नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



अक्सर यह कहा जाता है कि हमारे आज के जीवन में प्रैस की एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है, विशेष तौर पर लोकतांत्रिक देशों में। अन्य देशों में यह भूमिका सत्तावादी ताकतों के निर्देशानुसार निभाई जाती है, लेकिन लोकतांत्रिक देशों में उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून के दायरे में रहते हुए- जो मैं मानता हूँ कि काफी व्यापक है – अपनी राय बेबाकी से प्रस्तुत करे। यह एक बहुत बड़ा दायित्व है। जब किसी समूह को सत्ता या अधिकार मिलते हैं तो उनके साथ दायित्व या जिम्मेदारी का बोझ होना अवश्यंभावी है। हमने जीत कर अपनी आज़ादी हासिल की और हमें इस बात पर गर्व है। लेकिन, ज़ाहिर है कि स्वतंत्रता या आज़ादी कोई एकतरफ़ा चीज़ नहीं है; उसके साथ बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियाँ भी आती हैं, जैसे आज़ादी पर हमला होने की स्थिति में उसकी रक्षा करना – रक्षा केवल बाहरी आक्रमण से ही नहीं, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण है कि उसे अन्दर से कमज़ोर होने से बचाया जाए।

क्योंकि किसी भी राष्ट्र को बाहरी खतरों से भी ज़्यादा आन्तरिक पतन के प्रति सजग रहना चाहिए। ज़ाहिर तौर पर आज़ादी के साथ उसे बाहरी आक्रमण से सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी जुड़ी होती है जिसे हर कोई समझता है। लेकिन अन्ततः दूसरे प्रकार की ज़िम्मेदारी ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है और वह जिम्मेदारी राष्ट्र की आन्तरिक ताकत, उसके मनोबल, आत्मविश्वास को बनाए रखने की होती है। और यह काम मैं जिसे मोटे शब्दों में सही सलाह कहता हूँ, और उससे भी बढ़कर निष्पक्ष विचार और समस्याओं के बारे में शांतचित्त से चिन्तन के माध्यम से ही किया जा सकता है। संकट के समय में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब उत्तेजना और उन्माद की स्थिति में लोगों के हर मामूली अफवाह पर भी विश्वास करने की सम्भावना बहुत अधिक होती है।

बेशक, समाचारपत्र कई प्रकार के होते हैं और भारत में हज़ारों समाचार पत्र हैं। ऐसे समाचार पत्र भी हैं जो जिम्मेदार हैं; ऐसे भी हैं जो कभी जिम्मेदारी से काम करते हैं कभी नहीं करते; ऐसे समाचारपत्र भी हैं जो जिम्मेदार होने से कहीं ज्यादा गैर-जिम्मेदार होते हैं; और कुछ ऐसे कागज़ के पन्ने होते हैं जो केवल काल्पनिक बातें लिखने और गैर-जिम्मेदारी के दूसरे काम करने में ही अपनी महारत समझते हैं। अच्छी बात यह है कि बाद में बताए गए ये समाचारपत्र महत्वपूर्ण नहीं हैं। पुराने समय में सरकार का यह काम होता था या कम से कम ऐसा माना जाता था कि वह ऐसे समाचारपत्रों का दमन करे जो सरकार की राय में बुरी प्रवृत्ति वाले हों। निःसंदेह यह बिल्कुल गलत तरीका है क्योंकि आप किसी बुराई को दबाकर उसे खत्म नहीं कर सकते हैं।

