नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



राष्ट्रीय कांग्रेस चवालीस सालों से भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करती आई है। इस अवधि के दौरान उसने एक धीमी लेकिन निश्चित रफ्तार से राष्ट्र की चेतना को उसकी लम्बी तंद्रा से जगाया है और राष्ट्रीय आन्दोलन को खड़ा किया है। यदि हम आज अपनी नियति के महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं, अपनी ताकतों और कमज़ोरियों से बाखबर, और आशान्वित और आशंकित नज़रों से भविष्य की ओर देख रहे हैं, तब बेहतर हो कि हम सबसे पहले उन्हें स्मरण करें जिन्होंने किसी पुरस्कार की उम्मीद के बिना अपना जीवन लगा दिया ताकि उनके बाद आने वाले लोग सफलता का लाभ ले सकें। पुराने समय के बहुत से महान लोग अब हमारे साथ नहीं हैं, और हम बाद की पीढ़ी के लोग उनके तैयार किए हुए प्रतिष्ठा के इस टीले पर खड़े होकर अक्सर उनके कार्य की आलोचना कर सकते हैं। यही दुनिया का दस्तूर है। लेकिन आपमें से कोई भी न तो उन्हें और न ही स्वतंत्र भारत की नींव तैयार करने में उनकी महान भूमिका को भुला सकता है। और हममें से कोई भी उन पुरुषों और महिलाओं के उस गौरवशाली दल को नहीं भुला सकता है जिन्होंने परिणाम की चिन्ता किए बिना युवावस्था में ही अपना जीवन कुर्बान कर दिया या अपने युवाकाल को विदेशी आधिपत्य का विरोध करने के लिए जुल्म और तकलीफ सहते-सहते बिता दिया। उनमें से बहुतों के हम नाम तक नहीं जानते हैं। उन्होंने किसी भी प्रकार की सार्वजनिक सराहना की अपेक्षा या उम्मीद के बिना खामोशी से परिश्रम किया और तकलीफें झेलीं, और अपने दिल के खून से भारत की आज़ादी के नाज़ुक पौधे को सींचा। जबकि हममें से बहुतों ने टालमटोल की या स्थिति से समझौता कर लिया, ये लोग दृढ़ रहे और उन्होंने एक जनसमूह के आजादी के अधिकार की घोषणा की और बता दिया की अपने अपकर्ष की दशा में भी भारत में जीवन का उत्साह बाकी है, क्योंकि उसने अत्याचार और दासत्व के आगे झुकने से इन्कार कर दिया था। हमारा राष्ट्रीय आन्दोलन एक-एक कदम आगे बढ़ा है, और भारत माता को अपने शहीद सपूतों के धराशायी शरीरों पर से चल कर आगे बढ़ना पड़ा है। भले ही पुराने समय के दिग्गज हमारे साथ न हों, लेकिन उनका साहस अभी भी हमारे साथ है, और भारत आज भी जतिन दास और विज़या जैसे बलिदानी पैदा कर सकता है...

...ऐसी महान विरासत हमें मिली है, और आप लोग मुझे इसकी जिम्मेदारी सौंपना चाहते हैं। मैं भली भांति जानता हूँ कि मुझे यह सम्मानित स्थान आपकी सुविचारित राय से अधिक संयोग के कारण मिला है। आपकी इच्छा किसी और को चुनने की थी – एक ऐसा व्यक्ति जो हमारी आज की दुनिया में सबसे ऊँचा है – और इससे बेहतर चुनाव हो भी नहीं सकता था। लेकिन भाग्य और उन्होंने मिल कर मुझे आपकी और मेरी अपनी इच्छा के विरुद्ध इस बड़ी ज़िम्मेदारी के पद पर बिठा दिया। क्या मुझे इस दुविधा में डालने के लिए मैं आप सभी को धन्यवाद दूँ? लेकिन मैं सचमुच आभारी हूँ कि आपने एक ऐसे व्यक्ति में अपना विश्वास व्यक्त किया है जिसमें अजीब ढंग से विश्वास की स्वयं कमी है...

