नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



सोलह वर्ष पहले हमने इस कांग्रेस को उच्च वर्ग के बीच अशक्त तरीके से काम कर रही एक निष्प्रभावी संस्था से बदलकर एक शक्तिशाली लोकतांत्रिक संगठन का रूप दिया था जिसकी जड़ें भारत की भूमि पर और वहाँ रह रहे बड़ी संख्या में लोगों के बीच फैली हों। एक ऐसे युग और वर्ग जिसके दिन अब लद चुके, का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे चंद मुट्ठी भर मित्र, जो इस लोकतांत्रिक अभ्युत्थान से भयभीत थे, और उन्होंने देश को आन्दोलित करने और स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाली नई ताकतवर अत्यावश्यक शक्तियों का साथ देने के बजाए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शरण में जाना बेहतर समझा। ऐतिहासिक दृष्टि से बीते समय में विलीन हो चुके। लेकिन हमने उन शक्तियों की गड़गड़ाहट को सुना और हम कुछ समय के लिए उनके साथ हो गए और हमने वर्तमान इतिहास में एक सुयोग्य भूमिका निभाई। हमने इस नई जनभावना, लम्बे समय तक गुलामी से मुक्त होने के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर बचने के उपाय की अभिव्यक्ति को समझा; हमने उन मानसिक बेड़ियों को तोड़ने की इस प्रक्रिया के गर्व को अनुभव किया। हमें इस बात की खुशी हुई कि हम जनमानस और विश्व शक्तियों की भावनाओं के अनुरूप कार्य कर रहे हैं और यह अनुभव हुआ कि हम इतिहास की नियति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं।

भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष और विश्व की स्थिति

हम अपने राष्ट्रीय संघर्ष में व्यस्त थे और इस संघर्ष ने जो मोड़ लिया उस पर हमारे महान नेता और हमारी राष्ट्रीय प्रकृति की स्पष्ट छाप थी। तब हमें शायद ही इस बात का खयाल था कि बाहर क्या चल रहा है। लेकिन फिर भी हमारा संघर्ष स्वतंत्रता के लिए एक व्यापक संघर्ष का हिस्सा था, और हमें प्रेरित करने वाली शक्तियाँ दुनिया भर में लाखों लोगों को भी सक्रिय होने के लिए प्रेरित कर रही थीं। भूमध्यसागरीय क्षेत्र से लेकर सुदूर पूर्व तक, इस्लामी पश्चिम से लेकर बौद्धवादी पूर्व तक एशिया जाग चुका था; अफ्रीका ने भी इस नई भावना का समर्थन किया; युद्ध के हाथों टूटा हुआ यूरोप एक नया संतुलन तलाश करने की कोशिश कर रहा था। और यूरोप तथा एशिया भर में, सोवियत क्षेत्रों में, मानव स्वतंत्रता और सामाजिक समानता की एक नई अवधारणा अनेक प्रकार की विरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी। स्वतंत्रता की इस लड़ाई के कई पहलुओं की दृष्टि से दुनिया भर में अनेक प्रकार की मतभिन्नताएं थीं और इन्होंने हमें भ्रमित भी किया और हम साझी पृष्ठभूमि को नहीं पहचान पाए। फिर भी यदि हम इन भिन्नताओं को समझना चाहते हैं और अपने राष्ट्रीय संघर्ष को बेहतर बनाने के लिए कुछ सीखना चाहते हैं तो हमें स्थिति को समग्रता में समझने का प्रयास करना होगा। और यदि हम ऐसा करेंगे तो हमें अवश्य एक ऐसा मूलभूत सम्बंध दिखाई देगा जो बदलती स्थितियों में भी स्थिर रहता है। यदि हम एक बार इस मूलभूत समानता को समझ लें तो विश्व की स्थिति को समझने में आसानी होगी और अपनी राष्ट्रीय समस्याओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझ सकेंगे। तब हम समझ पाएंगे कि हम भारत को या भारत के लोगों को बाकी दुनिया से अलग नहीं रख सकते हैं।

विश्व युद्ध के बाद की कठिनाइयों के दौर में यूरोप और एशिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन आए और यूरोप में सामाजिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में तेज़ी आई, और एशिया के देशों में एक नए महत्वाकांक्षी राष्ट्रवाद का उदय हुआ। स्थिति में उतार-चढ़ाव आते रहे और ऐसा लगा कि क्रान्ति की भावना पस्त हो चुकी है और स्थिति सामान्य हो रही है। लेकिन आर्थिक और राजनैतिक स्थितियाँ ऐसी थीं कि स्थिति सामान्य नहीं हो सकती थी, मौजूदा व्यवस्था नई परिस्थितियों के अनुसार काम करने के लायक नहीं थी, और ऐसा करने के उसके तमाम प्रयास व्यर्थ और निष्फल रहे। सब जगह झगड़े बढ़े और दुनिया एक गहरे अवसाद में डूब गई और स्थिति लगातार बिगड़ती गई, केवल सुदूर यू.एस.एस.आर. के सोवियत क्षेत्रों को छोड़कर जहाँ दुनिया भर की स्थिति के विपरीत सभी क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति हुई। दो विरोधी आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्थाएं एक दूसरे के आमने-सामने थीं, और कुछ समय तक उन्होंने एक-दूसरे को बर्दाश्त किया, उनके बीच बुनियादी प्रतिस्पर्धा थी और उनके बीच विश्व मंच पर वर्चस्व के लिए होड़ शुरू हो गई। इनमें से एक व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था थी जो अनिवार्यतः बड़े-बड़े साम्राज्यों के रूप में विकसित हुई थी। औपनिवेशिक विश्व के देशों को निगल चुकने के बाद अब ये शक्तियाँ एक-दूसरे को निगल जाने के लिए आमादा थीं। शक्तिशाली लेकिन युद्ध से डरी हुईं, क्योंकि युद्ध से उनकी समृद्धि के लिए खतरा हो सकता था, फिर भी उनके बीच अवश्यंभावी संघर्ष शुरू हो गया और ये शक्तियाँ उत्तेजना के माहौल में युद्ध की तैयारियों में जुट गईं। वे उन समस्याओं का समाधान करने में बिल्कुल अक्षम थीं जिनसे उन्हें खतरा था, और असहाय होकर उन्होंने धीरे-धीरे होने वाले पतन की नियति को स्वीकार कर लिया। दूसरी ताकत यू.एस.एस.आर. की नई समाजवादी व्यवस्था की थी, जो तेज़ गति से प्रगति करती आई थी, हालाँकि अक्सर उसे इस प्रगति की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, और जहाँ पूँजीवादी विश्व की समस्याएं खत्म हो चुकी थीं।

