नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



हमने भी इसे चुना – जहाँ उचित हो हमें श्रेय देना चाहिए – क्योंकि हमने दूसरे देशों, विशेष तौर पर यूनाइटेड किंगडम में इसकी कार्य पद्धति की प्रशंसा की।

इस, प्रकार हमारी यह संसद और लोकसभा हमारे प्रक्रिया के नियमों और कार्य पद्धति की दृष्टि से कुछ हद तक ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के जैसी हो गई।

संसदीय लोकतंत्र के लिए कई प्रकार के गुण आवश्यक होते हैं। बेशक उन गुणों में योग्यता भी शामिल है। उसके लिए कार्य के प्रति समर्पण भाव आवश्यक होता है। लेकिन उसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में सहयोग, आत्मानुशासन, संयम की भी आवश्यकता होती है। यह बात स्पष्ट है कि इस जैसी कोई सभा प्रत्येक दल में सहयोग की भावना, बहुत सारे संयम और आत्मानुशासन के बिना अपना कोई कार्य नहीं कर सकती है। संसदीय लोकतंत्र कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे किसी देश में जादू की छड़ी घुमाकर उत्पन्न किया जा सकता हो। हम अच्छी तरह जानते हैं कि दुनिया में ऐसे देशों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है जहाँ संसदीय लोकतंत्र बहुत सफलतापूर्वक चल रहा हो। मैं समझता हूँ कि ऐसा कहने में कोई पक्षपात नहीं होगा कि इस देश में वह काफी सफलता से चल रहा है। क्यों? इतना इसलिए नहीं कि इस सभा के हम सदस्य लोग बुद्धिमत्ता के प्रतिमान हैं, बल्कि मेरे विचार से ऐसा हमारे देश की पृष्ठभूमि के कारण हुआ है, और इसलिए क्योंकि हमारे लोगों में लोकतंत्र की भावना है।

हमें याद रखना होगा कि संसदीय लोकतंत्र का क्या अर्थ होता है, वह भी सामान्य स्थिति की तुलना में बदलाव और उत्तेजना और उबाल के इस दौर में। भले ही पुरानी व्यवस्था अच्छी भी हो तब भी उसे नई व्यवस्था के लिए स्थान छोड़ना पड़ता है, ताकि ऐसा न हो कि कोई अच्छी परिपाटी भी दुनिया को भ्रष्ट न कर दे। बदलाव तो होना ही चाहिए, बदलाव आवश्यक है, विशेष तौर पर भारत जैसे देश में जहाँ लम्बे समय से कोई कमोबेश कोई बदलाव नहीं हुआ है, बदलाव नहीं होने का कारण केवल इतना ही नहीं है कि हमारे देश की गतिशीलता को विदेशी आधिपत्य ने सीमित, संकुचित और नियंत्रित कर रखा था, बल्कि इसलिए भी क्योंकि हम स्वयं अपने मनों मे, अपने सामाजिक तानेबाने में अपनी ही बनाई हुई लीक में फंस कर रह गए थे। इसलिए हमें अपनी आत्मा को इन लीकों से और विदेशी शासन द्वारा थोपी गईं अक्षमताओं और बंदिशों से बाहर निकालने के की आवश्यकता थी। समय के साथ चल पाने के लिए हमें तेज़ी के साथ बदलाव करने पड़े।

लेकिन जहाँ बदलाव आवश्यक है वहीं एक और गुण है जिसकी आवश्यकता है – एक निरन्तरता। बदलाव और निरन्तरता के बीच हमेशा संतुलन कायम करने की आवश्यकता होती है। कोई भी एक दिन किसी दूसरे दिन के जैसा नहीं होता है। हम हर दिन और पुराने हो जाते हैं। फिर भी हमारे अस्तित्व में एक नैरन्तर्य होता है, एक राष्ट्र के जीवन का अविच्छिन्न सातत्य। इन प्रक्रियाओं के बीच कितना संतुलन है इसके आधार पर तय होगा कि किसी देश का विकास कितनी मजबूत नींव पर होगा। यदि कोई बदलाव न हो और केवल निरन्तरता हो, तब ठहराव आ जाता है और अवनति होती है। यदि केवल बदलाव हो और निरन्तरता न हो, तो उसका अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना होता है और कोई भी देश या समूह उस ज़मीन से कट कर बहुत लम्बे समय तक नहीं रह सकता जिसने उसे जन्म दिया हो उसका पालन-पोषण किया हो।

संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली में परिवर्तन और निरन्तरता के ये सिद्धान्त निहित होते हैं। और इस प्रणाली के अन्तर्गत काम करने वाले लोगों, सभा के सदस्यों और इस व्यवस्था का भाग करने वाले अनेकानेक लोगों पर यह निर्भर करता है कि वे परिवर्तन की गति को निरन्तरता के सिद्धान्त का पालन करते हुए अपनी आवश्यकतानुसार बढ़ा सकते हैं। यदि सातत्य टूट जाए तो हम जड़हीन हो जाते हैं और संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती है। संसदीय लोकतंत्र एक नाज़ुक पौधा होता है यह हमारी सफलता का ही परिणाम है कि यह पौधा पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुआ है। हमने कठिन और गम्भीर समस्याओं का सामना किया है, और उनमें से बहुत सी समस्याओं को हल किया है; लेकिन बहुत सी समस्याओं को सुलझाना अभी भी बाकी है। यदि कोई समस्या न रहे, तो यह निष्प्राण हो जाने की निशानी है। निष्प्राण लोग ही समस्याओं से रहित होते हैं; जीवित लोगों की समस्याएं होती हैं और वे उन समस्याओं से जूझकर और उनके ऊपर विजय प्राप्त करके स्वयं को विकसित करते हैं। इस राष्ट्र के विकास की यह निशानी है कि हम न केवल समस्याओं को हल करते हैं, बल्कि हल करने के लिए नई समस्याएं भी उत्पन्न करते हैं।

लोकसभा में दिया गया भाषण, 28 मार्च, 1957