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नेहरू के व्यक्तित्व के आयाम

“आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नयी सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है, जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है, और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है। यह एक सुयोग है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ भारत और उसकी जनता की सेवा, और उससे भी बढ़कर सारी मानवता की सेवा करने के लिए प्रतिज्ञा ले रहे हैं।”

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता प्राप्ति की पूर्व संध्या पर अपने ऐतिहासिक भाषण में इन्ही प्रेरणादायी शब्दों से साथी देशवासियों का स्वागत किया था... आज तक ये शब्द आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते आए हैं।

उन्हें एक नवजात राष्ट्र का नेतृत्व संभालने... उसे उसकी नियति तक पहुँचाने का दुस्साध्य दायित्व सौंपा गया था... एक दायित्व जिसे उन्होंने अप्रतिम तत्परता और उत्साह के साथ निभाया... क्योंकि वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे; उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था... वे स्वतंत्रता सेनानी, विश्व नेता, दार्शनिक और राष्ट्र-निर्माता... रणनीतिकार, विचारक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में गहरी रुचि रखने वाले बुद्धिजीवी थे।

पंडित नेहरू ने शासन-कला और विज्ञान के बीच के सम्बंध को इन शब्दों में समझाया: “राजनीति की राह मुझे अर्थशास्त्र तक लेकर पहुँची जो अपरिहार्य रूप से विज्ञान और हमारी समस्त समस्याओं और स्वयं जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण तक पहुँचती है। केवल विज्ञान ही भूख और गरीबी की समस्याओं को हल कर सकता है।”

आधुनिक भारत के निर्माता
पंडित नेहरू एक दूरदृष्टि वाले नेता थे... अपने समय से बहुत आगे। उनके सपनों का भारत एक अत्यंत आधुनिक भारत था... अपने मन में उन्होंने औद्योगिकीकृत... तकनीकी दृष्टि से विकसित और आत्मनिर्भर आधुनिक भारत के लिए योजना पहले ही बना ली थी।

पंडित नेहरू के स्पष्ट दृष्टिकोण की बदौलत 1950 में योजना आयोग की स्थापना – एक ऐसी पहल जिसके प्रति जीवन भर उनका लगाव बना रहा − के साथ ही भारत में योजनाबद्ध आर्थिक विकास के एक नए युग का सूत्रपात हुआ।

पंडित नेहरू नियोजन प्रक्रिया को राष्ट्र-निर्माण का एक सशक्त साधन मानते थे। एक दृष्टा के रूप में उन्होंने कृषि को विकसित किए जाने के साथ-साथ आधारभूत ढाँचे को तैयार किए जाने और उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता को पहले ही भाँप लिया था। उन्होंने बल देकर कहा था: “मैं उद्योगों का पूरा समर्थन करता हूँ। मैं इस्पात संयंत्रों और अन्य प्रकार के संयंत्रों का समर्थना करता हूँ, लेकिन मैं यह भी कहता हूँ कि कृषि किसी प्रकार के उद्योग से कहीँ अधिक महत्वपूर्ण है।”

पंडित नेहरू की सरकार ने बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण कराया... औद्योगिक आधारभूत ढाँचा तैयार किया... व्यापक भूमि और कृषि सुधार लागू किए... और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और भारतीय प्रबंध संस्थानों की स्थापना शिक्षा पर उनके विशेष ध्यान को रेखांकित करती है।

भाखड़ा बाँध का उद्घाटन करते हुए पंडित नेहरू ने उसे “आधुनिक भारत का मंदिर” कहा था। बाद में उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की सराहना करते हुए उन्हें आधुनिक भारत के मंदिर बताया था। उन्होंने एक औद्योगिकीकृत भारत के भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया – और अपने समय के दूसरे नेताओं से भिन्न विचार रखते हुए उन्होंने यह सब एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कर दिखाया। इसमें संदेह नहीं कि भारत के आर्थिक विकास और खाद्य सुरक्षा तथा ऊर्जा सुरक्षा की कार्य-योजना की नींव पंडित नेहरू ने ही रखी थी।

उनके इन विचारों की अन्तर्निहित क्षमता के कारण ही पंडित नेहरू को आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में सम्मानित किया जाता है।

विश्व-नेता
बौद्धिक प्रखरता पंडित नेहरू के व्यक्तित्व का एक विशिष्ट गुण था... एक ऐसा गुण जिसके लिए उनके विरोधी भी उनकी सराहना करते थे। 1955 में पंडित नेहरू को लिखे अपने एक पत्र में विंस्टन चर्चिल ने लिखा था: “शांति के लिए आपकी उत्कट इच्छा और हमें विगत में हमारी मित्रता को खत्म करने वाले विरोधों के प्रति आपकी सहृदयता का मैं सदैव प्रशंसक रहा हूँ।” चर्चिल विश्व के अनेक राजनेताओं में से एक थे जो पंडित नेहरू की बुद्धिमत्ता, उनके व्यक्तित्व और उनके प्रगतिशील विचारों से प्रभावित हो कर उनकी ओर आकर्षित होते थे।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पंडित नेहरू विश्व के उन नेताओं में से एक थे जिन्होंने 1961 में बेल्ग्रेड में गुट-निरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की थी। इसके पहले शिखर सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए नेहरू ने विकासशील देशों और पश्चिमी तथा पूर्वी गुटों के संदर्भ में एक बीच का मार्ग अपनाए जाने की ओजस्वी ढंग से वकालत की थी।

