नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



हम संकटों के एक दौर में जी रहे हैं। एक संकट के बाद दूसरा संकट खड़ा हो जाता है, और जब शांति होती भी है, तब वह भी युद्ध या युद्ध की तैयारी का खतरा बना रहता है। त्रस्त मानवता सच्ची शांति के लिए भटक रही है, लेकिन कोई दुर्दैव उसका पीछा करता हुआ उसे अपने वांछित लक्ष्य से दूर, और दूर धकेल देता है। लगभग ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई कठोर नियति मानवता को बार-बार घटित होने वाली विपत्ति की ओर हाँक देती है। हम सभी बीते इतिहास के जाल में उलझे हुए हैं और उस पुराने अनिष्ट के परिणामों से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।

हमारे सामने खड़े अनेकानेक राजनैतिक और आर्थिक संकटों से भी शायद बड़ा संकट मानवीयता का है। जब तक आत्मा के इस संकट का समाधान नहीं हो जाता, हमें त्रस्त करने वाले दूसरे सभी संकटों का समाधान ढूँढना बहुत मुश्किल होगा।

हम अन्तरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था और विश्व एकता की बात करते हैं और लाखों लोग इनके लिए तरसते हैं। आज के समय में आवश्यक बन चुके मानव जाति के इस आदर्श को साकार करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए भी जा रहे हैं। लेकिन अभी तक वे प्रयास निष्प्रभावी साबित हुए हैं, हालाँकि यह बात अधिक से अधिक स्पषट होती जा रही है कि यदि वैश्विक व्यवस्था की स्थापना न की गई तो दुनिया में कोई व्यवस्था ही नहीं बचेगी। युद्ध लड़े और जीते या हारे भी जाते हैं, लेकिन विजेता भी लगभग उतना ही कष्ट भोगते हैं जितना पराजित पक्ष को भोगना पड़ता है। ज़ाहिर है कि हमारे युग की इस महत्वपूर्ण समस्या के बारे में हमारे दृष्टिकोण में कुछ खराबी है, किसी आधारभूत तत्व का अभाव है।

भारत में पिछली एक चौथाई शताब्दी से अधिक समय तक महात्मा गाँधी ने न केवल भारत की स्वतंत्रता की प्राप्ति में, बल्कि विश्व शांति के लिए असाधारण योगदान दिया। उन्होंने हमें अहिंसा के सिद्धान्त की शिक्षा दी, जोकि बुराई के आगे निष्क्रियतापूर्वक समर्पण नहीं है, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान का प्रभावशाली और निश्चित साधन है। उन्होंने हमें सिद्ध करके दिखाया कि मानवीयता की भावना सर्वशक्तिमान सेनाओं से भी अधिक बलशाली है। उन्होंने राजनैतिक कार्यों में नैतिक मूल्यों को लागू किया और बताया कि उद्देश्यों और उनकी प्राप्ति के साधनों को कभी भी एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अन्ततः साधन की लक्ष्य को नियंत्रित करते हैं। यदि बुरे साधनों का प्रयोग किया जाए तो उद्देश्य भी विकृत हो जाता है और कम से कम अंशतः अनिष्टकारी हो जाता है। अन्याय पर आधारित किसी भी समाज में संघर्ष और विघटन के बीज तब तक अवश्य बने रहेंगे जब तक वह समाज उस बुराई से स्वयं को मुक्त नहीं कर लेता।

निश्चित लीक के आधार पर सोचने के आदी हो चुके आधुनिक विश्व में ये सब बातें अति काल्पनिक और अव्यावहारिक लग सकती हैं। और फिर भी हम दूसरे तरीकों को बार-बार विफल होते हुए देखते आए हैं, और हर बार विफल होने वाले किसी तरीके को अपनाते रहने से ज़्यादा अव्यावहारिक और कुछ नहीं हो सकता। यहाँ हमें मानव प्रकृति की वर्तमान सीमाओं और राजनेताओं के सामने खड़ी तात्कालिक विपत्तियों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज विश्व की जो स्थिति है उसमें हमें युद्ध की सम्भावना को भी पूरी तरह से खारिज नहीं करना चाहिए। लेकिन इस बात में मेरा यकीन और अधिक बढ़ा है कि जब तक हम अपने राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सम्बंधों में नैतिकता पर आधारित कानूनों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हम स्थायी शांति की आशा नहीं कर सकते हैं। इसलिए जब तक हम उचित तरीकों के पालन पर दृढ़ नहीं होंगे, हमारे उद्देश्य उचित नहीं होंगे और उनमें से नए अनिष्ट उत्पन्न होंगे। यही गाँधीजी के संदेश का सार है और मानव जाति को अपनी दृष्टि और कर्म में शुद्धता लाने के लिए इस संदेश के मूल्य को पहचानना होगा। जब आँखों में खून उतरा हो तो दृष्टि सीमित हो जाती है।

मेरे मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि वैश्विक शासन व्यवस्था होनी चाहिए और होगी, क्योंकि विश्व की व्याधि का और कोई उपचार नहीं हो सकता। इसके लिए आवश्यक प्रशासन तंत्र तैयार करना कोई कठिन काम नहीं है। यह तंत्र संघीय सिद्धान्त का विस्तारित स्वरूप हो सकता है, संयुक्त राष्ट्र के वैचारिक आधार का विकसित स्वरूप हो सकता है, जिसमें प्रत्येक राष्ट्रीय इकाई को अपनी प्रकृति के अनुसार अपनी नियति तय करने की आज़ादी दी जा सकती है, लेकिन यह आज़ादी हमेशा वैश्विक शासन व्यवस्था के आधारभूत नियम के अधीन होनी चाहिए।

हम व्यक्ति के और राष्ट्रों के अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि हर अधिकार के साथ एक कर्तव्य जुड़ा होता है। अधिकारों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है, और कर्तव्यों पर बहुत कम ज़ोर दिया जाता है; यदि कर्तव्यों को निभाया गया होता तो उसके परिणामस्वरूप अधिकार स्वतः ही प्राप्त हो जाते। इसका अर्थ यह है कि जीवन के प्रति आज के प्रतिस्पर्धा वाले और संग्रहणशील दृष्टिकोण से अलग दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है।

आज हम सभी भय से त्रस्त हैं – भविष्य को लेकर भय, युद्ध का भय, उन राष्ट्रों के लोगों का भय जिन्हें हम नापसंद करते हैं या उनका जिन्हें हम नापसंद हैं। ऐसे भय को कुछ हद तक उचित ठहराया जा सकता है। लेकिन भय एक हेय मनोभाव है और अविवेकपूर्ण संघर्ष का कारण बनता है। इसलिए हम इस भय से अपने आप को मुक्त करें और अपने विचारों और कर्म को शुद्धता और नैतिकता का आधार प्रदान करें, और फिर आत्मा का यह संकट धीरे-धीरे हल हो जाएगा, हमें घेरने वाले काले डरावने बादल छंट जाएंगे और स्वतंत्रता के सिद्धान्त पर आधारित विश्व व्यवस्था के विकास का रास्ता साफ हो जाएगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए दिल्ली से प्रसारण, 3 अप्रैल, 1948