...आप लोग आज हमारे सामने उपस्थित बहुत सी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समस्याओं के बारे में विचार-विमर्श करेंगे, और आपके निर्णय भारत के इतिहास की राह को मोड़ सकते हैं। लेकिन आप लोग अकेले ऐसे लोग नहीं हैं जो समस्याओं से जूझ रहे हैं। सारी दुनिया आज एक बड़ा प्रश्नचिह्न है, और हर व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र अनिश्चित बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। सुकून और स्थिरता प्रदान करने वाला विश्वास का युग बीत चुका है, और हर बात पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, चाहे वह बात या चीज़ हमारे पूर्वजों के लिए कितनी ही स्थायी या सम्मानजनक क्यों न रही हो। हर तरफ संदेह और अशांति है, और राज्य और समाज के मूल सिद्धान्त बदलाव के दौर से गुज़र रहे हैं।

स्वतंत्रता, न्याय, सम्पत्ति और यहाँ तक कि परिवार की पुरानी स्थापित अवधारणाओं पर हमले हो रहे हैं, और इस सब का परिणाम अनिश्चित है। ऐसा प्रतीत होता है मानो हम इतिहास के ऐसे दौर से होकर गुज़र रहे हैं जहाँ दुनिया प्रसव की वेदना से छटपटा रही है, और उसकी इस पीड़ा के बाद एक नई विश्व व्यवस्था का जन्म होगा...

...जहाँ सब कुछ बदल रहा हो वहाँ भारत के लम्बे इतिहास को याद रखना उचित होगा। इतिहास में बहुत कम चीज़ें इतनी अद्भुत हैं जितनी भारत की सामाजिक व्यवस्था जिसने अनगिनत विदेशी प्रभावों और हज़ारों साल के बदलाव और संघर्ष को सहा है। वह इन प्रभावों को सहन कर सकी क्योंकि उसने इन प्रभावों को समाहित किया और उनके प्रति सहिष्णु रवैया अपनाया। उसका उद्देश्य दूसरी संस्कृतियों को खत्म करना नहीं था बल्कि उनके साथ संतुलन कायम करना था। आर्य और गैर-आर्य जातियाँ एक-दूसरे के अपनी-अपनी संस्कृति के अधिकारों को स्वीकार करते हुए मिल-जुल कर रहने लगीं, और पारसियों जैसे बाहर से आने वाले लोगों का भी स्वागत किया गया और उन्हें सामाजिक व्यवस्था में स्थान दिया गया। मुसलमानों के आने के बाद यह संतुलन बिगड़ा, लेकिन भारत ने उसे पुनःस्थापित करने का प्रयास किया, और बड़ी हद तक उसमें सफलता भी पाई। हमारे लिए दुखद बात यह है कि इससे पहले कि हम अपने मतभेदों का समाधान कर पाते, राजनैतिक ढाँचा चरमरा गया, ब्रिटिश आए और हमारी पराजय हुई...

...एक स्थिर समाज बनाने में भारत को बड़ी सफलता मिली थी, लेकिन वह एक विशेष दृष्टि से विफल हो गया, और उसकी इस विफलता के कारण, उसका पतन हुआ और वह पतन जारी है। असमानता की समस्या का कोई समाधान नहीं ढूँढा गया। भारत ने जानबूझकर इसकी अनदेखी की और अपनी सामाजिक व्यवस्था को असमानता के आधार पर तैयार कर लिया, और इस नीति के दुखदायक परिणाम हमारे सामने हैं – हमारे लाखों लोग जो कल तक दबे हुए थे और जिन्हें विकास का कोई अवसर उपलब्ध नहीं था...

...जब यूरोप में धर्मयुद्ध लड़े जा रहे थे और ईसाई अपने मुक्तिदाता के नाम पर एकदूसरे का संहार कर रहे थे, भारत एक सहिष्णु समाज था, हालाँकि, अफसोस, आज वह सहिष्णुता बहुत कम दिखाई देती है। कुछ हद तक धार्मिक स्वतंत्रता हासिल कर लेने के बाद यूरोप ने राजनैतिक स्वतंत्रता और कानूनी स्वतंत्रता के लिए प्रयास शुरू किए। इन्हें भी हासिल कर लेने के बाद उसे यह अहसास हुआ है कि आर्थिक स्वतंत्रता और समानता के बिना इनका कोई अर्थ नहीं है। और इसलिए आजकल राजनीति का बहुत अधिक अर्थ नहीं बचा है, और सामाजिक और आर्थिक समानता ही सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है...

