नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



मैं आपके पास यहाँ एक महान देश के प्रधानमंत्री की हैसियत से या किसी राजनीतिज्ञ की हैसियत से नहीं आया हूँ बल्कि सत्य के विनम्र साधक और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में आया हूँ जिसने अपना मार्ग खोजने के लिए सतत संघर्ष किया है, जिसमें हमेशा सफलता नहीं मिली है, अपने कर्मों को उन उद्देश्यों और सिद्धान्तों के अनुरूप बनाने का प्रयास किया है जिन्हें उसने आदर्श माना है। यह प्रक्रिया हमेशा ही कठिन होती है लेकिन संघर्ष और जुनून की इस दुनिया में यह और भी कठिन हो जाती है। राजनीतिज्ञों को दैनिक जीवन की समस्याओं से जूझना पड़ता है और वे तात्कालिक समाधान चाहते हैं। दार्शनिक परम उद्देश्यों की प्राप्ति के विषय पर विचार करते हैं और अक्सर रोज़मर्रा की दुनियादारी और उसकी समस्याओं से कट जाते हैं। क्या यह सम्भव है कि इन दोनों दृष्टिकोणों को एक साथ मिला दिया जाए और प्लेटो के दार्शनिक शासकों की तरह व्यवस्था को चलाया जा सके? महोदय, आपने एक महान कर्मशील व्यक्ति के रूप में और इस विश्वविद्यालय के प्रमुख के तौर पर एक दार्शनिक के रूप में अनुभव हासिल किया है, इसलिए आप इस प्रश्न का उत्तर तलाश करने में हमारी सहायता कर सकते हैं।

हर समय की लगातार आपाधापी वाले इस संसार में लोगों के पास सोच-विचार करने के लिए बहुत कम अवकाश होता है, आदर्शों और उद्देश्यों के लिए तो और भी कम। फिर भी, हम अपने वर्तमान के कार्यकलापों को भी तब तक कैसे कर सकते हैं जब तक कि हमें यह न मालूम हो कि हम किस ओर जा रहे हैं और हमारे लक्ष्य क्या हैं? विश्वविद्यालय के शांत वातावरण में ही ऐसी बुनियादी समस्याओं के बारे में समुचित विचार किया जा सकता है। आज जो युवक-युवतियाँ विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और जिनके ऊपर कल जीवन की समस्याओं का भार होगा, उन्हें सीखना होगा कि उनके लक्ष्य और सिद्धान्तों के मानक स्पष्ट हों तभी आगे की पीढ़ी के लिए कोई आशा रखी जा सकती है। पिछली पीढ़ी में कुछ महान लोग हुए लेकिन लेकिन एक पीढ़ी के तौर पर उसने विश्व को बार-बार विपत्तियों में डाला। इस पीढ़ी के दौरान मनुष्यों में विवेक के अभाव की कीमत दो विश्व युद्धों के रूप में चुकानी पड़ी। यह बड़ी भारी कीमत है और इसकी विडम्बना यह है कि इतनी भारी कीमत चुकाने के बाद भी हम वास्तविक अर्थ में शांति या संघर्ष की समाप्ति नहीं खरीद सके हैं और उससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि मानवजाति ने अपने इस अनुभव से सबक नहीं सीखा है और अभी भी वह उसी रास्ते पर चल रही है जिसने उसे पहले विपत्ति में डाला था।

