नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



अपने ग्यारह वर्षों के अस्तित्व की अवधि में संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रगति की है। इस वर्ष विशेष तौर पर वैश्विक मामलों में उसकी स्थिति और भी महत्वपूर्ण हो गई है। निःसंदेह, यदि संयुक्त राष्ट्र संघ ने कोई बहुत महान कार्य भी न किया होता तब भी विश्व के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का विशेष महत्व रहा है।

लेकिन हाल के समय में संयुक्त राष्ट्र ने यह दिखा दिया है कि वह साहसपूर्वक समस्याओं का सामना कर सकता है और उनके अन्तिम समाधान के लिए कार्य कर सकता है। शायद पिछले कुछ वर्षों में हुई बहुत सारी बातों में से यह बात सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाली है। हो सकता है कि कभी-कभी संयुक्त राष्ट्र कुछ ऐसे निर्णय करता है जिनसे हममें से कुछ लोग सहमत न हों। ऐसा होना लाज़मी है। लेकिन असल बात यह है कि वह हमें एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ पूरे विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व होता है, जो समस्याओं के बारे में विचार करता है और, यदि उन्हें तुरन्त हल न भी कर सके, तो उन्हें हल करने के लिए प्रयास अवश्य कर सकता है और अन्ततः, मैं आशा करता हूँ, उन्हें हल कर सकता है।

कठिनाइयों और विवादों के बावजूद, धीरे-धीरे यह राय बन रही है कि विश्व समुदाय एक साथ बैठकर अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से परस्पर परामर्श कर सकते हैं और यह राय न केवल बढ़ रही है बल्कि लोगों के मन में बैठ रही है। यह एक बड़ी बात है। मैं आशा करता हूँ कि यहाँ का प्रत्येक प्रतिनिधि, अपने देश के हितों को भी ध्यान में रखते हुए, धीरे-धीरे यह समझने लगेगा कि उसकी भूमिका अपने देश का प्रतिनिधि होने से कुछ अधिक है, कि वह, सम्भवतः कुछ हद तक, विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है।

हमें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनके अलावा एक और बात जो मुझे चिन्तित करती है वह इन समस्याओं का मुकाबला करने के तरीके के बारे में है। यही कारण है कि मैंने एक व्यापक वैश्विक दृष्टिकोण और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारपत्र, जिसे धीरे-धीरे लागू किए जाने की आवश्यकता है, में तय किए गए सिद्धान्तों के आधार पर समस्याओं का सामना करने की भावना का स्वागत किया है।

यदि मैं किसी ऐसी बात का उल्लेख करूँ जिसने मेरे देश पर बहुत प्रभाव डाला है तो आप कृपया मुझे क्षमा करें। मैं अपने देश की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता हूँ जिसने, महात्मा गाँधी के मार्गदर्शन में एक खास ढंग से, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। गाँधीजी ने हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा दी कि चीज़ों को अलग ढंग से कैसे किया जाए। उद्देश्य और लक्ष्य तो हम सभी के होते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आगे कैसे बढ़ा जाए ताकि जब हम किसी एक समस्या को हल करने का प्रयास करें तो कोई नई समस्या न खड़ी हो जाए; कि शत्रु के साथ कभी ऐसा व्यवहार न किया जाए कि समझौते और मित्रता के लिए कोई दरवाज़ा ही खुला न रहे।

इस दृष्टि से हमारे देश और यूनाइटेड किंगडम ने तब एक अच्छा उदाहरण पेश किया जब हमने भारत की स्वतंत्रता और आज़ादी के लिए समझौता किया, जिससे दोनों देशों के बीच मित्रता भी हो गई। यह एक अनूठा उदाहरण है कि हमारे दोनों देश जो पिछली कई पीढ़ियों से आपस में संघर्ष कर रहे थे, जिसके परिणामस्वरूप द्वेष और शत्रुता के भाव उत्पन्न हो चुके थे, भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न को हल करने के बाद दुश्मनी के अतीत को भुलाकर मित्र बन सके। इसका श्रेय दोनों ही पक्षों को जाता है, लेकिन कुछ हद तक यह निश्चित तौर पर उस दृष्टिकोण के कारण हुआ जो हमने गाँधीजी के मार्गदर्शन में अपनाया था। ऐसे कई मौके आए जब किसी बात को लेकर भारत में बहुत आक्रोश और कड़वाहट पैदा हुई: कई बार हमारे लोगों को गोली मार दी गई या उन्हें सड़कों पर पीटा गया।

