नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



इतनी सारी घटनाएं हमारे आसपास इतनी तेज़ी से घटित हो रही हैं कि हम उनके महत्व को नहीं समझ पाते हैं। हममें से कुछ लोग हर ऐसे अवसर पर लोगों को उत्साहपूर्वक मेहनत करने के लिए संदेश देते हैं, लेकिन ये संदेश भी बार-बार दोहराए जाने के कारण अपना महत्व खो देते हैं।

फिर भी, इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि भारत और भारत के लोगों के लिए 26 जनवरी, 1950 का दिन बड़े महत्व का दिन है। यह हमारे राष्ट्रीय संघर्ष की सम्पूर्णता का एक महत्वपूर्ण चरण है। वह यात्रा अब खत्म हो चुकी, और उसका स्थान एक दूसरी, और सम्भवतः उससे भी कठिन यात्रा ने ले लिया है। एक प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी है और हर प्रतिज्ञा को पूरा कर लेने पर संतुष्टि का अनुभव होता है और भविष्य के प्रयासों के लिए बल मिलता है।

यह 26 जनवरी विशेष तौर पर समीचीन है, क्योंकि यह दिन अतीत को वर्तमान से जोड़ता है और यह वर्तमान अतीत से निकला हुआ दिखाई देता है। बीस साल पहले हमने आज़ादी के लिए पहली प्रतिज्ञा की थी। इन बीस वर्षों में हमने मेहनत और संघर्ष और विफलता और सफलता को देखा है। और जिस व्यक्ति ने विफलता के अंधेरे से सफलता के उजाले तक हमारा नेतृत्व किया वह अब हमारे साथ नहीं है लेकिन उसके परिश्रम का फल हमें मिल रहा है। इस फल का हम क्या उपयोग कर पाएंगे यह बात बहुत सी बुनियादी बातों पर निर्भर करती है, वे बुनियादी सिद्धान्त जिन पर गाँधीजी ने अपने जीवन भर बल दिया – उत्कृष्ट चरित्र, मन की सच्चाई, कर्तव्यनिष्ठा, सहिष्णुता और सहयोग की भावना और कड़ी मेहनत। हमारे लोगों से मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि हम इन बुनियादी गुणों को अपनी गणतांत्रिक स्वतंत्रता का आधार बनाएं और अपने मन से भय और घृणा के भाव को दूर करके सदैव अपने लाखों-करोड़ों लोगों की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहें।

हम भाग्यशाली हैं कि हम भारतीय गणतंत्र के उदय की इस घड़ी के साक्षी हैं और हमारे बाद आने वाली पीढ़ी के लोग भी चाहेंगे कि वे भी इस अवसर के साक्षी रहे होते; लेकिन सफलता एक ऐसा बंधक है जिसकी कड़े परिश्रम से सोत्साह रक्षा करने की आवश्यकता होती है नहीं तो यदि हम अपने प्रयासों में कमी करें या यदि हमारी नज़र चूक जाए तो यह हाथ से फिसल जाती है।

राष्ट्र को संदेश, 26 जनवरी, 1950