... भारत को भी इस समस्या का हल तलाशना होगा, और जब तक वह ऐसा नहीं करेगा, उसके राजनैतिक और सामाजिक ढाँचे में स्थिरता नहीं आएगी। यह आवश्यक नहीं है कि वह समाधान किसी दूसरे देश का अनुसरण करके निकाला जाए। यदि हम स्थायी समाधान चाहते हैं तो वह समाधान भारत के लोगों की प्रकृति के अनुसार और उसकी विचारधारा और संस्कृति पर आधारित होना चाहिए। और जब वह समाधान खोज लिया जाएगा, उस दिन विभिन्न समुदायों के बीच के मतभेद, जो आज हमारे लिए समस्या का कारण हैं और हमारी आज़ादी में बाधक हैं, अपने आप दूर हो जाएंगे...

...बेशक बुनियादी अंतर तो पहले ही अधिकांशतः दूर हो चुके हैं, लेकिन एक दूसरे के प्रति भय और अविश्वास और संदेह के भाव अभी बाकी हैं और वैमनस्य का कारण बनते हैं। हमारे सामने समस्या फर्कों को मिटाने की नहीं है। वे तो बने भी रह सकते हैं और हमारी बहुरंगी संस्कृति को और समृद्ध बना सकते हैं। समस्या तो यह है कि भय और संदेह को कैसे दूर किया जाए, और इनका स्वरूप अमूर्त होने के कारण तर्क और भावशून्य दलील जैसे हथियार इनसे लड़ने के लिए नाकाफ़ी हैं। केवल विश्वास और उदार दृष्टिकोण ही इन पर विजय पा सकते हैं। मैं तो यही आशा कर सकता हूँ कि विभिन्न समुदायों के नेता पर्याप्त विश्वास और उदारता दिखाएंगे...

...मुझे धार्मिक कट्टरता और हठधर्मिता बिल्कुल पसंद नहीं है और मुझे खुशी है कि इनका प्रभाव मन्दा पड़ रहा है। मुझे किसी प्रकार या स्वरूप का सम्प्रदायवाद भी पसंद नहीं है। मैं समझ नहीं पाता हूँ कि राजनैतिक या आर्थिक अधिकार इस बात पर क्यों निर्भर करते हैं कि आप किस धार्मिक समूह या समुदाय के सदस्य हैं...

...विश्व शांति की चर्चा चल रही है और दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों ने इस सम्बंध में समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन समझौतों के बावजूद सशस्त्र सेनाएं बढ़ रही हैं और शांति की देवी को दिया जाने वाला सम्मान केवल सुन्दर भाषा के प्रयोग तक ही सीमित है। शांति तभी स्थापित हो सकती है जब युद्ध के कारणों को दूर किया जाए। जब तक किसी एक देश के ऊपर किसी दूसरे देश का आधिपत्य बना रहेगा, या कोई एक वर्ग किसी दूसरे वर्ग का शोषण करता रहेगा, वर्तमान व्यवस्था को नष्ट करने के प्रयास हमेशा चलते रहेंगे, और कोई भी स्थिर संतुलन टिका नहीं रह सकेगा। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद से कभी शांति नहीं आ सकती है। और चूँकि ब्रिटिश साम्राज्य इन्हीं का प्रतिनिधित्व करता है, और वह जनसामान्य के शोषण पर आधारित है, इसलिए हम अपनी इच्छा से उसका हिस्सा नहीं बन सकते हैं। हमें मिलने वाला कोई भी लाभ तब तक किसी काम का नहीं है जब तक कि वह हमारी जनता के दुखों के बोझ को कम करने में सहायक न हो। एक बड़े साम्राज्य का भार ढोने के लिए बहुत अधिक होता है, और हमारे लोग लम्बे समय तक इस बोझ को ढोते आए हैं। उनकी पीठ इस बोझ से दोहरी हो चुकी है और उनका मनोबल लगभग टूट चुका है। यदि शोषण का भार जारी रहता है तो फिर वे राष्ट्रमंडल में अपना योगदान कैसे कर पाएंगे? हमारी बहुत सी समस्याएं निहित स्वार्थों की समस्याएं होती हैं, जिनमें से अधिकांश ब्रिटिश सरकार की बनाई होती हैं या उसके द्वारा प्रेरित होती हैं। भारतीय रियासतों के शासकों, ब्रिटिश अधिकारियों और ब्रिटिश पूँजी और भारतीय पूँजी और बड़ी-बड़ी जमींदारियों के मालिकों के हित हमेशा हमसे पहले रखे जाते हैं, और ये लोग अपने संरक्षण के लिए मांग उठाते ही रहते हैं। लाखों दुखी भारतीय लोग जिन्हें सचमुच संरक्षण की आवश्यकता है और जिनकी कोई आवाज़ नहीं है, उनका पक्ष लेने वाले बहुत थोड़े हैं। ब्रिटिश साम्राज्य जब तक भारत में बना रहेगा, चाहे वह किसी भी स्वरूप में क्यों न हो, वह इन निहित स्वार्थों को मज़बूत करता रहेगा और नए स्वार्थ भी पैदा करेगा। और इनमें से हर स्वार्थ हमारे रास्ते में एक नया रोड़ा होगा। इस मजबूरी के कारण सरकार को दमन का सहारा लेना पड़ता है, और खुफिया एजेंटों, मुखबिरों और गवाहों वाली गुप्तचर सेवा सरकार के शासन का प्रतीक बन चुकी है।