अपने मुश्किल समय में पूँजीवादी व्यवस्था ने फासीवाद का सहारा लिया जिसमें उन सभी बातों का क्रूरतापूर्वक दमन किया गया जिनका पश्चिम की सभ्यता ने प्रत्यक्ष तौर पर समर्थन किया था; अपने कुछ गढ़ों में उसने वह स्वरूप धारण कर लिया जो उसके अधीन औपनिवेशिक देशों में उसका साम्रज्यवादी स्वरूप था। इस प्रकार फासीवाद और उपनिवेशवाद पतनशील पूँजीवाद के दो चेहरे बन गए, और हालाँकि अलग अलग देशों में वहाँ की राष्ट्रीय विशेषताओं और आर्थिक तथा राजनैतिक परिस्थितियों के अनुसार उनमें अन्तर थे, लेकिन वे उन्हीं प्रतिक्रियावादी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे और एक-दूसरे का समर्थन करते थे, साथ ही साथ एक दूसरे से संघर्ष भी करते थे क्योंकि संघर्ष तो उनकी प्रकृति में ही अन्तर्निहित था। पश्चिम के समाजवाद और पूर्वी तथा निर्भर देशों के राष्ट्रवाद ने फासीवाद और उपनिवेशवाद के इस संयुक्त स्वरूप का विरोध किया। स्मरण रहे कि पूर्व का राष्ट्रवाद फासीवादी देशों के अति संकीर्ण राष्ट्रवाद से मूलतः भिन्न था; जहाँ पूर्व का राष्ट्रवाद आज़ादी की पुरानी आकांक्षा से प्रेरित था वहीं यह दूसरे प्रकार का राष्ट्रवाद प्रतिक्रियावाद का अन्तिम सहारा था।

इसलिए हम आज के विश्व को दो बड़े समूहों में बंटा हुआ पाते हैं – एक ओर साम्राज्यवादी और फासीवादी प्रवृत्तियाँ हैं, तो दूसरी ओर समाजवादी और राष्ट्रवादी शक्तियाँ हैं। इन दोनों में कुछ बातें समान हैं और दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन करना कठिन है क्योंकि फासीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों के बीच परस्पर विरोध है, और कभी कभी आश्रित देशों का राष्ट्रवाद फासीवाद की ओर झुकाव लिए होता है। लेकिन इनके बीच का मुख्य अन्तर यथावत है और यदि हम इस अन्तर को ध्यान में रखें तो हमें वैश्विक परिस्थिति और उसमें हमारी भूमिका को समझने में सुविधा होगी।

ऐसी स्थिति में स्वतंत्र भारत के लिए संघर्ष करने वाले हम लोग अपने को कहाँ पाते हैं? जाहिर है कि हम दुनिया की उन प्रगतिवादी ताकतों के साथ हैं जो फासीवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करती हैं। हमें विशेषतः एक खास किस्म के साम्राज्यवाद से निपटना होगा, जो आधुनिक विश्व में सबसे पुराना और सबसे अधिक व्याप्त है, लेकिन वह शक्तिशाली होने के बावजूद विश्व में व्याप्त साम्राज्यवाद का एक स्वरूप ही है। और वही भारत की स्वतंत्रता की मांग और ब्रिटिश साम्राज्य से हमारे सम्बंध विच्छेद की मांग का अन्तिम तर्क भी है। भारतीय राष्ट्रवाद, भारत की स्वतंत्रता और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बीच सहमति का कोई बिन्दु नहीं हो सकता है, और यदि हम साम्राज्यवादी व्यवस्था का हिस्सा बने रहे, उसे चाहे जो भी नाम या दर्जा दिया जाए, भले ही हमें दिखावटी राजनैतिक सत्ता दे दी जाए, हम बंधन में और सीमित बने रहेंगे, प्रतिक्रियावादी ताकतों और पूँजीवादी विश्व निहित आर्थिक स्वार्थों के अधीन बने रहेंगे। हमारी जनता का शोषण चलता रहेगा और हमारी महत्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा। सच्ची राजनैतिक आज़ादी हमारी पहुँच से बाहर होगी, और कोई आमूल सामाजिक परिवर्तन नहीं हो सकेगा।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पतन

इस महान संघर्ष के दुनिया भर में फैलने के साथ ही हमने बहुत से पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देशों का पतन होते हुए देखा है और पाया है कि प्रतिक्रियावादी ताकतों ने फासीवाद या नाज़ीवाद या तथाकथित "राष्ट्रवादी" सरकारों के नेतृत्व में एकजुट होने का प्रयास किया है। भारत में भी हमने इन पिछले वर्षों में इसी प्रक्रिया को घटित होते हुए देखा है, और राष्ट्रवादी आन्दोलन जितना मजबूत हुआ है, हमारे साम्राज्यवादी शासकों ने हमारे साथियों को तोड़ने और अपने झंडे के नीचे देश की प्रतिक्रियावादी ताकतों को एकजुट करने का प्रयास किया है।

इस दौरान भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अवसान और अधिक स्पष्टता से दिखाई देने लगा है। उसकी प्रकृति ही ऐसी है कि वह हमारी उन आर्थिक समस्याओं को हल नहीं कर सकता जो मुख्यतः खुद उसी की देन हैं। वह क्रूर दमन करके और नागरिक और यहाँ तक कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीनने के सामान्य तौर-तरीके अपना कर जीवित है। उसने हमारे आसपास और प्रशासन तंत्र में जासूसों का जाल बिछा रखा है जिसमें गुप्तचर और दुष्प्रेरक आदि लोग शामिल हैं। वे परस्पर प्रशंसा के गीत गाकर तंत्र की खराब हालत और अक्षमता को छिपाने का प्रयास करते हैं। तर्क का स्थान पुलिसकर्मी की लाठी और सिपाही की संगीन और कैदखाने और कैदियों के शिविरों ने ले लिया है, और धौंस दिखाने वाली व्यवस्था हमारी असामान्य आर्थिक दशा को भी उचित ठहराती है।