पंडित नेहरू अपने नेतृत्व कौशल से अन्तरराष्ट्रीय और घरेलू मुद्दों को आसानी से एक साथ साध लेते थे... भारत के लिए वे एक राजनेता थे, तो विश्व के लिए वे एक कुशल कूटनीतिज्ञ थे।

नेहरू... और उनका दर्शन
पंडित नेहरू के जीवन के विभिन्न पहलुओं ने उनके दर्शन को गढ़ा था। औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष के दिनों में जब वे इलाहाबाद में बड़े हो रहे थे, तब उनका पारिवारिक निवास आनन्द भवन उन उथल-पुथल भरे दिनों और स्वदेशी आंदोलन के जन्म का साक्षी था। उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू एक प्रतिष्ठित वकील थे और युवा पंडित नेहरू ने छोटी उम्र में ही राष्ट्रवादी भावना को ग्रहण कर लिया था।

महात्मा गाँधी के प्रभाव में आकर उनके मन में गरीबों और पददलितों के प्रति सहानुभूति जागृत हुई।

इंग्लैंड में मिली शिक्षा ने उनके अन्दर के बुद्धिजीवी को उजागर किया।

बर्लिन, ब्रसेल्स और मॉस्को जैसे स्थानों की यात्राओं ने उनके राजनैतिक विचारों को आकार दिया और उनकी इस धारणा को सुदृढ़ किया कि भारत को एक समाजवादी सामाजिक ढाँचे की आवश्यकता है – एक ऐसा सिद्धान्त और विश्वास जिसका उन्होंने 1929 के लाहौर सम्मेलन में और फिर 1931 में कराची सम्मेलन में प्रबल समर्थन किया। दरअसल स्वातंत्रयेत्तर भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की स्थापना के विचार की नींव कराची सम्मेलन में पारित किए गए मौलिक अधिकारों सम्बंधी प्रस्ताव के साथ ही पड़ी थी।

निःसंदेह प्रत्येक भारतीय पंडित नेहरू को सदैव स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख पात्रों में से एक केंद्रीय पात्र के रूप में याद रखेगा। जब महात्मा गाँधी ने नमक सत्याग्रह शुरू किया तो नेहरू इस अनूठे सविनय अवज्ञा आंदोलन में कूद पड़े और 1930 और 1935 के बीच उन्हें चार वर्ष के कारावास की सज़ा दी गई। जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने उसे बलपूर्वक कुचलने का प्रयास किया, लोकप्रिय नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में बन्द कर दिया गया और पंडित नेहरू ने एक बार फिर एक लम्बी अवधि जेल में काटी। 1945 में जब लॉर्ड वॉवेल ने शिमला सम्मेलन आयोजित किया तो पंडित नेहरू को रिहा किया गया। यह पंडित नेहरू की सबसे बड़ी उपलब्धि का समय था। लॉर्ड वॉवेल के साथ और उसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन के साथ समझौता वार्ताओं में उनकी कन्द्रीय भूमिका ने प्रभावशाली राजनेता के रूप में उनकी क्षमता को रेखांकित किया जिसकी परिणति औपनिवेशिक शासन के शिकंजे से भारत की स्वतंत्रता के रूप में हुई।

पंडित नेहरू ने प्रचुर लेखन किया और भारत एक खोज... जिसे बड़ी संख्या में लोग एक गौरव ग्रंथ मानते हैं, सहित भारत और विश्व के बारे में अनेक पुस्तकें लिखीं।

एक मृदु-भाषी सज्जन व्यक्ति
भारत के लिए अपने प्रेम को पंडित नेहरू ने अपने लेखन में इस प्रकार व्यक्त किया: “भारत एक भौगोलिक और आर्थिक यथार्थ है, विविधता के बीच एक सांस्कृतिक एकता, मज़बूत लेकिन अदृश्य धागों से एक साथ बंधी अन्तर्विरोधों की एक गठरी। भारत में प्राचीन काल की किसी दन्तकथा जैसा मायावी गुण है; मानो किसी सम्मोहन ने उसके मानस को पकड़ रखा हो। भारत एक मिथक और एक अवधारणा है, एक स्वप्न और एक परिकल्पना, और फिर भी वह बिल्कुल वास्तविक है, विद्यमान और विस्तीर्ण।”

एक मनुष्य के रूप में पंडित नेहरू का व्यक्तित्व चित्ताकर्षक था... वे सौम्य, मृदु-भाषी और स्नेही स्वभाव वाले व्यक्ति थे।

अपने परिवार के लिए वे एक परवाह करने वाले पति और एक प्रेम करने वाले पिता थे... उनकी परवरिश में उनकी पुत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने उनके नेतृत्व कौशल और उनकी शासन कला जैसे उनके कई गुणों को आत्मसात किया था।

पंडित नेहरू अपनी एक और सुपरिचित विशेषता के लिए जाने जाते थे... बच्चों के प्रति उनका प्रेम... उन्हें बच्चों की संगति प्रिय थी। बच्चे भी उन्हें प्रेम करते थे और उन्हें “चाचा नेहरू” कह कर बुलाते थे। इसलिए यह उचित ही है कि 14 नवम्बर को उनका जन्म दिन भारत भर में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।