नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



पुराने समय में अग्रेज़ी निःसंदेह भारत में एक थोपी हुई भाषा थी। भारत पर अपना आधिपत्य जमाने वाली शक्ति द्वारा इसे थोपा गया था। इलसिए, हालाँकि इसने ज्ञान के नए वातायन खोले, लेकिन यह हमारी अपनी भाषाओं और हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं पर हावी हो गई। कुछ हद तक उसकी स्मृति बाकी है हालाँकि हमें उसे भुला देना चाहिए और इस विषय पर और अधिक निष्पक्ष और निर्वैयक्तिक ढंग से विचार करना चाहिए।

यह बात सही है कि भारतीय भाषाओं को अंग्रेज़ी के कारण मानसिक और अन्य प्रकार की पीड़ा सहनी पड़ी है: लेकिन उन्हें बाहर की दुनिया से सम्पर्क के कारण लाभ भी बहुत हुआ है। मैं अपेक्षाकृत अंग्रेज़ी का पक्षधर हूँ। मैं इस भाषा को महत्वपूर्ण मानता हूँ। लेकिन मैं समझता हूँ कि यदि भारत में यह धारणा जारी रहती है कि अंग्रेज़ी न जानने वाला कोई व्यक्ति भले ही अपनी भाषा का विद्वान हो, तब भी वह अंग्रेजी जानने वाले किसी दूसरे व्यक्ति से हेय है, भले ही उसका अंग्रेज़ी का ज्ञान कितना ही अशुद्ध क्यों न हो, तो यह बात बहुत बुरी होगी।

भाषा के मामले में भारत में एक प्रमुख बदलाव यह आया है कि अब स्कूलों में शिक्षा राज्य की भाषा में दी जाती है। निश्चित तौर पर शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रयोग किया जाता है, विशेषतया विश्वविद्यालयों में। लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा दिया जाना भाषा की दृष्टि से पुरानी परम्परा में एक बदलाव है। आप इसलिए अंग्रेज़ी को केवल एक गौण भाषा मान सकते हैं, एक अनिवार्य सहायक भाषा कह सकते हैं। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाषा है, लेकिन एक ऐसी भाषा जो शिक्षा का माध्यम नहीं है। इसे विदेशी भाषा के रूप में सीखा जाता है। ऐसा होना अवश्यंभावी है और उचित भी।

भारतीय भाषाओं के आत्मनिर्भर हो जाने या अपनी अलग सत्ता कायम कर लेने के कुछ जोखिम और खतरे हैं। हमें ऐसी किसी भी प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन ऐसा करते समय हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम उन भाषाओं के विकास में बाधक न बनें। हमें उन भाषाओं को अपनी पूरी क्षमता तक विकसित होने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए। मैं मानता हूँ कि इस प्रकार के विकास से भाषाएं एक-दूसरे के निकट आ सकती हैं। हम भाषाई अलगाववाद के खतरे से तभी उभर पाएंगे जब उचित प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करेंगे और जब भाषाओं का कोई एक समूह अपनी इच्छाओं को दूसरे समूहों पर थोपने का प्रयास नहीं करेगा।

मैं कह चुका हूँ कि मैं अंग्रेज़ी के प्रति झुकाव रखता हूँ। लेकिन मुझे इस देश की जनता से भी लगाव है। मैं यह बात नहीं भूल सकता कि हमें चालीस करोड़ लोगों को साथ लेकर चलना है, और उनकी भाषा के अलावा उन्हें मन से, भावनात्मक रूप से और व्यावहारिक रूप से साथ लेकर चलने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। और यह भूलने का कोई लाभ नहीं है कि अंग्रेज़ी न जाने वाला लोग ही भारत का भाग्य तय करेंगे, क्योंकि इस देश में उन्हीं का भारी बहुमत है। हमें अपनी भाषाओं को प्रोत्साहन देना होगा, और शिक्षा के कार्य को इस प्रकार से चलाना होगा कि हम अपनी भाषाओं को उत्तरोत्तर बढ़ाएं ताकि लोगों के साथ हमारा सम्पर्क बना रहे और हम उन्हें सरकार के स्तर पर और देश में हो रही घटनाओं के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ कर रख सकें।

हमारे संविधान में यह व्यवस्था की गई कि हिन्दी का उत्तरोत्तर विकास होना चाहिए। हमने यह निर्णय इसलिए नहीं लिया कि हिन्दी दूसरी भाषाओं से बेहतर है या अधिक सक्षम है, बल्कि यह निर्णय कुछ विशेष व्यावहारिक कारणों से लिया गया। मैं मानता हूँ कि ऐसा ही किया जाना चाहिए।

मैं दो बातों का सुझाव दूँगा। एक तो, जैसा मैंने कहा, इसे थोपा नहीं जाना चाहिए। दूसरे, मैं चाहूँगा कि एक अनिश्चित अवधि के लिए – मैं नहीं कह सकता कि कितने समय तक – एक सहायक, अतिरिक्त भाषा के रूप में अंग्रेज़ी का प्रयोग किया जा सकता है। मेरा यह विचार मुख्यतः वर्तमान में उपलब्ध सुविधाओं के कारण नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं नहीं चाहता कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोग यह महसूस करें कि हिन्दी में पत्राचार करने के लिए बाध्य करके उन्हें कुछ विशेष सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। वे लोग अंग्रेज़ी में पत्राचार कर सकते हैं। मैं चाहूँगा कि जब तक लोगों को इसकी आवश्यकता हो तब तक अंग्रेज़ी एक वैकल्पिक भाषा बनी रहे, और यह निर्णय मैं हिन्दी जानने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि हिन्दी न जानने वाले लोगों पर छोड़ना चाहूँगा।

अब मैं अंग्रेज़ी और उसके महत्व के बारे में बात करूँगा। अंग्रेज़ी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि भारत में बहुत से लोग इस भाषा को समझते हैं, हालाँकि यह एक ध्यान में रखे जाने योग्य बात है। यह भाषा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि यह मिल्टन और शेक्सपीयर की भाषा है, हालाँकि यह मुद्दा भी विचारणीय है। एशियाई भाषाओं के अलावा फ्रेंच, जर्मन, रूसी और स्पैनिश जैसी दूसरी विदेशी भाषाओं में भी महान कवि हुए हैं। अंग्रेज़ी हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक विश्व को समझने की दृष्टि से अंग्रेज़ी हमारे लिए एक महत्वपूर्ण वातायन है। और हम उस वातायन को बन्द नहीं कर सकते हैं। यदि हम उसे बन्द करते हैं तो हम अपने भविष्य को जोखिम में डालेंगे।

निष्कर्ष के तौर पर मैं कहूँगा कि यह सबसे महत्वपूर्ण है कि लोगों का विकास उनकी जड़ों से हो। हमारी भाषाएं संस्कृत से हमारी सांस्कृतिक परम्परा के सातत्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। हमें अपनी भाषाओं का विकास करना है और हमें अपने लोगों के साथ सम्पर्क बनाए रखना है। इसलिए हमें अपनी भाषाओं में अधिक से अधिक काम करना होगा। साथ ही हमें यह भी याद रखना होगा कि हम आधुनिक वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। हमारे पास कोई एक ऐसी विदेशी भाषा होनी चाहिए जो हमारे लिए आधुनिक विश्व की खिड़की की तरह काम कर सके।

लोकसभा में अंग्रेज़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने सम्बंधी श्री फ्रैंक एंथनी के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान दिए गए भाषण से उद्धृत