नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



“राष्ट्रपति जवाहरलाल की जय !” प्रतीक्षा करती हुई भीड़ के बीच से तेज़ी से गुजरते हुए राष्ट्रपति ने सिर उठाकर देखा, उनके हाथ उठे और नमस्कार की मुद्रा में जुड़ गये, और उनका पीला, दृढ़ चेहरा एक मुस्कान से प्रदीप्त हो गया। यह मुस्कान उनकी अपनी भावुकता की परिचायक थी, और जिन लोगों ने उसे देखा, उनपर इसका तुरन्त प्रभाव पड़ा, और उन्होंने भी प्रसन्नमुख होकर जय-ध्वनि की।

मुसकान आयी और गयी और फिर चेहरा कठोर और उदास हो गया, मानो उस भावना का जिसे उसने उपस्थित जन-समूह में जागृत किया था, उसपर प्रभाव ही न हो। प्रायः ऐसा प्रतीत हुआ कि उस मुस्कान और उसके साथ की मुद्रा में विशेष वास्तविकता नहीं है; यह सब उस जन-समूह की सदिच्छा प्राप्त करने का एक बनावटी ढंग मात्र था, जिसने कि उसे हृदय में बिठा रक्खा था। क्या यह अनुमान ठीक था ?

जवाहरलाल को फिर से ध्यान से देखिए। एक लंबा जुलूस है और दसियों हजार आदमी उनकी मोटर गाड़ी को घेरे हुए हैं और बे-सुध-से उनकी जयध्वनि कर रहे हैं। वह अपनी मोटर की गद्दी पर, अपने को ख़ूब सँभालतेहुए सीधे तनकर खड़े हो जाते हैं; देखने में लम्बे लगते हैं और एक देवता की भाँति शान्त, और वह अपार जन-समूह से अविचलित है। अचानक फिर वही मुसकान, या एक उन्मुक्त हँसी दीखती है, तनाव टूटता है और भीड़ भी उन्हीं के साथ हँस पड़ती है- बिना यह जाने हुए कि वह किस बात पर हँस रही है। अब वह देवता-स्वरूप नहीं रह जाते, बल्कि इंसान बन जाते है, और जिन हज़ारों व्यक्तियों के बीच वह घिरे हुए हैं उनसे एक अपनापा और संगी का रिश्ता क़ायम करते हैं, और जनसमूह गद्गद हो जाता है और मैत्री-भाव से उन्हें अपने हृदय में स्थान देता है। लेकिन मुस्कान लुप्त हो गयी है और फिर वही पीला और दृढ़ चेहरा दिखाई पड़ रहा है।

क्या यह सब-कुछ स्वाभाविक है, या एक सार्वजनिक नेता का स्वांग मात्र है ? शायद दोनों ही बातें है और लम्बे अभ्यास ने स्वभाव का रुप ग्रहण कर लिया है। सबसे प्रभावशाली मुद्रा वह है जिसमें मुद्रा का आभास न मिले, और जवाहरलाल ने बिना रंग और बुकनी लगाये हुए अभिनय करने की कला खूब सीख ली है। लापरवाही और बेलौसी के दिखावे के साथ वह सार्वजनिक नाट्य मंच पर बड़ा कुशल और कला-पूर्ण अभिनय करते हैं। यह सब उन्हें और उनके देश को कहां ले जाएगा? इस अन्यमनस्कता के दिखावे की तह में आखिर उनका उद्देश्य क्या है? इस छद्म मुद्रा के पीछे उनकी क्या इच्छाएँ, कैसी शक्तिलालसा और क्या अतृप्त आकांक्षाएँ हैं ?

हर हालत में यह प्रश्न मनोरंजक है, क्योंकि जवाहरलाल का ऐसा व्यक्तित्व है कि वह बरबस अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। लेकिन हमारे लिए इन प्रश्नों का गहरा महत्व भी है, क्योंकि जवाहरलाल का वर्तमान हिन्दुस्तान और संभवतः आनेवाले हिन्दुस्तान में एक अटूट नाता है और उनमें यह शक्ति है कि वह हिन्दुस्तान का बहुत भला भी कर सकते हैं और उतना ही बुरा भी। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर हमें ढूँढ़ने हैं।