लेकिन मुझे ऐसा कोई अवसर याद नहीं आता जब, तब भी जब लोगों की भावनाएं बहुत भड़की हुई होती थीं, कोई अंग्रेज़ भारत में किसी नाराज़ भीड़ के बीच से होकर गुज़रा हो और उसे कोई हानि पहुँचाई गई हो। यह बड़ी अनूठी बात है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि भारतीय लोग दूसरों से ज़्यादा शांतिप्रिय या बेहतर होते हैं। तनाव और दबाव की स्थिति में उनमें भी वही मानवीय कमज़ोरियाँ होती हैं जो और लोगों में हो सकती हैं, लेकिन उन्हें यह सबक बार-बार सिखाया गया है। एक-दो बार जब हमारे लोगों ने दुर्व्यवहार किया तब गाँधीजी ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने उस समय हम युवा लोगों को बहुत क्रोधित किया। उन्होंने पूरे आन्दोलन को रोक दिया। उन्होंने कहा: “आप लोगों ने बुरा व्यवहार किया है। इसे बन्द किया जाए।“ मैं महसूस करता हूँ कि इसका अपना कुछ प्रभाव पड़ता है। युद्ध होते हैं, और युद्ध अच्छे हैं या बुरे इसके बारे में बहस की जा सकती है। लेकिन हम अक्सर यह पाते हैं कि युद्ध के बाद हमें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है वे युद्ध के पहले की समस्याओं से बदतर होती हैं। विजय मिल जाने के बावजूद समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। इसलिए प्रश्न यह है कि समस्याओं को हल किया जाए, न कि बाद में और भी कठिन समस्याओं में उलझा जाए।

हम अल्पकालिक दृष्टिकोण नहीं अपना सकते हैं। हमें आगे दूर तक देखने की आवश्यकता है। दीर्घकालिक दृष्टिकोण के लिए यह आवश्यक है कि कोई वैश्विक व्यवस्था, विश्व एकता की व्यवस्था विकसित की जाए। यदि हम ऐसा करना चाहते हैं तो हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए, क्षणिक उत्तेजना में भी नहीं, जो उस व्यवस्था को विकसित करने की दिशा में बाधक बने। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे शत्रुता, घृणा और कटुता बढ़े। दुनिया में आज पहले ही बहुत घृणा और कटुता है।

हम उसे अनुभव करते हैं। हम फरिश्ते तो नहीं बन सकते, फिर भी व्यपाक दृष्टि से व्यक्तिगत स्तर पर और राष्ट्रों के तौर पर हमारे कार्यकलाप ऐसे हों, कि हम अपने किसी भी सिद्धान्त या विचार को त्यागे बिना, ऐसा कुछ न करें कि पुनःमैत्री की राह मुश्किल हो जाए।

दुनिया की सामान्य प्रमुख समस्याओं के अलावा हाल के समय में दो ऐसी बातें हुई हैं जिनकी ओर इस महान सभा का ध्यान आकृष्ट हुआ है। चाहे मिस्र की बात हो या हंगरी, दोनों ही जगह हुई घटनाएं महत्वपूर्ण हैं और साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण भी, लेकिन फिर भी, इनमें कुछ अच्छाई छुपी हुई है, उस कृत्य में नहीं, बल्कि उसके परिणामों में।

