नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



यहाँ आकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है क्योंकि मैं हमेशा ही न केवल हमारे पूर्व और पश्चिम में स्थित पड़ोसी देशों के साथ, बल्कि विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों को बढ़ाने के लिए उत्सुक रहा हूँ। यह केवल सांस्कृतिक सम्बंधों की इच्छा रखने या उन्हें अच्छा समझने भर का प्रश्न नहीं है; बल्कि यह प्रश्न उस परिस्थिति की आवश्यकता से भी जुड़ा है जो यदि उसे सुधारने के लिए कुछ न किया गया तो अवश्य बिगड़ेगी। मैं दिल से आशा करता हूँ कि भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद की स्थापना से हमारे देश के लोगों और अन्य देशों के लोगों के बीच मेल-जोल बढ़ेगा और सम्बंध प्रगाढ़ होंगे।

मेरे मन में बहुत उलझन की स्थिति है और मैं साफ-साफ आपको बताता हूँ कि वह उलझन क्या है। सारे मूल प्रश्न दुनिया में हमारे आसपास घटित हो रहे घटनाक्रम से उपजते हैं। राष्ट्र, व्यक्ति और लोगों के समूह एक-दूसरे को समझने की बात करते हैं और ज़ाहिर है कि उन्हें एक-दूसरे को समझना चाहिए और एक-दूसरे से सीखना भी चाहिए। लेकिन जब मैं इतिहास को देखता हूँ और वर्तमान की घटनाओं के बारे में सोचता हूँ तो कभी-कभी मुझे लगता है कि जो लोग एक-दूसरे को सबसे अधिक समझते हैं वही लोग आपस में सबसे ज़्यादा झगड़ते हैं। यूरोप में या एशिया में पड़ोसी देश एक-दूसरे को नाराज़ करते रहते हैं, हालाँकि आपस में बहुत अच्छी तरह परिचित होते हैं। इसलिए ज्ञान या जानकारी अपने आप में सहयोग या मित्रता का कारण नहीं है। यह कोई नई बात नहीं है। इतिहास के पन्ने भी यही दर्शाते हैं। क्या उन राष्ट्रों मे कोई कमी रही या इस प्रश्न के प्रति नज़रिए में ही कोई खराबी है? या कोई ऐसी बात है जो उस ढंग से नहीं हुई जैसा होना चाहिए था? जब हम संस्कृति की बात करते हैं तो मेरे में तुरन्त यह प्रश्न उठता है कि जिस ‘संस्कृति’ के बारे में लोग इतनी बात करते हैं वह आखिर है क्या?

मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तब जर्मन ‘कुल्तूर’ के बारे में और जर्मन लोगों द्वारा देशों को जीत कर और दूसरे तरीकों से उसका प्रसार करने के प्रयासों के बारे में पढ़ा करता था। इस ‘कुल्तूर’ को फैलाने के लिए और उसका विरोध करने के लिए एक बड़ा युद्ध हुआ था। ऐसा लगता है कि हर देश और हर व्यक्ति की संस्कृति को लेकर अपनी अलग राय है। जब सांस्कृतिक सम्बंधों की बात होती है – हालाँकि सैद्धान्तिक तौर पर यह बहुत अच्छी बात है – तब दरअसल होता यह है कि उन अलग और विचारों का संघर्ष होता है और मेलमिलाप के बजाए उलटे मनमुटाव ही बढ़ता है। यह एक मूल प्रश्न है – संस्कृति क्या है? और निश्चित तौर पर मैं आपको इसकी कोई परिभाषा देने में सक्षम नहीं हूँ क्योंकि मुझे इसकी कोई परिभाषा ही नहीं मिली है।

