नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



इन दिनों मुझे अक्सर ही किसी नए कार्य के उद्घाटन या किसी अन्य के पूरा हो जाने के अवसर पर आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलता रहता है। आज आप, मैं और यहाँ उपस्थित सभी लोग एक ऐसे ही अवसर पर एकत्र हुए हैं। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि आप इस अवसर पर आप अपने दिल और दिमाग में कैसा अनुभव करते हैं, क्योंकि मेरे दिल-दिमाग में एक अजीब से उल्लास और उत्साह का भाव है, और कई तरह की तस्वीरें मेरे सामने उभर रही हैं। हमने जो सपने देखे थे उनमें से बहुत से निकट आ रहे हैं और साकार हो रहे हैं। इन सपनों को साकार करने के ले हम एक-दूसरे की प्रशंसा कर सकते हैं, और जिन लोगों ने अच्छा कार्य किया है वे प्रशंसा के हकदार हैं। लेकिन जब प्रशंसा के हकदार लोगों की संख्या हज़ारों में, बल्कि लाखों में हो, तब कितने लोगों की प्रशंसा की जा सकती है?

जो प्रशंसा के पात्र हों, हमें उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। आज जिस कार्य को हम देख रहे हैं और जिसके उद्घाटन के कार्यक्रम में हम भाग ले रहे हैं, वह कार्य हमारे व्यक्तिगत स्वार्थों से बहुत बड़ा है। यह अद्भुत है। मैं कह चुका हूँ कि मैं, और निःसंदेह आप लोगों में से भी बहुत से लोगों को ऐसे विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलता रहता है। किसी स्थान पर शिलान्यास होता है; तो और कहीं किसी भवन, किसी अस्पताल, किसी स्कूल या विश्वविद्यालय का उद्घाटन हो रहा होता है। बड़े-बड़े कारखाने लग रहे हैं। देश भर में ये सब काम चल रहे हैं क्योंकि भारत माता बहुत सी चीज़ें बना रही है। उनमें भाखड़ा-नांगल का स्थान विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है – भाखड़ा-नांगल जहाँ एक छोटा सा गाँव हुआ करता था, लेकिन आज यह नाम देश भर में और दुनिया के कुछ हिस्सों में भी गूँज रहा है, क्योंकि यह एक बड़ा काम है, एक महान उद्यम का प्रतीक है।

करीब पचास साल पहले एक अंग्रेज़ व्यक्ति यहाँ आया था और पहली बार उसने यह विचार किया कि इस स्थान पर कुछ काम किया जा सकता है, लेकिन वह विचार साकार नहीं हो सका। इस मामले को कई बार उठाया गया। कुछ कच्ची योजनाएं भी बनीं लेकिन उन पर आगे कार्रवाई नहीं की गई। उसके बाद भारत आजाद हुआ। और आज़ादी की इस प्रक्रिया में पंजाब को भारी आघात और गहरे घाव सहने पड़े। लेकिन इस आघात और ज़ख्मों के बावजूद आज़ादी अपने साथ एक नई ताकत, एक नया उत्साह लेकर आई थी। और इसलिए उन घावों, चिन्ताओं और विपत्तयों के बावजूद इस बड़े उद्यम को शुरू करने का उत्साह जागा। और हमने इस काम को अपने हाथों मे ले लिया। मैं यहाँ आता रहा हूँ। आपमें से बहुत से लोग भी यहाँ आए होंगे और इस धीरे-धीरे बदलती तस्वीर को देखकर आपको अपने भीतर उत्साह की उत्तेजना महसूस हुई होगी। यह कितना विशाल, कितना शानदार उद्यम है – एक ऐसा उद्यम जिस कोई ऐसा राष्ट्र ही कर सकता है जो विश्वास और साहस से भरपूर हो! यह उद्यम अकेले पंजाब का, या पटियाला तथा पूर्वी पंजाब राज्य संघ, या पड़ोसी राज्यों का ही उद्यम नहीं है, बल्कि पूरे भारत देश का उद्यम है।