करीब दो साल से वह कांग्रेस के सभापति हैं और कुछ लोगों का ख़याल है कि वह कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के पिछ-लगुए मात्र हैं और दूसरों के रोक-दबाव में चलनेवाले हैं। फिर भी वह अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और जनता तथा सभी तरह के लोगों पर अपना प्रभाव बराबर दृढ़तापूर्वक बढ़ाते ही जा रहे हैं। वह किसान और कमकर, व्यापारी और फेरीवाले, ब्राह्मण और अछूत, मुस्लिम, सिख, पारसी, ईसाई, यहूदी, इन सब तक पहुँुंचते हैं जो कि भारतीय जीवन की विविधता के अंग हैं। जिस भाषा में वह इन सब से बोलते हैं वह औरोंकी भाषा से कुछ हट कर है, और वह सदा इन सब को अपने पक्ष में लाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। इस अवस्था में भी वह बड़ी स्फूर्ति के साथ हिन्दुस्तान जैसे विशाल देश में सर्वत्र पहुंचते रहे हैं और सभी जगह अद्भुत लोकप्रियता से उनका स्वागत हुआ है। उत्तर से लेकर कन्या कुमारी तक, एक विजयी सीज़र की भाँति उन्होंने यात्रा की है, और जहाँ जहाँ वह गये हैं, उन्होंने अपने यश की कथाएं छोड़ी हैं। क्या यह सब केवल उनका शौक़ दिल-बहलाव है, या इसमें कोई गहरी चाल है, या यह केवल किसी ऐसी शक्ति का खेल है जिसे वह आप नहीं समझ पाते हैं? अथवा क्या यह उनकी शक्ति-लालसा है, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी ‘आत्मकथा’ में किया है और जो कि उन्हें एक जनसमूह से दूसरे जनसमूह की ओर प्रेरित करती है और उनसे अपने आपसे चुपके से कहलाती है कि :

“मैंने इन जनधाराओं को अपने हाथों में समेट कर अपनी इच्छा-शक्ति को नक्षत्रों द्वारा आकाश के आर-पार अंकित किया है”

अगर उनकी धुन बदल जाए तो क्या हो? जवाहरलाल जैसे लोगों पर-उनमें बड़े और अच्छे कामों को करने की चाहे जैसी शक्ति हो-जनसत्तात्मक व्यवस्था में भरोसा नहीं किया जा सकता । वह अपने को जनतावादी और समाजवादी कहते हैं, और इसमें संदेह नहीं कि वह सच्चे उत्साह से ऐसा कहते हैं, फिर भी हरएक मनोवैज्ञानिक जानता है कि मस्तिष्क अन्त में हृदय का गु़लाम होता है और तर्क को तो सदा घुमाकर मनुष्य की अदम्य प्रेरणाओं और इच्छाओं के अनुकूल बनाया जा सकता है। तनिक-सी उमेठ काफ़ी है और जवाहरलाल एक तानाशाह बन सकते हैं और धीमी गति से चलनेवाली जनसत्ता के आडम्बरों को ठुकरा सकते हैं। जनतावाद और समाजवाद की भाषा और नारों को वह भले ही अपनाये रहें, लेकिन हम सभी जानते हैं कि इस प्रकार की भाषा पर फ़ासिस्टवाद भी पला और पुष्ट हुआ है, और बाद में उसने इसे व्यर्थ के कचरे की भाँति अलग फेंक दिया है।

विश्वास और स्वभाव से जवाहरलाल निश्चय ही फ़ासिस्ट नहीं हैं, उनमें ऊँचे घरानेवालों की सहज बुद्धि इतनी पर्याप्त है कि फ़ासिस्टवाद के भोंडेपन और गँवारुपन को वह सहन न करेंगे। उनकी मुखाकृति और स्वर बताते हैं कि :

“सार्वजनिक स्थानों में घरेलू मुखाकृतियाँ जितनी आकर्षक और सुन्दर दिखती है, सार्वजनिक मुखाकृतियाँ घरों के भीतर उतनी सुन्दर और अच्छी नहीं लगतीं।”

