नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



इस सम्मेलन का आयोजन इसके आयोजकों का एक सुखद और अच्छा निर्णय है। हमारी बैठक किसी और रूप में महत्वपूर्ण रही होती लेकिन पिछले दो-तीन महीनों के घटनाक्रम के कारण, जहाँ हमें यह अहसास कराया गया है कि हमारे सामने और नीचे की खाई बढ़ती जा रही है, यह बैठक और भी महत्वपूर्ण हो गई है। यह सामान्य स्थिति में भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता, अब जब हम मानव इतिहास में इस संकट के समय में मिल रहे हैं तब इसका महत्व और अधिक बढ़ गया है।

आज साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और जातीयतावाद के खिलाफ संघर्ष सहित जो महत्वपूर्ण है और जिसके बारे में यहाँ बार-बार उल्लेख किया गया, सहित हर चीज़ को इस संकट ने ढंक लिया है। इसलिए हमारे लिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम मानवता के समक्ष उत्पन्न हुए इस संकट पर ध्यान दें। दुनिया की महाशक्तियाँ भी हमारे ऊपर नज़र जमाए बैठी हैं।

हम अपने आपको गुट-निरपेक्ष देश कहते हैं। “गुट-निरपेक्ष” शब्द की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की जा सकती है, लेकिन मूलतः इसका प्रयोग दुनिया की महाशक्तियों के गुटों के प्रति निरपेक्ष रहने के संदर्भ में किया गया था। “गुट-निरपेक्ष” शब्द का एक नकारात्मक अर्थ है। लेकिन यदि हम इसे एक सकारात्मक अर्थ दे दें तो इसका आशय ऐसे राष्ट्रों से है जो युद्ध के प्रयोजन से सैन्य गुटों, सैन्य गठबंधनों आदि के साथ जुड़ने से आपत्ति रखते हैं। हम ऐसे दृष्टिकोण से स्वयं को दूर रखते हैं और अपनी ताकत को शांति के पक्ष में लगाना चाहते हैं। इस प्रकार, जब भी कोई संकट की स्थिति उत्पन्न होती है जब युद्ध की सम्भावना हो, तो असम्बद्ध होने के कारण हमें यह समझना चाहिए कि इस बात का दायित्व सबसे अधिक हमारे ही ऊपर है कि हम युद्ध की विभीषिका को घटित होने से रोकने के लिए जो भी कर सकते हों, करें।

यदि इस संकट के समय में हमारा कोई प्रयास युद्ध के भय को दूर करने में मददगार साबित होता है, तो हम अपना औचित्य सिद्ध कर सकेंगे और स्वयं को मज़बूत कर सकेंगे। मैं जानता हूँ कि स्थिति को बदलने की कुंजी इस सम्मेलन के हाथ में नहीं है। वह तो मूलतः दोनों महाशक्तियों, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के हाथों में है। फिर भी यह सम्मेलन, या यों कहें कि इस सम्मेलन में भाग लेने वाले देश इतने असहाय भी नहीं हैं कि युद्ध की घोषणा हो जाए और दुनिया तबाह हो जाए और हम हाथ पर हाथ धरे देखते रहें। यह वह समय, स्थान और अवसर है जब हम युद्ध और शांति के मुद्दे को उठाएं और उसे अपना कर दुनिया में साबित कर दें कि हम शांति के पक्षधर हैं, और जहाँ तक हमसे हो सकेगा, हमारे पास जो भी साधन उपलब्ध हैं उनकी सहायता से हम शांति के लिए संघर्ष करेंगे। यहाँ एकत्रित राष्ट्रों की शक्ति कोई सैन्य शक्ति या आर्थिक शक्ति नहीं है; फिर भी वह शक्ति तो है। आप उसे नैतिक शक्ति कह सकते हैं। हम सभी मिल कर युद्ध और शांति के बारे में क्या राय कायम करते हैं या महसूस करते हैं, जाहिर है कि उसका भी प्रभाव तो होगा।

कुछ छह या सात साल या आठ साल पहले, गुटनिरपेक्षता एक असामान्य बात थी। यदाकदा कुछ थोड़े से देश ही उसकी बात करते थे और दूसरे देश उसका मजाक बनाते थे या कम से कम उसे गम्भीरता से नहीं लेते थे।“गुट-निरपेक्षता?” यह क्या है? आपको इस ओर होना चाहिए या उस ओर,” यह तर्क दिया जाता था। वह तर्क आज खत्म हो चुका है। पिछले कुछ वर्षों का पूरा इतिहास बताता है कि गुट-निरपेक्षता की अवधारणा के पक्ष में राय का विस्तार हो रहा है। क्यों? क्योंकि वह घटनाओं के क्रम के अनुरूप थी; चाहे सम्बंधित देश गुट-निरपेक्ष हो या न हो, वह लोगों के व्यापक बहुमत की सोच के अनुरूप थी, क्योंकि लोग शांति के लिए भूखे थे और उन्हें दोनों ही पक्षों की विशाल सेनाओं और परमाणु बमों वाली बात पसंद नहीं थी। इसलिए उनकी दृष्टि ऐसे देशों की ओर मुड़ी जिन्होंने इन गुटों के साथ पंक्तिबद्ध होने से मना कर दिया।