इनमें से बहुत सी बातें निकल कर सामने आई हैं जिनका मैं व्यक्तिगत तौर पर स्वागत करता हूँ। एक बड़ी बात इसमें से यह निकल कर आई है कि संयुक्त राष्ट्र सभा में, और अन्यत्र, व्यक्त की जाने वाली विश्व समुदाय की यह राय कि कौन सी बात गलत है और उसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, एक मज़बूत राय है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। यह एक महत्वपूर्ण बात है और भविष्य में सम्भवतः इससे किसी भी राष्ट्र को सच्चाई के मार्ग से भटकने में भय होगा। किसी भी देश को, चाहे वह कमज़ोर देश हो या मजबूत, कुछ भी ऐसा करने से पहले दो बार सोचेगा कि कहीं उसके ऐसा करने से विश्व समुदाय की राय उसके खिलाफ तो नहीं हो जाएगी। यह अपने आप में दुनिया में किसी प्रकार के विवेक के जागने की निशानी है।

युद्ध और दूसरे प्रकार के संघर्ष इसलिए होते हैं क्योंकि लोगों के मन में इसे प्रेरित करने वाला कुछ घटित होता है। यूनेस्को के संविधान में कहा गया है कि युद्धों की शुरुआत लोगों के मन से होती है। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम कोई भी ऐसा निर्णय न लें जिससे कटुता बढ़े। प्रयास यह होना चाहिए कि हम केवल घटना के ऊपर अपना आक्रोश प्रकट करने के बजाए समस्या को हल करें; हालाँकि उस स्थिति में आक्रोश और नाराज़गी के कारण हो सकते हैं। हम भविष्य की दृष्टि से काम कर रहे हैं। भविष्य केवल राष्ट्रों की और व्यक्तियों की आज़ादी पर आधारित सहयोग का ही हो सकता है।

जहाँ तक मिस्र और हंगरी की घटनाओं का सम्बंध है जिनके बारे में यह सभा विचार कर रही है, मैं सिवाय सहिष्णुता के उस दृष्टिकोण के जो मैंने इन समस्याओं के समाधान के लिए सुझाया, कोई और सुझाव देने की स्थिति में नहीं हूँ। सहिष्णुता का अर्थ अकर्मण्य होना नहीं होता है। उसका आशय क्रियाशीलता से है। उसका यह अर्थ नहीं होता कि हम अधिकारपत्र में निर्धारित उन सिद्धान्तों में से किसी भी सिद्धान्त को भुला दें जिनका हम समर्थन करते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि संयुक्त राष्ट्र, और हम सभी उस अधिकारपत्र को याद रखें जोकि आधारभूत है।

हो सकता है कि विश्व की परिस्थितियाँ आदर्श न होने के कारण हम अधिकारपत्र को शीघ्रता से लागू न कर पाएं। फिर भी हमें एक-एक कदम करके उस दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिए। पहला काम तो हमे यह करना चाहिए कि हम किसी स्थिति को इतना न बिगड़ने दें कि वह किसी बड़े संघर्ष का कारण बन जाए, ऐसा होने की स्थिति में हमारे सभी मूल्य और सिद्धान्त नष्ट हो सकते हैं।

विभिन्न प्रकार के नए हथियारों को विकसित किए जाने के कारण दुनिया के लिए और किसी भी विवेकशील देश के लिए युद्ध करना सचमुच एक असम्भव सा विचार बन चुका है। पहले भी युद्ध बहुत भीषण परिणामों वाले होते थे, और हमने देखा है कि युद्धों से कोई समस्या हल नहीं हुई है। नकारात्मक दृष्टि से भले ही उनके कुछ परिणाम रहे हों, लेकिन सकारात्मक दृष्टि से उन्होंने कुछ भी हल नहीं किया है।

इसका सकारात्मक पहलू यह होगा कि हम सिद्धान्तों के आधार पर शांतिपूर्ण समाधानों के लिए सक्रिय होकर कार्य करें और साथ ही भविष्य में विश्व में सहयोग स्थापित करने की दृष्टि से कार्य करें। हमें अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण सम्बंध बनाकर रहना है। आज विभिन्न प्रकार की प्रगति के कारण व्यावहारिक दृष्टि से हर देश दूसरे देश का पड़ोसी है। इसलिए हमें दुनिया भर के देशों के बीच सहयोग की स्थापना की दृष्टि से कार्य करना चाहिए।

