नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



बहुत समय बाद अपने गृह नगर इलाहाबाद, जिसके लिए मैं लगभग अजनबी बन चुका हूँ, लौटा हूँ। इन पिछले पंद्रह महीनों में मैं पुराने दिल्ली शहर के नज़दीक नई दिल्ली में रहा हूँ। ये दोनों शहर हमें क्या संदेश देते हैं, इनका खयाल आते ही हमारे मन में कौन सी छवियाँ और विचार उभरते हैं? जब मैं इनके बारे में सोचता हूँ तो दूर तक भारत के इतिहास का परिदृश्य मेरी आँखों के सामने उभर आता है, केवल राजाओं और सम्राटों के पदारोहण के सिलसिले के रूप में ही नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के आन्तरिक जीवन, अनेकानेक क्षेत्रों में उसके सांस्कृतिक कार्यकलापों, उसके आध्यात्मिक साहस की गाथाओं और विचारों तथा कर्म के क्षेत्र में उसकी यात्राओं के वृत्तांत के रूप में। किसी राष्ट्र का जीवन, और विशेषतः भारत जैसे किसी राष्ट्र का जीवन मूलतः गाँवों में बसता है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धियाँ, और कभी-कभी मानव जीवन के अरुचिकर पहलू भी, शहरों में ही देखने के लिए मिलते हैं। तो, ये शहर मुझे भारत के सांस्कृतिक विकास की याद दिलाते हैं, उस आन्तरिक मज़बूती और स्थिरता की याद दिलाते हैं जो दीर्घकालिक सभ्यता और संस्कृति से आती हैं। भारत में हमें अपनी इस विरासत पर बहुत गर्व रहा है, और यह उचित ही है। लेकिन, आज हमारी स्थिति क्या है?

यह उचित ही है कि हम इस प्राचीन शहर और ज्ञान के केन्द्र इलाहाबाद मैं अपने आप से यह प्रश्न पूछ रहे हैं। आधुनिक विश्व में विश्वविद्यालय हमें बहुत कुछ सिखा सकते हैं और उनके कार्यों के क्षेत्र का दायरा बढ़ता ही जाता है, मैं स्वयं विज्ञान के प्रति श्रद्धा रखता हूँ और मेरी यह मान्यता है कि अन्ततः विश्व की रक्षा, यदि विश्व की रक्षा की जानी है तो, वैज्ञानिक तरीकों और दृष्टिकोण से ही होगी। लेकिन, हम ज्ञान के अर्जन का जो भी मार्ग चुनें, और हमें वह चाहे जितना भी लाभदायक प्रतीत होता हो, एक निश्चित आधार या नींव का होना आवश्यक हैं जिसके बिना विद्या का प्रतिष्ठान बड़े अस्थिर और परिवर्तनशील आधार पर खड़ा दिखाई देगा। किसी भी विश्वविद्यालय को इस आवश्यक आधार और नींव, चिन्तन और कर्म के वे मानक जो किसी व्यक्ति या राष्ट्र का निर्माण करते हैं, को समझना होगा और उस पर बल देना होगा। और इस बहुत तेज़ी से बदलते दौर में, जब हमने पुराने मूल्यों को लगभग भुला ही दिया है और नए मूल्यों को अपना लिया है, तब आज के समय में ऐसा करना आवश्यक हो जाता है। हमें आज़ादी मिली, लम्बे प्रयास के बाद मिली आज़ादी, और वह भी कम से कम हिंसा का सहारा लेकर। लेकिन उसके तुरन्त बाद ही हमें खून और आँसुओं के दरिया से होकर गुज़रना पड़ा। खून और आँसुओं से भी बुरी बात यह थी कि हमें उसके कारण भारी शर्म और बदनामी उठानी पड़ी। उस समय हमारे मूल्य और सिद्धान्त कहाँ थे, हमारी प्राचीन सभ्यता कहाँ थी, हमारी मानवीयता और आध्यात्मिकता और वे सारी चीज़ें जो विगत में भारत की पहचान रही हैं, वे सब कहाँ थीं? अचानक इस देश में अंधकार छा गया और लोग उन्मादी पागलपन के शिकार हो गए। भय और घृणा ने हमारे विवेक को अंधा बना दिया और सभ्यता जितना संयम सिखाती है, वह सब तिरोहित हो गया। दहशत उत्पन्न करने वाली वीभत्स घटनाएं एक बाद एक घटित होती गईं और मनुष्यों की पाशविक बर्बरता ने हमें अचानक एक खोखलेपन का आभास करा दिया। ऐसा लगा कि सभी चिराग गुल हो गए; सभी नहीं, क्योंकि कुछ चिराग उस प्रचंड तूफान में भी टिमटिमाते हुए संघर्ष कर रहे थे। हमने उन लोगों के प्रति संवेदना ज़ाहिर की जो मारे गए और जो मर रहे थे और उनके लिए भी जो मौत से भी बदतर कष्ट भोग रहे थे। उससे भी कहीँ अधिक हमें भारत के लिए दुख हुआ, जो हमारी साझी माँ है, और जिसे आज़ाद कराने के लिए हमने इतने वर्षों तक संघर्ष किया था।

