना नहीं चाहिए। उनकी रक्षा के लिए सहिष्णुता और अनुशासन के रूप में चाहे जो क़ीमत देनी पड़े। ‘राम राज्य’ हमारे भीतर ही है और संसार की पाशवी शक्तियों से लड़ता रहता है। मनुष्य-स्वभाव की मूलगत भलाई प्रेम-नीति से आकर्षित होती रहती है। उस मूल भावना को विकसित करने से हम सत्ता के प्रलोभनों को तज कर आत्मिक निष्ठा और सचाई की ओर बढ़ सकते हैं।

गाँधी और नेहरू दोनों के लिए राजनीतिक स्वतन्त्रता गुण और महत्ता की वृद्धि का साधन है। इस स्वतन्त्रता द्वारा हम जड़ता और कायरता के, विद्वेष और अनुदारता के पापों से मुक्त हो सकेंगे। राजनीतिक स्वतन्त्रता, सामाजिक समता और बन्धुत्व की प्रतिष्ठापना का साधन मात्र है। जो स्वतन्त्रता हमने प्राप्त की है, उसे हमें बढ़ाना और मज़बूत करना चाहिए। हमें सब वर्गों के लिए न्याय प्राप्त करना चाहिए, आर्थिक तानाशाही का अत्याचार मिटाना चाहिए। हमें अहिंसक सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति द्वारा जातिहीन और वर्गहीन समाज तक पहुँचना है।

यद्यपि नेहरू समाजवादी दल के सदस्य नहीं हैं, फिर भी वह देश के समाजवादी आन्दोलन के प्रतिनिधि हैं। जहाँ वह सोवियत क्रान्ति द्वारा घटित सामाजिक कार्य का अभिनन्दन करते हैं, वहाँ उससे उत्पन्न जीवन की यान्त्रिकता की आलोचना भी करते हैं। एक संवेदनशील कलाकार और मानवी स्वतन्त्रता में विश्वास करने वाले के नाते, वह मनुष्यों के जीनव, उनकी कर्म और क्रीड़ा की प्रवृतियों के यन्त्रवत् ऩियमनसे सहानुभूति नहीं रख सकते। घर में और शाला में, कारखानों में और खेतों में, सब नागरिकों को एक बँधी हुई लीक पर चलने के लिए बाध्य करने से हम जन-मन में गहरे विसंवाद, तनाव और दमित इच्छाओं के बीज बोते हैं। मानव से मानवीयता को बहिष्कृत करने वाली कोई प्रणाली नेहरु को स्वीकार्य नहीं है।

आज दुनिया के सामने जो प्रमुख समस्या है-एक ओर लोकतंत्र और दूसरी ओर तानाशाही,-उसमें नेहरू की सहानुभूति स्पष्ट है। लोकतन्त्र का आधार है स्वतन्त्रता और न्याय की स्थापना का अधिकाधिक प्रयत्न, जब कि तानाशाही दोनों के नकार पर आश्रित है। नेहरू लोकतन्त्र के पक्ष में हैं, परन्तु वह यह भी जानते हैं कि साम्यवाद किन कारणों से फैलता है। साम्यवाद केवल सर्वहारा को ही नहीं बल्कि बौद्धिक संशयात्माओं और निराशावादियों को भी आकर्षित करता है। दो विश्वव्यापी महायुद्धों ने जो मानसिक और सामाजिक ध्वंस किया है उसके अवशेषों में साम्यवाद पनपता है। भूख और दैन्य में से घृणा और साम्यवाद पैदा होता है।

जो सरकार परिस्थिति को ध्यान में नहीं रखती, दैन्य और बेकारी, निराशा और असन्तोष को दूर नहीं करती, वह साम्यवाद के प्रसार को आमन्त्रित करती है। सन् 1930 में ही, लाहौर कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भाषण देते समय, नेहरू ने अपनी स्थिति स्पष्ट की थी : “मुझे स्पष्टतया स्वीकार करना चाहिए कि मैं समाजवादी और प्रजातन्त्रवादी हूँ, कि मैं राजाओं और सम्राटों में विश्वास करने वाला नहीं हूँ, न उस व्यवस्था में जो आज ऐसे औद्योगिक प्रभुत्वों को पैदा करती है जिसका मनुष्यों के जीवन और भाग्य पर पुराने सम्राटों से भी अधिक अधिकार होता है, और जिनकी पद्धतियाँ पुरानी सामन्ती धनिकशाही से भी अधिक लुटेरी और प्राणलेवा हैं.... कहा जाता है कि कांग्रेस को पूँजी और श्रम के बीच, ज़मींदार और किसान के बीच सन्तुलन रखना है। लेकिन हमारी तराज़ू के पलड़े ही समान नहीं हैं और स्थिति को ज्यों का त्यों बनाये रख़ना अन्याय और शोषण को बनाये रखना है। स्थिति को सुलझाने का सही रास्ता यही है कि एक वर्ग पर दूसरे का प्रभुत्व मिटा दिया जाय।”

