नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



कुछ बातें एकदम स्पष्ट हैं। सबसे पहले तो यह कि भारत एक बहुभाषी देश है। यह भी एक सच्चाई है कि हमारी भाषाएं किसी न किसी रूप में संस्कृत भाषा से जुड़ी हुई हैं। उत्तर की भाषाओं जैसी कुछ भाषाएं संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं; दूसरी भाषाओं का हालाँकि अपना स्वतंत्र इतिहास रहा है, लेकिन उनमें भी संस्कृत के बहुत से शब्द हैं। बेशक, जैसा कि आप सम्भवतः भली भांति परिचित हैं, यदि मैं कहूँ तो, बाद के वर्षों में दक्षिण भारत संस्कृत भाषा के ज्ञान का उत्तर भारत से भी बड़ा केंद्र बन गया। बहरहाल, हमारी भाषाओं के बीच आपस में काफी घनिष्ठ सम्बंध हैं। फिर भी, वे स्वतंत्र भाषाएं हैं, महान भाषाएं हैं, और वे सभी भारत की भाषाएं हैं।

एक अखिल-भारतीय शासकीय भाषा का क्या मतलब है? अभी तक अंग्रेज़ी कमोबेश हमारी राज-काज की भाषा रही है। ज़ाहिर है कि हम अंग्रेज़ी को राजभाषा नहीं बनाए रख सकते हैं। ध्यान रहे, मेरा कहने का यह मतलब नहीं है कि आप अंग्रेज़ी सीखना छोड़ दें। मैं चाहता हूँ कि आप अंग्रेज़ी सीखना जारी रखें और एक विदेशी भाषा के रूप में उसे अच्छी तरह से सीखें। और मैं चाहूँगा कि आप फ्रैंच, जर्मन, रूसी, चीनी, अरबी, फ़ारसी और स्पैनिश जैसी प्रमुख विदेशी भाषाओं को भी सीखें। ज़ाहिर है कि एक महान स्वतंत्र देश के रूप में हमें अन्तरराष्ट्रीय मामलों, राजनीति, आर्थिक क्षेत्र, व्यापार, वाणिज्य, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और बहुत से दूसरे क्षेत्रों में विश्व मंच पर अपनी भूमिका निभानी है। इस कार्य को करने के लिए यह आवश्यक है कि हममें से पर्याप्त संख्या में लोग विदेशी भाषाओं को सीखें। चूँकि हमारा परिचय अधिकांशतः अंग्रेज़ी भाषा से है, इसलिए यदि हम इस परिचय का लाभ उठाते हुए इस भाषा को सीखना जारी नहीं रखते हैं तो यह एक नादानी होगी। और यदि हम इसे सीखें तो भली प्रकार से सीखें, और केवल इसके सतही ज्ञान से ही संतुष्ट न हों। मैं अंग्रेज़ी भाषा का कतई विरोधी नहीं हूँ। मैं मानता हूँ कि अंग्रेज़ी आज विश्व की महान भाषाओं में से एक है, जिसका प्रयोग करने और बोलने वालों की संख्या सम्भवतः दूसरी सभी विश्व भाषाओं से अधिक है। फिर भी, भारत में हमारे लिए यह पूरी तरह अनुचित होगा कि हम एक विदेशी भाषा को अपनी राजभाषा के रूप में स्वीकार करें। मैं आपको बता सकता हूँ कि कई बार मुझे और विदेश जाने वाले दूसरे लोगों को इस दृष्टि से थोड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है कि हमें वहाँ अपने देशवासियों से अंग्रेज़ी में बात करनी पड़ती है। लोग आश्चर्य करते हैं और पूछते हैं कि क्या हमारी अपनी कोई भाषा नहीं है जो हमें एक विदेशी भाषा में बात करनी पड़ती है। एक छोटा सा उदाहरण दूँ, अभी हाल तक हमारे रक्षा बलों में आदेश देने के अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया जाता था, हालाँकि ज़ाहिर है कि आम सिपाही अंग्रेज़ी भाषा नहीं जानता है। यह हास्यास्पद है, अनुचित और लज्जास्पद है। ज़ाहिर बात है कि भारत में हम एक दर्जन भर भाषाओं के आदेशसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। हम अपनी सेना को इस प्रकार बांट नहीं सकते हैं।