एक ऐसी सरकार जो आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम और इसी तरह के कानूनों पर निर्भर हो, जो प्रैस और साहित्य का दमन करती हो, जो सैकड़ों संगठनों पर प्रतिबंध लगाती हो, जो मुकदमा चलाए बिना ही लोगों को जेल में डाल देती हो और आज भारत में हो रहीं बहुत सी ऐसी बातों को करती हो, वह एक ऐसी सरकार है जो जिसके बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। मै कभी अपने आप को इन स्थितियों के लिए ढाल नहीं पाता हूँ, मुझे ये असह्य लगती हैं। लेकिन मैं पाता हूँ कि बहुत से देशवादी इन बातों के प्रति उदासीन और बेपरवाह हैं, कुछ तो इनका समर्थन तक करते हैं, कुछ ऐसे हैं जो अनिश्चितता के कारण कोई निर्णय नहीं कर पाते और जब ऐसे मुद्दों पर चर्चा छिड़ती है तो तटस्थ हो जाते हैं। और मैं सोचता हूँ कि उन लोगों के और मेरी तरह सोचने वाले लोगों के बीच क्या समानता है। हम कांग्रेस में भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में हर प्रकार के सहयोग का स्वागत करते हैं; हमारे दरवाज़े उन लोगों के लिए सदैव खुले हैं जो आजादी के समर्थक हैं और साम्राज्यवाद का विरोध करते हैं। लेकिन ये दरवाजे उन लोगों के लिए नहीं खुले हैं जो साम्राज्यवाद के साथ मिले हुए हैं और नागरिक स्वतंत्रता के दमन में ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन करते हैं। हम उनके विरोधी खेमे में हैं।

राष्ट्रीय कांग्रेस और जनसाधारण

यह तस्वीर का एक पहलू है। अपने बारे में हमें क्या कहना है? मैंने पाया है कि देश भर में फूट की भावना फैल रही है, जोकि एक अजीब बीमारी है, और पुराने साथियों के बीच मामूली झगड़े बढ़ते ही जा रहे हैं और इनसे हमारे पूरे काम में व्यवधान उत्पन्न होता है। कुछ देर के लिए हमने उन बड़े सिद्धान्तों को भुला दिया है जिनके लिए हम साथ खड़े हुए थे और अब हम छोटी-छोटी बातों के लिए आपस में झगड़ रहे हैं। बड़ी हद तक जनता से हमारा सम्पर्क कट गया है, और हम उस प्राणदायी ऊर्जा से वंचित हो गए हैं जो हमें लोगों से मिलती है, हम कमज़ोर हो रहे हैं और हमारा संगठन सिकुड़ रहा है और उसमें पहले जैसी ताकत नहीं बची है।

विगत में हमारे सीधे कार्रवाई के संघर्ष जनसमर्थन पर आधारित थे, विशेषतः किसानों पर, लेकिन उसका मुख्य सहारा और नेतृत्व हमेशा मध्यम वर्ग से ही आता था, और उन परिस्थितियों में यह अनिवार्य था। मध्यम वर्ग एक अस्पष्ट सा समूह है; ऊपर के स्तर पर, उनमें से बहुत थोड़े से लोगों की ब्रिटिश सरकार के साथ घनिष्ठता है; नीचे के स्तर पर वंचित और अन्य समूह हैं जिन्हें लम्बे समय तक आर्थिक हालात ने कुचल कर रखा है, उनमें से अग्रिम राजनैतिक कार्यकर्ता और क्रान्तिकारी उत्पन्न होते हैं; इनके बीच में मध्यवर्ती समूह होते हैं जो अक्सर अग्रिम कार्यकर्ताओं के समर्थक होते हैं और ऊपरी समूहों से भी मिले होते हैं इस उम्मीद पर कि कभी इन वरिष्ठ लोगों के समूह में दाखिल हो सकेंगे। इस प्रकार मध्यवर्गीय नेतृत्व एक अन्यमनस्क नेतृत्व होता है जो एक ही समय पर दो दिशाओं में देख रहा होता है। संकट की घड़ी में जब एक समान लक्ष्य और कर्म की आवश्यकता होती है तब यह दोमुखी नेतृत्व हमारे उद्देश्य को अवश्य नुकसान पहुँचाएगा और जब आगे बढ़ने की आवश्यकता होगी तब हमें आगे बढ़ने से रोकेगा। सांसारिक सम्पत्ति आदि से बहुत अधिक जुड़ा होने के कारण वह इनके छिन जाने से डरता है, इसलिए उसके ऊपर दबाव डाल कर उसकी शक्ति को खत्म करना आसान होता है। लेकिन फिर भी यह बड़ा विरोधाभास है कि क्रान्तिकारी नेता मध्यम वर्ग के इन्हीं बुद्धिजीवियों में से निकल कर आते हैं, और ह जानते हैं कि भारत में हमारे सबसे साहसी नेता और पक्के साथी मध्यम वर्ग में से ही निकल कर आए हैं। लेकिन हमारे संघर्ष का स्वरूप ऐसा है कि इन अग्रणी नेताओं के हटने का बाद उनका स्थान लेने वाले दूसरे नेता जल्दी थक जाते हैं और अपने वर्ग के गतिहीन तत्वों से प्रभावित हो जाते हैं। यह बात हमारे संघर्ष में हाल के समय में तब स्पष्ट हो गई जब हमारे सम्पत्तियुक्त वर्ग पर सरकार की धन और सम्पत्तियों को ज़ब्त करने की कठोर नीति का प्रहार हुआ था और वे संघर्ष को खत्म करने के लिए दबाव डालने के लिए तैयार हो गए थे।

फिर इस समस्या का समाधान किस प्रकार हो? अनिवार्यतः हमारा नेतृत्व मध्यवर्गीय होगा, लेकिन उसे जनसामान्य पर अधिक ध्यान देना होगा और उनसे प्रेरणा ग्रहण करनी होगी। कांग्रेस, जैसा कि वह दावा करती है, केवल जनसाधारण के लिए ही न हो, बल्कि जनसाधारण की भी हो; तभी वह सच्चे अर्थ में जनसाधारण के लिए काम करने वाला संगठन हो पाएगी। मैं महसूस करता हूँ कि हमारी अपेक्षाकृत कमजोरी हमारे मध्य वर्ग में कुछ विघटन और जनता से हमारे दूर हो जाने के कारण उत्पन्न हुई है। हमारी नीतियाँ और हमारे विचार आबादी के एक बड़े हिस्से के बजाए इस मध्यवर्गीय दृष्टिकोण से कुछ ज्यादा ही प्रभावित होने लगे हैं। यहाँ तक कि हमारे सामने की साम्प्रदायिकता की समस्या, जिसका सामान्य जन के लिए कोई महत्व नहीं है, जैसी समस्याएं भी मूलतः मध्यवर्गीय समस्याएं हैं।