हमने युद्ध लड़े हैं और हमने विजय भी हासिल की है और उस जीत का जश्न भी मनाया है; लेकिन जीत किसे कहते हैं और उसे मापने का पैमाना क्या है? कोई भी युद्ध कुछ निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लड़ा जाता है। दुश्मन की पराजय अपने आप में कोई उद्देश्य नहीं होती है बल्कि उस उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग की बाधा को हटाने की प्रक्रिया होती है। यदि उद्देश्य हासिल न किया जा सके तो दुश्मन पर विजय केवल नकारात्मक राहत बन कर रह जाती है और निःसंदेह यह तो सच्ची विजय नहीं है। लेकिन हमने देखा है कि युद्धों में उद्देश्य लगभग पूरी तरह से यह होता है कि दुश्मन को हराया जाए और दूसरे और असली उद्देश्य को भुला दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि दुश्मन को हराकर मिलने वाली जीत केवल आंशिक जीत बन कर रह गई है और उसने वास्तविक समस्या का समाधान नहीं किया है; उसने तात्कालिक समस्या का समाधान किया है, लेकिन साथ ही साथ उसने कई दूसरी तरह की, और कई बार और ज़्यादा गम्भीर समस्याओं को जन्म दिया है। इसलिए यह आवश्यक है कि हर बार, चाहे वह युद्ध का काल हो या शांति का, हमारे मन में अपने वास्तविक उद्देश्य को लेकर स्पष्टता हो और हम हमेशा ही उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कार्य करें।

मैं यह भी मानता हूँ कि हम जिस उद्देश्य को हासिल करना चाहते हैं और उसे पाने के लिए जो तरीके अपनाते हैं उनके बीच एक गहरा सम्बंध होता है। यदि उद्देश्य उचित भी हो और उसके लिए अपनाए जाने वाले तरीके गलत हों तो उससे उद्देश्य भ्रष्ट हो जाएगा या वे तरीके हमें गलत दिशा में मोड़ देंगे। इस प्रकार साधन और साध्य के बीच घनिष्ठ और यौगिक सम्बंध होता है और उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। पुराने समय के कई महान लोगों ने हमें यही पाठ सिखाया है लेकिन दुर्भाग्य से शायद ही हम इसे याद रखते हैं।

मैं ऐसे ही कुछ विचार आपके समक्ष रखने का साहस कर रहा हूँ, इसलिए नहीं कि ये नए या अनूठे हैं बल्कि इसलिए क्योंकि इन विचारों ने मेरे जीवन की यात्रा में, जो कभी अनवरत व्यस्तता और संघर्ष में तो कभी थोपी गई कार्यनिवृत्ति के समय में गुजरी है, मेरे ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ा है। मेरे देश के महान नेता महात्मा गाँधी, जिनकी प्रेरणा से और जिनकी देखरेख के आश्रय में में बड़ा हुआ, हमेशा नैतिक मूल्यों पर बल देते थे और हमें आगाह करते थे कि हम कभी भी साधनों को साध्य से कम महत्व न दें। हम उनके अनुयायी होने के काबिल तो नहीं थे, लेकिन फिर भी हमने अपनी पूरी क्षमता के अनुसार उनकी शिक्षा का पालन करने का प्रयास किया। जो थोड़ा बहुत पालन हम कर पाए उससे भी हमें बहुत लाभदायक परिणाम हासिल हुए। एक बड़े और शक्तिशाली राष्ट्र के साथ एक पीढ़ी के प्रचंड संघर्ष के बाद हमें सफलता मिली, और इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात जिसका श्रेय दोनों ही पक्षों को जाता है, यह थी कि यह सफलता किस ढंग से हासिल की गई। इतिहास में शायद ही इस तरह की कोई दूसरी घटना हो जहाँ ऐसे संघर्ष का शांतिपूर्ण ढंग से समाधान किया गया हो, और उसके बाद दोस्ताना और सहयोगपरक सम्बंधों को भी कायम रखा गया हो। यह आश्चर्य की बात है कि दोनों देशों के बीच की कड़वाहट और बैरभाव कितनी जल्दी तिरोहित हो गया, और सहयोग की भावना ने उसका स्थान ले लिया। और भारत में हमने स्वेच्छा से यह फैसला किया है कि हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इस सहयोग को जारी रखेंगे।