भारत ने और भी बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का निर्माण किया है जो इससे बहुत छोटी नहीं हैं। दामोदर वैली, हीराकुद और दक्षिण की बड़ी परियोजनाएं तेज़ गति से आगे बढ़ रही हैं। हर दिन योजनाएं तैयार की जा रही हैं क्योंकि हम जल्दी से जल्दी एक नए भारत का निर्माण करना चाहते हैं, उसे आगे ले जाना चाहते हैं, उसे मज़बूत बनाना चाहते हैं और उसके लोगों की गरीबी को दूर करना चाहते हैं। ये सब कार्य हम कर रहे हैं, और कई मायनों में भाखड़ा-नांगल इनमें सबसे बड़े उद्यमों में से एक होगा, क्योंकि वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद आज यहाँ इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए हर बड़ा कदम उठाया जा रहा है। भारत में पूरा किए जाने वाला हर कार्य नए कार्यों को करने के लिए राष्ट्र को नई ऊर्जा देता है। भाखड़ा- नांगल सिर्फ इसलिए एक मील का पत्थर नहीं है क्योंकि यहाँ से बहने वाला पानी पंजाब, पटियाला तथा पूर्वी पंजाब राज्य संघ, राजस्थान की ज़मीन के एक बड़े भाग की सिंचाई करेगा और राजस्थान के रेगिस्तान को उपजाऊ बनाएगा, या इसलिए क्योंकि यहाँ इतनी बिजली का उत्पादन हो सकेगा कि हज़ारों कारखानों और कुटीर उद्योंगों को चलाया जा सके जो लोगों को रोजगार उपलब्ध कराएंगे और उनकी बेरोज़गारी को दूर करेंगे। यह इसलिए एक मील का पत्थर है क्योंकि यह राष्ट्र की मज़बूती, दृढ़ता और साहस के साथ आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति का प्रतीक है। और इसीलिए इसे देख कर मेरा हौसला और मेरी ताकत बढ़ी है, क्योंकि अपने सपनों को सच करने और उन्हें मूर्त रूप देने से बढ़कर उत्साहजनक और कुछ नहीं हो सकता।

नांगल आने से ठीक पहले मैं भाखड़ा में था जहाँ बाँध का निर्माण किया जा रहा है। मैंने सतलज नदी के किनारे खड़े होकर बाईं और दाहिनी ओर फैले पहाड़ों को देखा। दूर, अलग-अलग स्थानों पर लोग काम कर रहे थे। चूँकि वह छुट्टी का दिन था, वहाँ बहुत अधिक काम नहीं चल रहा था क्योंकि सभी लोग यहाँ आए हुए थे। फिर भी वहाँ कुछ लोग काम कर रहे थे। दूर से देखने पर वे उस विशाल पर्वत की तुलना में बहुत छोटे दिखाई दे रहे थे जिसमें से काटकर एक सुरंग बनाई जा रही थी। मेरे मन में यह विचार आया कि इन्हीं लोगों पर्वत के खिलाफ संघर्ष करके उसे नियंत्रित कर लिया है।

अभी केवल आधा काम ही हुआ है। हम इतने काम को पूरा कर लिए जाने का जश्न मना सकते हैं लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि जिस बाँध के बारे में आपने बहुत कुछ सुन रखा है, उसका निर्माण करने का सबसे कठिन काम अभी बाकी है। हमारे इंजीनियर हमें बताते हैं कि दुनिया में सम्भवतः इतनी ऊँचाई पर कहीं भी बाँध नहीं बनाया गया है। यह काम मुश्किलों और जटिलताओं से भरा है। उस निर्माण स्थल पर घूमते हुए मेरे मन में यह खयाल आया कि इस युग में सबसे बड़ा मन्दिर और मस्जिद और गुरुद्वारा वही है जहाँ मनुष्य मानवजाति के कल्याण के लिए काम करता है। इससे महान जगह और कौन सी होगी, इस भाखड़ा-नांगल से, जहाँ हज़ारों-लाखों लोगों ने परिश्रम किया है, अपना खून-पसीना बहाया है और अपनी जानें तक कुर्बान की हैं? इससे ऊँचा स्थान और क्या होगा जिसे हम अधिक महान या पवित्र कह सकें?