मैं समझता हूँ कि एक हद तक इसका कारण पिछले पंद्रह वर्षों में हुआ एक प्रकार का विकास है जिसके प्रति हम अपने आप को नहीं ढाल पाए हैं, हमारी जनता को प्रभावित करने वाली बढ़ती आर्थिक समस्याओं और लोगों की बढ़ती जागृति जिसे कांग्रेस के माध्यम से अपने आप को प्रकट करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले हैं। 1920 में ऐसी स्थिति नहीं थी और कांग्रेस और लोगों के बीच आधारभूत सम्पर्क बना रहता था, और उनकी इच्छाओं, जो तब अस्पष्ट थीं, को कांग्रेस के माध्यम से अभिव्यक्ति मिलती थी। लेकिन अब वे इच्छाएं और आकांक्षाएं अधिक निश्चित आकार ले चुकी हैं, काँग्रेस के दूसरे तत्वों ने उनका अधिक सम्मान नहीं किया है और वह सम्पर्क टूट गया है। यह स्थिति दुखद होने के बावजूद विकास का संकेत है, और इसके लिए दुखी होने के बजाए हमें सम्पर्क की एक नई कड़ी तैयार करनी चाहिए और एक नया सम्पर्क स्थापित करना चाहिए जो कांग्रेस को जनता के प्रति अधिक सजग बना सके। 1920 में जनता का प्रतिनिधित्व करने के मध्यवर्गीय दावे का कुछ औचित्य था; आज की स्थिति में वह औचित्य कम हुआ है, बावजूद इसके कि निम्न मध्यवर्ग और सामान्य जनता के बीच अभी भी बहुत सी समानताएं हैं।

लोगों से हमारा कटाव अंशतः हमारी कांग्रेस के संविधान के कारण से भी है। उसमें पंद्रह साल पहले किए गए आमूल बदलावों ने उसे तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल बनाया था और कांग्रेस बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करके राष्ट्रीय कार्यकलाप का प्रभावी साधन बन गई थी। हालाँकि उस पर नियंत्रण और उसकी पृष्ठभूमि मूलतः मध्यवर्गीय थी, लेकिन उसने सुदूर गाँवों तक अपनी पैठ बनाई थी और लोगों के बीच आर्थिक चेतना फैलाई थी और शहरों और गाँवों में भी राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने लगी थी। हमारे इस विशाल देश में एक नए जीवन की धड़कन को महसूस किया जाने लगा था, और चूँकि हम उसके अनुकूल थे, हमें उससे ताकत मिली। बाद के वर्षों में सरकार द्वारा चलाए गए दमन चक्र ने गाँवों के साथ हमारे भौतिक और बाहरी सम्पर्क को कई प्रकार से खत्म कर दिया। लेकिन इससे भी बढ़कर कुछ और बात भी हुई। पुराने समय की अस्पष्ट सी अपील अब काफी नहीं थी, और हमारे सामने खड़ी नई आर्थिक चुनौतियों पर हम कोई निश्चित राय प्रकट करने में हिचकिचा रहे थे। भौतिक कटाव से भी बदतर बात यह थी कि मध्यवर्गीय तत्वों और जनसामान्य के बीच मानसिक स्तर पर भी दूरियाँ आ रहीं थीं। हमारा संविधान बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रहा था; जमीन पर उसकी जड़ें खत्म चुकी थीं और वह केवल हवाई काम कर रही छोटी छोटी समितियों तक ही सिमट गया था। उसके पीछे कांग्रेस के नाम की प्रतिष्ठा अभी भी जुड़ी थी और यह स्थिति काफी समय तक चली, लेकिन उसमें लोकतांत्रिक भावना की सजीवता नहीं बची थी। वह निरंकुशता का शिकार हो गया था और नियंत्रण के लिए स्पर्धा करने वाले समूहों का अखाड़ा बन गया था जो नियंत्रण के लिए घटिया से घटिया और आपत्तिजनक तरीके अपना रहे थे। आदर्श खत्म हो गए थे और अवसरवादिता और भ्रष्टाचार ने उनका स्थान ले लिया था। कांग्रेस की संवैधानिक रचना नई स्थिति से निबटने के लायक नहीं थी; उसे थोड़े से गैर-जिम्मेदार लोग कभी भी झकझोर सकते थे। एक व्यापक लोकतांत्रिक आधार ही उसे बचा सकता था और उसमें इसी बात की कमी थी।

पिछले साल संविधान में संशोधन करके उसकी इनमें से कुछ कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया था। वह कोशिश कितनी सफल रही मैं इसका फैसला कर पाने की स्थिति में नहीं हूँ। इस प्रयास ने सम्भवतः संगठन और प्रभावशाली बनाया है, लेकिन यदि उसके पीछे ताकत न हो तो प्रभावशीलता का कोई अर्थ नहीं है, और हमारी दृष्टि में वह ताकत लोगों से ही मिल सकती है। मौजूदा संविधान अभी भी संगठन के निरंकुशतावादी पक्ष पर अधिक बल देता है, और ग्रामीण प्रतिनिधित्व पर बल देने के बावजूद उसमें जनता के साथ प्रभावी सम्पर्क की व्यवस्था नहीं है।

हमारे सामने असल समस्या यह है कि हम के अन्दर की सभी साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों को अपने स्वतंत्रता संघर्ष के साथ किस प्रकार जोड़ सकते हैं; हम किस प्रकार अधिकांशतः मध्यम वर्गों को शामिल करते हुए जनसामान्य का एक ऐसा मोर्चा तैयार कर सकते हैं जो स्वतंत्रता का समर्थक हो। एक संयुक्त मोर्चा बनाने के बारे में कुछ चर्चा हुई है, लेकिन जहाँ तक मुझे जानकारी है, इसका सम्बंध जनसाधाराण की अनदेखी करते हुए उच्च वर्गों के बीच के किसी गठबंधन से है। निश्चित तौर पर यह कांग्रेस का विचार नहीं हो सकता है और यदि उसने इसका समर्थन किया, तो वह उन हितों के साथ विश्वासघात होगा जिनका कांग्रेस प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है और उसके अस्तित्व का आधार ही खत्म हो जाएगा। साम्राज्यवाद का विरोध करना ऐसे संयुक्त मोर्चे का सारतत्व होना चाहिए जिस पर समझौता नहीं किया जा सकता, और उसकी ताकत आवश्यक रूप से किसानों और मजदूरों की सक्रिय भागीदारी पर आधारित होनी चाहिए।

शायद आप सोच रहे होंगे कि मैंने जिस प्रकार अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मामलों की पृष्ठभूमि की चर्चा विस्तार के साथ की है और अभी तक उन मुद्दों का उल्लेख नहीं किया है जो आपके मन में हैं तो इसका क्या कारण है। हो सकता है कि आप अधीर हो रहे हों। लेकिन मेरा विश्वास है कि अपनी समस्याओं को देखने का सही तरीका यह है कि उन्हें विश्व परिदृश्य में उनके महत्व के अनुसार देखा जाए। मेरा विश्वास है कि विश्व में होने वाली घटनाओं के बीच घनिष्ठ सम्बंध है और हमारी राष्ट्रीय समस्या विश्व की पूँजीवाद-साम्राज्यवाद की समस्या का ही एक हिस्सा है।