मैं दूसरे और अधिक अनुभवी देशों को किसी भी रूप में सलाह देने की धृष्टता नहीं करूँगा। लेकिन क्या मैं विनम्रतापूर्वक यह कह सकता हूँ कि भारत की शांतिपूर्ण क्रांति से कुछ सीख ली जा सकती है जिसे दुनिया के सामने खड़ी बड़ी समस्याओं के समाधान की दृष्टि से लागू किया जा सकता है? उस क्रांति ने हमारे सामने यह बात सिद्ध कर दी है कि बल के प्रयोग से मनुष्य की नियति का निर्धारण किया जाए यह आवश्यक नहीं है और यह कि संघर्ष करने का ढंग और उस संघर्ष को समाप्त करने का तरीका ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। इतिहास हमें दिखाता है कि इस बलप्रयोग की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन इतिहास यह भी दर्शाता है कि अन्ततोगत्वा शारीरिक बल का कितना भी प्रयोग दुनिया की नैतिक ताकतों की अनदेखी नहीं कर सकता है; और यदि वह ऐसा करने का प्रयास करता है, तो वह अपने जोखिम पर ही ऐसा करता है। आज हमारे सामने यह समस्या अपने विकरालतम स्वरूप में खड़ी है क्योंकि भौतिक बल के पास जितने घातक हथियार उपलब्ध हैं उनकी कल्पना भी भयावह है। क्या बीसवीं शताब्दी आदिम बर्बरता से केवल मनुष्य की बुद्धि द्वारा तैयार किए गए हथियारों की विध्वंसकारी क्षमता की दृष्टि से ही भिन्न होगी? मेरे गुरु की शिक्षा के आधार पर मैं मानता हूँ कि इस स्थिति से निपटने और हमारे समक्ष खड़ी समस्या का समाधान करने का एक वैकल्पिक तरीका है।

मुझे इस बात का अहसास है कि कोई राजनेता या व्यक्ति जो सार्वजनिक विषयों को सम्भालता है, वास्तविकताओं को अनदेखा नहीं कर सकता है और अमूर्त सत्य की दृष्टि से कार्रवाई नहीं कर सकता है। उसके निर्णय हमेशा इस दृष्टि से नियंत्रित होते हैं कि उसके साथी लोग उस सत्य को किस सीमा तक ग्रहण करने के लिए तैयार हैं। फिर भी, आधारभूत सत्य सत्य ही बना रहता है और उसे हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए और, जहाँ तक सम्भव हो, हमारे कृत्य उसके अनुरूप होने चाहिए। अन्यथा हम बुराई के ऐसे दुष्चक्र में फंस जाते हैं जहाँ एक बुरा काम दूसरे बुरे काम का कारण बनता चला जाता है।