...इसलिए हम आज भारत की पूर्ण आज़ादी की मांग करते हैं। इस कांग्रेस ने न तो कभी हमें किसी भी प्रकार का हुक्म देने के ब्रिटिश संसद के अधिकार को स्वीकार किया है और न ही करेगी। उससे हम कोई आग्रह नहीं कर रहे हैं। लेकिन हम दुनिया की संसद और चेतना से अपील करते हैं, और उनके समक्ष हम घोषणा करेंगे, ऐसी मेरी आशा है, कि भारत अब किसी विदेशी आधिपत्य के सामने नहीं झुकेगा। हो सकता है कि आज या कल हम इतने सशक्त न हों कि अपने संकल्प की दृढ़तापूर्वक घोषणा कर सकें। हमें अपनी कमज़ोरी का पूरा अहसास है, और हमें कोई घमंड नहीं है और न ही अपनी शक्ति का गर्व है। लेकिन किसी को भी, विशेषतः इंग्लैंड को हमारे संकल्प के अर्थ या ताकत को कम करके नहीं आंकना चाहिए। पूरी गम्भीरता से, परिणामों को पूरी तरह से जानते हुए हम, मैं आशा करता हूँ, कि यह संकल्प लेंगे और फिर वापस मुड़ने का कोई प्रश्न नहीं होगा। किसी महान देश की सोच एक बार स्पष्ट हो जाने और संकल्पित हो जाने के बाद उसे ज़्यादा समय तक रोका नहीं जा सकता है। यदि आज हम विफल हो जाएं और कल भी हमें सफलता न मिले, तो उससे अगला दिन भी आएगा और अपने साथ सफलता लाएगा.....

.... फिर भी हम अपने सामने उपस्थित उन समस्याओं की अनदेखी नहीं कर सकते हैं जो हमारे संघर्ष के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं या हमारे भविष्य के संविधान को प्रभावित कर सकती हैं। हमें सामाजिक समायोजन और संतुलन के लिए प्रयास करने होंगे, और भारत के लिए शाप बन चुकी व्यवधानकारी ताकतों पर जीत हासिल करने के लिए प्रयास करने होंगे.....