मित्रों को शिकायत है कि अपने राजनैतिक जीवन में नेहरू बराबर जिन उच्चादर्शों को घोषित करते आये, उनके बारे में उनका उत्साह दिन पर दिन शिथिल पड़ता जा रहा है, शासन के प्रधान के नाते वे न्यस्त स्वार्थों से गठबन्धन करने में लगे हैं; और अपनी परिस्थितियों से ऊपर उठने में असमर्थ हैं। किन्तु इन आदर्शों की उपलब्धि कुछ सप्ताहों या महीनों में नहीं हो सकती। पानी उबालने के लिए भी ताप के साथ-साथ समय की आवश्यकता होती है। समाजवादी कार्यक्रम लम्बा है और उस पर हमें उत्साह और दृढ़ता से चलना चाहिए। नेहरू को पदग्रहण किये अधिक समय नहीं हुआ, और उनके कृतित्व पर निर्णय करने का समय अभी नहीं आया। यह सम्भव है कि जल्दबाज़ी में किया गया निर्णय देश में अव्यवस्था पैदा कर दे और हमें उसी ख़तरे के मुँह में ले जाय जिसे कि हम टालना चाहते हैं। यह दुर्भाग्य है कि समाजवादी दल-जो कर्म, सेवा और त्याग में किसी दल से पीछे नहीं रहा-आज विरोध पक्ष में खड़ा है। कांग्रेस सरीखा प्रत्येक क्रान्तिकारी संगठन सत्ता पाने से पहले अपनी एकता और शक्ति प्रदर्शित करता है, परन्तु शत्रु को हरा कर सत्ता प्राप्त कर लेने पर वह टूटने लगता है और भीतरी विग्रह से खंड-खंड हो जाता है। दलों के नाम या बिल्ले का प्रश्न गौण है; विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न पद्धतियाँ उपयोगी या हानिकर हो सकती हैं। हमें एक समाजवादी प्रजातन्त्र की स्थापना में श्रद्धा नहीं खोनी चाहिए। यदि हम विरोध को कुचलने लगें, आलोचना के प्रति असहिष्णु हो जायें तो सहज ही तानाशाही की ओर हमारा झुकाव होने लगेगा। जो सरकार आलोचना के प्रति उदासीन होती है और अपनी त्रुटियाँ नहीं देख पाती, वह सम्मान खो देती है। नेहरू अभी भी वीर, स्वाभिमानी, भारत की सामाजिक और राजनीतिक गठन में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए उत्सुक और अधीर हैं; वह अभी भी भारत और विश्व की भलाई की दिशा में स़माजवादी आन्दोलन को ले जा सकते हैं।

हमें मानव जाति को आत्महिंसा के मार्ग से बचाना है। वह केवल प्रजातन्त्र और स्वतन्त्रता के सिद्धान्तों के प्रति एकान्त निष्ठा से ही हो सकता है। नेहरू ने सदैव निष्ठा और स्पष्टता से ऊँचे आदर्श का समर्थन किया है। स्वतंत्रताप्राप्ति के पहले भी उन्होंने मंचूरिया, चीन, अबीसीनिया, इस्पान और चेकोस्लोवाकिया में फ़ासिवाद और साम्राज्यवाद का विरोध किया था। पीडि़त दलित जनताएँ नेहरू में एक ऐसा बन्धु देखती हैं जिसकी ओर सहानुभूति और परामर्श के लिए, या आवश्यकतानुसार प्रत्यक्ष सहायता के लिए भी वे मुड़ सकती है। नेहरू का विश्वास है कि भारत एशिया की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है और संसार के भविष्य निर्माण में उसका एक रचनात्मक भाग रहेगा।

दिल्ली में हाल में जो इंडोनेशिया-सम्मेलन हुआ, उसका उद्घाटन करते हुए पंडित नेहरू ने कहा: “हम पूर्व की प्राचीन सभ्यता के प्रतिनिधि हैं; और पश्चिम की गतिमान संस्कृति के भी। राजनीतिक दृष्टि से हम विशेषतः लोकतन्त्री स्वतन्त्रता की भावना के प्रतीक हैं जो नये एशिया की एक प्रमुख और अर्थ-गर्भित विशेषता है।” नेहरू सतर्क हैं कि एशिया अपना व्यक्तित्व न खो दे। दूसरे देशों में जो कुछ प्राणवान् है उसे ग्रहण करते हुए भी एशिया को अपना वैशिष्टय बनाये रखना है। अतीत और वर्तमान का सम्बन्ध छिन्न करना भविष्य को भी खो देना होगा। नेहरू के नेतृत्व में एशिया संसार की मन्त्रणा-सभाओं में अपना स्थान पुनः प्राप्त कर रहा है।

भविष्य के बारे में हम सब एक-से अज्ञ हैं परन्तु इस बात के बारे में हम आश्वस्त हैं कि नेहरू का कृतित्व ऐसा नहीं है जो समय की गति में विलीन हो जाएगा। उन्होंने अपने लिए एक अविनाशी स्मारक स्थापित किया है, और मानवी स्वतन्त्रता के महान् योद्धाओं में उनका नाम चिरकाल तक लिया जाएगा।