भारत एक गौरवशाली इतिहास वाला प्राचीन देश है। साथ ही वह एक नया देश भी है जिसकी नई इच्छाएं और अभिलाषाएं हैं। अगस्त के महीने से वह अपनी अलग विदेश नीति लागू करने की स्थिति में आ गया है। पहले वह उन परिस्थिजन्य वास्तविकताओं से नियंत्रित था जिन्हें हम न तो अनदेखा कर सकते थे और न ही हम उन्हें पराजित कर सकते थे। लेकिन इसके बावजूद भारत ने अपने महान नेता की सीख को नहीं भुलाया। गलतियों के साथ ही सही, उसने जहाँ तक सम्भव हो सका, सिद्धान्त को वास्तविकता में ढालने का प्रयत्न किया है। एक तो राष्ट्रों के परिवार में भारत एक नया देश था और वह दूसरे राष्ट्रों पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं डाल सकता था। लेकिन यह स्थिति एक दृष्टि से भारत के लिए फायदेमंद भी थी। उसके पास क्षमतावान संसाधन उपलब्ध थे जो निश्चित तौर पर उसकी ताकत और प्रभाव को बढ़ा सकते थे। उससे भी बड़े लाभ की स्थिति यह थी कि वह अपने अतीत की ज़ंजीरों में नहीं जकड़ा हुआ था, पुरानी शत्रुताओं या बंधनों से नहीं बंधा था, ऐतिहासिक दावों या पारम्परिक स्पर्धाओं से नहीं बंधा था। यहाँ तक कि उसके पूर्व शासकों के प्रति भी कोई कड़वाहट शेष नहीं थी। इस प्रकार भारत ने राष्ट्रों के परिवार में पूर्वाग्रहों या द्वेष के बिना प्रवेश किया, स्वागत करने और स्वागत पाने के लिए तैयार। निःसंदेह भारत को अपने हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी विदेश नीति के बारे में विचार करना था, लेकिन साथ ही उसने इसे अपने आदर्शवादी सिद्धान्तों का पुट भी दे दिया। इस प्रकार भारत ने आदर्शवाद को राष्ट्रीय हितों के साथ मिलाने का प्रयत्न किया है। इस नीति के मुख्य उद्देश्य हैं: किसी प्रमुख शक्ति या शक्तियों के गुट में शामिल हुए बिना सभी विवादास्पद विषयों पर अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण रखते हुए शांति की स्थापना के लिए प्रयास, राष्ट्रों और व्यक्तियों की स्वतंत्रता को समर्थन, जातीय भेदभाव की समाप्ति और विश्व के एक बड़े भाग की आबादी को त्रस्त करने वाली गरीबी, बीमारी और अज्ञानता का उन्मूलन। मुझसे अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि भारत किसी या देशों के समूह के साथ अपना गुट क्यों नहीं बना लेता है और मुझसे कहा जाता है कि चूँकि हम ऐसा करने से बचते रहे हैं इसलिए हम अनिश्चितता की स्थिति में हैं। इस प्रश्न और इस टिप्पणी को आसानी से समझा जा सकता है, क्योंकि किसी संकट की स्थिति में यह स्वाभाविक होता है कि जो संकट से सीधे सम्बंधित पक्ष होते हैं वे दूसरों के निष्पक्ष शांत व्यवहार को अविवेकपूर्ण, अदूरदर्शी, नकारात्मक, अव्यावहारिक और कायरतापूर्ण तक मानते हैं। लेकिन मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भारत ने जो नीति अपनाई है वह न तो नकारात्मक है और न ही तटस्थ। यह एक सकारात्मक और सप्राण नीति है जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गाँधी की शिक्षा से सीखी गई बातों पर आधारित है। शांति केवल भारत में हमारी प्रगति और विकास के लिए ही अत्यावश्यक नहीं है बल्कि पूरे विश्व के लिए इसकी आवश्यकता है। इस शांति को कैसे बनाए रखा जाए? आक्रमण के आगे घुटने टेक कर तो नहीं, बुराई या अन्याय से समझौता करके तो नहीं, और युद्ध की बातें करके या युद्ध की तैयारी करके भी नहीं! आक्रमण का मुकाबला तो करना है, क्योंकि इससे शांति खतरे में पड़ती है। लेकिन साथ ही साथ पिछले दो युद्धों से मिली सीख को भी याद रखने की आवश्यकता है, और मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि हम उसी दिशा में बढ़े चले जाते हैं। दुनिया को दो विरोधी खेमों में जमा करने की प्रक्रिया उसी संकट को और गहरा बनाती है जिससे बचने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इससे भय का भाव उत्पन्न होता है, और यह भय लोगों की समझने की शक्ति को अस्पष्ट कर देता है और उन्हें गलत रास्तों पर ले जाता है। जीवन में भय से अधिक खराब और खतरनाक और कुछ नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के एक महान राष्ट्रपति ने ठीक ही कहा था कि दरअसल हमें भय के अलावा और किसी चीज़ से डरने की आवश्यकता नहीं है।

इसलिए हमारे सामने समस्या यह है कि इस भय को किस प्रकार कम किया जाए और अन्त में कैसे इसे पूरी तरह खत्म किया जाए। यदि पूरी दुनिया किसी न किसी का पक्ष लेगी और युद्ध की बात करेगी तो यह नहीं हो सकेगा। उस स्थिति में युद्ध लगभग अवश्यंभावी बन जाता है।

