नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



जब मुझे यहाँ आने के लिए आमंत्रण मिला तो मैंने उसे सहर्ष स्वीकार किया। लेकिन फिर भी मुझे गाँधीजी से सम्बंधित इस प्रकार के किसी आयोजन में जाना स्वीकार करने में थोड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि उनके बारे में सोचते ही मेरे मन में कई प्रकार के विचार आने लगते हैं जो मेरे मन को उलझा देते हैं। मैं हमेशा यह समझने की कोशिश करता हूँ कि वे ऐसी परिस्थितियों में क्या प्रतिक्रिया करते, उनकी क्या सलाह होती और उनकी उस सम्भावित सलाह से हम कितने दूर हैं। यह बात मुझे परेशान करती है, और हो सकता है कि दूसरे लोगों को भी परेशान करती हो। मैं यह कल्पना करने का दुस्साहस नहीं कर सकता कि मैं उन ऊँचे मानदंडों के स्तर पर कार्य कर सकता हूँ जो वे हमसे अपेक्षा करते और जिन्हें उन्होंने स्वयं निर्धारित किया था।

हम सबने जैसी कल्पना की थी, गाँधीजी उससे कहीं अधिक बड़े इन्सान थे। उनका यह उल्लेखनीय गुण था कि वे अपने अनुयायियों को अपनी समस्याओं को हल करने का मौका देते थे और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित भी करते थे। वे उनका मार्गदर्शन करते थे, लेकिन चाहते थे कि उनके अनुयायी अपने निर्णय स्वयं लें और अपनी समझ के हिसाब से काम करें। वे अपनी राय किसी के ऊपर थोपना नहीं चाहते थे। वे अपने ही तरीके से लोगों के दिल और दिमागों को जीतना चाहते थे, लेकिन यह तरीका दूसरों पर अपने आपको थोपने का नहीं था। वे नहीं चाहते थे कि लोग अपनी भावना को दबाएं और वे जो कहें उसे करने या मानने लगें। वे ऐसे अनुयायी नहीं चाहते थे, हालाँकि उनके महान व्यक्तित्व के प्रभाव में लोगों के लिए अपनी स्वतंत्र बुद्धि के हिसाब से काम करना बहुत कठिन होता था।

गाँधीजी एक स्फूर्तिवान व्यक्ति थे। वे ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो किसी प्रकार की नित्यचर्या का पालन करते। वे अपने सिद्धान्तों पर अडिग थे और एक बार जब अपने मन में किसी बात को स्पष्ट तौर पर समझ लेते थे तो फिर कोई ताकत उन्हें डिगा नहीं सकती थी। लेकिन वे जीवन की हर छोटी-छोटी बात को ऐसा आधारभूत सत्य नहीं मानते थे जिसे बदला न जा सकता हो। वे समझते थे कि जीवन एक परिवर्तनशील और विकास की प्रक्रिया है और इसलिए उसे एक विकासशील और गतिशील दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। आधी शताब्दी से अधिक समय तक भारत और मानवता की सेवा करते हुए उन्होंने स्वयं का विकास किया और एक नए और बदले हुए अंदाज़ में समस्याओं का सामना किया। क्योंकि उनके व्यक्तित्व में बदलाव को भांपने और उसका सामना करते हुए अपने मूल सिद्धान्तों पर कायम रहने का गुण था। हम अपने वर्तमान स्तर पर रहते हुए उनके बारे में राय कैसे दे सकते हैं और यह कल्पना कैसे कर सकते हैं कि हम उनके आदर्शों पर खरे हैं? यही बात मुझे परेशान करती है। लेकिन उनके बारे में बात करना अपने आप में एक सांत्वना देने वाली बात है और हमें एक महान शख्सियत की याद दिलाती है। यह बात हमें ऊँचा उठाती है। इस संग्रहालय जैसी जगह में आना भी अपने आप में बड़ी बात है। यह बात हमें हमारे स्तर से ऊपर उठाकर एक ऐसी सतह पर ले जाती है जो हमारे जीवन के तुच्छ झगड़ों और घृणा के स्तर से ऊपर है। यह अच्छी बात है कि हम भारत के विभिन्न हिस्सों में इस प्रकार के संग्राहलय बना रहे हैं। यहाँ तक कि यदि हम गाँधीजी की पत्थर, संगमरमर या काँसे की प्रतिमाएं भी लगा सकें तो वह भी अच्छा है। कई वर्षों तक मैं मूर्तियाँ और प्रतिमाएं स्थापित किए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया करता था, अंशतः इसलिए क्योंकि मुझे यह पसंद नहीं था कि हम किसी भी प्रकार से मूर्तियों की पूजा करें और वे उन आन्तरिक गुणों का स्थान ले लें जो व्यक्ति की पूजा या उसके विचार में परिलक्षित होने चाहिए। मुझे लगता था कि हम औपचारिक रस्मों पर ज्यादा ध्यान देते हैं और उसके बाद समझ लेते हैं कि हमारा दायित्व पूरा हुआ। लेकिन बाद में विचार करने पर मैंने पाया है कि मूर्ति आदि की स्थापना के बारे में मेरी आपत्ति सही नहीं थी, बशर्ते कि वह एक बेहतरीन कलाकृति हो। मुझे अब यह वांछनीय लगने लगा है क्योंकि वह मूर्ति एक स्मारक के रूप में काम करेगी। वह मूर्ति देखने वालों के मन में भारत के महान सपूत की याद को ताज़ा कर देगी, और उनकी वह स्मृति थोड़ी देर के लिए ही सही हमें बेहतर इन्सान बना देगी।

