नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



प्यारे बच्चो:

शंकर ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं इस साप्ताहिक के बाल विशेषांक के लिए कुछ लिखूं। एक कमज़ोर क्षण में, साप्ताहिक से ज़्यादा बच्चों का खयाल करते हुए मैंने लिखने का वादा कर दिया। लेकिन जल्दी ही मुझे यह बात समझ आ गई कि मैने जल्दबाज़ी में यह फैसला किया था। मैं किस विषय पर लिख सकता था?

मुझे बच्चों के साथ रहना, उनसे बातें करना, और उससे भी बढ़कर, उनके साथ खेलना पसंद है। थोड़ी देर के लिए मैं भूल जाता हूँ कि मैं बहुत बूढ़ा हो चला हूँ और मेरे बचपन को गुज़रे हुए बहुत लम्बा समय बीत चुका है। लेकिन अब जब मैं तुम्हारे लिए यह खत लिखने बैठा हूँ तो मेरे लिए अपनी उम्र और हमारे बीच के फासले को भुला पाना कठिन हो रहा है। बुज़ुर्गों को यह आदत होती है कि वे युवाओं को उपदेश और अच्छी सलाह देते रहते हैं। मुझे याद है कि बहुत समय पहले जब मैं एक छोटा लड़का हुआ करता था तब मुझे यह आदत बहुत नापसंद थी। इसलिए मैं समझ सकता हूँ कि तुम लोगों को भी यह आदत पसंद नहीं होगी। बड़ों को अपने आप को बहुत बुद्धिमान दिखाने की भी आदत होती है, हालाँकि उनमें से बहुत थोड़े लोग ही ऐसे होते हैं जो सचमुच बहुत बुद्धिमान हों। मैंने अपने बारे में अभी कोई राय नहीं बनाई है कि मैं बुद्धिमान हूँ या नहीं। कभी-कभी दूसरे लोगों की बातें सुनते समय मुझे लगता है कि मैं बहुत होशियार, प्रतिभावान और खास हूँ। फिर खुद को देखने के बाद मुझे इस बात पर शंका होने लगती है। चाहे कुछ भी हो, जो लोग बुद्धिमान होते हैं वे कभी भी अपनी बुद्धिमत्ता का बखान नहीं करते और ऐसा व्यवहार भी नहीं करते जैसे वे दूसरों से बेहतर हों।

इसलिए मुझे तुम लोगों को यह नसीहत नहीं देनी चाहिए तुम क्या-क्या करो और क्या मत करो। मैं मानता हूँ कि ऐसी नसीहतें तो तुम्हें अपने अध्यापकों से और दूसरे लोगों से बहुत मिल चुकी होंगी। न मुझे ऐसा मान कर चलना चाहिए कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ।

तो फिर मैं किस चीज़ के बारे में लिखूँ? यदि तुम मेरे साथ यहाँ मौजूद होते तो मुझे हमारे इस सुन्दर संसार के बारे में बात करना बहुत अच्छा लगता, फूलों और पेड़ों के बारे में और पक्षियों तथा पशुओं और तारों और पहाड़ों और हिमनदों के बारे में और इस दुनिया में हमारे आसपास की सभी सुन्दर चीज़ों के बारे में हम बात करते। हमारे आसपास इतनी सारी सुन्दरता बिखरी हुई है और फिर भी हम, जो बड़े लोग हैं, अक्सर इस सुन्दरता को भुला देते हैं और अपने दफ्तरों में व्यस्त हो जाते हैं और समझते हैं कि हम बड़ा ज़रूरी काम कर रहे हैं।

मैं आशा करता हूँ कि तुम ज्यादा समझदारी से काम लोगे और अपने आसपास की इस सुन्दरता और जीवन को अनुभव करने के लिए अपनी आँखें और कान खुले रखोगे। क्या तुम फूलों को उनके नाम से और पक्षियों को उनके गीतों से पहचान सकते हो? यदि आप प्रेम और मित्रता का भाव लेकर इनके पास जाएं तो इन्हें, या प्रकृति की सभी चीज़ों को अपना दोस्त बनाना कितना आसान है। तुमने पुराने ज़माने की परीकथाएं और किस्से तो पढ़े ही होंगे। लेकिन यह दुनिया अपने आप में अब तक लिखी गई सभी परीकथाओं और साहस के किस्सों में सबसे महान परी कथा है। बस इसे देखने और सुनने के लिए हमारी आँखें और कान खुले रहने चाहिए और हमारे मन को जीवन और संसार की सुन्दरता को स्वीकार करने तैयार होना चाहिए।