तो, फिर हम क्या करें? क्योंकि कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि बुराई इतनी बढ़ जाए कि वह जनहित की दृष्टि से खतरनाक हो जाए। स्पष्ट है कि आपके जैसे संगठन के लिए सही तरीका यह होगा कि आप इसमें सीधे तौर पर रुचि लें, बेशक लोगों को दंडित करने की दृष्टि से नहीं – दंडित करने का कोई प्रश्न ही नहीं है – बल्कि समाचार पत्रों का संचालन करने वाले लोगों के बीच एक मज़बूत राय कायम की जाए ताकि पथभ्रष्टों को रोका जा सके; या कम से कम लोगों को तो यह बताया ही जा सकता है कि सम्बंधित व्यक्ति अपने पथ से भटक गया है और उसकी दिशा सही नहीं है। मैं समझता हूँ कि ऐसा करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि जहाँ एक तरफ भारतीय प्रैस के प्रमुख समाचारपत्रों ने जिम्मेदारी के सामान्यतः ऊँचे मानदंड स्थापित किए हैं वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसी पत्रिकाएं हैं जिनकी गैर-जिम्मेदारी को देखकर मुझे हैरानी होती है। बेशक, लोग उन्हें पढ़ते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। हम इस स्थिति से कैसे निपटेंगे? यह प्रश्न विशेष अधिकार और सत्ता के उत्तरदायी बनने के व्यापक मुददे से सम्बंधित है। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री श्री स्टेनले बॉल्डविन एक बार इग्लैंड प्रैस से बहुत नाराज़ हो गए और उन्होंने कहा कि प्रैस को किसी वेश्या जैसी सुविधाएं और सत्ता हासिल है लेकिन उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। बात को कहने का यह एक अतिवादी तरीका था, लेकिन बात यह है कि जब हमें कोई शक्ति या अधिकार मिलता है तो आवश्यक रूप से उस अधिकार के साथ कोई कर्तव्य या दायित्व भी जुड़ा होता है। आप इन दोनों को अलग करके नहीं देख सकते हैं।

हम लोग, जो अपने अधिकारों के लिए लड़े हैं और अन्ततः उन्हें हासिल भी कर चुके हैं, बड़ी आसानी से भूल जाते हैं कि कोई अधिकार अपने आप में अधूरा होता है, और यदि राष्ट्र या उसका एक बड़ा हिस्सा उसके साथ जुड़े कर्तव्यों को भुला दे तो वह अधिकार ज़्यादा समय तक टिका नहीं रह सकता है। चाहे व्यक्ति के तौर पर या नागरिक के तौर पर या लोगों के समूहों के तौर पर हम अभी भी अधिकारों की बात अधिक करते हैं और कर्तव्यों के बारे में कम चिन्ता करते हैं। इससे देश कमज़ोर होता है और हम किसी तरह का रचनात्मक योगदान दिए बिना केवल आलोचना करते हैं। यह बात पूरे देश पर लागू होती है लेकिन प्रैस पर और भी अधिक लागू होती है। यानी प्रैस ने पुराने समय में सरकार के हस्तक्षेप से अपनी आजादी के लिए लड़ाई लड़ी और धीरे-धीरे व्यापक आजादी हासिल कर ली। मैं कह सकता हूँ कि हमारी दूसरी भावनाएं जो भी हों – यहाँ ‘हमारी’ का अर्थ सरकारी की भावनाओं से है – इस समय प्रैस को अभिव्यक्ति की जितनी आजादी है या जितनी आजादी का प्रैस उपयोग कर रही है, दुनिया में उससे अधिक आजादी शायद ही कहीं हो। मैं आपसे साफ और खरी बात कहता हूँ। ऐसा बहुत कुछ जो उस आजादी के कारण छपता है, मेरी नज़र में बहुत खतरनाक है। मुझे लगता है कि एक व्यापक दृष्टि में प्रैस की स्वतंत्रतता केवल एक नारा नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेरे मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि भले ही सरकार को प्रैस को मिलने वाली आजादी पसंद न हो और भले ही वह उसे खतरनाक मानती हो, प्रैस की स्वतंत्रता में दखल देना गलत है। प्रतिबंध लगा कर आप कुछ बदल नहीं सकते हैं; आप केवल कुछ बातों को सार्वजनिक होने से दबा लेते हैं जिसके कारण उन विचारों का और अधिक प्रसार करने की इच्छा बलवती होती है। इसलिए मैं दमित या नियंत्रित प्रैस के बजाए उस आजादी के दुरुपयोग के खतरों वाली स्वतंत्र प्रैस ही चाहूँगा।