हम देखते हैं कि हर राष्ट्र और हर सभ्यता अपनी संस्कृति को विकसित करती है जिसकी जड़ें सैकड़ों और हज़ारों वर्षों तक की पीढ़ियों तक जाती हैं। हम देखते हैं कि इन राष्ट्रों पर उस अवधारणा का घनिष्ठ प्रभाव पड़ता है जिसके कारण से बहुत समय पहले उस सभ्यता की शुरुआत हुई थी। वह अवधारणा दूसरी अवधारणाओं से प्रभावित होती है और हम पाते हैं कि इन अलग-अलग अवधारणाओं के बीच परस्पर क्रिया चलती रहती है। मैं समझता हूँ कि ऐसी कोई संस्कृति नहीं है जो पूरी तरह से मौलिक, शुद्ध और किसी भी दूसरी सभ्यता से बिल्कुल अप्रभावित हो। यह हो ही नहीं सकता, वैसे ही जैसे कोई यह दावा नहीं कर सकता कि वह सौ प्रतिशत किसी एक ही जाति या वंश से है क्योंकि सैकड़ों-हज़ारों वर्षों में बदलाव और मिश्रण तो ज़रूर हुआ है।

इसलिए, राष्ट्रीय संस्कृति का मूल तत्व भले ही प्रमुख बना रहे, संस्कृति में थोड़ी मिलावट तो होगी ही। यदि यह प्रक्रिया शांतिपूर्वक चलती रहे तो इसमें कोई नुकसान नहीं है। लेकिन अक्सर इसके कारण संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके कारण कभी-कभी किसी एक समूह को लगने लगता है कि उसकी संस्कृति को बाहरी या विदेशी संस्कृति द्वारा पराजित कर दिए जाने का खतरा है। ऐसी स्थिति में वे लोग अपने खोल में सिमट जाते हैं जिससे उनकी सोच और विचार बाहर तक नहीं पहुँच पाते हैं। यह एक नुकसान पहुँचाने वाली स्थिति है, क्योंकि किसी भी मामले में, और विशेषकर संस्कृति के मामले में, गतिहीनता से बुरा कुछ नहीं हो सकता। संस्कृति, यदि उसका कोई मूल्य या महत्व है, में एक गहराई होनी चाहिए। और उसका एक गतिमान स्वरूप होना चाहिए। क्योंकि संस्कृति बहुत सी बातों पर निर्भर करती है। यदि हम उस मूल ढाँचे को छोड़ दें जो किसी राष्ट्र या समहू के विकास के शुरुआती दौर में उसे दिया गया था, तो फिर वह भौगोलिक परिस्थिति, जलवायु और अन्य प्रकार के दूसरे कारकों से प्रभावित होती है। अरब क्षेत्र की संस्कृति मुख्यतः वहाँ की भौगोलिक स्थिति और रेगिस्तान से प्रभावित है क्योंकि उसका विकास उसी क्षेत्र में हुआ। ज़ाहिर है कि प्राचीन काल में भारत की संस्कृति, जैसाकि हम अपने साहित्य में देखते हैं, हिमालय, यहाँ के वनों और यहाँ की महान नदियों के साथ-साथ और भी दूसरी चीज़ों से बहुत प्रभावित हुई। यह ज़मीन से उपजी संस्कृति का सहज विकास था। संस्कृति के विभिन्न स्वरूपों जैसे वास्तुकला, संगीत और साहित्य, में से कोई दो मिल सकते हैं, जैसा कि अक्सर होता था, और एक सुखद संयोग का निर्माण करते हैं। लेकिन जब भी किसी चीज़ में सुधार करने का प्रयास किया जाता है या जब वह विकास न तो सहज होता है और न ही अपने आप को ढाल पाता है, तब संघर्ष अवश्यंभावी हो जाता है। मेरे विचार से तब भी एक ऐसी स्थिति का विकास होता है जो मूलतः संस्कृति की किसी भी अवधारणा के विरुद्ध होती है। और वह चीज़ होती है जानबूझकर विचार को अलग कर लेना और उसे जानबूझकर दूसरे प्रभावों से अलग करके रखना। भारत के इतिहास के बारे में मेरी अपनी राय यह है कि हम भारत की तरक्की और उसके पतन को उन कालखंडों से जोड़कर देख सकते हैं जब भारत ने अपने विचारों को बाहर की दुनिया के लिए खुला रखा था और जब उसने उन्हें बन्द करने का प्रयास किया। उसने अपने आपको बाहरी प्रभावों से जितना अलग किया, उसकी प्रगति की गति उतनी ही थमती गई। भले ही किसी व्यक्ति, समूह, राष्ट्र या समाज के जीवन की बात हो, जीवन मूलतः गतिशील, परिवर्तनशील और विकासशील होता है। जो भी चीज़ उसके गतिमान विकास को रोकती है, उसे नुकसान पहुँचाती है, और उसके महत्व को कम करती है।