दुर्भाग्य से हमें एक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा है जिसे शीत युद्ध कहा जाता है। लेकिन शीतयुद्ध किसी गर्म युद्ध या गोलीबारी के युद्ध से बेहतर है। किन्तु शीत युद्ध की अवधारणा संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों के बिल्कुल प्रतिकूल है। यह यूनेस्को के संविधान की उस बात को नकारता है जिसमें कहा गया है: कि युद्धों की शुरुआत लोगों के मन से होती है। गाँधीजी अहिंसा के सिद्धान्त के लिए समर्पित थे और जीवन भर उन्होंने इसकी शिक्षा दी, लेकिन फिर भी उन्होंने कहा: “यदि आपके दिमाग में तलवार है तो उसे हर समय मन में रखे रहने और पोषित करते रहने के बजाए उसका इस्तेमाल कर लेना बेहतर है। अपने भीतर कुंठित होते रहने के बजाए, और हर समय उस तलवार के बारे में या उसे प्रयोग करने के बारे में सोचते रहने और बाहर से उसके प्रयोग को रोकने का प्रयत्न करने का दिखावा करने के बजाए उसे बाहर निकालिए, प्रयोग कीजिए और फेंक दीजिए।“

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि शीत युद्ध का यह विचार मूलतः और सिद्धान्ततः गलत है। यह अनैतिक है। यह शांति और सहयोग के सभी विचारों के विरुद्ध है। इसलिए, हमें अपने मन में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सही रास्ता क्या है।

जैसाकि हम जानते हैं, कई प्रकार के सैन्य गठबंधन इस समय हैं। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि आज जब हम चर्चा कर रहे हैं, ये सभी समझौते और सैन्य गठबंधन अनुचित और बेकार हैं। ये उन लोगों की दृष्टि से भी अनावश्यक हैं जिन्हें लगता है कि उन्हें इनसे लाभ होगा। तर्क के लिए मैं यह स्वीकार भी कर लूँ कि पहले जब स्थितियाँ भिन्न थीं, तब ये आवश्यक थे, लेकिन आज की परिस्थितियों में मैं यही कहूँगा कि ये समझौते और गठबंधन किसी राष्ट्र की ताकत को नहीं बढ़ा रहे हैं। इनसे केवल शत्रुता बढ़ती है जिसके कारण हथियार जमा करने की होड़ को बढ़ावा मिलता है और निःशस्त्रीकरण के लक्ष्य को हासिल करना और भी कठिन हो जाता है। यदि शांति की स्थापना करना हमारा लक्ष्य है तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम शीत युद्ध को समाप्त करें। और यदि हम शीत युद्ध को समाप्त करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि हम शांति की स्थापना के लिए सेनाओं और समझौतों और गठबंधनों की स्थापना करने के अपने विचार को मज़बूत न बनाएं।

मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि दुनिया भर के लोग शांति की तीव्र इच्छा रखते हैं। मुझे संदेह है कि दुनिया में कहीं ऐसे भी लोग हों जो युद्ध चाहते हों। बेशक दुनिया भर में जनसामान्य शांति की कामना रखते हैं।

यदि ऐसा है, तो फिर हम शांति के मार्ग का अनुसरण क्यों न करें? हम क्यों भय, चिन्ता, घृणा और हिंसा की भावनाओं से निर्देशित हों?