समाजवाद का उद्देश्य

मेरा दृढ़ विश्वास है कि दुनिया की और भारत की समस्याओं के समाधान की कुंजी समाजवाद के पास है, और जब मैं इस शब्द का प्रयोग करता हूँ तो किसी अनिश्चित मानवतावादी दृष्टि से नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक-आर्थिक अर्थ में करता हूँ। लेकिन समाजवाद एक आर्थिक सिद्धान्त से बढ़ कर भी कुछ है। यह एक जीवन दर्शन है और मुझे भी प्रभावित करता है। मुझे समाजवाद के अलावा गरीबी, व्यापक बेरोज़गारी, भारत के लोगों की पराधीनता और उनके अपकर्ष से मुक्ति के लिए कोई और मार्ग दिखाई नहीं देता। इसके लिए हमारी राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव करने, भूमि और उद्योग के क्षेत्रों में निहित स्वार्थों को खत्म करने के साथ-साथ भारत की राज्य व्यवस्था में सामंती और स्वेच्छाचारी व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि निजी सम्पत्ति को, एक सीमित अर्थ में निजी सम्पत्ति को छोड़कर, समाप्त किया जाए, और मौजूदा मुनाफे की व्यवस्था के बदल कर सहकारी सेवाओं के उच्च आदर्शों वाली व्यवस्था को स्थान दिया जाए। अर्थात अन्ततोगत्वा हमारी प्रवृत्तियों, आदतों और इच्छाओं में बदलाव किया जाए। संक्षेप में इसका अर्थ यह है कि एक नई सभ्यता विकसित की जाए जो वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था से मूलतः भिन्न हो। इसकी एक झलक हम यू.एस.एस.आर. के क्षेत्रों की नई सभ्यता में देख सकते हैं। वहाँ बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ, लेकिन उस नई व्यवस्था और नई सभ्यता को हमारे निराशाजनक युग में सबसे ज्यादा आशा जगाने वाली बात के रूप में देखता हूँ। यदि भविष्य के लिए आशा शेष है तो वह मुख्यतः सोवियत रूस और उसके काम के कारण है, और मेरी मान्यता है कि यदि कोई आपदा घटित न हुई तो यह सभ्यता दूसरे क्षेत्रों में भी फैलेगी और उन युद्धों और संघर्षों को भी खत्म करेगी जिन्हें पूँजीवाद बढ़ावा देता है।

मैं नहीं कह सकता कि यह नई व्यवस्था भारत कैसे या कब पहुँचेगी। मुझे लगता है कि हर देश इसे अपने ढंग से लागू करेगा और उसे अपनी राष्ट्रीय प्रकृति के अनुकूल बना लेगा। लेकिन उस व्यवस्था के सार तत्व को कायम रखा जाना चाहिए और उसे वर्तमान अव्यवस्था से उभरने वाली विश्व व्यवस्था को जोड़ने वाली कड़ी बनाया जाना चाहिए।

इस प्रकार समाजवाद मेरे लिए मात्र एक पसंदीदा आर्थिक सिद्धान्त मात्र नहीं है, यह एक महत्वपूर्ण मत है जिसका मैं अपने दिल और दिमाग से पूरा समर्थन करता हूँ। मैं भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्यरत रहता हूँ क्योंकि मेरे भीतर का राष्ट्रवादी विदेशी आधिपत्य को स्वीकार नहीं कर सकता है, मैं इसके लिए और भी अधिक प्रयास इसलिए करता हूँ क्योंकि मेरी दृष्टि में सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए यह एक अनिवार्य कदम है। मैं चाहूँगा कि कांग्रेस एक समाजवादी संगठन बने और नई सभ्यता की स्थापना के लिए प्रयासरत दुनिया की दूसरी शक्तियों के साथ मिल कर काम करे। लेकिन मुझे लगता है कि वर्तमान में कांग्रेस का जैसा संघटन है, उसमें से बहुसंख्य लोग इस दिशा में इतना आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं होंगे। हम एक राष्ट्रवादी संगठन हैं और हम एक राष्ट्रवादी स्तर पर सोचते और कार्य करते हैं। यह बात अब स्पष्ट है कि यह एक सीमित राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति की दृष्टि से भी बहुत संकीर्ण विचार है, और इसलिए हम जनसाधारण और उनकी आर्थिक आवश्यकताओं की बात करते हैं। लेकिन फिर भी हममें से अधिकांश लोग अपनी राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि के कारण कोई ऐसा कदम उठाने से हिचकते हैं जिससे कुछ निहित स्वार्थ डर कर हमें छोड़ न जाएं। इनमें से अधिकांश हित पहले ही हमारे खिलाफ हैं और हम राजनैतिक संघर्ष में भी उनसे विरोध के अलावा और किसी चीज़ की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

मैं देश में समाजवाद को बढ़ाने के लिए जितना भी इच्छुक होऊँ, मेरी कोई ऐसी इच्छा नहीं है कि मैं उसे कांग्रेस पर थोपूँ और परिणामस्वरूप हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए कठिनाइयाँ खड़ी करूँ। मैं खुशी-खुशी उन लोगों के साथ पूरी ताकत लगाकर सहयोग करूँगा जो स्वतंत्रता के लिए कार्य कर रहे हैं, भले ही वे समाजवादी समाधान के विचार से सहमत न हों। लेकिन मैं ईमानदारी से अपनी राय को व्यक्त करूँगा और आशा करूँगा कि मैं फिर कभी कांग्रेस और देश को इसके लिए राज़ी कर लूँ, क्योंकि मेरी दृष्टि में कांग्रेस और देश इसी ढंग से आजादी हासिल कर सकेगा। निश्चित तौर पर हम सभी लोग जो स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं, सामाजिक मुद्दों पर अपने मतभेदों के बावजूद मिलकर कार्य कर सकते हैं। विगत में कांग्रेस एक ऐसा व्यापक मोर्चा बनकर रही है जो एक साझे बन्धन से एक साथ जुड़े हैं। हालाँकि उन विचारों पर भिन्नता अधिक स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगी है, उसे अपने वर्तमान स्वरूप में अपना काम करते रहना चाहिए।

गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट के खिलाफ लड़ाई

अब मैं उस विषय पर आता हूँ जो सम्भवतः आपके मन को उद्वेलित कर रहा है – ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया नया अधिनियम और उसके सम्बंध में हमारी नीति। कांग्रेस की पिछली बैठक के बाद से यह अधिनियम लागू हुआ है, लेकिन उस समय भी हमें एक श्वेत पत्र के रूप में इसका पूर्वाभास हो गया था, और इस उच्च पद पर मेरे योग्य पूर्ववर्ती द्वारा अपने अध्यक्षीय भाषण में किए गए विश्लेषण से बेहतर उन प्रावधानों का विश्लेषण नहीं हो सकता है। कांग्रेस ने उस प्रस्तावित संविधान को अस्वीकार किया था और संकल्प किया था कि कांग्रेस का उससे कोई लेना-देना नहीं होगा। जैसा कि विदित है, यह नया अधिनियम एक और भी पीछे ले जाने वाला कदम है और हमारे अधिक संयत और एहतियात बरतने वाले राजनीतिज्ञों ने भी इसकी निंदा की है। जब हमने श्वेत पत्र को अस्वीकार कर दिया तो फिर साम्राज्यवादी आधिपत्य को बढ़ावा देने और जनता के शोषण को बढ़ाने वाले इस नए घोषणापत्र से हमारा क्या वास्ता हो सकता है? और थोड़ी देर के लिए यदि हम उसकी विषयवस्तु को भुला भी दें, तो क्या हम उसके साथ जुड़े अपमान और चोट को भुला सकते हैं, हमारी इच्छाओं की अनदेखी को भुला सकते हैं, नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन और हमारा भाग्य बन चुके अत्याचारों को क्या हम भुला सकते हैं?

दासता का घोषणा पत्र किसी दास की दृष्टि में कोई कानून नहीं होता है, और हो सकता है कि हम विवशता में कुछ देर के लिए उससे समझौता कर लें और अध्यादेशों आदि के अपमान को सहन कर लें, लेकिन मजबूरी की उस स्वीकृति में उसके खिलाफ विद्रोह करने और उसे समाप्त करने का अधिकार और इच्छा भी छुपी हुई होगी... इस अधिनियम के प्रति हमारा रुख केवल असहमतिपूर्ण विरोध और उसे समाप्त करने के लगातार प्रयास के रूप में ही हो सकता है। यह कार्य हम किस प्रकार से कर सकते हैं?

मुझे लगता है कि मौजूदा परिस्थिति में हमारे पास नए प्रांतीय विधानमंडलों के लिए चुनाव, यदि चुनाव कराए जाते हैं तो, लड़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। हमें एक संविधान सभा की मांग को सबसे आगे रखते हुए एक विस्तृत राजनैतिक और आर्थिक कार्यक्रम के आधार पर निर्वाचित होने का प्रयास करना चाहिए। मेरा दृढ़ मत है कि हमारी राजनैतिक और सामुदायिक समस्याओं का समाधान इस सभा के माध्यम से ही हो सकेगा, बशर्ते कि उसके लिए चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर जनता द्वारा किया जाए। वह सभा तब तक अस्तित्व में नहीं आएगी जब तक कि इस देश में एक अर्ध-क्रान्ति जैसी परिस्थिति का निर्माण न कर दिया जाए और कागज़ी संविधानों के अलावा सत्ता के वास्तविक सम्बंध ऐसे न हो जाएं कि भारत के लोग यह महसूस करा सकें कि उनकी इच्छा क्या है। ऐसा कब तक हो पाएगा, मैं नहीं कह सकता, लेकिन दुनिया भर ऐसी शक्तियाँ सक्रिय हैं कि भारत में गतिहीनता की स्थिति को लम्बे समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसिलिए यह मुद्दा हमारे सामने हमारी अपेक्षा से पहले उठ सकता है। लेकिन यह बात स्पष्ट है कि संविधान सभा का गठन इस नए अधिनियम या नए विधानमंडलों के माध्यम से नहीं होने वाला है। फिर भी हमें इस मांग के लिए दबाव बनाए रखना चाहिए और इस मुद्दे को देश और दुनिया के सामने रखना चाहिए ताकि जब इसका समय आए तो हम उसके लिए तैयार हों। हमारे संविधान को तैयार करने के लिए संविधान सभा ही एकमात्र उचित और लोकतांत्रिक तरीका है, और फिर सभा के प्रतिनिधि समझौते पर ब्रिटिश सरकार के साथ वार्ता करेंगे।

निर्वाचित होने के पीछे हमारा एक प्रमुख कारण यह होगा कि हम कांग्रेस का संदेश लाखों मतदाताओं और उन लाखों-लाख मताधिकारवंचितों तक पहुँचा सकें, उन्हें अपने भविष्य के कार्यक्रम के बारे में बता सकें, जनता को यह समझा सकें कि हम न केवल उनके समर्थक हैं बल्कि उन्हीं में से हैं और उनके सामाजिक और आर्थिक बोझ को दूर करना चाहते हैं। हमारी अपील और हमारा संदेश सिर्फ मतदाताओं तक ही सीमित नहीं रहेगा, क्योंकि हमें उन करोड़ों लोगों को भी ध्यान में रखना होगा जिन्हें मताधिकार से वंचित किया गया है और उन्हें ही हमारी सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता है क्योंकि वे ही समाज के सबसे नीचे की सीढ़ी पर हैं और उन्हें ही शोषण का दंश सबसे अधिक झेलना पड़ता है। हमने विगत में चुनावों में सरकार के व्यापक हस्तक्षेप को देखा है; हमें उसका और प्रतिक्रियावादियों के एकजुट और धनाढ्य समर्थकों का भी मुकाबला करना होगा। असल खतरा तब उत्पन्न होगा जब हम अस्थिरचित्त और सुलहवादी समूहों और व्यक्तियों का समर्थन हासिल करने के लिए अपने कार्यक्रम और नीति को कमज़ोर करेंगे। यदि हम सिद्धान्तों से समझौता करेंगे तो हम दो नावों की दुविधा में डूब जाएंगे जिसके लिए हम स्वयं ही दोषी होंगे। सही और सुरक्षित तरीका केवल यही है कि हम अपने कार्यक्रम के पीछे दृढ़ता से खड़े हों और ऐसे किसी भी व्यक्ति से समझौता न करें जिसने विगत में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष का विरोध किया हो, या जो किसी भी रूप में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का समर्थन कर रहा हो।