फ़ासिस्ट मुखाकृति एक बनावटी मुखाकृति है और वह घर-बाहर कहीं भी अच्छी नहीं लगती। जवाहरलाल के चेहरे और स्वर में निश्चय ही घरेलूपन है। इ़स बात में कोई धोखा नहीं हो सकता कि जन-समूह में और सार्वजनिक सभाओं में भी उनके बोलने का ढंग एक आत्मीयता लिए हुए होता है। ऐसा जान पड़ता है कि वह अलग-अलग व्यक्तियों से निजी और घरेलू ढंग से बातें कर रहे हों। उनकी बातों को सुन कर और उनके संवेदनशील चेहरे को देख कर मन में कौतूहल होता है यह जानने का कि इन सबके पीछे कौन-से विचार और इच्छाएँ हैं जो काम कर रही हैं, कैसी जटिल और दबी हुई मनोवृतियाँ, कैसे दमन किए हुए और शक्ति में परिवर्तन आवेग, क्या आकांशाएँ हैं, जिन्हें कि वह अपने से भी स्वीकार करने का साहस नहीं कर सकते। सार्वजनिक भाषण देते समय विचारों का क्रम उन्हें बाँंधे हुए रहता है, लेकिन दूसरे अवसरों पर उनकी आकृति उनका भेद खोल देती है; क्योंकि उनका मन भटक कर नए क्षेत्रों, नयी कल्पनाओं में पहुंच जाता है और एक क्षण के लिए अपने साथ के व्यक्ति को भूल कर अपने मस्तिष्क द्वारा कल्पित पात्रों से मानों चुपके-चुपके बातें करने लगते हैं। क्या वह उन मानवी सम्पर्कों के विषय में सोचते हैं जिन्हें कि अपनी जीवनयात्रा में-जो कि कठिन और तूफ़ानी रही है-उन्होंने खो दिया है लेकिन जिनकी वह कामना करते हैं? या वह एक स्वनिर्मित भविष्य और उसके संघर्ष तथा उसमें प्राप्त विजय का स्वप्न देखते हैं? इतना तो उन्हें जानना चाहिए कि जो रास्ता उन्होंने चुना है, उसमें विश्राम नहीं है, किनारे बैठ कर दम लेने का अवसर नहीं है और विजय-प्राप्ति भी और अधिक भार डाल देती है। जैसा कि लारेंस में अरब वालों से कहा था- “विद्रोहियों के लिए विश्रामगृह कहाँ, न उनके लिए आनन्द के अवसर आते हैं।” सार्वजनिक भाषण देते समय विचारों का क्रम उन्हें बाँंधे हुए रहता है, लेकिन दूसरे अवसरों पर उनकी आकृति उनका भेद खोल देती है; क्योंकि उनका मन भटक कर नए क्षेत्रों, नयी कल्पनाओं में पहुंच जाता है और एक क्षण के लिए अपने साथ के व्यक्ति को भूल कर अपने मस्तिष्क द्वारा कल्पित पात्रों से मानों चुपके-चुपके बातें करने लगते हैं। क्या वह उन मानवी सम्पर्कों के विषय में सोचते हैं जिन्हें कि अपनी जीवनयात्रा में-जो कि कठिन और तूफ़ानी रही है-उन्होंने खो दिया है लेकिन जिनकी वह कामना करते हैं? या वह एक स्वनिर्मित भविष्य और उसके संघर्ष तथा उसमें प्राप्त विजय का स्वप्न देखते हैं? इतना तो उन्हें जानना चाहिए कि जो रास्ता उन्होंने चुना है, उसमें विश्राम नहीं है, किनारे बैठ कर दम लेने का अवसर नहीं है और विजय-प्राप्ति भी और अधिक भार डाल देती है। जैसा कि लारेंस में अरब वालों से कहा था- “विद्रोहियों के लिए विश्रामगृह कहाँ, न उनके लिए आनन्द के अवसर आते हैं।” जवाहरलाल के लिए आनन्द के अवसर न हों लेकिन यदि भाग्य ने साथ दिया तो इससे बड़ी चीज़ उन्हें मिल सकती है-अर्थात् जीवन के उद्देश्य की सिद्धि।

जवाहरलाल फ़ासिस्ट नहीं बन सकते। फिर भी वह सभी संयोग उपस्थित है जिनसे तानाशाह बना करते हैं-महान् लोकप्रियता, एक सुनिश्चित उद्देश्य के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, स्फूर्ति, गर्व, संगठनशक्ति, योग्यता, कड़ाई; और जनता के प्रति उनका चाहे जितना प्रेम हो, उनमें दूसरों के प्रति एक असहिष्णुता है और कमज़ोरों और अयोग्यों के प्रति एक घृणा का भाव है। उनके क्रोध के आवेगों से लोग भली भाँंति परिचित हैं; वह उस पर क़ाबू भले ही पा लें, उनके होठों की फड़क उनका भेद खोल देती है। काम को पूरा कराने की, जो कुछ नापसन्द हो उसे मिटा कर नया निर्माण करने की उनकी प्रगल्भ इच्छा अधिक समय तक जनतावाद के धीमी गति से चलने वाले व्यापारों से मेल नहीं खा सकती। बाहरी रूप-रेखा को क़ायम रखते हुए वह अवश्य अपनी इच्छाशक्ति से उसे झुकाना चाहेंगे। साधारण वातावरण में वह एक सुयोग्य और सफल कार्य-संचालक होने की क्षमता रखते हैं, लेकिन इस क्रान्ति के युग में तानाशाही आगे खड़ी रहती है और क्या यह सम्भव नहीं कि जवाहरलाल अपने को एक तानाशाह समझने लग जायँ ?

