नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



जैसा कि सदन को ज्ञात है, एक प्रस्ताव है कि भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका में चीनी नागरिकों के सम्बंध में कुछ जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए। मैं समझता हूँ कि यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी भारत मुश्किलों के समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। अक्सर यह भूमिका सार्वजनिक नहीं होती थी, बल्कि सम्बंधित पक्षों के अनुकूल विनीत भूमिका होती थी। इससे विवाद में शामिल पक्षों को एक-दूसरे के नज़दीक लाने में सहायता मिली है। लेकिन हमने कभी भी न तो मध्यस्थ बनने का प्रयास किया है और न ही मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है। ‘मध्यसथ’ शब्द की चर्चा अक्सर होती है। लेकिन बड़े देशों के बीच मध्यस्थता करने का कोई प्रश्न नहीं है। हमने केवल इतना भर करने का प्रयास किया है कि बड़े देश एक-दूसरे के सामने बैठें, आपस में वार्ता करें और अपनी समस्याओं को स्वयं हल करें। उन्हें यह सलाह देना हमारा काम नहीं है कि उन्हें क्या करना चाहिए। हम अधिक से अधिक इतना ही कर सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में उत्पन्न हुई कुछ बाधाओं को दूर कर दें।

इस सम्बंध में भारत के योगदान को सम्भवतः एक या दो शब्दों, पंचशील, और उसमें अन्तर्निहित विचारों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है। इन विचारों में कोई नई बात नहीं है सिवाय इस बात के कि इनका प्रयोग एक विशेष संदर्भ में किया गया है। और इस सदन ने अनुभव किया होगा कि जबसे शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के इन विचारों का पहली बार उल्लेख किया गया और इन्हें प्रचारित किया गया, तब से न केवल विश्व भर में इनका प्रसार हुआ है और अधिक से अधिक देश इनसे प्रभावित हुए हैं, बल्कि उत्तरोत्तर इनकी गम्भीरता और महत्व भी बढ़ा है। यानी, एक सामान्य अर्थ में प्रयोग किए जाने वाले पंचशील शब्द को विश्व मामलों में अब एक विशिष्ट अर्थ और महत्व दिया जाने लगा है।

मैं समझता हूँ कि शांतिपूर्ण समाधान, और उससे भी बढ़कर, अहस्तक्षेप की इस अवधारणा को प्रसार करने का कुछ श्रेय हमें लेना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है कि प्रत्येक देश दूसरे देशों के मामलों में हस्तक्षेप किए बिना अपनी नियति का निर्धारण करे, हालाँकि इसमें कोई नई बात नहीं है। महान सत्य नए नहीं हो सकते हैं। लेकिन यह बात सच है कि अहस्तक्षेप जैसे विचार पर अधिक बल दिए जाने की आवश्यकता है क्योंकि पिछले कुछ समय से बड़े देशों में दूसरों के मामलों में दखल देने, उनपर दबाव बनाकर अपनी बात मनवाने की प्रवृत्ति जागृत हुई है, और वे अपेक्षा करते हैं कि दूसरे देश इसमें उनका साथ दें। मैं समझता हूँ कि बड़े देश होने के कारण यह उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। इतिहास में ऐसा होता ही रहा है।

आज की वैश्विक स्थिति में किसी भी प्रकार के अहस्तक्षेप – राजनैतिक, आर्थिक या वैचारिक – का बड़ा महत्व है। यह बात बहुत प्रासंगिक नहीं है कि उस पर पूरी तरह से अमल न करके उसे कहीं-कहीं ही लागू किया जाएगा। आप कोई कानून पारित करते हैं, और वह कानून धीरे-धीरे पूरे देश के जीवन पर अपना प्रभाव डालता है, हालाँकि यह हो सकता है कि कुछ लोग उसका पालन न करें। जो लोग उसे नहीं मानते हैं वे भी धीरे-धीरे उसके दायरे में आ जाते हैं।

पंचशील की अवधारण यह है कि आगे बढ़ने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, सम्भवतः दृष्टिकोण भी अलग हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर अन्तिम ध्येय समान ही रहते हैं। यदि मैं एक दूसरे सादृश्य का प्रयोग करके कहूँ तो सत्य किसी एक देश या समुदाय तक ही सीमित नहीं होता है; उसके इतने सारे पहलू हो सकता हैं कि किसी के लिए यह कहना उचित नहीं होगा कि वह सम्पूर्ण सत्य को जानता है, और हर देश और हर समुदाय, यदि वह अपने प्रति सच्चा है, उसे अपनी गलतियों से सीखते हुए, कष्ट उठाते और अनुभव इकट्ठा करते हुए अपना मार्ग स्वयं खोजना होता है। यदि वह दूसरों की नकल करे, तो परिणाम यह हो सकता है कि उसका विकास रुक जाए। और यदि वह नकल भी बहुत अच्छी तरह से कर ले तब भी उसका प्रयास मन के विकास की सामान्य प्रक्रिया वाला नहीं होगा जोकि उसके विकास का अभिन्न अंग होना चाहिए।

पिछले लगभग तीस वर्षों तक हमारा विकास महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुआ है। उन्होंने हमारे लिए जो कुछ किया या जो नहीं किया, उसके बावजूद उनके नेतृत्व में इस देश का विकास सहज ढंग से हुआ है। वह भारत की भावना और दृष्टिकोण के अनुरूप था। फिर भी वह आधुनिक विश्व से अलग-थलग नहीं था, और हम आधुनिक विश्व के अनुरूप थे। अपने आप को ढालने की यह प्रक्रिया चलती रहेगी। यह प्रक्रिया भारत की सोच और भावना से उद्भूत है, हालाँकि बाहर से सीखी हुई बहुत सी बातें भी उस पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं। उसी प्रकार, पंचशील की यह धारणा एक महत्वपूर्ण वास्तविकता पर बल देती है कि प्रत्येक देश को अपनी व्यवस्था स्वयं करनी चाहिए। मैं यहाँ सैन्य बन्दोबस्त की दृष्टि से बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मैं यहाँ बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक प्रयासों और दूसरों के विचारों के लिए उदार दृष्टि रखने और उनके अनुभव से सीखने की बात कर रहा हूँ। प्रत्येक देश को दूसरे देश के ऐसे प्रयास के प्रति किसी प्रकार का हस्तक्षेप किए बिना या अपने विचार उस पर थोपे बिना सहानुभूतिपूर्ण और अनुकूल दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

भारत ने इसी भूमिका को निभाया है। यह भूमिका कितनी भी छोटी क्यों न हो, पिछले कुछ वर्षों में हमने जिस सामान्य नीति को अपनाने का प्रयास किया है उसे दूसरे देशों में सराहा गया है। हो सकता है कि इस नीति को सभी ने स्वीकार न किया हो, निश्चित तौर पर ऐसा नहीं हुआ है; कुछ देशों ने इसकी कुछ बातों पर असहमति जताई है या पूरी नीति को ही अस्वीकार किया है। लेकिन भारत की नीति की सच्चाई में धीरे-धीरे विश्वास बढ़ा है। इस बात की मान्यता बढ़ी है कि यह एक ईमानदार नीति है जो मूलतः सद्भावना और दूसरे देशों के प्रति सहयोग भाव पर आधारित है, और उसमें किसी भी देश के प्रति द्वेष का भाव नहीं हैं।

लोकसभा में दिए गए भाषण से उद्धृत, 17 सितम्बर, 1955