हमने देखा है और हम जानते भी हैं कि किसी देश में विदेशी सेना की मौजूदगी हमेशा तकलीफ और आक्रोश उत्पन्न करने वाली होती है; उस देश के लोग कभी उसे पसंद नहीं करते। यह स्थिति असामान्य और अवांछनीय है। उस सेना की मौजूदगी से सुरक्षा का वह भाव भी पैदा नहीं होता जिसके लिए उसे रखा जाता है। युद्ध की तकनीकों में आज जिस तरह से विकास हो रहा है, अब होने वाला कोई भी युद्ध विश्व युद्ध ही होगा, जिसमें दूर स्थित ठिकानों से मिसाइल दागे जाएंगे। ऐसी स्थिति में जगह-जगह सशस्त्र सेनाएं तैनात करना और सैन्य ठिकाने बनाना अनावश्यक है और इससे दूसरे पक्ष को भी वैसा ही करने की बुराई और अनैतिकता की होड़ में शामिल होने के लिए बढ़ावा मिलता है।

फिर हम इस समस्या का सामना किस प्रकार करें? मैं जानता हूँ कि हम एक प्रस्ताव पारित करके इसे खत्म नहीं कर सकते, फिर भले ही वह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की महासभा में ही क्यों न पारित किया गया हो। लेकिन यदि हमें अपना लक्ष्य स्पष्ट तौर पर मालूम है तो हम उस दिशा में अवश्य प्रयास कर सकते हैं। निःशस्त्रीकरण की समस्या शीत युद्ध से जुड़ी हुई है। हम सभी जानते हैं कि यह समस्या कितनी कठिन है। मुझे याद है कि राष्ट्र संघ में एक प्रारम्भिक निःशस्त्रीकरण आयोग हुआ करता था। उसने कई वर्षों तक अपना काम किया और बहस और चर्चाओं के कई खंड प्रकाशित किए जिन पर बाद में राष्ट्र संघ में विचार-विमर्श हुआ। लेकिन उनका कोई परिणाम नहीं निकला।

किसी भी प्रकार का निःशस्त्रीकरण किसी कमज़ोर देश को सशक्त नहीं बना सकता और न ही किसी गैर-औद्योगिक देश को किसी दूसरे औद्योगिक देश की बराबरी पर ला सकता है। न ही वह वैज्ञानिक प्रगति कि दृष्टि से पिछड़े किसी देश को वैज्ञानिक दृष्टि से उन्नत किसी दूसरे देश के बराबर बना सकता है। लेकिन निःशस्त्रीकरण के माध्यम से हम युद्ध की सम्भावना और उसके भय को कम अवश्य कर सकते हैं। अन्ततोगत्वा यह पूरा मुद्दा परस्पर विश्वास और एक-दूसरे के प्रति भय की भावना को कम करने से जुड़ा है। निःशस्त्रीकरण उस उद्देश्य को हासिल करने में सहायता कर सकत है, हालाँकि वह स्थितियों में समानता नहीं ला सकता। खतरा फिर भी बरकरार रहता है।

तो फिर दुनिया में शांति का वातावरण बनाने के लिए हम क्या उपाय कर सकते हैं? मैं समझता हूँ कि हमें दो-तीन चीज़ें करने की आवश्यकता है।

एक तो यह, कि घोषणापत्र के अनुसार देशों को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जिन देशों पर दूसरे देशों का आधिपत्य है वह खत्म होना चाहिए। दुनिया का कोई भी देश, अधिक से अधिक बहुत थोड़े देश ही ऐसे हैं, इस दृष्टि स्वतंत्र नहीं हो सकता कि वह जो भी करना चाहे उसे कर सके। उन्हें नियंत्रित करने वाले कुछ कारक हैं, और होने भी चाहिए। अन्तिम विश्लेषण में यह कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र स्वयं एक ऐसा ही नियंत्रणकारी कारक है जो गलत व्यवहार करने वाले या ऐसे देशों को नियंत्रित कर सकता है जो अपनी तथाकथित स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे देशों की आजादी में दखल देते हैं। इस दृष्टि से हर देश की आज़ादी पर नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन पहला काम यह करने की आवश्यकता है कि देशों की स्वतंत्रता के दायरे को तब तक बढ़ाया जाए जब तक कि दुनिया भर के देश उसके दायरे में नहीं आ जाते।