राष्ट्रों के परिवार के एक सदस्य के रूप में हम नहीं चाहते हैं कि हम उस सदस्यता के किसी भी दायित्व या बोझ को वहन करने से बचें। हमने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सदस्यता के सभी उत्तरदायित्वों को पूरी तरह स्वीकार किया है और हम उनका वहन करने की इच्छा रखते हैं। हम साझी ज़िम्मेदारी में अपना पूरा योगदान करना चाहते हैं और चाहते हैं कि हमारी सेवा का पूरा उपयोग हो। लेकिन यह कार्य प्रभावी ढंग से तभी किया जा सकता है जब हम इसे अपने ढंग से और अपने तरीके से करें। हम लोकतांत्रिक तौर-तरीकों में गहरी आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर लोकतंत्र के दायरे का विस्तार हो, क्योंकि कोई भी लोकतंत्र अभाव, गरीबी और असमानता की स्थितियों में ज़्यादा समय तक टिक नहीं सकता है। हमारे लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार और हमारे लोगों के जीवन के स्तर को बेहतर बनाना हमारी तात्कालिक आवश्यकताएं हैं। इन लक्ष्यों की प्राप्ति में हम जितने अधिक कामयाब होंगे, विश्व शांति के लिए हम उतना ही अधिक योगदान कर सकेंगे। हमें अपनी कमियों और विफलताओं का पूरी तरह से अहसास है और हम दूसरों से बेहतर होने का दावा नहीं करते; लेकिन हम नहीं चाहते कि हमारी वर्तमान असम्बद्धता से हमें जो लाभ हैं वे खत्म हो जाएं। हम मानते हैं कि यह असम्बद्धता केवल हमारे हित में ही नहीं है बल्कि विश्व शांति और स्वतंत्रता की दृष्टि से भी लाभदायक है। शांति के लिए खतरा उत्पन्न होने की स्थिति में यह असम्बद्ता न तो दूसरों को अलग-थलग करने का स्वरूप लेती है, न उदासीनता या तटस्थता बनती है। जब मानव की स्वतंत्रता या शांति खतरे में हो तो न तो हम तटस्थ रह सकते हैं और न रहेंगे; उस स्थिति में तटस्थ रहना उन सिद्धान्तों के साथ विश्वासघात होगा जिनके लिए हमने संघर्ष किया और जिनके समर्थन में हम खड़े हैं।

यदि हम शांति सुनिश्चित करना चाहते हैं तो हमें केवल लक्षणों का उपचार करने के बजाए युद्ध के मूल कारणों का निराकरण करना होगा। आधुनिक विश्व में युद्ध के बुनियादी कारण कौन-कौन से हैं?

एक बुनियादी कारण तो किसी एक देश द्वारा दूसरे देश पर आधिपत्य या आधिपत्य जमाने का प्रयास है। हाल के समय तक एशिया के एक बड़े भूभाग पर विदेशी और मुख्यतः यूरोपीय शक्तियों का शासन था। हम स्वयं और पाकिस्तान, सीलोन और बर्मा भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा थे। अभी भी कुछ ऐसे भू-क्षेत्र हैं जहाँ फ्रांस, हॉलैंड और पुर्तगाल का शासन है। लेकिन राष्ट्रवाद और स्वातंत्र्य प्रेम की उठती लहर ने एशिया में अधिकांश पश्चिमी साम्राज्यों को डुबो दिया है। मैं आशा करता हूँ कि इंडोनेशिया भी जल्दी ही एक स्वतंत्र सम्प्रभु देश बन जाएगा। हम यह आशा भी करते हैं कि शीघ्र ही फ्रांसीसी हिंद-चीन को भी स्वतंत्रता मिल जाएगी और जल्दी ही वहाँ की अपनी चुनी हुई सरकार के नेतृत्व में शांति की स्थापना होगी। लेकिन अफ्रीका का बहुत सा भाग विदेशी ताकतों के अधीन है, जिनमें से कुछ ताकते अभी भी अपने आधिपत्य क्षेत्र का विस्तार करने का प्रयास कर रही हैं। यह बात स्पष्ट है कि साम्राज्यवाद के सभी बचे हुए अवशेषों को खत्म करना होगा।