ऐसा लगा मानो रोशनी बुझ गई। लेकिन एक चमकती लौ जलती रही और आसपास के अंधकार में अपना प्रकाश फैलाती रही। और उस पवित्र लौ को देखकर हमारी ताकत और हमारी आशा वापस लौटी और हमने महसूस किया कि हमारे लोग कुछ समय के लिए चाहे किसी भी प्रकार की विपत्ति से पराभूत हो जाएं, लेकिन भारत की आत्मा, दृढ़ और निष्कलंक, वर्तमान के उथल-पुथल से ऊपर उठकर क्षुद्र अनिवार्यताओं की परवाह न करते हुए अपना प्रकाश फैला रही थी। आपमें से कितने लोग इस बात को समझते हैं कि इन कुछ महीनों में महात्मा गाँधी की मौजूदगी का भारत के लिए क्या महत्व है? पिछले पचास वर्षों से अधिक समय के दौरान भारत और उसकी आज़ादी के लिए उनके महान योगदान से हम सभी परिचित हैं। लेकिन पिछले चार महीनों में उन्होंने जो सेवा की है उससे बढ़कर कोई सेवा नहीं हो सकती जब विलय होते संसार में वे दृढ़ता के साथ एक चट्टान की तरह खड़े रहे सत्य का मार्ग दिखाने वाले प्रकाशस्तंभ की तरह, और उनके धीमे, लेकिन दृढ़ स्वर ने भीड़ के शोर से ऊपर उठकर सही मार्ग दिखाया।

और इस चमकती मशाल की बदौलत भारत और उसके लोगों में हमारा विश्वास डिगा नहीं। लेकिन आसपास फैले अंधकार का अवसाद अपने आप में एक खतरा था। जब आज़ादी का सूरज चढ़ चुका था तो फिर हम अंधकार के इस अवसाद में एक बार फिर क्यों डूब गए? हम सभी के लिए, और विशेष तौर पर विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे युवकों और युवतियों के लिए ठहरकर इन बुनियादी विषयों पर विचार करना बहुत आवश्यक है, क्योंकि भारत का भविष्य उसके वर्तमान में ढल रहा है, और भविष्य वैसा ही होगा जैसा उसे देश के युवक और युवतियाँ बनाना चाहेँगे। आज एक प्रकार की संकीर्णता और असहिष्णुता और असंवेदनशीलता और विवेकहीनता व्याप्त है जो मुझे थोड़ा डराती है। हाल में हम एक बड़े विश्व युद्ध की विभीषिका से होकर गुज़रे हैं। उस युद्ध से हमें शांति और आज़ादी तो हासिल नहीं हुई है, लेकिन हम उससे कई बातों की सीख ले सकते हैं। इस युद्ध ने फासीवाद और नाज़ीवाद का अन्त किया। ये दोनों ही मत संकीर्ण और अहंकारी थे और घृणा और हिंसा पर टिके थे। मैंने इन्हें अपने-अपने देशों में और दूसरे स्थानों में भी पनपते हुए देखा है। इन्होंने कुछ समय के लिए अपने लोगों को प्रतिष्ठा तो दिलाई, लेकिन उन्होंने आत्मा को मार डाला और विचार और व्यवहार के सभी मूल्यों और मानकों को नष्ट कर दिया। जिन देशों को वे ऊँचा उठाना चाहते थे उन्हीं देशों को उन्होंने बरबाद कर दिया।

