नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



मैंने कल ही कहीं पढ़ा कि मेरे मित्र और पुराने सहयोगी, जयप्रकाश नारायण ने हाल में* कहा है कि – मुझे उनके शब्द याद नहीं हैं- कि मुझे कांग्रेस के लिए मज़बूत विपक्ष स्थापित या तैयार करने के लिए सहायता करनी चाहिए। यह बड़े अजीब किस्म का अनुरोध है। मैं किसी भी सरकार में पूरी तरह विश्वास करता हूँ, भले ही कोई भी सरकार हो, भले ही उसके आलोचक बहुत कड़े हों, और भले ही उसे विरोध का सामना करना पड़ता हो। आलोचना के बिना लोग और सरकारें आत्मसंतुष्ट और असावधान हो जाते हैं। संसदीय लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था ही ऐसी आलोचना पर टिकी है। प्रैस भी आलोचना करती है। ऐसी स्थिति हमारे लिए बहुत खराब होगी जब प्रैस आलोचना करने के लिए स्वतंत्र न हो, यदि लोगों को खुलकर अपनी बात कहने और आलोचना करने की इजाज़त न हो। ऐसी सरकार संसदीय व्यवस्था वाली सरकार नहीं होगी। और न ही ऐसा लोकतंत्र सच्चा लोकतंत्र होगा। मैं संसद में आलोचना का स्वागत करता हूँ। दरअसल, हम अपने ही दल के सदस्यों की आलोचना का स्वागत करते हैं। हमारे अपने दल में सरकार की नीतियों की आलोचना करने के लिए बहुत गुंजाइश है। लेकिन जब जयप्रकाशजी मुझसे यह कहते हैं कि मैं एक विपक्ष तैयार करूँ, तो क्या वे मुझसे यह अपेक्षा रखते हैं कि मैं कांग्रेस का विरोध करने के लिए एक नकली विपक्ष तैयार करूँ? ऐसे विपक्ष का क्या तो मूल्य होगा और क्या उसकी नैतिकता होगी?

मेरा खयाल है कि उन्होंने तुर्की के महान नेता कमाल अतातुर्क का उदाहरण दिया है। जयप्रकाशजी के प्रति पूरे सम्मान के साथ मैं कहना चाहूँगा कि यह अच्छा उदाहरण नहीं है। तुर्की में किसी प्रकार का लोकतंत्र नहीं था, वास्तविक या बनावटी। वहाँ तानाशाही थी। क्या वे चाहते हैं कि भारत में भी वैसा ही हो? आशय यह है कि प्रैस में और दूसरे मंचों पर अपनी राय प्रकट करने की और चुनाव लड़ने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए। मैं तो पी.एस.पी. या कम्यूनिस्ट पार्टी के लिए चुनाव प्रचार नहीं कर सकता हूँ। लेकिन उन्हें पूरी आज़ादी है कि वे ऐसा कर सकते हैं। चुनाव आयोग सरकार से स्वतंत्र संस्था है। आपको पूरी आजादी है, आप सभी को आज़ादी है कि आप जिसे चाहें उसके पक्ष में मतदान करें। आप जानते हैं कि इसमें दबाव या ज़बरदस्ती का कोई प्रश्न नहीं है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहूँगा कि भारत में हमें दुनिया के लगभग किसी भी दूसरे देश की तुलना में चुनाव की दृष्टि से या दूसरे मामलों में ज़्यादा आजादी है। ऐसे कुछ देश हो सकते हैं जहाँ हमारे जितनी ही आज़ादी हो। लेकिन उससे कहीं बहुत ज़्यादा संख्या ऐसे देशों की है जहाँ ऐसी आजादी नहीं है। हमें वह आजादी है और हमें उस पर गर्व है और मुझे पूरा विश्वास है कि वह आजादी बनी रहेगी। मैं चाहता हूँ कि हर तरह के विरोधी लोगों के सामने जाकर उनका समर्थन माँगें। यदि लोग उनके पक्ष में वोट न दें तो क्या मैं उन्हें उस विरोधी के लिए वोट करने के लिए विवश करूँ?

