नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



मित्रो और साथियो, हमारे जीवन का उजाला छिन गया है और हर तरफ अंधकार है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं आप लोगों से क्या कहूँ और कैसे कहूँ। हमारे प्रिय नेता, जिन्हें हम बापू कहते थे, हमारे राष्ट्रपिता, नहीं रहे। शायद मेरा ऐसा कहना गलत है। फिर भी, अब हम उन्हें उस तरह से दुबारा नहीं देख सकेंगे जैसे हम उन्हें इतने वर्षों से देखते आए हैं। अब हम उनकी सलाह लेने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे और उनसे ढाढ़स नहीं पा सकेंगे, और यह एक भारी आघात है, अकेले मेरे लिए ही नहीं, बल्कि इस देश के लाखों-लाख लोगों के लिए भी। और इस आघात को कम करने के लिए मेरे या किसी और व्यक्ति के लिए कोई और सलाह देना थोड़ा कठिन है।

मैंने कहा कि उजाला छिन गया है, और फिर भी मैं गलत था। क्योंकि जो प्रकाश इस देश में जगमगाया था वह कोई साधारण प्रकाश नहीं था। जिस रोशनी ने इस देश को इतने वर्षों तक प्रकाशित किया है वह इस देश को आने वाले कई-कई वर्षों तक प्रकाशित करती रहेगी, और हज़ार साल बाद भी वह रोशनी इस देश में दिखाई देती रहेगी और दुनिया उसे देख सकेगी और वह असंख्य लोगों के हृदय को सांत्वना प्रदान करेगी। क्योंकि वह रोशनी हमारे वर्तमान को ही नहीं दर्शाती थी, वह तो सप्राण, शाश्वत सत्य थी, जिसने हमें सही मार्ग दिखाकर, हमें गलतियाँ करने से बचाकर इस प्राचीन देश को स्वाधीनता दिलाई।

यह सब तब घटित हुआ जब उन्हें अभी कितना कुछ और करना था। हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि वे अनावश्यक थे या उनका काम पूरा हो चुका था। लेकिन अब, विशेष तौर पर जब हमारे सामने इतनी सारी चुनौतियाँ हैं, उनका हमारे बीच न रहना एक भीषण और असह्य आघात है।

एक सिरफिरे व्यक्ति ने उनका प्राणांत कर दिया, ऐसा कृत्य करने वाले व्यक्ति को मैं सिरफिरा ही कहूँगा, लेकिन पिछले वर्षों और महीनों में इस देश में बहुत ज़हर फैला है, और इस ज़हर ने लोगों के मानस पर प्रभाव डाला है। हमें इस ज़हर का मुकाबला करना होगा, उसे समूल खत्म करना होगा, हमें अपने सामने उपस्थित सभी संकटों का मुकाबला करना होगा, और यह मुकाबला उन्माद या पागलपन के आवेश में नहीं, बल्कि उसी तरीके से करना होगा जो हमारे प्रिय नेता ने हमें सिखाया है।

अब सबसे पहले हमें यह याद रखना होगा कि हममें से कोई भी आक्रोशित होकर दुर्व्यवहार न करे। हमें दृढ़ और स्थिर रहते हुए व्यवहार करना है, हमारे समक्ष उपस्थित सभी संकटों का मुकाबला करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ, उस मनोरथ को पूरा करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ जो हमारे प्रिय नेता ने हमारे लिए तय किया है, हमेशा यह याद रखते हुए, जो मेरी मान्यता है, कि यदि उनकी आत्मा ऊपर से हमें देखे, तो उनकी आत्मा को इससे अधिक दुख और किसी बात से नहीं पहुँचेगा कि हमने किसी प्रकार का ओछा व्यवहार किया है या किसी प्रकार की हिंसा की है।