दूसरे, जातीय सम्बंधों की भी समस्या है। कुछ जातियों की ज्ञान या आविष्कारों के क्षेत्र में प्रगति, युद्ध और देशों को जीतने की दृष्टि से उन्हें मिली सफलता के कारण उन्हें यह गुमान हो गया है कि जाति की दृष्टि से वे दूसरों से श्रेष्ठ हैं जिसकी वजह से वे दूसरे राष्ट्रों को हिकारत की दृष्टि से देखते हैं। यहूदियों को खत्म करने का भयावह प्रयास, जो बड़ी हद तक सफल हुआ था, इसका ताज़ा उदाहरण है। एशिया और अफ्रीका में इस जातीय श्रेष्ठता का प्रदर्शन सबसे व्यापक और अक्खड़ ढंग से किया गया है। इस बात को भुला दिया जाता है कि लगभग सभी महान धर्मों का उदय पूर्व में ही हुआ था और वहाँ महान सभ्यताएं उस समय फल-फूल रही थीं जब यूरोप और अमेरिका का इतिहास में कोई उल्लेख ही नहीं था। पश्चिम ने एशियाई और अफ्रीकी लोगों को अक्सर तिरस्कृत किया है और कई स्थानों में अभी भी अधिकारों की समानता से वंचित तो रखा ही जाता है, उन्हें सामान्य मानवीय और सदय व्यवहार से भी महरूम रखा जाता है। हमारे आधुनिक विश्व के लिए यह एक बड़ा खतरा है; और अब जब एशिया और अफ्रीका अपनी उस अकर्मण्यता की तंद्रा से बाहर निकल रहे हैं, इस बुराई के कारण ऐसी आग लग सकती है जिसके परिणामों की कल्पना कोई नहीं कर सकता है। आपके यहाँ के एक महापुरुष ने कहा था कि यह देश आधे गुलामों और आधे स्वतंत्र लोगों की स्थिति में नहीं चल सकता है। यदि आधे लोगों को गुलाम बना कर रखा जाए और उन्हें तिरस्कृत किया

जाए तो दुनिया में शांति अधिक समय तक कायम नहीं रह सकती है। यह समस्या इतनी आसान नहीं है कि इसे कोई प्रस्ताव या आदेश पारित करके हल किया जा सके। जब तक इसे हल करने के लिए दृढ़ता से और ईमानदारी से प्रयास नहीं किए जाएंगे, शांति नहीं होगी। बहुत देशों, विशेषतः एशिया और अफ्रीका के देशों में लाखों लोगों की दरिद्रता और अभाव युद्ध और विद्रोह का तीसरा कारण हैं। हालाँकि पश्चिम में युद्ध ने बड़ी दरिद्रता और कठिनाइयों को जन्म दिया है, लेकिन फिर भी वहाँ का व्यक्ति सामान्यतः कुछ हद तक आराम का जीवन जीता है – उसे रोटी, कपड़ा और मकान की सुविधा कुछ हद तक उपलब्ध है। इसलिए पूर्व की बुनियादी समस्या यह है कि वहाँ के लोगों को जीवन की ये बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। जब इनका अभाव होता है तो निराशाजनित उदासीनता बढ़ती है या विद्रोह का विध्वंकारी रोष जन्म लेता है। यदि हमें शांति सुनिश्चित करनी है तो हमें राजनैतिक अधीनता, जातीय असमानता, आर्थिक असामनता और गरीबी को दूर करना होगा। यदि हम इनका कोई समाधान नहीं कर पाएंगे तो दूसरे लोगों के स्वर और नारे लोगों के मन को आकर्षित करेंगे।

