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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



शांति का योद्धा जोसिप ब्रोज़ टीटो
जवाहरलाल नेहरू से जब मैं वर्ष 1954 के अन्त में पहली बार मिला उस समय मैं उनके व्यक्तित्व और दोनों विश्वयुद्धों के बीच की अवधि में और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद के वर्षों में एक राजनैतिक कार्यकर्ता और राजनेता के रूप में उनके कार्यकलाप से पहले ही परिचित था। इसलिए व्यक्तिगत तौर पर उनसे पहली मुलाकात में मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं किसी ऐसे व्यक्ति से मिल रहा हूँ जिसके साथ मेरी लम्बे समय से व्यक्तिगत जान-पहचान हो। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मैंने भी उन्हें और उनके कृतित्व को उनके लेखन के माध्यम से ही जाना था जिसने मेरी धारणा को और बल दिया। मैंने उन्हें हमेशा ही गाँधी के साथ-साथ भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और अन्तरराष्ट्रीय मामलों में भारत के उल्लेखनीय और लाभकारी योगदान की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति माना है। शांति के लिए संघर्ष में उनकी उल्लेखनीय भूमिका का मैं विशेष तौर पर सम्मान करता हूँ। उनके महान देश का जब मैंने दो बार दौरा किया और कुछ अन्य अवसरों पर जब मैं उनसे मिला तो मेरी इस धारणा की पूरी तरह पुष्टि हो गई।

दिसम्बर, 1954 में नई दिल्ली में हमारी पहली मुलाकात के बाद से मुझे अनेक बार भारत और यूगोस्लाविया में और उनके साथ अन्तरराष्ट्रीय नीति और हमारे दोनों देशों के बीच सम्बंधों के बारे में प्रत्यक्ष तौर पर या पत्राचार के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान करने का अवसर मिला है। इन मुलाकातों और वैचारिक आदान-प्रदान से मैं इस बात का कायल हो गया कि वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने राष्ट्र के कल्याण और शांति, अन्तरराष्ट्रीय सद्भावना और सहयोग के लिए निष्ठापूर्वक समर्पित हैं। चूँकि हमारे देशों की जनता की आकांक्षाएं और नीतियाँ समान हैं, इसलिए हम अपनी चर्चाओं में बड़ी सहजता से एक-दूसरे के साथ सहमत होते थे। अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी हमारे विचार समान होते थे और यह बात अनेक दस्तावेज़ों में बड़ी स्पष्टता से व्यक्त होती है, इनमें से मैं विशेष तौर पर 22 दिसम्बर, 1954 में नई दिल्ली में की गई घोषणा और राष्ट्रपति नासर के साथ 19 जुलाई, 1956 को ब्रियोनी में हस्ताक्षर की गई हमारी संयुक्त घोषणा का उल्लेख करना चाहूँगा।

किसी व्यक्ति और राजनेता की महानता उसके अपने लोगों की स्वाधीनता, समृद्धि और शांति – जोकि वर्तमान समाज के मूलभूत सिद्धान्त हैं - के लिए सकारात्मक संघर्ष का प्रतीक बनने की क्षमता से सर्वाधिक परिलक्षित होती है। मेरी राय में नेहरू, जिन्होने भारत की जनता की स्वाधीनता की लड़ाई में और एक राष्ट्र के रूप में भारत की एकता में बहुत बड़ा योगदान दिया, की महानता की यही कसौटी है। साथ ही उन्होंने भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप प्रगति और समाजवाद के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आर्थिक और सामाजिक प्रगति के कार्य की शुरुआत की और अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में शांति और सह-अस्तित्व की सुसंगत नीति की शुरुआत की। यही कारण है कि मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में नेहरू का विशेष आदर करता हूँ जिसने आंतरिक प्रगति के लिए और शांति तथा शांतिपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय नीति के लिए महान भारतीय राष्ट्र के अधिकांश जन को अपने साथ एकजुट करने में सफलता हासिल की।

मैं जब भी नेहरू से मिला, मैं उनके चरित्र-बल, उनकी आत्मिक ऊर्जा, सन्निकट समस्याओं को देख पाने की उनकी सूक्ष्म-दृष्टि, उनकी आकर्षक शैली और निजी सम्बंधों में उनकी गर्मजोशी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। मैंने उन्हें एक ऐसा व्यक्ति पाया जो जीवन की वास्तविकताओं का निर्भीकता से सामना करता है और मुश्किलों से घबराता नहीं है, एक ऐसा व्यक्ति जो समस्याओं के समाधाने के लिए किसी प्रकार के भ्रम या सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से प्रभावित नहीं होता, बल्कि कठिनाइयों का सामना करने और उन्हें हल करने के लिए साहसपूर्वक और व्यावहारिक दृष्टि से तत्पर रहता है। उनके प्रकृति प्रेम, उनके मानवतावादी दृष्टिकोण और अपने परिवार के प्रति उनके समर्पण भाव ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया।

मुझे जनवरी, 1955 में अवदि में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेषन में नेहरू को अपने देश की राजनीति में व्यस्त देखने का अवसर भी मिला, जहाँ उन्होंने समाजवादी दृष्टि से भारत के विकास के लिए एक नए कार्यक्रम की घोषणा की। मैं जानता हूँ कि यह नेहरू की कई वर्षों की मेहनत का परिणाम था और उन्हें इस परिणाम से संतुष्ट होने का पूरा अधिकार था। उस अवसर पर मुझे यकीन हो गया कि वहाँ भारी संख्या में उपस्थित प्रतिनिधियों और जनसाधारण पर उनका निर्विरोध अधिकार था और वे लोग उनमें गहरी निष्ठा रखते थे, जिसके कारण नेहरू अपने देश के विकास और शांति की रक्षा, जोकि एक ऐसी भूमिका है जो उनके महान देश की सीमाओं से परे तक जाती है, के लिए विषम और जटिल परिस्थितियों में भी अपनी भूमिका निभा पाते हैं।

अपने परिश्रम और दूरदृष्टि से भारत के बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने वाले, और शांति के लिए अपने अथक श्रम, सह-अस्तित्व की नीति के प्रति अपनी निष्ठा और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करके वर्तमान विश्व के महान राजनेताओं के बीच अपना स्थान बना चुके ऐसे उत्कृष्ट नेता पर भारत को गर्व होना स्वाभाविक ही है।

आज मैं उनके सुदीर्घ और सुखद जीवन की कामना करता हूँ और कामना करता हूँ कि वे अपने देश की जनता की सेवा और उसके माध्यम से शांति और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के लिए अपना अवदान देते रहें।