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नेहरू के बारे में लेख और भाषण



ना काहू से बैर लॉर्ड एटली
जब कोई देश आज़ाद होता है, तो अक्सर ऐसा होता है कि स्वतंत्रता के बाद के कुछ वर्ष निराशा और मोहभंग के होते हैं। इस प्रकार के संघर्ष के नेता प्रायः सकारात्मक चिन्तन करने के बजाए आलोचना अधिक करते हैं। कभी-कभी उनके मन में कड़वाहट भरी होती है और पुराने द्वेष भाव होते हैं जिसके कारण वे पिछली शासन व्यवस्था के बचे हुए हर प्रतीक को मिटा देना चाहते हैं। आज़ादी मिलने पर, प्रशासन चलाने के अनभ्यस्त ये लोग, अपने अतीत से पीछा छुड़ाने की कोशिश में अनावश्यक चीज़ों के साथ-साथ महत्वपूर्ण चीज़ों से भी हाथ गँवा बैठते हैं; ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं जिनकी समझ का दायरा इतना व्यापक हो और जिनमें शासन-कौशल हो कि वे पुरानी व्यवस्था को बदल कर नई व्यवस्था का सफलतापूर्वक परिवर्तन कर सकें।

इस दृष्टि से भारत एक भाग्यशाली देश था कि उसे जवाहरलाल नेहरू जैसा असाधारण क्षमता और सूझबूझ वाला नेता मिला।

ब्रिटिश सरकार द्वारा कई वर्षों तक कारावास में रखे जाने के बावजूद उनके मन में कड़वाहट नहीं थी। उनके विचार इतने महान थे कि वे किसी भी प्रकार के क्षुद्र विचारों से ऊपर उठकर सोच सकते थे। वे पूर्व और पश्चिम दोनों को समझते हैं और इस बात को ध्यान में रखते हुए लगभग बारह वर्षों से अपने देश का नेतृत्व कर रहे हैं कि इनमें से प्रत्येक परम्परा भारत के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकती है। उन्होंने इतने बड़े उप-महाद्वीप का शासन चलाने में आने वाली व्यापक समस्याओं को समझा है। उन्होंने इस बात को समझा कि सिविल सेवकों के रूप में पिछली शासन व्यवस्था की सेवा करने वाले भारतीय बदलाव के लिए संघर्ष करने वालों से कम देश प्रेम का भाव नहीं रखते हैं। उन्होंने इन लोगों की योग्यताओं का पूरा लाभ उठाया; उन्होंने पिछले कई दशकों में तैयार किए गए शासन तंत्र को भी ध्वस्त नहीं किया।

इसके अलावा, अधीनता से उभरने वाले किसी राष्ट्र के नेता के सामने तानाशाह बन जाने का बड़ा भारी प्रलोभन होता है। ऐसा नेता तेज़ गति से तरक्की करने की अपने चाह के कारण लोकतांत्रिक सिद्धान्तों को तिलांजलि देकर कोई छोटा और सरल रास्ता अपना सकता है। लेकिन नेहरू इतने विवेकशील थे कि वे ऐसा नहीं कर सकते थे। उन्हें मालूम था कि लोगों की सहमति से किए गए सुधार किसी सरकार द्वारा ऊपर से थोपे गए सुधारों की तुलना में कहीं अधिक टिकाऊ होते हैं। इसलिए उन्होंने हमेशा ही सर्वसत्तावादी तरीकों का प्रयोग करने की प्रवृत्ति को नियंत्रित किया है।

गाँधी के आध्यात्मिक वारिस और अपरिमित निजी प्रतिष्ठा के धनी के रूप में उन्होंने लोकतंत्र के मार्ग को ही अपनाया है। राष्ट्रवाद एक अच्छा सेवक किन्तु बुरा स्वामी होता है। अतिराष्ट्रवाद दुनिया को टुकड़ों में बाँट सकता है जबकि यदि मानवता को अपने सामने खड़ी विपत्तियों से जीतना है तो विश्व को एकजुट किए जाने की आवश्यकता है। मुझे ऐसा लगता है कि भारत के सामने यह खतरा था कि यदि भाषा के आधार पर पुनर्गठन के अतिवादी दावों को स्वीकार कर लिया गया तो भारत विखंडित हो जाएगा। नेहरू को कुछ हद तक भाषाई आधार पर प्रान्तों के गठन की माँग को स्वीकार करना पड़ा है। बेशक, प्रशासनिक सहूलियत की दृष्टि से ब्रिटिश शासन द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं में कुछ बदलाव किए जाने की आवश्यकता थी, लेकिन नेहरू ने अतिवादी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने में संकोच नहीं दिखाया है। उन्होंने किसी बहुभाषी जनसमुदाय की अन्तर्जात कठिनाइयों का साहसपूर्वक सामना किया है। साथ ही उन्होंने एशिया के लोकतांत्रिक देशों की सामान्य भाषा अंग्रेज़ी को पूरी तरह से खत्म कर देने के किसी भी प्रयास में अन्तर्निहित खतरे को भी समझा है।