....मैं ईमानदारी से स्वीकार करना चाहता हूँ कि मैं एक समाजवादी और गणतंत्रवादी हूँ, और मैं राजाओं और सामंतों की व्यवस्था को नहीं मानता हूँ, और ऐसी किसी व्यवस्था को भी नहीं मानता हूँ जो उद्योग जगत के आधुनिक राजाओं को बढ़ावा देती है, जिनका लोगों के जीवन और भाग्य पर पुराने ज़माने के राजाओं से भी अधिक कब्जा होता है, और जिनके तौर तरीके पुराने सामंती कुलीनतंत्र से कम शोषणकारी नहीं होते हैं। लेकिन मैं स्वीकार करता हूँ कि इस राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी गठित संस्था के लिए देश की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पूर्ण समाजवादी कार्यक्रम को अपनाना शायद सम्भव नहीं होगा। लेकिन हमें यह बात समझनी होगी कि समाजवादी दर्शन दुनिया भर में सामाजिक संरचना में समाहित हो चुका है, और अब विवाद केवल इस बात को लेकर है कि इसे पूरी तरह साकार करने के लिए क्या तरीके अपनाए जाएं और उसके क्रियान्वयन की गति क्या हो। यदि भारत अपने यहाँ की दरिद्रता और असमानता को मिटाना चाहता है तो उसे भी उसी दिशा में बढ़ना होगा, हालाँकि वह इसके लिए अपने तरीके ईजाद कर सकता है और इस सिद्धान्त को अपने लोगों की प्रकृति के अनुसार ढाल सकता है....

.....हमारे सामने तीन प्रमुख समस्याएं हैं – अल्पसंख्यकों सम्बंधी, भारत के राज्यों सम्बंधी, और श्रमिकों और किसान सम्बंधी। अल्पसंख्यकों के विषय पर मैं पहले ही अपनी बात कह चुका हूँ। मैं केवल इतनी बात ही दोबारा कहूँगा कि हमें अपने वचन और कर्म से उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करना होगा कि उनकी संस्कृति और परम्पराओं की सुरक्षा की जाएगी....

.....हमारी तीसरी समस्या ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। चूँकि किसान और श्रमिक भारत का पर्याय हैं, इसलिए हम जितना अधिक उन्हें बढ़ावा दे पाएंगे और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाएंगे, हम अपने कार्य में उतने ही सफल होंगे। और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की ताकत का पैमाना होगा कि वे किस पैमाने पर इस आंदोलन का समर्थन करते हैं। हम उनके मुद्दों, जोकि वास्तव में देश के भी मुद्दे हैं, का समर्थन करके ही उन्हें अपने पक्ष में कर सकते हैं। कांग्रेस ने अक्सर उनके प्रति अपनी सद्भावना व्यक्त की है, लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ सकी है। ऐसा कहा जाता है कि कांग्रेस को पूँजी और श्रम और ज़मींदार और काश्तकार के बीच न्यायसंगत संतुलन बनाना होगा। लेकिन यह संतुलन एक पक्ष की ओर बहुत अधिक झुका हुआ है और रहा है और यथास्थिति को बनाए रखना अन्याय और शोषण को जारी रखने जैसा होगा। इसे ठीक करने का एकमात्र तरीका यह है कि किसी भी एक वर्ग के दूसरे वर्ग के ऊपर वर्चस्व को खत्म किया जाना चाहिए। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने कुछ महीने पहले बम्बई में पारित किए गए एक प्रस्ताव में सामाजिक और आर्थिक बदलाव के इस सिद्धान्त को स्वीकार किया था। मैं आशा करता हूँ कि कांग्रेस भी इस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा देगी, और ऐसे बदलावों का एक कार्यक्रम तैयार करेगी जिन्हें तुरन्त लागू किया जा सकता है.....

..... कांग्रेस समग्रता में सम्भवतः इस कार्यक्रम को आज ज़्यादा आगे नहीं बढ़ा सकती है। लेकिन उसे अन्तिम लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए और उस दिशा में आगे काम करना चाहिए। यह प्रश्न केवल मजदूरी और नियोक्ता या भूमालिक द्वारा बांटी जाने वाली खैरात का नहीं है। अपने हितसाधन के लिए उद्योग या ज़मीन पर नियंत्रण रखना एक प्रकार की खैरात ही है और वह इस बुराई को खत्म करने में पूरी तरह अक्षम है। न्यासधारित व्यवस्था, जिसका कुछ लोग समर्थन करते हैं, भी उतनी ही नाकाम है। क्योंकि न्यासधारित संरक्षण का अर्थ यह हुआ कि अच्छा या बुरा तय करने का अधिकार स्वयंभू न्यासी के हाथ में रहता है, और वह उसका प्रयोग मनमाने ढंग से कर सकता है। न्यायसंगत न्यासधारित व्यवस्था केवल राष्ट्र की न्यासधारित व्यवस्था ही हो सकती है, किसी व्यक्ति या समूह की नहीं। बहुत से अंग्रेज़ बड़ी ईमानदारी से अपने आप को भारत का संरक्षक मानते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने हमारे देश को किस हालत में पहुँचा दिया है!.....