एशिया के बहुत से देश राष्ट्रों के इस परिवार में शामिल हो चुके हैं; हम आशा करते हैं कि बाकी देश भी जल्दी ही इसमें अपना स्थान पा लेंगे। अफ्रीका के देशों के लिए भी हम यही कामना करते हैं। इस प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए और अमेरिका तथा यूरोप को इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए अपने प्रभाव और शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। हम देख रहे है कि यह व्यापक बदलावों का दौर है, बदलाव केवल राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि लोगों के मन में भी हो रहे हैं। एशिया में एक बार फिर स्फूर्ति का संचार हुआ है और वह प्रगति की राह पर आगे बढ़ने और अपने विशाल जनसमूहों के आर्थिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए तत्पर है। एक विशाल महाद्वीप में आई यह जागृति मानवता के महत्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसके लिए उत्कृष्ट और विचारशील राजकौशल की आवश्यकता है। यदि हममें से कोई भी इसे भय या अलगाववाद की दृष्टि से देखेगा तो उससे जागृति की वे समस्याएं हल नहीं होंगी। इसके लिए स्नेहपूर्ण और सूझबूझयुक्त दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होगी, उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए स्पष्ट और साझे लक्ष्य तय करने होंगे। आज बहुत से राष्ट्रों के बजटों में हथियारों पर ऊर्जा और संसाधनों की विशाल राशि को खर्च किया जाता है, लेकिन उसके बावजूद विश्व शांति की समस्या को हल नहीं किया जा सका है। सम्भवतः यदि उस परिव्यय का एक छोटा सा अंश भी किसी और ढंग से और किन्ही अन्य उद्देश्यों के ले खर्च किया जा सके, तो हम शांति और सुख का कहीं अधिक स्थायी आधार तैयार कर पाएंगे।

यह भारत का दृष्टिकोण है, जिसे पूरे मित्रभाव से सभी विचारशील महिलाओं और पुरुषों, सद्भाव रखने वाले सभी व्यक्तियों के सामने हमारी साझी मानवता के हित में प्रस्तुत किया गया है। यह दृष्टिकोण कल्पित अभिलाषाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि हम सभी को प्रभावित करने वाली समस्याओं के बारे में गहन चिन्तन पर आधारित है, और इसके गुणदोषों के आधार पर मैं इसे आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

महोदय, मैं कुछ बातें और कहना चाहूँगा। आपकी कही हुई बातों ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, पिछले प्रशंसात्मक उल्लेख में आपने मेरे बारे में जिन बातों का उल्लेख किया, और आपकी बातों को मैंने बड़ी विनम्रतापूर्वक सुना है।

आपकी प्रतिष्ठित अध्यक्षता में जो दृश्य मैं आज यहाँ देख रहा हूँ उसकी स्मृति लम्बे समय तक मेरे साथ रहेगी। निश्चिय ही मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि मैं कभी उसे भुला दूँगा। मैं इस दृश्य को याद रखूँगा और उससे भी बढ़कर मैं आपके उस सौजन्य और उदारता को याद रखूँगा जो आपने मुझे यहाँ बुलाकर और मुझे अपने इस समूह का हिस्सा बना कर प्रदर्शित की है।

मैं आपके साथ इस महान विश्वविद्यालय का सह-सदस्य होने के इस सम्मान को मुझे अब तक दिए गए दूसरे सम्मानों से अधिक संजोकर रखूँगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर तो इस सम्मान को संजोकर रखूँगा ही, किन्तु चूँकि यह सम्मान सम्भवतः केवल एक व्यक्ति का ही सम्मान नहीं है, बल्कि इस दौरान आपने मुझे भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक के रूप में भी सम्मानित किया है। और इसलिए महोदय, मैं कुछ देर के लिए अपने आप को भुलाकर अपने देश और अपने देशवासियों की ओर से आपके प्रति आभार प्रकट करता हूँ।

कोलम्बिया विश्विविद्यालय में 17 अक्तूबर, 1949 को डिग्री ऑफ लॉज़ से सम्मानित किए जाने के अवसर पर दिया गया भाषण