दुनिया में कई महान धर्म हुए हैं और उन्होंने मानवता पर बहुत अधिक प्रभाव डाला है। फिर भी, यदि मैं पूरे सम्मान के साथ और किसी के प्रति कोई दुर्भावना के बिना कह सकूँ तो, इन्हीं धर्मों ने, मनुष्य के मन को जितना अपरिवर्ती बनाया है, कट्टर और हठधर्मी बनाया है, उसका एक बुरा प्रभाव हुआ है। उनमें कही गई बातें अच्छी होती हैं लेकिन जब यह दावा किया जाता है कि उनमें कही गई बातें ही अन्तिम सत्य हैं, तब समाज गतिहीन हो जाता है।

सम्बंधित व्यक्ति या जाति या राष्ट्र में कुछ गहराई होनी ही चाहिए और कहीं न कहीं उसकी जड़ें होनी ही चाहिए। यदि अतीत में उनकी जड़ें न हों तो उनका अधिक महत्व नहीं रह जाता है क्योंकि यह अतीत ही उनकी कई पीढ़ियों के अनुभव और ज्ञान की संचित राशि होता है। इसलिए इसका होना आवश्यक होता है। अन्यथा व्यक्ति एक ऐसी धूमिल सी प्रति बन जाता है जिसका एक व्यक्ति या समूह के रूप में कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता है। वहीं दूसरी ओर व्यक्ति केवल अपनी जड़ों के सहारे ही जीवित नहीं रह सकता है। और जड़ें भी, यदि वे बाहर की धूप और खुली हवा में निकल कर न आएं तो मुरझा जाती हैं। ऐसा होने पर ही जड़ें आपका भरण-पोषण कर सकती हैं। तभी वृक्ष पर शाखाएं और फूल लगेंगे। तब आप इन दो आवश्यक चीज़ों के बीच संतुलन कैसे कायम रखेंगे? यह बहुत कठिन काम है क्योंकि कुछ लोग शाखाओं पर उगे फूलों और पत्तियों की बहुत परवाह करते हैं और यह भूल जाते हैं कि ये तो इसलिए फल-फूल रहे हैं क्योंकि उन्हें पोषण देने वाली एक मज़बूत जड़ मौजूद है। कुछ ऐसे होते हैं जो जड़ों की चिन्ता में ही इतने उलझे रहते हैं कि फूल और पत्तियाँ बाकी नहीं रहतीं; बस एक मोटा तना बाकी रह जाता है। तो, प्रश्न यह है कि इनके बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।