उन्होंने देश के भीतर जो नीतियाँ अपनाईं वे नीतियाँ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उनके दृष्टिकोण के अनुरूप हैं। यह बात उनके बुद्धिमत्तापूर्ण शासन कौशल में दिखाई देती है जिसके माध्यम से उन्होंने भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बनाए रखने की पहल की; क्योंकि यह संगठन अपने सदस्य देशों को पूरी स्वतंत्रता देकर अलग-अलग महाद्वीपों में रहते हुए भी कुछ निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर उन्हें एकजुट रखने वाले महत्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य करता है।

मैंने यूरोपीय मूल के लोगों द्वारा एशिया और अफ्रीका के लोगों के दुनिया में समानता के दावों को स्वीकार किए जाने का स्वागत किया है, लेकिन मैंने ऐसे अलग-थलग रहने वाले महाद्वीपों के विचार का विरोध किया है जो एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। मेरी मान्यता है कि नेहरू ने हमेशा इस खतरने को समझा है। वे केवल एशिया का संघ बनाने के बजाए स्वाधीनतायुक्त विश्व एकता चाहते हैं। उनके इस दृष्टिकोण को कभी-कभी, विशेषतः अमेरिका में, गलत समझा जाता है। मुझे लगता है कि पश्चिमी ब्लॉक के साथ कतार में खड़े होने के प्रति उनके विरोध को गलतफहमी के कारण रूस के प्रति सहानुभूति के परिणाम के तौर पर देखा गया है। नेहरू एक निहायत सभ्य व्यक्ति हैं और वे मार्क्सवाद-लेनिनवाद के शुष्क सिद्धान्तों से प्रभावित नहीं होंगे, साथ ही वे मानव की गरिमा का इतना सम्मान करते हैं कि वे नहीं चाहेंगे कि रूसी लोगों की सर्वसत्तावादी परम्पराएं दुनिया भर में लागू कर दी जाएं।

1936 में ही, जब वे सोवियत रूस से कहीं अधिक प्रभावित थे और अपने उपनिवेशवाद विरोधी विचारों के कारण पश्चिम के प्रति उनके विचार आज की तुलना में कहीं अधिक अनुदार थे, उस समय भी उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा था: "मेरी जड़ें शायद आज भी उन्नीसवीं शताब्दी में ही हैं, और मैं उदार मानवतावादी परम्परा से इतना प्रभावित हूँ कि पूरी तरह से उससे बाहर भी नहीं आ सकता हूँ। मेरी यह मध्यवर्गीय छवि मेरे साथ चिपकी रहती है और स्वाभाविक है कि बहुत से साम्यवादियों को इससे खीझ होती है। मुझे मतांधता नापसंद है, और कार्ल मार्क्स के लेखन को या किन्हीं और किताबों को इस प्रकार प्रस्तुत करना जैसे वे धर्मग्रंथ हों जिन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती, और उनका अनुशासन थोपना और विरुद्ध मत मानने वालों को उत्पीड़ित करना, जो कि आधुनिक साम्यवाद की विशेषता बन चुके हैं, ये भी पसंद नहीं हैं। रूस में जो घटित हुआ है, खास तौर पर सामान्य स्थितियों में भी अत्यधिक हिंसा का प्रयोग, वह भी मुझे नापसंद है।"

जहाँ तक मुझे दिखाई देता है, नेहरू चाहते हैं कि स्वतंत्र राष्ट्र किसी एक या दूसरे गुट से अपनी निरपेक्षता के माध्यम से विश्व में इतना प्रभाव उत्पन्न करें कि विश्व को सम्भावित तबाही से बचाया जा सके, और उनकी इच्छा है कि भारत इस दृष्टि से एक उपयोगी भूमिका निभाए। दरअसल यही उनकी विदेश नीति का सार है।

आज नेहरू स्वतंत्र विश्व के प्रधानमंत्रियों के अगुआ हैं। एक महान देश के प्रधानमंत्री के तौर पर वह जो कुछ भी कहते या करते हैं वह दूसरों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। बेशक, उन्होंने कुछ गलतियाँ भी की हैं। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो महान कार्य करता हो और उससे गलतियाँ न हों।

मैं स्वयं उनकी नीतियों से हमेशा सहमत नहीं होता हूँ और मुझे विश्वास है कि मेरे बारे में भी उनकी यही राय होगी, लेकिन मैं उनकी उपलब्धियों की सराहना करता हूँ, और एक महान व्यक्ति के तौर पर उनके प्रति आदर और प्रेम का भाव रखता हूँ।

मुझे लगता है कि नेहरू पूर्व और पश्चिम के विचारों का संयोग हैं। उन्हें दोनों की ही समझ है। वे पश्चिम की उपज हैं; और साथ ही वे एशिया के महानतम लोकतंत्र के नेता भी हैं। मैं यही आशा करता हूँ कि लोकतांत्रिक और निरंकुशतावादी विश्व के बीच की लड़ाई युद्ध के मैदान में लड़ी जाने के बजाए व्यक्तियों के मस्तिष्क में वैचारिक दायरे में लड़ी जाए; और हम भाग्यशाली हैं, और इसका श्रेय बहुत हद तक नेहरू को जाता है, कि इस संघर्ष में भारत स्वतंत्रता, लोकतंत्र और विधि के शासन के हिमायती के रूप में खड़ा दिखाई देता है।