उन्हें याद करना अच्छी बात है। उनके बारे में विचार करने मात्र से हमें पुण्य मिलता है। तब हम अपने आप से प्रश्न करते हैं, उनके जीवनकाल में भी उनकी उपस्थिति में हम अपने आप से प्रश्न करते थे। जहाँ एक ओर हमें उनके उनके नजदीक होने की खुशी होती थी, वहीँ हम यह सोच कर अपने मन में थोड़ा पीड़ित होते थे कि हम उनके सान्निध्य के योग्य हैं या नहीं और क्या हम जैसे नहीं हैं वैसे होने का दिखावा कर रहे हैं। यदि उनकी मौजूदगी में ऐसे भाव उत्पन्न होते थे, तो अब जब वे हमारे साथ नहीं हैं तब यह भावना कितनी प्रबल होगी! उनकी याद हमारे सामने यह शाश्वत प्रश्न खड़ा कर देती है।

हममें से कुछ लोग गाँधीजी की कही हुई बातों या उनके कार्यों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। लेकिन यह खतरा हमेशा बना रहता है अनुयायी कहीं साधारण बातों में उलझ कर न रह जाए और अपने गुरु की बड़ी सीख को भूल बैठे। ऐसा तो होना ही है, क्योंकि अनुयायी की अपनी समझ सीमित है।

दरअसल एक देवदूत भारत की भूमि पर था जिसने उसे अपनी तपस्या से उसे पवित्र कर दिया। उन्होंने न केवल भारत की धरती को पवित्र किया बल्कि हमारे लोगों के दिल और दिमाग में भी बदलाव ला दिया। भारत के सामान्य जन के लिए यह उनके लिए फिक्रमंद एक महान इन्सान की तस्वीर है, जो उनके लिए काम कर रहा है, उनके जीवन में थोड़ी खुशियाँ ला रहा है। यह अच्छी बात है कि हम उस छवि को बाकी और बातों से अधिक याद करते हैं। यह भी अच्छी बात है कि हम उन मूलभूत सिद्धान्तों को भी याद करते हैं जिनकी वे हिमायत करते थे। उनमें से एक सिद्धान्त यह है कि किसी लक्ष्य को पाने के लिए अपनाए जाने वाले साधन अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, और यह कि ऐसा कोई लक्ष्य उचित नहीं हो सकता जिसे हासिल करने के लिए गलत तरीकों का प्रयोग किया जाए। जैसा जीवन हम जीते हैं उसमें इस सिद्धान्त को लागू करना बहुत कठिन है। फिर भी, इन सिद्धान्तों को ध्यान में रखना अच्छी बात है। आज मैं यहाँ इसलिए आया हूँ ताकि गाँधीजी और उनकी स्मृति को एक बार फिर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकूँ।

गाँधी स्मारक संग्रहालय के उद्घाटन और गाँधी स्मारक निधि, मदुरै के राज्य मंडलों के अध्यक्ष और संचालकों के सम्मलेन के उद्घाटन के अवसर 15 अप्रैल, 1959 को दिए गए भाषण से उद्धृत