यह कठिनाई इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि दक्षिण के बहुत से लोगों के मन में यह आशंका है कि हिन्दी के बारे में संवैधानिक प्रावधान से उन्हें बहुत से मामलों में, विशेषतः अखिल-भारतीय सेवाओं के मामले में नुकसान हो सकता है। ज़ाहिर है कि अखिल-भारतीय सेवाओं में लोगों का चयन देश भर से किया जाता है, जोकि होना ही चाहिए। इससे हटकर कोई और व्यवस्था अनुचित होगी। यह बात भी अनुचित और अन्यायपूर्ण होगी कि अखिल-भारतीय सेवाओं के लिए परीक्षाओं का आयोजन इस प्रकार का हो जिसके कारण हिन्दी न जानने वालों का घाटा हो। आपमें से बहुत से लोगों ने दिल्ली का केन्द्रीय सचिवालय देखा होगा जहाँ काम करने वाले बहुत सारे लोग दक्षिण भारतीय हैं। वे लोग वहाँ क्यों हैं? सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें योग्य और कुशल पाया गया। इसमें पक्षपात का कोई प्रश्न नहीं है। चूँकि हमें इस बात की परवाह है कि भारत के अहिंदीभाषी क्षेत्रों के लोगों को इस वजह से कोई असुविधा न हो, इसलिए हमने तय किया है कि अखिल-भारतीय सेवाओं के लिए परीक्षण और परीक्षाएं, जिन्हें अभी अंग्रेज़ी में आयोजित किया जाता है, उन्हें आगे चलकर इस प्रकार से आयोजित किया जाए कि इस कारण से कोई असुविधा उत्पन्न न हो। इसके अलावा, हमने कहा है कि, समय आने पर, ये परीक्षण या परीक्षाएं तीन भाषाओं में ली जाएं, हिन्दी में या अंग्रेज़ी में या उम्मीदवार की अपनी क्षेत्रीय भाषा में। परीक्षा में भाग लेने और उसमें उत्तीर्ण हो जाने के बाद उसे हिन्दी भाषा का चुनाव करना होगा और अपना काम करने के लिए इस भाषा को सीखना होगा। इसी प्रकार उस चरण में हम कोशिश करेंगे कि हिन्दी भाषा जानने वाले लोग किसी दक्षिण भारतीय भाषा का चुनाव करें और उस भाषा में एक परीक्षा उत्तीर्ण करें।

हम देख रहे हैं कि भारत में व्यवधानकारी शक्तियाँ काम कर रही हैं। बाकी के लोग अनजाने में बाधा उत्पन्न करते हैं और संकीर्णतावादी या प्रान्तीयतावादी या सम्प्रदायवादी हो जाते हैं। वे उन बड़े उद्देश्यों को भुला देते हैं जिन्हें हम हासिल करना चाहते हैं, भूल जाते हैं कि भारत के सामने एक महान भविष्य है, कि भारत का लक्ष्य ऊँचा है, कि भारत ने कभी हेय लक्ष्यों को अपना ध्येय नहीं बनाया।

हमें संकीर्ण, संकुचित, प्रान्तीय, साम्प्रदायिक और जातीय सोच नहीं अपनानी चाहिए, क्योंकि हमें एक महान लक्ष्य हासिल करना है। हम भारतीय गणतंत्र के नागरिक दृढ़ता से सीधे खड़े हों, हमारी दृष्टि आकाश पर किन्तु पाँव मज़बूती से जमे हों और हम भारत के लोगों के बीच एकता कायम करें। राजनैतिक एकता तो कुछ हद तक पहने ही स्थापित हो चुकी है, लेकिन मैं उससे कहीं अधिक गहरी एकता की बात कर रहा हूँ – भारत के लोगों के बीच भावनात्मक एकता हो ताकि हम सब मज़बूती से एकजुट हों, और एक शक्तिशाली राष्ट्रीय इकाई के रूप में काम करें, और साथ ही अपनी इस अनूठी विविधता को भी कायम रख सकें। मैं नहीं चाहता कि इस विविधता को दलों में बांट कर तितर-बितर कर दिया जाए, और इसलिए हमें तुच्छ झगड़ों में उलझने के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। कई बार हमें दूसरों के ऐसे विचारों को स्वीकार करना पड़ सकता है जो हमें पसंद न हों; किन्तु यही तो लोकतंत्र का तरीका है। कांग्रेस के आंदोलन में हमने चालीस साल तक इसी आधार पर काम किया। गाँधीजी कोई स्वेच्छाचारी व्यक्ति नहीं थे। वे चाहते तो अपनी इच्छा को किसी पर भी थोप सकते थे, और जब कभी उन्होंने ऐसा किया भी तो केवल अपने प्यार और स्नेह के माध्यम से और अपने उस आदर के माध्यम से जो हम उनके और उनके ज्ञान के प्रति रखते थे। हम अक्सर उनसे बहस करते, झगड़ा करते थे, और कभी-कभी उन्हें अपनी बात मानने के लिए राज़ी भी कर लेते थे।

हमें मुख्यतः भारत की भावनात्मक एकता को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। हमें खयाल रखना होगा कि हम क्षणिक भावावेश में न बह जाएं, भले ही वह राजनीति में धर्म के गलत इस्तेमाल के कारण हो या साम्प्रदायिकता या प्रान्तीयता या जातीयता के कारण हो। हमें इस महान देश को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाना है, सामान्य अर्थ में शक्तिशाली नहीं, यानी विशाल सेनाओं आदि वाला शक्तिशाली राष्ट्र नहीं, बल्कि विचार, कर्म, संस्कृति और मानवता की शांतिपूर्वक सेवा करने में सक्षमता की दृष्टि से शक्तिताशाली राष्ट्र बनाना है।

बंगलौर में दिया गया भाषण, 6 अक्तूबर, 1955