मुझे आज भारत में भी बहुत कुछ वैसी ही प्रवृत्ति पनपती हुई दिखाई दे रही है। वह प्रवृत्ति राष्ट्रवादिता की बात करती है, कभी कभी धर्म और संस्कृति की भी बात करती है, लेकिन फिर भी वह राष्ट्रवाद, सच्ची नैतिकता और सच्ची संस्कृति से एकदम उलट है। यदि इस बात को लेकर किसी प्रकार का संदेह था तो पिछले कुछ महीनों में वास्तविक स्थिति हमारे सामने स्पष्ट हो गई। कुछ सालों से हम समाज के एक तबके की घृणा और हिंसा तथा संकीर्ण साम्प्रदायिकता की नीति के खिलाफ संघर्ष करते आए हैं। अब वह तबका भारत के कुछ हिस्सों को काट कर एक राष्ट्र बनाने में कामयाब हो चुका है। मुस्लिम सम्प्रदायवाद, जो भारत की आज़ादी के लिए एक खतरा और रुकावट बना हुआ था, अब अपने आपको एक राष्ट्र कहता है। अब वह भारत की सजीव ताकत नहीं रहा क्योंकि उसकी ताकत दूसरे हिस्सों में केन्द्रित हो गई है। लेकिन इससे समाज के ऐसे दूसरे वर्गों की भी अवनति हुई है जो उसकी नकल करना चाहते हैं और कभी-कभी उससे भी अधिक सम्प्रादायवादी होने का प्रयास करते हैं। हमें अब भारत में हो रही इस प्रतिक्रिया का मुकाबला करना होगा और एक साम्प्रदायिक राष्ट्र की मांग का स्वर उठ रहा है, हालाँकि इसे व्यक्त करने के लिए प्रयोग किए गए शब्द भिन्न हो सकते हैं। और केवल सम्प्रदाय के आधार पर राष्ट्र की ही मांग नहीं की जा रही है, बल्कि राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्यकलापों के हर क्षेत्र में इस संकीर्णतावादी और दमनकारी मांग को उठाया जा रहा है।

यदि हम भारत के लम्बे इतिहास को देखें तो हम पाते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जब भी दुनिया को स्पष्ट और भयमुक्त दृष्टि से देखा और आदान-प्रदान के लिए अपने मस्तिष्क को खुला रखा तब उन्होंने बहुत प्रगति की। और बाद के युगों में जब उनकी दृष्टि संकीर्ण हो गई और वे बाहरी प्रभावों से कट गए, तो भारत को राजनैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से नुकसान पहुँचा। हमारी विरासत कितनी महान है, हालाँकि हमने अक्सर इसका दुरुपयोग ही किया है! हर तरह की दरिद्रता और तकलीफों के अनुभवों से गुज़रने के बावजूद भारत एक महत्वपूर्ण राष्ट्र था और आज भी है। निर्माणकारी और सृजनात्मक कार्यों के क्षेत्र में हमारी इस क्षमता का विस्तार एशिया और दूसरे स्थानों पर हुआ जिसके कारण हमें गौरवशाली सफलताएं हासिल हुईं। हमारी ये सफलताएं तलवार से हासिल नहीं की गई थीं, बल्कि दिल और दिमाग को जीत कर हासिल की गई थीं जो मेल-मिलाप कराती हैं और तब भी कायम रहती हैं जब तलवार के दम पर जीतने वाले लोगों और उनकी उपलब्धियों को भुला दिया जाता है। लेकिन यदि उसी क्षमता को सही या उचित दिशा न दी जाए तो वह पलटकर हमें ही नष्ट और भ्रष्ट कर सकती है।

अपने छोटे से जीवनकाल में भी हमने इन दोनों ताकतों – रचनात्मक और सृजनात्मक कार्य की शक्तियाँ और विनाशकारी शक्तियाँ – को भारत और दुनिया भर में अपना अपना काम करते हुए देखा है। अन्ततः जीत किसकी होगी? ओर हम कौन सी ताकत के समर्थन में खड़े हैं? हम सभी के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, विशेष तौर पर उनके लिए जो कल राष्ट्र का नेतृत्व करेंगे और जिनके कंधों पर कल की जिम्मेदारियों का भार होगा। हम तटस्थ होकर किनारे बैठे हुए चनौती का सामना करने से इन्कार नहीं कर सकते हैं। जब स्पष्ट सोच और प्रभाव कदम उठाए जाने की आवश्यकता हो तब हम अपनी सोच को आवेश के उन्माद और घृणा के कारण भ्रमित नहीं होने दे सकते हैं।