और फिर मुझे यह खयाल भी आया कि भाखड़ा-नांगल एक बड़े विश्वविद्यालय के जैसा है जहाँ हम काम कर सकते हैं और काम करते हुए सीख भी सकते हैं, ताकि हम और भी बड़े काम कर सकें। देश आगे बढ़ रहा है और हर दिन के साथ उसकी प्रगति की रफ्तार भी बढ़ रही है। जैसे-जैसे हम काम को सीख रहे हैं और अनुभव हासिल कर रहे हैं, हमारी प्रगति भी तेज़ होती जा रही है। भाखड़ा-नांगल केवल वर्तमान समय के लिए किया गया कार्य नहीं है, क्योंकि जो काम हम अभी कर रहे हैं वह हमारे जीवनकाल के लिए ही नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और सदियों के लिए भी है।

सतलज नदी को देखकर मेरे मन में एक और विचार आया। यह नदी कहाँ से आई है? वह कौन से मार्ग से बहती हुई यहाँ तक पहुँची है? क्या आप जानते हैं कि सतलज की उत्पत्ति कहाँ से होती है? इसका उद्गम स्थल मानसरोवर के आसपास कैलाश पर्वत पर है। वहीँ पास से सिंधु नदी की भी उत्पत्ति होती है जहाँ से ये नदियाँ हज़ारों मील का सफर तय करती हुईं भारत और पाकिस्तान पहुँचती हैं। ब्रह्मपुत्र नदी भी वहीं से बहती हुई एक दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। दूसरी नदियाँ भी आसपास के क्षेत्र से उत्पन्न होती हैं और तिब्बत से होती हुई चीन की ओर बहती हैं। इस प्रकार सतलज हिमालय से सैकड़ों मील का सफर तय करती हुई हम तक यहाँ पहुँचती है और हमने अनुकूल ढंग से उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया है। आपने दिशा बदलने वाली दोनों बड़ी-बड़ी नहरों को देखा है। अभी के लिए पूरी नदी की दिशा को एक नहर के माध्यम से मोड़ा गया है। बरसात का मौसम बीतने के बाद नदी को पूरी तरह इन दोनों नहरों में मोड़ दिया जाएगा ताकि वहाँ बाँध का निर्माण किया जा सके।

मैं दूर तक देखने का प्रयास करता हूँ, केवल भाखड़ा-नांगल ही नहीं बल्कि पूरे भारत देश की तरफ जिसकी हम सन्तानें हैं। देश किस दिशा में बढ़ रहा है? हमें उसे कहाँ ले जाना है, हमें किस दिशा में चलना है और कौन-कौन से बड़े कार्य करने हैं? इनमें से कुछ कार्य हमारे जीवनकाल में ही पूरे हो जाएंगे। बाकी के कार्यों को हमारे बाद आने वाले लोग शुरू करेंगे और उन्हें पूरा भी करेंगे। एक प्राणवान राष्ट्र की प्रगति की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है और इसे कोई नहीं रोक सकता है। हमें आगे बढ़ना है। प्रश्न यह है कि हम किस दिशा में बढ़ें, कैसे आगे बढ़ें, किन सिद्धान्तों और उद्देश्यों को लेकर आगे बढ़ें? ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़े हैं। यह अवसर उनके बारे में बात करने का नहीं है लेकिन हमें इन्हें हमेशा याद रखना चाहिए और कभी भूलना नहीं चाहिए। जब हम कोई बड़ा काम करने का संकल्प लेते हैं तो हमें उदार मन से ऐसा करना चाहिए। तुच्छ विचारों वाले लोग या संकीर्ण दृष्टिकोण वाले राष्ट्र कभी कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। बड़े काम को देखकर उनके साथ-साथ हमारा कद भी बढ़ जाता है, और हमारा दृष्टिकोण थोड़ा और व्यापक हो जाता है।