.....हमें तय करना होगा कि उद्योग किसके हित के लिए चलाए जाएंगे और ज़मीन किसके लिए भोजन पैदा करेगी। आज धरती का प्रचुर उत्पादन उस पर काम करने वाले किसान या मज़दूर के लिए नहीं है, और उद्योग का प्रमुख उद्देश्य चंद लोगों को लखपति बनाना होता है। फसल चाहे कितनी भी अच्छी हो, और लाभांश कितना भी अधिक क्यों न हो, हमारे लोगों की मिट्टी की झोंपड़ियाँ और उनके नंगे तन गौरवशाली ब्रिटिश साम्राज्य और हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के प्रभावों का प्रमाण देते हैं.....

.....इसलिए हमारा आर्थिक कार्यक्रम मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए और उसमें धन के लिए मनुष्य के हितों की बलि नहीं चढ़ाई जानी चाहिए। यदि किसी उद्योग को उसके मज़दूरों को भूखा मारे बिना नहीं चलाया जा सकता तो उसे बन्द कर दिया जाना चाहिए। यदि ज़मीन पर काम करने वाले मजदूरों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल सकता, तो फिर उन्हें वंचित करने वाले बिचौलियों की भूमिका को खत्म किया जाना चाहिए। खेत या कारखाने में काम करने वाले हर कामगार को कम से कम इतना तो अधिकार होना चाहिए कि उसे न्यूनतम मजदूरी मिले और उसके काम करने के घंटे इतने मानवीय हों कि उसकी ताकत और मनोबल क्षीण न हो। सभी दलों की समिति ने इस सिद्धान्त को स्वीकार किया और इसे अपनी सिफारिशों में शामिल किया था। मैं आशा करता हूँ कि कांग्रेस भी वैसा ही करेगी, और उसके नैसर्गिक परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार होगी। इसके अलावा, कांग्रेस बेहतर जीवन के लिए मजदूरों की मांगों को भी स्वीकार करेगी, और उन्हें हर सम्भव सहायता उपलब्ध कराएगी ताकि वे संगठित हो सकें और अपने आप को उस दिन के लिए तैयार कर सकें जब वे सहकारिता के आधार पर उद्योग को नियंत्रित करेंगे.....

.....किन्तु भारत में उद्योग श्रमिकों की संख्या बहुत कम है, हालाँकि उनकी संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। किसानों की दशा सबसे ज़्यादा खराब है और उनकी सहायता किए जाने की आवश्यकता है, और हमारे कार्यक्रम में उनकी मौजूदा स्थिति पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। वास्तविक राहत उन्हें केवल भूमि सम्बंधी कानूनों और पट्टेदारी की व्यवस्था में बड़े बदलाव करके ही दी जा सकती है। हमारे बीच कई बड़े ज़मींदार हैं, और हम उनका स्वागत करते हैं। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि व्यक्तियों द्वारा बड़ी-बड़ी जायदादों पर स्वामित्व रखा जाना, जोकि यूरोप की सामंती व्यवस्था जैसा ही है, यह व्यवस्था दुनिया भर में तेज़ी से खत्म हो रही है। यहाँ तक कि जिन देशों को पूँजीवाद का गढ़ माना जाता है, उन देशों में भी बड़ी-बड़ी भूसम्पत्तियों को छोटे टुकड़ों में बाँट कर उन्हें उस ज़मीन पर काम करने वाले मजदूरों को दिया जा रहा है। भारत में भ कई स्थानों पर कृषि मजदूरों के स्वामित्व की व्यवस्था प्रचलित है, और हमें इस व्यवस्था को पूरे देश में लागू करना होगा। मैं आशा करता हूँ कि ऐसा करते समय हमें कम से कम बड़े भूस्वामियों के परिवारों की महिलाओं का सहयोग मिलेगा....