क्या संस्कृति का आशय व्यक्ति के किसी प्रकार के आन्तरिक विकास से है? बेशक, यही होना चाहिए। क्या इसका अर्थ इससे है कि वह दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है? निश्चित ही होना चाहिए। क्या इसका सम्बंध दूसरे व्यक्ति को समझने से है? मुझे ऐसा ही लगता है। क्या इसका सम्बंध दूसरे को अपनी बात समझा सकने से है? मुझे तो ऐसा ही लगता है। ये सब उसी के अर्थ हैं। जो व्यक्ति दूसरों के दृष्टिकोण को नहीं समझ सकता है, वह इस सीमा तक अपनी सोच और संस्कृति की दृष्टि से सीमित होता है, क्योंकि, कुछ असाधारण मनुष्यों को छोड़कर, कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जिसे हर चीज़ की जानकारी और ज्ञान हो। दूसरे व्यक्ति को भी सत्य की कुछ जानकारी या ज्ञान हो सकता है और यदि हम उसके प्रति अपने मस्तिष्क को बन्द कर लें तो न केवल हम अपने आप को उस ज्ञान से वंचित करेंगे, बल्कि हम एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित करेंगे जो, मेरी समझ के हिसाब से, किसी सुसंस्कृत व्यक्ति की प्रकृति के विरुद्ध होता है। अपने भीतर जमे हुए सुसंस्कृत चित्त के खिड़की और दरवाज़े खुले रहने चाहिए। उसमें यह क्षमता होनी चाहिए कि वह दूसरों के दृष्टिकोण को समझ सके, भले ही वह उससे असहमत क्यों न हो। किसी बात से सहमत या असहमत होने का प्रश्न तभी उठता है जब आप उसे समझ लें। अन्यथा, यह तो बन्द आँख से किसी चीज़ को नकारना होता है जोकि किसी प्रश्न के बारे में विचार करने का सभ्य तरीका नहीं है।

मैं एक दूसरे शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा – विज्ञान। जीवन की समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या होता है? मैं समझता हूँ कि यह दृष्टिकोण हर चीज़ की जाँच करता है, गलतियों को सुधार कर और परीक्षण के द्वारा सत्य का अन्वेषण करता है और चीज़ों को यूँ हीं स्वीकार नहीं कर लेता है, बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि वैसा क्यों है, और यदि व्यक्ति उसके प्रति आश्वस्त हो जाए तो उसे स्वीकार कर लेता है, कोई प्रमाण प्रस्तुत किए जाने पर अपनी राय को बदलने की क्षमता रखता है, अपनी सोच खुली रखता है, जहाँ भी सत्य मिले उसे आत्मसात करने का प्रयत्न करता है। यदि यही संस्कृति है, तो आधुनिक विश्व में और आज के राष्ट्रों में यह बात किस हद तक परिलक्षित होती है? ज़ाहिर है कि यदि यह और अधिक परिलक्षित हो रहा होता तो फिर हमारी बहुत सी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं को हल करना बहुत आसान रहा होता।

दुनिया का लगभग हर देश यह मानता है कि उसे किसी प्रकार के ईश्वरीय विधान से यह व्यवस्था प्राप्त है कि वह चुने हुए लोगों या जाति का समूह है और दूसरे लोग, वे भले हों या बुरे, किसी दृष्टि से उनसे कमतर हैं। यह आश्चर्य की बात है कि इस प्रकार की भावना पूर्व और पश्चिम के सभी राष्ट्रों में समान रूप से पाई जाती है। पूर्व के राष्ट्र अपने विचारों और विश्वासों पर मजबूती से डटे हुए हैं और कभी-कभी कुछ मामलों में अपने आपको दूसरों से बेहतर भी समझते हैं। खैर, पिछले दो-तीन सौ सालों में उन्हें कुछ आघात लगे हैं और वे अपमानित हुए हैं, उन्हें नीचा दिखाया गया है और उनका शोषण हुआ है। और इसलिए उनकी इस भावना के बावजूद कि वे कई प्रकार से दूसरों से बेहतर रहे हैं, उन्हें यह स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा है कि उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा सकता है और उनका शोषण किया जा सकता है। इससे कुछ हद तक, उन्हें वास्तविक स्थिति का आभास हुआ है। यह कहकर भी वास्तविकता से भागने की कोशिश की गई कि यह बड़े दुख की बात है कि हम भौतिक और तकनीकी दृष्टि से इतने उन्नत नहीं थे लेकिन ये सब चीज़ें तो बिल्कुल सतही हैं; फिर भी मूलभूत बातों की दृष्टि से, आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्यों की दृष्टि से हम ही श्रेष्ठ थे। मेरे मन में इस बात को लेकर कोई संशय नहीं है कि आध्यात्मिकता और नैतिकता ही बाकी चीज़ों से अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन जिस प्रकार से इस विचार के सहारे पलायन करने का प्रयास किया जाता है कि हम आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, सिर्फ इसलिए कि हम भौतिक दृष्टि से पिछड़े हों, बड़े आश्चर्य की बात है। यह किसी भी दृष्टि से युक्तिसंगत नहीं लगता। यह अपनी अवनति के कारणों का सामना करने से पलायन करने का एक तरीका है।