वयस्क लोगों में खुद को खंडों और समूहों में बांटने की एक अजीब सी आदत होती है। वे खुद दीवारें खड़ी करते हैं और फिर समझते हैं कि जो लोग उनके बनाए हुए घेरे से बाहर हैं वे अजनबी हैं जिनसे नफरत की जानी चाहिए। ये अवरोध क्षेत्र के होते हैं, जाति, रंग, दल, राष्ट्र, प्रान्त, भाषा, परम्परा, अमीरी और गरीबी की होती हैं। इस प्रकार ये लोग अपने ही बनाए हुए कैदखानों में जीते हैं। सौभाग्य से बच्चों को अन्तर पैदा करने वाले इन अवरोधों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं होती है। वे साथ मिलकर काम करते हैं या खेलते हैं और बड़े होने के बाद ही वे अपने नेताओं से इन अवरोधों के बारे में सीखते हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम लोगों को बड़े होने में अभी लम्बा समय लगेगा।

मैंने हाल में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड की यात्रा की है। दुनिया के दूसरे छोर तक की यह एक लम्बी यात्रा थी। मैंने पाया कि इन देशों के बच्चे भी यहाँ के बच्चों के जैसे ही थे और इसलिए मैंने बड़ी आसानी से उन्हें अपना दोस्त बना लिया, और जब भी मुझे अवसर मिलता, मैं उनके साथ थोड़ा खेल भी लेता था। यह अनुभव उन बड़े लोगों के साथ मेरी बहुत सी चर्चाओं से बेहतर था जो यह कल्पना करते हैं कि वे बहुत अलग हैं और जानबूझकर अपने आप को अलग बना लेते हैं।

कुछ महीने पहले जापान के बच्चों ने मुझे पत्र लिखा और कहा कि मैं उनके लिए एक हाथी भेजूँ। मैंने भारत के बच्चों की ओर से उनके लिए एक सुन्दर सा हाथी भिजवा दिया। यह हाथी मैसूर से मंगवाया गया था और उसने समुद्र के रास्ते जापान तक की यात्रा की। जब वह टोक्यो पहुँचा तो कई हज़ार बच्चे उसे देखने पहुँचे। उनमें से बहुत से बच्चे ऐसे थे जिन्होंने कभी हाथी नहीं देखा था। इस प्रकार यह शानदार जानवर उनके लिए भारत का प्रतीक बन गया और उनके और भारत के बच्चों के बीच की कड़ी बन गया। मुझे इस बात की बड़ी खुशी थी कि हमारे इस उपहार के कारण जापान के इतने सारे बच्चों को ढेरों खुशी मिली और उन्हें हमारे देश के बारे में सोचने का मौका मिला। इसलिए, हमें भी उनके देश के बारे में सोचना चाहिए और दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के बारे में भी सोचना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि हर जगह तुम लोगों के जैसे ही बच्चे होते हैं जो स्कूल जाते हैं, खेलते हैं, और कभी-कभी झगड़ा भी करते हैं, लेकिन हमेशा दुबारा दोस्त भी बन जाते हैं। तुम लोग अपनी पुस्तकों में इन देशों के बारे में पढ़ सकते हो, और जब तुम लोग बड़े हो जाओगे, तो तुममें से बहुत से लोग इन देशों को देखने के लिए भी जाएंगे। वहाँ दोस्त बन कर जाना और तुम पाओगे कि वहाँ के लोग भी दोस्त बनकर ही तुम्हारा स्वागत करेंगे।

तुम लोग जानते हो कि हमारे यहाँ एक बहुत महान व्यक्ति हुए हैं। उन्हें महात्मा गाँधी कहा जाता था। लेकिन हम उन्हें प्यार से बापूजी कह कर बुलाते थे। वे बहुत ज्ञानी थे लेकिन वे अपने ज्ञान का दिखावा नहीं करते थे। वे बड़े सादा थे और कई मायनों में बच्चों के जैसे थे और उन्हें बच्चों से प्यार था। वे सभी के दोस्त थे और किसान या मजदूर, गरीब या अमीर, जो भी उनके पास जाता था वे उसका दोस्त की तरह स्वागत करते थे। वे सिर्फ भारत के ही सभी लोगों के दोस्त नहीं थे बल्कि बाकी दुनिया भर के लोगों को भी अपना दोस्त मानते थे। उन्होंने हमें सिखाया कि हम किसी से भी घृणा न करें, झगड़ा न करें बल्कि एक-दूसरे के साथ मिलकर खेलें और देश की सेवा में सहयोग करें। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि हम किसी चीज़ से न डरें और प्रसन्नतापूर्वक और हँसते हुए दुनिया का सामना करें।

हमारा देश एक बहुत बड़ा देश है और हमें इसके लिए बहुत सारा काम करना है। यदि हममें से हर एक व्यक्ति अपने हिस्से का थोड़ा-थोड़ा काम करे तो यह मिलकर बहुत बड़ा काम हो जाएगा और देश समृद्ध होगा और तेज़ी से प्रगति करेगा।

मैंने इस पत्र में तुम लोगों से ऐसे बात करने की कोशिश की है जैसे तुम लोग मेरे पास ही बैठे हो और मैं जितनी बातें लिखना चाहता था, मैंने उससे ज़्यादा ही लिख दिया है।

शंकर के साप्ताहिक के बाल विशेषांक के लिये लिखा गया पत्र नई दिल्ली, 3 दिसम्बर, 1949