जयप्रकाशजी कहते हैं कि यदि कांग्रेस पराजित होती है तो यह उसके लिए अच्छा होगा, लेकिन इसका फैसला हमें नहीं, बल्कि लोगों को करना है। सवाल यह है कि देश के लिए क्या अच्छा है, न कि कांग्रेस के लिए क्या अच्छा है। जयप्रकाशजी जैसे हमारे मित्र कांग्रेस के प्रति अपनी नफरत में इतने उलझ गए हैं कि उन्होंने भारत और भारत के हित जैसी चीज़ों को भुला ही दिया है। मेरा विश्वास है कि यदि दुर्भाग्य से कांग्रेस की पराजय हुई तो यह भारत के लिए बहुत बुरा होगा। मेरा कहने का यह मतलब नहीं है कि कांग्रेसीजन दूसरों से बेहतर लोग होते हैं। दूसरे संगठनों में भी अच्छे लोग हैं। दूसरे संगठनों में भी देशभक्त लोग हैं। यह व्यक्तिगत मित्रता का प्रश्न नहीं है; यह राष्ट्रीय हित का सवाल है। कल्पना कीजिए कि संसद में मजबूत कांग्रेस पार्टी के बजाए दर्जन भर या बीस छोटे-छोटे समहू होते और उनमें से किसी का भी बहुमत न होता। तब क्या होता? कोई स्थिर सरकार नहीं बन पाती और हर छोटा दल दूसरे दलों के साथ षड़यंत्र करने में लगा होता। ऐसे लोगों को मंत्रीपद देने के प्रस्ताव दिए जाते जो अपने दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल होने के लिए तैयार हों। जब सभी तरह के दल हों और उनमें से किसी भी दल का बहुमत न हो तो फिर अन्ततः यही होता है। मैं ऐसे उदाहरण गिना सकता हूँ जहाँ स्थिर सरकार न होने के कारण देश विफल हो रहे हैं। एक ऐसे समय में जब हम दूसरी पंचवर्षीय योजना की बात कर रहे हैं, जब देश की ऊर्जा विकास के काम में लगनी चाहिए, जब पाकिस्तान जोरशोर से जिहाद और युद्ध की बात उठा रहा है, उस समय क्या हम बेमेल समूहों को लेकर प्रयोग करने के बारे में सोच सकते हैं? मुझे आश्चर्य और हैरानी होती है कि व्यावहारिक समझ वाला कोई व्यक्ति एक ऐसी बात कह रहा है जिसमें भारत की कड़वी सच्चाइयों की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है। कड़वी सच्चाई यह है कि हमें एक विशाल विरोधी से लड़ना है, कोई राजनैतिक दल नहीं, बल्कि हमारी अपनी विफलताएं, हमारी अपनी गलतियों की जवाबदेही, हमारी व्यवधानकारी प्रवृत्तियाँ, हमारी साम्प्रदायिकता, हमारा प्रान्तीयतावाद, हमारा जातिवाद, हिंसा पर उतारू होने की हमारी प्रवृत्ति और भी ऐसी बहुत सी बातें। इतिहास बताता है कि हमारा झुकाव व्यवधानकारी, विखंडनकारी प्रवृत्तियों की ओर बहुत अधिक रहा है। और यदि भारत में ब्रिटिश शासन ने कोई अच्छा काम किया तो वह यह था कि उसने हमें अपने संघर्ष के लिए एकजुट कर दिया। लेकिन वास्तव में पहली बार व्यापक आधार पर इस एकता को कायम करने का काम गाँधीजी ने कांग्रेस में रहते हुए ही किया था। उसके परिणाम भी मिले, लेकिन आपने देखा है कि वह एकता कितनी जल्दी बिखर जाती है। राज्यों के पुनर्गठन के मामले को ही लें। वह निर्णय भले ही सही रहा हो या गलत, लेकिन लोगों द्वारा इसके कारण बड़े पैमाने पर हत्याएं, आगजनी और हिंसा किया जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। क्या यह हमारे भीतर की कमज़ोरी को नहीं दर्शाता है? बेशक, हो सकता है कि ऐसा राजनैतिक कारणों से किया गया हो, क्योंकि चुनाव नज़दीक थे। मैं जयप्रकाशजी के सामने यह बात रखना चाहता हूँ क्योंकि उनकी अपनी पार्टी – पी.एस.पी. – ने इस आन्दोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी। यहाँ मैं किसी भी प्रकार से इस मामले में उनके दृष्टिकोण या राज्यों की सीमाओं सम्बंधी आन्दोलन में उनकी भागीदारी की आलोचना नहीं कर रहा हूँ। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि ऐसा करके, और जिस ढंग से उन्होंने ऐसा किया, उन्होंने व्यवधान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया, जोकि भारत के लिए सबसे खतरनाक प्रवृत्तियों में से एक है।

आइलैंड ग्राउंड, मद्रास में 31 जनवरी, 1957 को दिए गए भाषण से उद्धृत। *28 जनवरी, 1957 को बेगूसराय, बिहार में बोलते हुए प्रजा समाजवादी नेता श्री जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि प्रधानमंत्री नेहरू को देश में एक मज़बूत विपक्षी दल को विकसित करने में सहायता करनी चाहिए।