इसलिए हमें वैसा नहीं करना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम कमज़ोर हों, बल्कि यह कि हम अपनी शक्ति और एकता से अपने सामने की सभी कठिनाइयों का सामना करें। हमें अपनी एकजुटता बनाए रखनी है, और इस विपत्ति की घड़ी में अपनी सभी क्षुद्र समस्याओं और कठिनाइयों और झगड़ों को समाप्त करना है। कोई बड़ी विपत्ति हमें यह स्मरण कराने के लिए एक संकेत होती है कि हम जीवन के बड़े उद्देश्यों को याद रखें और ऐसी मामूली बातों को भुला दें जिनके बारे में हम बहुत अधिक सोचते हैं। अपनी मृत्यु के माध्यम से उन्होंने हमें जीवन के बड़े उद्देश्यों, विद्यमान सत्य का स्मरण कराया है, और यदि हम इसे याद रखेंगे तो वह भारत के हित में होगा...

कुछ मित्रों ने यह सुझाव दिया था कि महात्माजी के शरीर को कुछ दिनों के लिए संलेपित करके रखा जाए ताकि लाखों की संख्या में लोग उन्हें अपनी अन्तिम श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। लेकिन उनकी यह इच्छा थी, जिसे उन्होंने कई बार व्यक्त किया था, कि ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए, कि ऐसा न किया जाए, कि वे अपने पार्थिव शरीर को संलेपित किए जाने के विचार के विरुद्ध थे, और इसलिए हमने निर्णय किया कि दूसरे लोगों की इसके विपरीत इच्छा होने के बावजूद इस सम्बंध में उनकी इच्छा का पालन किया जाए।

और इसलिए दाह संस्कार शनिवार के दिन दिल्ली शहर में यमुना नदी के किनारे किया जाएगा। शनिवार को पूर्वाह्न में लगभग 11.30 बजे बिड़ला हाउस से शवयात्रा निकाली जाएगी जो एक निर्धारित मार्ग से होती हुई यमुना नदी तक पहुँचेगी। वहाँ लगभग अपराह्न 4 बजे दाह संस्कार किया जाएगा। कार्यक्रम के स्थल और मार्ग की घोषणा रेडियो और प्रैस के माध्यम से कर दी जाएगी।

दिल्ली में अपनी अन्तिम श्रद्धांजलि देने के इच्छा रखने वाले लोग इस मार्ग के किनारे-किनारे एकत्र हों। मेरी सलाह है कि बहुत अधिक संख्या में लोग बिड़ला हाउस न पहुँचें, बल्कि बिड़ला हाउस से यमुना नदी तक के इस लम्बे मार्ग के दोनों ओर एकत्र हों। और मेरा विश्वास है कि ये सभी लोग वहाँ शांति बनाए रखेंगे और किसी प्रकार के प्रदर्शन नहीं किए जाएंगे। इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि देने का यही सबसे अच्छा और सबसे उपयुक्त तरीका होगा। इसके अलावा, शनिवार के दिन हम सभी व्रत रखें और प्रार्थना करें।

जो लोग अन्यत्र रहते हैं, दिल्ली से बाहर और भारत के दूसरे हिस्सों में, निःसंदेह वे भी जिस प्रकार उनके लिए सम्भव हो, इस अन्तिम श्रद्धांजलि में भाग ले सकते हैं। वे लोग भी इस दिन व्रत रख सकते हैं और प्रार्थना कर सकते हैं। और दाह संस्कार के लिए निर्धारित समय पर, यानी शनिवार को अपराह्न 4 बजे, लोग नदी या समुद्र के किनारे पर जाएं और वहाँ प्रार्थना करें। और जब हम प्रार्थना करें, तो हमारी सबसे बड़ी प्रार्थना यही हो सकती है कि हम सत्य, और उस उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करने की प्रतिज्ञा करें जिसके लिए हमारे इस महान देशवासी ने अपना जीवन जिया और जिसके लिए उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। भारत के लिए और स्वयं अपने लिए यही हमारी सर्वोत्तम प्रार्थना हो सकती है।

जय हिंद।