आज हम एक ऐसी स्थिति में आ पहुँचे हैं जहाँ शांति के लिए वार्ता के प्रयास और युद्ध के अलावा और कोई विकल्प बाकी नहीं रहा है। यदि लोग वार्ता करने से इन्कार कर देते हैं तो वे निःसंदेह युद्ध करेंगे। मुझे आश्चर्य होता है कि इतने महान देश अपने कठोर और अहंकारपूर्ण रवैए को इतना बड़ा और महत्वपूर्ण समझ लेते हैं कि वे उसे छोड़कर शांति के लिए वार्ता नहीं कर सकते। मैं कहना चाहूँगा कि ऐसे रवैये के कारण उनकी प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि मानव जाति का भविष्य दांव पर लगा है। यह हमारा दायित्व और जिम्मेदारी है कि हम उन्हें वार्ता करने के लिए कहें।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि इनमें से बहुत सी समस्याओं को हल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पूरी तरह निःशस्त्रीकरण किया जाए। मैं मानता हूँ कि विश्व शांति के लिए निःशस्त्रीकरण अत्यंत आवश्यक है। निःशस्त्रीकरण के बिना वर्तमान समस्याएं, भय और संघर्ष चलते रहेंगे। यदि यह सम्मेलन ऐसा चाहे तब भी हम एकदम तुरन्त निःशस्त्रीकरण हासिल नहीं कर सकते। फिलहाल हम इतना ही कर सकते हैं कि इन भयों और खतरों से उबरने के लिए वार्ता की आवश्यकता पर बल दें। यदि ऐसा किया जाता है तो उसके बाद आगे के कदम भी उठाए जा सकेंगे।

मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि यह बताना हमारा काम नहीं है कि जर्मनी या बर्लिन, जो वर्तमान तनाव का तात्कालिक कारण है, के बारे में क्या किया जाए। मुझे स्पष्ट महसूस होता है कि कुछ कड़वी सच्चाइयों को स्वीकार करना होगा। हमारे सामने दो स्वतंत्र स्थितियाँ हैं: जर्मनी के संघीय गणतंत्र की सरकार और जर्मन लोकतांत्रिक गणतंत्र की सरकार। अभी जो स्थिति है, उसमें हम देख रहे हैं कि बर्लिन का महान शहर को जैसे किसी अन्तरराष्ट्रीय सीमा ने बांट दिया है। बड़ी चिन्ताजनक स्थिति है, लेकिन वह है। बर्लिन का पश्चिमी भाग पश्चिम जर्मनी और पश्चिम के देशों के साथ जुड़ा है और वह उनकी पहुँच में है। मुझे खुशी है कि श्री ख्रुश्चेव ने स्वयं ऐसे संकेत दिए हैं कि आवाजाही पर नियंत्रण नहीं लगाया जाएगा और उसे उनके लिए अभी की ही तरह खुला रखा जाएगा। यदि इस बात को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया जाए और सभी सम्बंधित पक्ष इसका जिम्मा लें, तो मुझे लगता है कि चिन्ता और संघर्ष के एक प्रमुख कारण को दूर किया जा सकेगा। मैंने यह बात सिर्फ यह बताने के लिए कही है कि भले ही पूरी समस्या को हल न किया जा सकता हो, लेकिन लोगों के लिए चिन्ता का कारण बने हुए बहुत से बड़े मुद्दों को हल किया जा सकता है।

दुनिया के हित में सबसे ज़रूरी बात आज यह है कि मुद्दे से सीधे सम्बंध रखने वाली महाशक्तियाँ आपस में मिलें और शांति स्थापित करने की इच्छाशक्ति दिखाते हुए वार्ता करें। और यदि ऐसे कदम के समर्थन में यह सम्मेलन अपनी ताकत लगा देता है तो यह एक ऐसा सकारात्मक कदम होगा जो हम मदद करने की दृष्टि से उठाएंगे।

क्या मैं ऐसा कहूँ कि हाल में सोवियत सरकार द्वारा परमाणु परीक्षण शुरू करने का निर्णय लिए जाने से युद्ध के खतरे की छाया और नज़दीक बढ़ आई है? मुझे इस बात का गहरा खेद है क्योंकि इसकी देखा-देखी दूसरे देश भी परीक्षण करने लगेंगे, और परमाणु युद्ध के अन्तर्जात खतरे के अलावा ऐसा करना हमें युद्ध के खतरे के बेहद नज़दीक ले जाएगा। इसलिए यह और भी आवश्यक हो गया है कि वार्ता की प्रक्रिया अविलम्ब शुरू की जाए।

