नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



हमने विचारपूर्वक और लम्बी बहस के बाद संसदीय शासन की व्यवस्था पर आधारित एक संविधान स्वीकार किया। यह तथ्य, कि हमारे संविधान के लागू होने के बाद की लगभग आठ वर्ष की अवधि में किसी भी रूप में उसके प्रति हमारी आस्था डिगी नहीं है, उस संविधान के प्रति हमारे दृढ़ विश्वास को दर्शाता है। हम संसदीय शासन व्यवस्था को महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि समस्याओं को हल करने का यह एक शांतिपूर्ण तरीका है। यह बहस, चर्चा, और निर्णय करने और भले ही हम उस निर्णय से सहमत न हों, उसे स्वीकार करने की प्रक्रिया है। लेकिन संसदीय शासन व्यवस्था में अल्पमत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। ज़ाहिर है कि बहुमत अपने संख्याबल के आधार पर अपनी बात मनवा लेगा। लेकिन ऐसा बहुमत जो अल्पमत की अनदेखी करता है, संसदीय लोकतंत्र की सच्ची भावना से काम करने वाला बहुमत नहीं होता है।

संसदीय शासन व्यवस्था एक लोकतांत्रिक अवधारणा है। इसका अर्थ होता है कि मताधिकार का तब तक आनुक्रमिक विकास किया जाए जब तक कि वह सभी के लिए वयस्क मताधिकार न बन जाए। पिछले कुछ समय में ही यह सम्भव हो पाया है कि किसी देश में वयस्क मताधिकार दिया गया हो। अब वयस्क मताधिकार के फायदे पूरी तरह से महसूस किए जाने लगे हैं। इस राजनैतिक बदलाव के पूरी तरह से स्थापित हो जाने के बाद अब यह बात ज़ाहिर हो चुकी है कि राजनैतिक बदलाव अपने आप में काफी नहीं होता है।

हम राजनैतिक लोकतंत्र से आर्थिक लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ते हैं। पहली बात, इसका अर्थ होता है सभी के कल्याण के लिए कार्य करना, आप चाहें तो इसे कल्याणकारी राज्य कह सकते हैं। दूसरे, इसका अर्थ होता है आर्थिक क्षेत्र में सभी के लिए अवसर की समानता के लिए कार्य करना। हर देश, चाहे वह साम्यवादी हो, गैर-साम्यवादी हो या साम्यवाद विरोधी हो, इसी दिशा में बढ़ रहा है।

बड़े पैमाने पर शिक्षा के बिना राजनैतिक लोकतंत्र लाना बहुत कठिन है। अन्य देशों में पूर्ण राजनैतिक लोकतंत्र तभी आया जब वहाँ शिक्षा का अच्छा प्रसार हुआ जिसने लोकतंत्र के लिए आधार तैयार किया। लेकिन एशियाई देशों में, और भारत में निश्चित तौर पर, हमने राजनीतिक दृष्टि से जागरूक मतदाता वर्ग की मांगों को पूरा करने की आवश्यक व्यवस्था के बिना ही सौ प्रतिशत राजनैतिक लोकतंत्र की लम्बी छलांग लगाई है। सभी एशियाई देशों की समस्याओं का यही सार है।

6 दिसम्बर, 1957 को नई दिल्ली में संसदीय लोकतंत्र के विषय पर संगोष्ठी में दिए गए उद्घाटन भाषण से उद्धृत