एक बार चुनाव में सफल हो जाने के बाद हमें क्या करना होगा? हम पद लें या न लें? शायद यह एक गौण विषय है, लेकिन फिर भी इस मुद्दे के पीछे सिद्धान्त का प्रश्न छुपा है और दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण मतभेद छुपे हैं, और इस प्रश्न पर इस तरफ या उस तरफ लिया गया कोई भी निर्णय दूरगामी परिणामों वाला होगा। इसके पीछे छुपा हुआ प्रश्न स्वयं स्वतंत्रता का भी है कि क्या हम भारत में क्रान्तिकारी परिवर्तन चाहते हैं या फिर ब्रिटिश सरकार के तत्वावधान में केवल कुछ मामूली सुधार के लिए कार्य कर रहे हैं। हमारे विचार वापस उस समय की ओर लौटते हैं जब 1920 में कांग्रेस में बदलाव के विषय पर विचारों का संघर्ष हुआ था। हमने उस समय सोचविचार कर और दृढ़ता से एक विकल्प चुना था और निष्प्राण के पुराने और सुधारवादी मत को अस्वीकार किया था। क्या हम वापस उसी अंधे दमघोंटू समय में वापस लौट जाएं, वह भी इतने साल साहसपूर्वक प्रयास करने के बाद, और हमने जो किया है, हासिल किया है और सहा है, उसकी स्मृति को मिटा दें? यही मुद्दा है और जब हम अपना निर्णय लें तब हममें से कोई भी इस बात को न भूले।

यह प्रश्न कैसे उठा? यदि हम अधिनियम के प्रति अपना विरोध व्यक्त करते हैं और पूरी योजना को खारिज कर देते हैं तो क्या इसका यही अर्थ नहीं निकलेगा कि हम उसके क्रियान्वयन से कोई लेना देना न रखें और उसके कार्यान्वयन को जहाँ तक हमसे सम्भव हो, रोकें? अधिनियम की शर्तों के अनुसार कोई पद और मंत्रालय स्वीकार करने का मतलब होगा कि हम उसके लिए अपनी अस्वीकृति को नकार रहे हैं और हम अपनी ही नज़र में दोषी साबित हो जाएंगे। राष्ट्र के सम्मान और आत्म सम्मान की दृष्टि से इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि आवश्यक रूप से इसका यह अर्थ होगा कि हम किसी हद तक साम्राज्यवाद के दमनकारी तरीकों के साथ सहयोग कर रहे हैं, और हम अपने ही लोगों पर अत्याचार और उनके शोषण में भागीदार बन जाएंगे। बेशक हम लोगों के अधिकारों की हिमायत करेंगे और दमन के खिलाफ विरोध जताएंगे, लेकिन इस अधिनियम के अन्तर्गत मंत्रियों के रूप में हम लोगों को राहत देने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकेंगे, और हमें साम्राज्यवाद की व्यवस्था के साथ उसके कार्यों की जिम्मेदारी लेनी होगी, घाटे के बजटों के लिए, श्रमिकों और किसानों के दमन के लिए। सत्ता के बिना जिम्मेदारी स्वीकार करना हमेशा खतरनाक होता है, लोकतांत्रिक देशों में भी; इस अलोकतांत्रिक संविधान, जिसमें बचाव की व्यस्थाएं करके रखी गई हैं और शक्तियाँ आरक्षित रखी गई हैं और गिरवी निधियों की व्यवस्था है, में स्थिति और भी खराब होगी जब हमें अपने विरोधियों के बनाए हुए नियमों का पालन करना पड़ेगा। साम्राज्यवाद कभी-कभी सहयोग की बात करता है, लेकिन जैसा सहयोग उसे चाहिए उसे सामान्यताय समर्पण कहा जाता है, और पद स्वीकार करने वाले मंत्रियों को उन्हीं सिद्धान्तों पर समझौता करना पड़ेगा जिनका वे जनता के बीच समर्थन करते हों। यह एक शर्मिंदगी पैदा करने वाली स्थिति है जिसे किसी भी आत्म सम्मानी व्यक्ति को स्वीकार करने से बचना चाहिए। हमारे महान संगठन का इसमें शामिल होने का मतलब होगा कि हम अपने अस्तित्व के आधार और पृष्ठभूमि का त्याग कर दें।

हमारे सामने एक ही सीधा रास्ता खुला है, कि हम अपने कार्यक्रम को लेकर लोगों के पास जाएं और उनके सामने इस बात को स्पष्ट करें कि मौजूदा स्थिति में हमें इस अधिनियम की प्रमुख बातें स्वीकार नहीं हैं, और इसलिए जब हम अपने कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए विधानमंडलों के मंच का प्रयोग करें तब हम इन साम्राज्यवादी संस्थाओं में जब भी हम ऐसा कर पाएं, गतिरोध उत्पन्न करके इन्हें खत्म करने का प्रयास करें। ये गतिरोध वरीयतः उन कार्यक्रमों पर उत्पन्न किए जाएं ताकि जनता समझ सके कि ये विधानमंडल उन्हें लाभ पहुँचाने की दृष्टि से कितने निष्प्रभावी हैं।

हमें कभी यह नहीं भूलना चाहिए और न ही अपनी जनता को यह बताकर भ्रमित करना चाहिए कि हम इन विधानमंडलों में काम करके किसी प्रकार की वास्तविक सत्ता या आजादी पा सकते हैं। कुछ हद तक अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए निश्चित तौर पर हम उनका प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन आजादी के लिए संघर्ष की जिम्मेदारी मुख्यतः जनता को दी जानी चाहिए, और इसीलिए हमें अपना प्रभावी कार्य इन विधानमंडलों के दायरे से बाहर होना चाहिए। हमें जनता से ताकत मिलेगी और उनके बीच में काम करने से मिलेगी और उन्हें संगठित करने से मिलेगी....

कांग्रेस के जनाधार का विस्तार करना

मैं पहले ही हमारे संगठन और जनता के बीच अलगाव के बारे में बात कर चुका हूँ। मैं समझता हूँ कि हमारा मौजूदा संविधान इस प्रकार के सम्पर्क स्थापित करने या अपनी प्राथमिक समितियों को प्रेरित करने में बहुत सहायक नहीं साबित हो रहा है। ये समितियाँ व्यावहारिक दृष्टि से केवल मतदाता सूचियाँ बन कर रह गई हैं जो केवल प्रतिनिधियों का चुनाव करने का ही काम करती हैं, और चर्चाओं या नीतियों को तय करने में कोई भूमिका नहीं निभाती हैं।

रूस के बारे में वैब की नई पुस्तक में दी गई जानकारी इस दृष्टि से बड़ी दिलचस्प है कि रूस में पूरी व्यवस्था एक व्यापक और जीवन्त लोकतांत्रिक आधार पर स्थापित की गई है। रूस को पश्चिम के दृष्टिकोण से लोकतांत्रिक देश नहीं माना जाता है, लेकिन हम पाते हैं कि वहाँ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व यहाँ की तुलना में अधिक पाए जाते हैं। वहाँ के छह लाख शहरों और गाँवों में व्यापक लोकतांत्रिक संगठन मौजूद हैं और इनमें से प्रत्येक में अपने सोवियत की व्यवस्था है जहाँ लगातार चर्चाएं होती हैं, बहस होती हैं, आलोचनाएं होतीं जिससे नीतियों के निर्धारण में और उच्चतर समितियों के लिए प्रतिनिधियों के चुनाव में सहायता मिलती है।