.....इस कांग्रेस के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह अपने वार्षिक अधिवेशन में विस्तार से कोई आर्थिक कार्यक्रम तैयार करे। यहाँ हम केवल कुछ सामान्य सिद्धांत तय कर सकते हैं और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति से आग्रह कर सकते हैं कि वह ट्रेड यूनियन कांग्रेस और दूसरे संगठनों, जिनकी इस मामले में गहरी रुचि है, के साथ मिलकर कार्यक्रम का विवरण तैयार करे। मैं आशा करता हूँ कि इस कांग्रेस और ट्रेड यूनियन कांग्रेस के बीच सहयोग बढ़ेगा, और दोनों संगठन साथ मिलकर भविष्य के संघर्षों में सहयोग करेंगे.....

.....ये सभी ऐसी आशाएं हैं जिनके तब तक पूरे होने की उम्मीद नहीं है जब तक सत्ता हमारे हाथों में नहीं सौंप दी जाती है, और इसलिए हमारे सामने वास्तविक समस्या देश की सत्ता को पाना है। इसके लिए हम सूक्ष्म तर्क या बहस या वकीलों जैसे वाक्छल का प्रयोग नहीं करेंगे, बल्कि देश की इच्छा को लागू कराने के लिए प्रतिबंधों की व्यवस्था तैयार करेंगे। इस कार्य के लिए कांग्रेस को स्वयं को तैयार करना चाहिए.....

.....विगत एक साल हमारे लिए तैयारियों का साल रहा है, और हमने कांग्रेस के संगठन को मान्य और मजबूत बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास किए हैं। इसके परिणाम बहुत अच्छे रहे हैं, और हमारा संगठन असहयोग आन्दोलन के बाद हुई प्रतिक्रिया के बाद से आज पहले से अच्छी हालत में है। लेकिन हमारी कमजोरिया भी बहुत हैं और स्पष्ट हैं। परस्पर द्वेष, यहाँ तक कि कांग्रेस की समितियों में भी आम बात है और चुनावी झगड़े हमारी शक्ति और ऊर्जा को नष्ट करते हैं। यदि हम अपनी इस पुरानी कमजोरी पर विजय नहीं पा सकते और अपने तुच्छ अहंकार से ऊपर नहीं उठ सकते तो फिर हम बड़ी लड़ाई कैसे लड़ेंगे? मैं ईमानदारी से आशा करता हूँ कि जब देश के सामने एक मजबूत कार्यक्रम होगा तो हमारे सामने का परिदृश्य साफ होगा और हम इस व्यर्थ और हतोत्साहित करने वाली कलह को बर्दाश्त नहीं करेंगे....

....अभी तक मैंने विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया है और मैं उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना भी नहीं चाहता हूँ। इसका कारण यह नहीं है कि मुझे पूर्वी अफ्रीका या दक्षिण अफ्रीका या फीजी में या अन्यत्र रह रहे अपने उन भाइयों से कम लगाव है जो बड़ी साहस के साथ बड़ी-बड़ी चनौतियों का सामना कर रहे हैं। लेकिन उनका भाग्य भारत के मैदानी भागों में तय होगा, और जो संघर्ष हम चला रहे हैं वह उनके लिए भी उतना ही है जितना हमारे लिए.....

.....इस संघर्ष के लिए हमें एक प्रभावी तंत्र की आवश्यकता है। हमारी कांग्रेस का संविधान और संगठन बहुत पुराने और सुस्त पड़ चुके हैं, और ये संकट की स्थिति से निपटने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। बड़े-बड़े प्रदर्शनों का समय अब बीत चुका है। अब हमें शांतिपूर्वक और अबाधित ढंग से कार्य करने की आवश्यकता है, और यह तभी हो सकता है जब हमारे कार्यकर्ताओं में कड़ा अनुशासन हो। जो प्रस्ताव पारित किए जाएं उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कांग्रेस अनुशासित ढंग से कार्य करती है तो उसके सदस्यों की वास्तविक संख्या चाहे जितनी भी कम हो जाए, उसकी ताकत बढ़ेगी। कम संख्या वाले दृढ़ संकल्पित लोगों ने राष्ट्रों की नियति को बदल कर दिखाया है। बड़ी भीड़ कुछ अधिक उपयोगी नहीं होती। स्वतंत्रता में संयम और अनुशासन निहित है, और हममें से प्रत्येक को व्यापक हित से छोटा समझना होगा.....