जिम्मेदारी के बिना स्वतंत्रता धीरे-धीरे लगभग स्वच्छंदता का रूप धारण कर लेती है। स्वच्छंदता एक अस्पष्ट सा शब्द है और मुझे पसंद भी नहीं है; लेकिन मैं इस संदर्भ में उसका प्रयोग कर रहा हूँ क्योंकि इस समय मुझे इससे बेहतर शब्द सुझाई नहीं दे रहा है। अन्ततः स्वच्छंदता की परिणति मानसिक पतन के रूप में होती है; और यदि किसी राष्ट्र का मानसिक पतन हो तो फिर वह उसके हर दूसरे अंग को भी प्रभावित करेगा। यही बात समाचार पत्रों पर भी लागू होती है। यदि उन्हें जो स्वतंत्रता प्राप्त है उसमें स्वच्छंदता और गैर-जिम्मेदारी बढ़ती है तो न केवल वह उनकी स्वतंत्रता को खतरे में डालेगी बल्कि उनकी प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुँचाएगी। निःसंदेह हमें आजादी होनी चाहिए लेकिन हमें सार्वजनिक कार्यकलापों, जिनमें प्रैस भी शामिल है, में भी सत्यनिष्ठा को बनाए रखना चाहिए। निःसंदेह हम जानते हैं कि पुराने प्रैसकर्मियों और पत्रकारों ने इस दृष्टि से ऊँचे मानदंड स्थापित किए हैं कि प्रैस को कैसा होना चाहिए और मुझे इस बात का कोई संदेह नहीं है कि जिम्मेदार पत्रकार जन पहले से ही हमेशा उन ऊँचे मानकों के अनुसार काम करने का प्रयास करते रहे हैं। खैर, मुझे लगता है कि इस समस्या का सही तरीका यही है कि पत्रकार और उनके संगठन इस समस्या को हल करने के लिए काम करें और कोई बाहरी एजेंसी, भले ही वह एजेंसी सरकार ही क्यों न हो, इस काम को करने के लिए सक्षम नहीं है। उन्हें स्वयं के लिए मानदंडों को ऊँचा उठाना चाहिए, दंड के द्वारा नहीं – क्योंकि वे कोई सरकार की कार्यकारी शाखा नहीं हैं – बल्कि वे अपने गलती करने वाले बंधुओं के सामने यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह गलत है। मैंने पाया है कि जब कुछ पत्रिकाएं गैर-जिम्मेदारी का व्यवहार करती हैं तब बहुत कम ऐसा होता है कि दूसरी पत्रिकाओं ने उनके आचरण की आलोचना की हो। मैं जानता हूँ कि यह अच्छी बात नहीं है कि समाचारपत्र एक-दूसरे को भला-बुरा कहें; मैं स्वयं भी पत्रकारों के बीच विवादों को बढ़ावा देने के पक्ष में नहीं हूँ। मेरे कहने का आशय यह है कि कोई जिम्मेदार संस्था उस पेशे से जुड़े किसी ऐसे सदस्य को रोकने का काम कर सकती है जो स्पष्ट तौर पर गलत दिखाई दे रहा हो। बेशक हर व्यक्ति को अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार है और मैं इससे इन्कार नहीं कर रहा हूँ; मैं केवल उस गैर-जिम्मेदारी और फूहड़पन की बात कर रहा हूँ जिसके स्तर तक ये बिना प्रतिष्ठा वाले समाचार पत्र जा सकते हैं। मैं समझता हूँ कि ऐसी संस्था दृढ़ता से – यदि आप चाहें तो शिष्टतापूर्वक लेकिन दृढ़ता से – यह बात स्पष्ट कर सकती है कि वह ऐसी बातों से सहमत नहीं है। इस प्रकार वह संस्था इस दृष्टि से लोगों का नेतृत्व कर सकेगी।

समाचारपत्रों के सम्पादकों के अखिल-भारतीय सम्मेलन में दिया गया भाषण, नई दिल्ली, 3 दिसम्बर, 1950