बेशक यह सब करना हमारी क्षमता के बाहर है, क्योंकि उस दिशा में प्रयोग करने से पहले राजनैतिक और आर्थिक ढाँचे में बदलाव करने की आवश्यकता है। लेकिन हम उस उदाहरण से भी लाभ उठा सकते हैं और अपने सीमित ढंग से कांग्रेस के सबसे निचले स्तर पर लोकतंत्र को विकसित कर सकते हैं और प्राथमिक समितियों को प्राणवान संगठन के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं।

जनता के साथ सम्पर्क बढ़ाने का एक और तरीका यह हो सकता है कि हम लोगों को उत्पादकों के रूप में संगठित करें और फिर उनके संगठनों को कांग्रेस के साथ जोड़ लें या उन दोनों संगठनों के बीच पूर्ण सहयोग की व्यवस्था स्थापित करें। आज उत्पादकों के जो संगठन विद्यमान हैं जैसे किसान संगठन, और साम्राज्यवाद विरोधी संगठन, उन्हें भी लोगों की भलाई और राष्ट्र की स्वतंत्रता के संघर्ष की दृष्टि से परस्पर सहयोग के लिए राज़ी किया जा सकता है। इस प्रकार कांग्रेस के व्यक्तिगत सदस्यों के अलावा निगम सदस्य भी होंगे, और अपने स्वतंत्र चरित्र को बनाए रखते हुए वह जनता को प्रभावित कर सकेगी और उससे प्रभावित भी हो सकेगी.....

मुझे लगता है कि यह आवश्यक है कि कांग्रेस किसानों और मजदूरों के संघों को के गठन को प्रोत्साहित करे, और पहले से विद्यमान ऐसे संगठनों के साथ सहयोग करे ताकि जनता के रोजमर्रा के संघर्ष को उनकी आर्थिक मांगों और दूसरी शिकायतों के आधार पर चलाया जा सके। जनता के आर्थिक संघर्ष के लिए उनका साथ देने वाले संगठन के रूप में कांग्रेस की पहचान उसे सबसे अधिक स्वाधीनता के नजदीक ले जाएगी। मैं चाहूँगा कि दूसरे विशेष समूहों जैसे महिलाओं को भी आजादी के लिए हमारे संघर्ष सामान्य दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। तब कांग्रेस इस स्थिति में होगी कि वह इन सभी महत्वपूर्ण कार्यों का समन्वय कर सकेगी और इस प्रकार अपने जनाधार को ज्यादा से ज़्यादा बड़ा कर सकेगी।

युद्धकारी कार्यक्रम और युद्ध की कार्रवाई के बारे में कुछ बातें कही गई हैं। मैं नहीं जानता कि इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है, लेकिन यदि राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्यक्ष कार्रवाई या सविनिय अवज्ञा इसका अभिप्राय है, तो मैं कहूँगा कि मुझे निकट भविष्य में इसकी कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती। हम जब तक बड़ी कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं हो जाते तब तक हमें बड़ी-बड़ी बातें नहीं करनी चाहिए। आज हमारा काम यह है कि हम अपने संगठन का सुधार करें, कुछ लोगों के मन की पराजयवादी मानसिकता को दूर करें, और अपने संगठन को जनता के साथ जोड़ते हुए उसका निर्माण करें, और साथ ही साथ लोगों के साथ मिल कर काम करें। ऐसा समय आ सकता है, और हमारी अपेक्षा से पहले आ सकता है, जब हमारी परीक्षा हो सकती है। हम अपने आप को उस परीक्षा के लिए तैयार करें। सविनय अवज्ञा आदि ऐसी चीज़ें नहीं हैं जिन्हें हम अपनी इच्छा से शुरू या बन्द कर सकें। यह बहुत सी बातों पर निर्भर करता है, जिनमें से कुछ बातें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, लेकिन क्रान्तिकारी बदलाव और दुनिया में बार-बार उत्पन्न हो रहे संकटों के इस दौर में घटनाओं की रफ्तार हमसे तेज़ होती है। हमें बहुत अवसर मिलेंगे।

भूमि, ग्रामीण गरीबी और बेरोज़गारी और पूरी तरह से पुरानी पड़ चुकी भूमि व्यवस्था आज भारत की प्रमुख समस्या है। परिस्थितियों के एक अजीब से घालमेल ने भारत को पिछली कुछ पीढ़ियों से अवरुद्ध करके रखा है, और उसने राजनीति और अर्थव्यवस्था के जो परिधान पहन रखे हैं वे उसके नाप के नहीं हैं और वे फटेहाल हैं। कुछ मामलों में हमारी कृषि की दशा एक सौ पचास साल पहले की महान क्रांति से पहले के फ्रांस में कृषि की दशा से अलग नहीं है। यह दशा लम्बे समय तक नहीं चल सकती है। साथ ही हम अन्तरराष्ट्रीय पूँजीवादी व्यवस्था का भाग भी बन चुके हैं और हमें इस पतनोन्मुख व्यवस्था के कारण तकलीफों और संकटों का सामना करना पड़ रहा है। इन वर्गों की आकांक्षाओं और विश्व की शक्तियों के बीच के संघर्ष के परिणामस्वरूप भारत में क्या स्थिति उभर कर सामने आएगी, कहा नहीं जा सकता। लेकिन हम विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि वर्तमान व्यवस्था के अवसान का समय आ चुका है, और यह हमारा दायित्व है कि हम भविष्य को अपनी इच्छा के अनुसार ढालें.....

दुनिया की प्रगतिशील ताकतों, जो मानवता की स्वतंत्रता के हक में खड़ी हैं और राजनैतिक और सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने के लिए कार्य कर रही हैं, साम्राज्यवाद और फासीवादी प्रतिक्रिया के विरुद्ध उनके संघर्ष में हम अपने पूर्ण सहयोग का प्रस्ताव करते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि उनका और हमारा संघर्ष एक ही है। हमें किसी व्यक्ति या देश विशेष से शिकायत नहीं है, और हम जानते हैं कि हमारा दमन करने वाले साम्राज्यवादी इंग्लैंड में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो साम्राज्यवाद को नापसंद करते हैं और स्वतंत्रता की हिमायत करते हैं।