यह बात जवाहरलाल के लिए और हिन्दुस्तान के लिए भयावह होगी, क्योंकि तानाशाही के जरिये हिन्तुस्तान स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त कर सकता। एक सुयोग्य और उदार तानाशाही के अधीन वह चाहे थोड़ा-बहुत पनप ले, लेकिन वास्तव में वह दबा रहेगा और उसके निवासियों को ग़ुलामी से उद्धार पाने में विलम्ब लग जाएगा।

एक साथ दो बरस तक जवाहरलाल कांग्रेस के राष्ट्रपति रहे हैं और कई प्रकार से उन्होंने अपने को कांग्रेस के लिए इतना जरूरी बना लिया है कि बहुत-से लोगों का सुझाव है कि यह तीसरी बार फिर राष्ट्रपति चुने जायँ। लेकिन हिन्दुस्तान और खुद जवाहरलाल के हक़ में इससे बड़ी असेवा न होगी। उन्हें तीसरी बार चुन कर हम यह दिखावेंगे कि व्यक्ति-विशेष को हम कांग्रेस से बड़ा मानते हैं और इस प्रकार हम जनता के विचारों को सीज़रशाही के पथ में प्रवृत्त करेंगे। स्वयं जवाहरलाल में हम ग़लत प्रवृतियों को उभारेंगे और उनकी अहम्मन्यता और गर्व को बढ़ावेंगे। उन्हें विश्वास हो जाएगा कि एकमात्र वही इस भार को सँभाल सकते हैं या हिन्दुस्तान की समस्याओं को सुलझा सकते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पदों के प्रति ज़ाहिर में अपनी बेरुखी दिखाने के बावजूद पिछले सत्रह वर्षों से वह कांग्रेस में एक न एक महत्वपूर्ण पद थामे रहे हैं। वह सोचने लगेंगे कि उनके बिना लोगों का काम न चलेगा और किसी को भी यह सोचने देना, चाहे वह जितना बड़ा व्यक्ति हो, ठीक नहीं। उनके लगातार तीसरी बार कांग्रेस का राष्ट्रपति बनने में हिन्दुस्तान का हित नहीं है।

इस तरह के विचार के लिए एक व्यक्तिगत कारण भी हो सकता है। यद्यपि वह बहादुरी से काम में लगे हैं फिर भी यह स्पष्ट है कि जवाहरलाल थक गये हैं और बांसी पड़ गये हैं। और अगर वह राष्ट्रपति बने रहे तो और भी ढ़ल जायँगे। उन्हें दम मारने का अवसर यों भी नहीं मिल सकता, क्योंकि शेर की सवारी करने वाले को काठी छोड़ने का कहाँ मौक़ा मिलता है। फिर भी हम उन्हें गर्व से बहकने से और बहुत भार तथा जिम्मेदारी में पड़ कर मानसिक शक्ति-क्षय से रोक सकते हैं। भविष्य में उनके अच्छे कामों की आशा रखने का हमें हक़ है। हमें कोई काम ऐसा न करना चाहिए जिससे इस आशा पर संकट आवे। न हमें उनको ही अति-प्रशंसा द्वारा बिगाड़ना चाहिए। उनमें जो भी अहम्मन्यता है, बहुत है। उसे रोकना चाहिए। हमें सीज़रों की आवश्यकता नहीं है।

  • 5 October 1937. J.N. Papers, N.M.M.L. Jawaharlal later appended the following note to this article: “This article was written by Jawaharlal Nehru, but it was published anonymously in The Modern Review of Calcutta, November 1937. ‘Rashtrapati' is a Sanskrit word meaning Head of the State. The title is popularly used for President of the Indian National Congress. Chanakya was a famous Minister of Chandragupta, who built an empire in north India in the fourth century B.C., soon after Alexander’s raid on India. Chanakya is the prototype of Machiavelli."

  • Victory to President Jawaharlal.