नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



भारत क्या है? यह प्रश्न बार बार मेरे मन में उठता है। हमारे इतिहास के प्रारम्भिक दौर की जानकारी मुझे विस्मय में डाल देती थी। यह एक ऐसी साहसी और उद्यमशील जाति का इतिहास था जो अन्वेषण की भावना और स्वतंत्र अनुसंधान की तीव्र इच्छा से प्रेरित थी और ज्ञात प्राचीनतम काल में भी एक परिपक्व और सहिष्णु सभ्यता होने का प्रमाण देती थी। जीवन और उसके आनन्द और कष्टों को स्वीकार करते हुए यह सभ्यता परम और सार्वभौमिक तत्व की खोज करने वाली थी। उसने महान संस्कृत भाषा का विकास किया और इस भाषा, अपनी कलाओं और वास्तुकला के माध्यम से उसने सुदूर देशों तक अपना संदेश पहुँचाया। यहाँ उपनिषदों की रचना की गई, गीता और बुद्ध के संदेश दिए गए।

आज हमारे भीतर और हमारे देश में ये सब विशेषताएं विद्यमान हैं। हमने परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति की है तो हमारे यहाँ गाय के गोबर के युग की संस्कृति भी जीवित है।

हमारे इस उथल-पुथल और क्रमभंग के युग में, हम दोनों ओर देख रहे हैं, हमारे आगे हमारा भविष्य है और पीछे हमारा अतीत है और हम दोनों ओर खिंच रहे हैं। हम इस द्वंद्व का समाधान किस प्रकार करें और किस प्रकार ऐसी व्यवस्था बनाएं कि हमारी भौतिक आवश्यकताएं भी पूरी हों और साथ ही हमारे चित्त और आत्मा का भी पोषण हो? हम अपने लोगों के सामने ऐसे कौन से नए सिद्धान्त या नए युग के लिए अनुकूलित किए गए पुराने सिद्धान्त प्रस्तुत करें ताकि हम लोगों को जागृत और कर्म के लिए प्रेरित कर सकें?

दुनिया में अन्य स्थानों की ही भांति भारत में भी दो सशक्त भावनाओं का उदय हुआ है – राष्ट्रवाद का विकास और सामाजिक न्याय की तीव्र उत्कंठा। समाजवाद और मार्क्सवाद सामाजिक न्याय की इस इच्छा के प्रतीक बने और अपने वैज्ञानिक कलेवर के अलावा उन्होंने भावनात्मक स्तर पर भी जनसाधारण को अपनी ओर आकर्षित किया।

जीवन बदलती हुई परिस्थितियों के प्रति सतत समायोजन की प्रक्रिया है। पिछले पचास वर्षों में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेज़ी से हुए बदलावों ने सामाजिक बदलाव की इस आवश्यकता को और भी बढ़ा दिया है, और अनैक्य या असमायोजन लगातार बढ़ रहा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति निश्चित तौर पर दुनिया की अधिकांश आर्थिक समस्याओं, विशेष तौर पर दुनिया भर में सभी के लिए आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की समस्या को हल करने की क्षमता रखती है। इसके लिए अपनाए जाने वाले तरीकों को सम्बंधित देश या समुदाय की पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना होगा।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आज प्रमुख समस्या विश्व शांति को लेकर है। हमारे पास एकमात्र उपलब्ध विकल्प यह है कि विश्व को यथास्थिति में स्वीकार किया जाए और एक-दूसरे के प्रति सहनशीलता बरती जाए। प्रत्येक देश को यह छूट होनी चाहिए वह दूसरे देशों के अनुभव से सीखते हुए अपने ढंग से अपना विकास करे, और हम उस पर अपनी राय न थोपें। मूलतः, इसके लिए एक नए मानसिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पंचशील या पाँच सिद्घान्तों में यह तरीका सुझाया गया है।

राष्ट्र के भीतर भी संघर्ष उत्पन्न होते हैं। वयस्क मताधिकार की व्यवस्था वाली लोकतांत्रिक प्रणाली में इन टकरावों को सामान्य संवैधानिक तरीकों से हल किया जा सकता है।

भारत में हमें प्रान्तीयता या भाषा के नाम पर टकराव के सबसे अधिक तकलीफदेह टकराव देखने के लिए मिले हैं। मुख्यतः समस्या आज वर्ग के हितों के टकराव के कारण उत्पन्न होती है, और ऐसे मामलों में निहित स्वार्थों को समाप्त करना आसान नहीं होता है। लेकिन हमने भारत में देखा है कि पुराने रजवाड़ों, बड़ी जागीरदारियों, तालुकादारों और ज़मींदारों के निहित स्वार्थों को शांतिपूर्ण तरीकों से खत्म किया जा चुका है, हालाँकि इसके लिए हमें एक ऐसी सुस्थापित व्यवस्था को खत्म करना पड़ा जो केवल कुछ चुनिंदा लोगों के हितों की ही हिमायत करती थी। जहाँ हमें यह समझना होगा कि वर्ग संघर्ष हैं, वहीं हमें यह भी समझना होगा कि इनसे निपटने के लिए शांतिपूर्ण तरीकों का प्रयोग न किए जाने का कोई कारण नहीं है। लेकिन ये तरीके तभी सफल होंगे जब हमारे सामने एक स्पष्ट लक्ष्य हो जिसे लोग आसानी से समझ सकें।

भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद द्वारा प्रकाशित ‘इंडिया टुडे एंड टुमौरो’, आज़ाद मैमोरियल लैक्चर्स, नई दिल्ली, 22 तथा 23 फरवरी, 1959 से उद्धृत