और अब मैं हमारी कुछ दूसरी समस्याओं के बारे में संक्षेप में बात करना चाहूँगा। यहाँ ऐसे बहुत से देशों के प्रतिनिधि उपस्थित हैं जो हाल ही में स्वतंत्र हुए हैं। उनके सामने बहुत बड़ी-बड़ी समस्याएं हैं और सबसे बढ़कर आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सफल होने की समस्या है, क्योंकि इनमें से अधिकांश देश अल्प-विकसित हैं। ऐसी स्थिति में यह सही और उचित होगा कि सम्पन्न देश इस प्रक्रिया में उनकी सहायता करें। कुछ हद तक उन्होंने ऐसा किया भी है। मैं मानता हूँ कि उन्हें इस दृष्टि से और सहायता करनी चाहिए, लेकिन अन्ततः स्वयं को सफल करने का दायित्व उन देशों के लोगों का ही होगा। हममें से प्रत्येक के देश को इस समस्या का सामना करना है।

यहाँ कुछ ऐसे देशों का भी प्रतिनिधित्व है जो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अल्जीरिया एक ऐसा ही देश है जिसने मनुष्यों की जान और तकलीफों के रूप में अपनी आजादी के संघर्ष में बहुत बड़ी कीमत चुकाई है और फिर भी वह अभी तक अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका है। फिर ट्यूनिशिया है जिसका अनुभव असाधारण रहा है। मैं विशेष तौर पर यहाँ बिज़ार्ता का उल्लेख कर रहा हूँ जोकि एक विदेशी सैन्य संचालन का अड्डा है, क्योंकि मुझे तो विदेशी सैन्य अड्डे का विचार ही बड़ा अजीबोगरीब लगता है। इसके अलावा कांगो की अपनी समस्याएं हैं। अंगोला की विभीषिका है। वह एक ऐसी बन्द किताब है जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

फिर पूर्वी अफ्रीका की स्थिति की बात करें तो वहाँ तंगान्यिका जैसे देश हैं जिन्हें आजादी का आश्वासन दिया गया है। मध्य अफ्रीका की स्थिति अच्छी नहीं है। दक्षिण की ओर दक्षिण अफ्रीका जातीय अहंकार, जातीय भेदभाव का सबसे बड़ा प्रतीक है, और रंगभेद एक ऐसा बर्ताव है जिसे हममें से कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता है। और इसे दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका पर संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों को चुनौती के रूप में थोपा गया है! हमारे सामने इतनी सारी समस्याओं का झुंड खड़ा है। और हमें इन सबका सामना करना है।

आज दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नई और शक्तिशाली ताकतों का उदय हो रहा है। हमें नई दुनिया के बारे में सोचना है। इसमें संदेह नहीं है कि पुरानी साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी जीवनशैली खत्म हो जाएगी। लेकिन नई ताकतें दूसरों को हमारे ऊपर अपना आधिपत्य जमाने में मदद कर सकती हैं, और निश्चित तौर पर अल्प विकसित और पिछड़े देशों पर ऐसा करने का प्रयास किया जाएगा। इसलिए पिछड़े बने रहना हमारे हित में नहीं है।

हमें अपने देशों में ऐसे समाजों का विकास करना है जहाँ सच्ची आज़ादी हो। आजादी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें बल मिलेगा और समृद्ध समाजों की रचना करने में सहायता मिलेगी। जब हम इन बुनियादी समस्याओं के बारे में विचार करते हैं तो युद्ध पहले से भी बड़ी नादानी दिखाई देता है। यदि हम युद्ध को न टाल पाए तो हम अपनी समस्याओं से नहीं निपट सकते। लेकिन यदि हम युद्ध को टाल सकें तो हम अपनी दूसरी समस्याओं की ओर ध्यान दे सकते हैं। हम दुनिया के दूसरे हिस्सों में साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी शासन के अधीन लोगों को आज़ाद करवा सकते हैं और अपने-अपने देशों में स्वतंत्र औ समृद्ध समाजों की रचना कर सकते हैं। यह एक सकारात्मक काम है जो हम कर सकते हैं। इसलिए मैं इस सभा में आग्रह करता हूँ कि आज हमें युद्ध के इस बड़े खतरे को दूर करने पर सबसे अधिक ज़ोर देना चाहिए। यह न केवल हमारा आवश्यक दायित्व है, बल्कि यदि हम ऐसा कर सके तो हम लाखों-करोड़ों लोगों की सोच के अनुरूप होंगे। गुट-निरपेक्षता को इस बात से बल मिला है कि लाखों लोग असम्बद्ध हैं और वे युद्ध नहीं चाहते हैं।

आइए, हम सब इस ताकत का सही इस्तेमाल करें और विनय और मित्रता का व्यवहार करें ताकि हम उन लोगों को प्रभावित कर सकें जिनके हाथ में युद्ध और शांति का निर्णय करने की ताकत है। हम कोशिश करें कि यदि हम युद्ध को हमेशा के लिए न टाल सकें तो कम से कम उसे कुछ समय के लिए पीछे धकेल सकें ताकि तब तक दुनिया परस्पर सहयोग करने का सबक सीख सके।