बेशक, राष्ट्रवाद एक अजीब चीज़ है जो किसी देश के जीवन के एक दौर में जीवनदायी होता है, उसकी प्रगति, ताकत और एकता को बढ़ाता है, लेकिन साथ ही उसकी प्रवृत्ति ऐसी होती है कि वह व्यक्ति को इस दृष्टि से सीमित कर देता है कि वह अपने देश को बाकी दुनिया की तुलना में विशेष समझने लगता है। उसका नज़रिया बदल जाता है और वह लगातार अपने संघर्षों और अपने गुणों और विफलताओं के बारे में ही सोचता रहता है और दूसरे विचारों को त्याग देता है। इसका नतीजा यह होता है कि जो राष्ट्रवाद किसी जनसमूह के विकास का प्रतीक बनता है, वही राष्ट्रवाद मन के स्तर पर विकास में अवरोध का प्रतीक बन जाता है। जब राष्ट्रवाद कामयाब होता है तो कभी-कभी वह इतने आक्रामक और उग्र तरीके से फैलता है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक खतरा बन जाता है। आप जिस किसी भी विचारधारा का अनुसरण करते हों, आप इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि एक संतुलन कायम किए जाने की आवश्यकता है। नहीं तो जो अच्छा है, वही बुराई में बदल सकता है। यदि इसके बारे में गलत दृष्टिकोण अपनाया जाए तो वही संस्कृति जो मूलतः एक अच्छी चीज़ है, गतिहीन और उग्र बन जाती है और संघर्ष और घृणा को जन्म देने वाली बन जाती है। मैं नहीं जानता कि आप इस दृष्टि से संतुलन कैसे कायम करेंगे। इस युग की राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं के अलावा यह एक सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि इसके पीछे मनुष्य के मन में एक बड़ा संघर्ष चल रहा है और वह कुछ ऐसा तलाश कर रहा है जिसे वह ढूँढ नहीं पा रहा है। हम आर्थिक सिद्धान्तों की बात करते हैं क्योंकि उनका महत्व निर्विवाद है। जब मनुष्य भूख से मर रहे हों तब संस्कृति या ईश्वर की भी बात करना भी अज्ञानता है। किसी और चीज़ की बात करने से पहले मनुष्य की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिए। यहीं से अर्थशास्त्र की भूमिका शुरू होती है। लोग जब यह देखते हैं कि बोझ को ढोने की जिम्मेदारी में बराबरी नहीं है तो वे इस कष्ट और भुखमरी और असमानता को सहने के लिए तैयार नहीं हो सकते। जहाँ दूसरे फायदा उठाते हैं और वे केवल बोझ उठाते हैं।