.....कांग्रेस देश के किसी छोटे समूह का प्रतिनिधित्व नहीं करती है, और बहुत से लोग ऐसे हैं जो उसमें शामिल होने या उसके लिए काम करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं, लेकिन वे उससे आशा रखते हैं कि वह उन्हें मुक्ति दिलाएगी। कलकत्ता के प्रस्ताव के बाद से ही देश उत्सुकतापूर्वक कांग्रेस की बैठक के इस महान दिन की प्रतीक्षा कर रहा था। हममें से कोई यह दावा नहीं कर सकता कि हम क्या और कब हासिल करेंगे। सफलता पर हमारा वश नहीं हैं। लेकिन सफलता अक्सर उन्हें मिलती है जो साहस दिखा कर कर्म करते हैं, ऐसे भीरु लोगों को शायद ही कभी सफलता मिलती है जो परिणामों से डरते रहते हैं। हमने बड़ा दांव लगाया है, और यदि हम बड़े काम करना चाहते हैं तो यह बड़े खतरे उठाकर ही सम्भव हो सकता है। हमें सफलती शीघ्र मिले या बाद में, हमें स्वयं अपने अलावा और कोई बड़े प्रयास करने और अपने देश के गौरवशाली इतिहास में एक महान अध्याय जोड़ने से नहीं रोक सकता.....

.....देश के विभिन्न भागों में षड़यंत्र चल रहे हैं। यह तो हमारे साथ होता ही रहता है। लेकिन गुप्त षड़यंत्रों का समय अब नहीं रहा। अब हम इस देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए एक खुला षड़यंत्र कर रहे हैं, और साथियो, और हमारे सभी देशवासियो, आपका आह्वान किया जाता है कि आप इसमें शामिल हों। लेकिन इसके पुरस्कार के रूप में कष्ट भोगना पड़ सकता है, हो सकता है कि मृत्यु भी हो जाए। लेकिन इससे आपको इतना संतोष तो होगा कि आपने भारत के लिए अपने हिस्से का योगदान दिया, और मानवता को उसकी वर्तमान गुलामी की स्थिति से मुक्ति दिलाने में थोड़ी सहायता तो की.....

.....दुनिया भर में जहाँ-जहाँ भारतीय रह रहे हैं वहाँ यह घोषणा गूँज रही है कि स्वतंत्रता ही आपका धर्म है। वे अपना सिर गर्व से ऊँचा उठा सकते हैं और उनके भीतर आशा जागी है, लेकिन याद रहे आज आपने सही मार्ग पर केवल अपना कदम भर रखा है। आगे का मार्ग कठिनाइयों से भरा है, लेकिन यह क्या कम बात है कि आपने सही मार्ग चुना है। इस कांग्रेस ने देश भर में लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। कुछ लोगों ने हमारे निर्णय को पसंद किया है तो कुछ ने उसे नापसंद भी किया है। कुछ ने हमारा विरोध करने की धमकी दी है। यह बात दुखद है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कांग्रेस ने अब एक ऐसा कदम उठाया है जिसकी सहायता से आप भेद कर सकेंगे को कौन लोग केवल वर्तमान व्यवस्था में रहते हुए सुधार चाहते हैं, और कौन लोग हमारे पुराने मत, जिसमें सभी तरह के लोग हमारे कार्यकर्ता बन कर हमें हर दिशा में खींचते थे जिसके कारण हम प्रगति नहीं कर पाते थे, में आमूल परिवर्तन के पक्षधर हैं। मैं ऐसे वक्तव्यों को लेकर चिंतित नहीं हूँ कि कुछ लोगों के अलग हो जाने से कांग्रेस कमज़ोर होगी। यदि दुनिया का इतिहास हमें कोई चीज़ सिखाता है तो वह यह है कि ताकत भेड़ों जैसा व्यवहार करने से नहीं आती है, बल्कि कर्म करने के लिए कृतसंकल्प संगठित, अनुशासित लोगों के एक साथ आने से आती है.....