नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



आज के संवेदनशील लोग मनुष्यों के बीच के भारी अन्तर को, उनके बीच की विशाल दूरी, उनके बीच के बड़े फर्क को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, जहाँ एक ओर अवसरों का अभाव है तो दूसरी और अपव्यय की स्थिति है। यह बहुत ही भद्दा दिखाई देता है, और कोई भी देश या व्यक्ति ऐसे भद्देपन को उचित नहीं ठहरा सकता है। यदि मैं कहूँ तो 50 या 100 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। हालाँकि मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति बहुत प्रबल थी और शायद उस समय दुख-कष्ट भी अधिक थे, फिर भी वह दृष्टिकोण अलग था। शायद सामाजिक मूल्यों के प्रति नज़रिया अलग था। लेकिन आज की दुनिया के संदर्भ में मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति न केवल आर्थिक दृष्टि से गलत होती जा रही है, बल्कि संवेदना के किसी भी दृष्टिकोण से निर्लज्ज अशिष्टता का रूप लेती जा रही है। इसलिए बदलाव अवश्यंभावी है।

तो फिर आप ये बदलाव किस प्रकार करेंगे? जैसा मैंने कहा, मैं बिना अधिक सुविचारित ध्वंस या रुकावट के ये बदलाव लाना चाहूँगा, क्योंकि ध्वंस और रुकाटव, इनके बाद भविष्य में चाहे कुछ भी घटित हो, निश्चित तौर पर वर्तमान के विकास को रोक देते हैं। इनके कारण उत्पादन ठप्प हो जाता है। सम्पदा का सृजन रुक जाता है। इसमें संदेह नहीं कि बाद में व्यक्ति को तेजी के साथ किसी काम को कर पाने की स्थिति में आ जाता है, लेकिन यह बात निश्चित नहीं है कि बाद में आप उस काम को उतनी तेजी से कर ही पाएंगे। इसलिए समझौता करने की आवश्यकता पड़ती है। हालाँकि इस संदर्भ में या किसी दूसरे संदर्भ में भी मुझे समझौता शब्द पसंद नहीं है, लेकिन हम उसे टाल नहीं सकते हैं।

ऐसी स्थिति में हम अर्थव्यवस्था की माध्यमिक अवस्था में पहुँच जाते हैं। आप इसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहें या कोई और नाम भी दे सकते हैं। इसमें चीज़ें इस तरह से संचालित की जाती हैं कि देशी की धन-सम्पत्ति लगातार बढ़ती रहे, और साथ ही साथ देश में धन का वितरण अधिक न्यायसंगत ढंग से हो। धीरे-धीरे हम एक ऐसी अवस्था में पहुँचते हैं जहाँ पूरी अर्थव्यवस्था के गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र बदल चुका होता है। अब, मुझे इस बात को लेकर शंका है कि क्या ये बदलाव टकराव और संघर्ष बार-बार होने वाले संघर्षों के बिना कर पाना सम्भव है, क्योंकि लोग अपने कुछ निश्चित हितों या विचारों को छोड़ने और नए विचार स्वीकार करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं। कोई भी व्यक्ति जो कुछ उसके पास हो, उसे छोड़ना पसंद नहीं करता है; कम से कम कोई समूह तो ऐसा करना पसंद नहीं करते हैं; व्यक्ति कभी-कभी ऐसा करने के लिए तैयार हो जाते हैं। ये टकराव लगातार बार-बार होते रहते हैं, लेकिन बात यह है कि, यदि मैं ऐसा कह सकूँ तो, ये झगड़े मूर्खतापूर्ण होते हैं, क्योंकि इनसे घटनाओं का प्रवाह नहीं बदला जा सकता है। इनके कारण प्रक्रिया में देरी हो सकती है, और नतीजा यह होगा कि जो लोग निहित स्वार्थों को पकड़ कर बैठे हैं, अन्त में शायद उन्हें ही सबसे ज़्यादा नुकसान होगा।

7 अप्रैल, 1948 को उद्योग तथा आपूर्ति मंत्री डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत किए गए उद्योग नीति प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान संविधान सभा (विधायी) में दिया गया भाषण