दूसरी बात यह है कि दुनिया भर में कहीं भी विदेशी भूमि पर अपनी सेनाओं को रखना मूलतः गलत है, भले ही ये सेनाएं सम्बंधित देश की सहमति से ही क्यों न रखी गई हों। और, इस धारणा की भी कलई खुलने लगी है कि अधिक से अधिक शस्त्र जमा करके कोई देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। इस प्रकार की नीति से केवल सैन्य सामग्री जुटाने की एक होड़ शुरू होती है ताकि शस्त्रों का सन्तुलन कम से कम बिगड़े। मुझे समझ नहीं आता कि हम तब तक शांति की दिशा में कैसे बढ़ सकते हैं जब तक देश अपनी शक्ति को चर्चा का आधार बनाते हैं। यदि हम इन सेनाओं के इस जमावड़े को खत्म कर पाएं और साथ ही साथ कुछ हद तक निःशस्त्रीकरण कर पाएं, तो मैं समझता हूँ कि विश्व का वातावरण पूरी तरह बदल जाएगा। इसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि शांति की स्थापना और भय को दूर करने की दिशा में तेज़ी से प्रगति हो सकेगी।

हमने पिछले दो तीन महीनों में देखा है कि दुनिया किस प्रकार उन बातों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करती है जिन्हें वह गलत समझती है। यह एक स्वस्थ संकेत प्रकट हुआ है। कोई भी देश कुछ गलत कार्य तब करता है जब उसे यह विश्वास होता है कि विश्व समुदाय का एक हिस्सा उसके कृत्य के समर्थन में सहमति जताएगा। यदि वह ऐसा न कर सके तो फिर उसके लिए आगे बढ़ना कठिन हो जाएगा। हमने देखा है कि दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली राष्ट्र भी विश्व समुदाय की राय पर अपने विचारों को नहीं थोप सकते हैं।

इस प्रकार हमने गलत व्यवहार करने वाले किसी भी देश के खिलाफ एक बहुत मज़बूत सुरक्षा की व्यवस्था कर ली है।

मेरा दृढ़ विचार है कि मिस्र और हंगरी की घटनाओं ने अपने-अपने ढंग से इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत की है। इस महान सभा को और सभी देशों को इस स्थिति के बारे में विवेकपूर्वक और सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए, किसी के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करने या किसी को अपमानित करने की दृष्टि से कोई कार्य नहीं करना चाहिए। यदि हमारे इस दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप कुछ गलत होता है या कुछ ऐसा होता है जो हम नहीं चाहते, तब इसका अर्थ यही होगा कि हमसे भूल हुई है।

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि विश्व मामलों में हम एक ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हैं जहाँ हमें एक विकल्प का चुनाव करना है। हम उसी पुराने ढर्रे पर नहीं बने रह सकते जो हमें ताकत और घृणा को बढ़ावा देते रहने के अलावा किसी विशेष गंतव्य तक नहीं ले जा सकता। मैंने शुरुआत में जो सुझाव दिया था, यदि उसकी ओर वापस जाएं तो, लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितना कि उस लक्ष्य को प्राप्त करना महत्वपूर्ण होता है। यदि साधन उचित नहीं होंगे, तो हम कितना भी प्रयास कर लें लक्ष्य के उचित होने की सम्भावना नहीं है।

इसलिए, विशेष तौर पर यहाँ, इस विश्व सभा में जिसे सभी राष्ट्र सम्मान से देखते हैं, मैं आशा करता हूँ कि दुनिया भर के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाएगा कि हम अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हमेशा उचित साधन ही चुनें। ये साधन हमेशा शांतिपूर्ण हों, केवल हथियारों का प्रयोग न किए जाने की दृष्टि से बाहरी तौर पर ही नहीं, बल्कि मन के दृष्टिकोण के स्तर पर भी। ऐसा दृष्टिकोण शांति का ऐसा वातावरण तैयार करेगा जो हमारी समस्याओं का समाधान करने की दृष्टि से बहुत सहायक होगा।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में न्यू यॉर्क में दिया गया भाषण, 20 दिसम्बर, 1956