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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



वह पहली मुलाकात लॉर्ड माउंटबेटन
जवाहरलाल नेहरू से मेरी पहली मुलाकात 18 मार्च, 1945 को उस समय हुई जब वे एक सप्ताह की यात्रा पर मलय आए थे। उस समय मैं दक्षिण-पूर्व एशिया का सर्वोच्च सेनापति था। पहली रात को उन्होंने मेरी पत्नी और मेरे साथ ही रात्रि भोज किया और उस समय से ही हम मित्र हो गए।

एक साल बाद जब मैं सत्ता के हस्तांतरण की व्यवस्था करने के लिए वायसरॉय बनकर भारत गया, तो वहाँ उनका राजनेता वाला दृष्टिकोण, जिसमें ब्रिटिश जेलों में लम्बे समय तक उन्हें कैद रखे जाने को लेकर उनके मन में कोई कड़वाहट नहीं दिखाई देती थी, मुझे सबस अच्छा लगा।

जब मैं वहाँ भारत के पहले संवैधानिक गवर्नर जनरत की हैसियत से रहा तो मैं उनकी भारत की बड़ी-बड़ी समस्याओं को हल करने की शैली से विशेष तौर पर प्रभावित हुआ; इससे भी बड़ी बात यह थी कि ब्रिटेन के प्रति उनकी मित्रवत भावना और उनकी यह इच्छा कि भारत राष्ट्रमंडल में बना रहे, स्पष्ट झलकती थी।

हालाँकि जून, 1948 में भारत छोड़ने के बाद से उनके साथ हमारा कोई आधिकारिक सम्पर्क नहीं रहा है, लेकिन मेरी पत्नी और मेरे साथ उनकी मित्रता ने हमें एक दूसरे से मिलने पत्र-व्यवहार के माध्यम से सम्पर्क में रहने के कई अवसर प्रदान किए हैं।

जहाँ तक हमारा सम्बंध है, हम दोनों ही उनके प्रति सच्ची सहानुभूति और प्रेम का भाव रखते हैं, और मुझे पूरा विश्वास है कि समकालीन विश्व की उनके बारे में जो धारणा है, इतिहास उन्हें उससे भी अधिक सम्मान का स्थान देगा।