हमें इन समस्याओं का समाधान आर्थिक दृष्टि से और दूसरे तरीकों से करना ही होगा, लेकिन मैं मानता हूँ कि इस सबके पीछे लोगों के दिमाग में एक बड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या भी है। हो सकता है कि कुछ लोग इसके बारे में जानबूझ कर सोचते हैं और कुछ लोग अचेतन मन से अस्पष्ट तौर पर इसके बारे में विचार करते हैं लेकिन यह बात तय है कि मनुष्य के मन में आज यह संघर्ष है। इसे कैसे हल किया जाएगा, मैं नहीं जानता। मुझे इस बात को लेकर चिन्ता है: जो लोग एक दूसरे को अधिक जानते हैं वे ही आपस में अधिक लड़ते हैं। फिर भी, इसका मतलब यह नहीं है कि हम एक दूसरे को समझने का प्रयास न करें। उसका तो यह अर्थ होगा कि हम अपने आप को सीमित कर लेंगे, और आधुनिक विश्व में ऐसा नहीं किया जा सकता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम उचित ढंग से एक-दूसरे को समझने का प्रयास करें। तरीके का सही होना महत्वपूर्ण है। सही तरीका, मित्रवत तरीका महत्वपूर्ण है क्योंकि मित्रततापूर्ण रवैये की प्रतिक्रिया भी मित्रतापूर्ण होती है। मुझे इस बारे में लेशमात्र भी संशय नहीं है कि जीवन का यह मूलभूत सिद्धान्त है कि यदि दृष्टिकोण उचित हो तो उसके लिए प्रतिक्रिया भी अनुकूल होती है। यदि दृष्टिकोण अनुचित होगा तो उसके लिए प्रतिक्रिया भी अप्रिय होगी। इसलिए यदि हम साथी मनुष्यों या देशों के प्रति मित्रतापूर्ण दृष्टिकोण रखेंगे, अपने मन और दिल के दरवाज़ों को खुला रखेंगे, उन्हें मिलने वाली सफलताओं को स्वीकार करेंगे – और इसका अर्थ यह नहीं है कि हम ऐसी चीज़ों के बारे में समझौता कर लें जिन्हें हम सत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं या अपनी प्रकृति के अनुकूल मानते हैं – तब हम समझ विकसित करने की दिशा में बढ़ेंगे, सही समझ की दिशा में बढ़ेंगे। इसलिए, मैं यह निर्णय आप पर छोड़ता हूँ कि संस्कृति क्या है और ज्ञान क्या है। हमारा ज्ञान बढ़ता है, समझ बढ़ती है और अनुभव बढ़ता है, और बढ़ते बढ़ते हमें इतना ज्ञान हो जाता है कि हमें अपनी स्थिति का अनुमान लगाना भी कठिन हो जाता है। हम इस सबसे अभिभूत हो जाते हैं और, और साथ ही हमारे भीतर यह भाव जाग्रत होता है कि ये सब चीजें आवश्यक रूप से पूरी मानव जाति के ज्ञान का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। मुझे लगता है कि कुछ ऐसे भी लोग हुए हैं जिन्हें आधुनिक जीवन और आधुनिक विज्ञान की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, लेकिन उसके बावजूद वे लोग हममें से अधिकांश लोगों से अधिक ज्ञानी थे। आगे चलकर कभी हम इस ज्ञान, वैज्ञानिक प्रगति और मनुष्य जाति की बेहतरी को सच्चे ज्ञान के साथ मिला पाएंगे या नहीं, मैं नहीं कह सकता। यह विभिन्न शक्तियों के बीच चल रही एक प्रतिस्पर्धा है। मुझे एक प्रसिद्ध यूनानी कवि की पंक्तियां याद आ रही हैं जो एक बहुत बड़े विद्वान भी थे:

बुद्धिमत्ता इसके सिवा और क्या है? मानव का जतन या
ईश्वर की असीम कृपा, इतनी सुन्दर, इतनी महान?
त्रास से मुक्त, श्वास लेते और प्रतीक्षारत
थामे द्वेष से ऊपर उठा हुआ एक हाथ,
और क्या मनोरमता से बना नहीं रहेगा चिर नेह?

भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद के उद्घाटन के अवसर पर दिया गया भाषण, नई दिल्ली, 9 अप्रैल, 1950