हम कैसे भारत के निर्माण के लिए प्रयासरत हैं, और कैसे विश्व का निर्माण करना चाहते हैं? क्या घृणा, हिंसा और भय और सम्प्रदायवाद और संकीर्ण प्रान्तीयतावाद हमारे भविष्य का निर्धारण करेंगे? यदि हमारे भीतर लेशमात्र भी सच बाकी है और यदि हम अपने काम के प्रति सच्चे हैं, तो हरगिज़ नहीं। इस इलाहाबाद शहर में, जो मुझे केवल इसलिए प्रिय नहीं है कि मेरा इसके साथ निकट सम्बंध रहा है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि भारत के इतिहास में इसका योगदान रहा है, यहाँ मेरा बचपन और मेरी युवावस्था भारत के भविष्य के सपने देखते हुए गुजरी है। क्या उन सपनों में कोई वास्तविकता थी, या वे केवल एक विह्वल मन की कल्पना मात्र थे? उन सपनों का एक छोटा सा हिस्सा साकार हो चुका है, लेकिन वैसे नहीं जैसे मैंने कल्पना की थी, और कितना कुछ करना अभी बाकी है। सफलता मिलने पर होने वाली खुशी के बजाए मन में अपने आसपास के लोगों के कष्टों को देखकर एक खालीपन और दुख का भाव है, और हमें लाखों लोगों की आँखों से आँसुओं को पोंछना है।

कोई भी विश्वविद्यालय मानवीयता, सहिष्णुता, विवेक, प्रगति, विचारों की साहसिक यात्रा और सत्यान्वेषण का प्रतीक होता है। वह उच्चतर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मानवता के प्रयाण का प्रतीक होता है। यदि विश्वविद्यालय भली प्रकार अपने दायित्व का निर्वहन करें तो वह राष्ट्र और लोगों के हित में होगा। लेकिन यदि ज्ञान का वह मंदिर स्वयं ही संकीर्ण कट्टरवादिता और क्षुद्र प्रयोजनों का शिकार हो कर रह जाएगा तो फिर राष्ट्र कैसे समृद्ध होगा और लोगों का चरित्र कैसे महान बनेगा?

इसलिए हमारे विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों तथा उनकी नियति का निर्देशन करने वाले लोगों के ऊपर एक बड़ा उत्तरदायित्व है। उन्हें अपना प्रकाश फैलाते रहना चाहिए और उस समय भी सही रास्ते से नहीं डिगना चाहिए जब भावनाओं का आवेश जनसामान्य को डिगा देता है और बहुत से ऐसे लोगों को विवेकशून्य बना देता है जिन पर दूसरों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी होती है। यदि हम इस उम्मीद में कुटिल और अनिष्टकारी तरीके अपनाएंगे कि इनसे हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने में मदद मिलेगी और हमारा हित होगा, तो ऐसा कभी नहीं होने वाला है। गलत तरीके अपना कर कभी सही उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

हमें अपने राष्ट्रीय लक्ष्य को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए। हमारा लक्ष्य एक मज़बूत, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की स्थापना करना है जहाँ हर नागरिक को बराबरी का स्थान मिले और उसे विकास और सेवा का पूरा अवसर हो, जहाँ धन और प्रतिष्ठा की वर्तमान असमानताएं मिट चुकी हों, जहाँ हमारी बुनियादी आकांक्षाएं रचनात्मक और सहयोगकारी कार्यों की ओर निर्देशित हों। ऐसे भारत में साम्प्रदायिकता, अलगाववाद, पृथकता, अस्पृश्यता, कट्टरता और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के लिए कोई स्थान नहीं है, और जहाँ धर्म की आज़ादी है लेकिन उसे राष्ट्र के जीवन के राजनैतिक और आर्थिक पहलुओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं है। यदि ऐसा है तो फिर हमारे राजनैतिक जीवन में हिन्दू और मुसलमान और ईसाई और सिख होने की ये सारी बातें बन्द होनी चाहिए और हमें एक संयुक्त लेकिन सामासिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए जहाँ व्यक्ति और राष्ट्र दोनों की स्वतंत्रता सुरक्षित हो।

हम मुसीबतों के कठिन दौर से गुज़रे हैं। हमने उन्हें सफलतापूर्वक पार किया है लेकिन हमें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है, और उन्होंने लोगों के व्यथित मन और आत्मा पर जो घावों की विरासत छोड़ी है वह लम्बे समय तक हमारे साथ चलेगी। हमारा इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ है। हम स्वतंत्र और अनुशासित विचारों वाले ऐसे पुरुषों और महिलाओं की तरह उनका सामना करने के लिए अपने आप को तैयार करें जो उचित मार्ग से विचलित नहीं होंगे और अपने आदर्शों और लक्ष्यों को नहीं भूलेंगे। हमें ज़ख्मों को भरने के इस काम को शुरू करना है और हमें निर्माण और सृजन करना है। भारत की लथपथ देह और आत्मा हम सभी को पुकार रही है कि हम इस महान कार्य के लिए अपने आप को समर्पित करें। यही प्रार्थना है कि हम इस महान कार्य और भारत के योग्य साबित हों!

13 दिसम्बर, 1947 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विशेष दीक्षांत समारोह में दिया गया भाषण