नेहरू के चुने हुए भाषण और लेख



अतीत में लोकतंत्र का अर्थ मुख्यतः राजनैतिक लोकतंत्र समझा जाता रहा है, जिसे मोटे तौर पर हर व्यक्ति के मतदान करने के अधिकार के रूप में देखा जाता है। यह बात स्पष्ट है कि भूख से व्याकुल किसी दीनहीन व्यक्ति के लिए मत अपने आप में कोई महत्व नहीं रखता है। ऐसे व्यक्ति की रुचि मत देने से अधिक भोजन पाने में होगी। इसलिए राजनैतिक लोकतंत्र अपने आप में काफी नहीं है, उसका प्रयोग बस और अधिक आर्थिक लोकतंत्र पाने के लिए किया जा सकता है। जीवन की सुख-सुविधाएं अधिक से अधिक लोगों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए और अत्यधिक असमानता को दूर किया जाना चाहिए। निःसंदेह जिन देशों में राजनैतिक लोकतंत्र है वहाँ यह प्रक्रिया कुछ समय चल रही है।

हम लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं। मैं अपनी बात करूँ, तो मेरा इसमें विश्वास है, सबसे पहले तो इसलिए क्योंकि मेरी दृष्टि में लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए यह उचित साधन है और इसलिए क्योंकि यह एक शांतिपूर्ण तरीका है। दूसरे, इसलिए क्योंकि लोकतंत्र उन दबावों को खत्म कर देता है जो अन्य प्रकार की सरकारें व्यक्ति के ऊपर थोप सकती हैं। लोकतंत्र सत्ता द्वारा थोपे जाने वाले अनुशासन को अधिकांशतः आत्मानुशासन में बदल देता है। आत्मानुशासन का यह अर्थ है कि जो लोग सहमत न हों – अल्पमत – वे समाधानों को इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उन्हें स्वीकार कर लेना टकराव से बेहतर होता है। यह बेहतर होता है कि उन्हें स्वीकार कर लिया जाए और फिर यदि आवश्यक हो, तो शांतिपूर्ण तरीकों से उन्हें बदला जाए।

इसलिए मेरी दृष्टि में लोकतंत्र का अर्थ शांतिपूर्ण तरीकों से समस्याओं का समाधान करना है। यदि यह प्रक्रिया शांतिपूर्ण न हो तो मेरी राय में यह लोकतंत्र नहीं है। यदि मैं दूसरे कारण के बारे में और विस्तार से कहूँ, तो लोकतंत्र व्यक्ति को विकसित होने का अवसर प्रदान करता है। लेकिन इस अवसर का मतलब अराजकता नहीं है जहाँ हर व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करने के लिए स्वच्छंद हो। किसी भी सामाजिक संगठन को एकजुट रखने के लिए कुछ अनुशासन का होना चाहिए। इस अनुशासन को बाहर से थोपे जाने का एक रूप यह हो सकता है कि कोई एक देश दूसरे देश को नियंत्रित करे या फिर निरंकुश या सत्तावादी शासन व्यवस्था हो सकता है। अनुशासन के बिना लोकतंत्र सम्भव नहीं है।

अब प्रश्न यह उठता है: यदि लोग अनुशासन का पालन न करें तो क्या लोकतंत्र का ढांचा चरमराने नहीं लगेगा? अनुशासन को लागू करने के लिए किसी और व्यवस्था को लोकतंत्र का स्थान लेना पड़ेगा। थोपा हुआ अनुशासन तो आ सकता है – सैन्य तानाशाही के माध्यम से - जैसा कि कुछ मामलों में हुआ है। यदि निर्वात की स्थिति उत्पन्न होगी तो बाहरी सत्ताएं उसे भरेंगी या कोई आन्तरिक सत्ता उस खाली स्थान को भरने के लिए उत्पन्न होगी।

केवल सैद्धान्तिक तौर पर संविधान की स्थापना कर देने से कोई समस्या हल नहीं हो सकती है। हो सकता है कि संविधान बहुत अच्छा हो, लेकिन उसके क्रियान्वयन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संविधान में लोगों की भावनाओं और उनकी प्रकृति को कितना ध्यान में रखा गया है। हमने कुछ ही सालों बाद कई बहुत अच्छे संविधानों को इसलिए टूटते हुए देखा है क्योंकि लोगों ने अपने ही संविधान पर अमल नहीं किया या इसलिए क्योंकि संविधान उनके विचारों के अनुरूप नहीं था या उनकी समस्याओं को हल करने में सक्षम नहीं था।

लोकतांत्रिक सरकार का एक ऐसा पहलू है जिस पर हमें भारत में दूसरे देशों की तुलना में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यूरोप के लोगों ने अपनी संसदीय प्रणाली को एक सौ वर्ष या उससे अधिक समय में धीरे-धीरे विकसित किया। कभी-कभी टकराव भी हुए; कुछ अवसरों पर उसके टूटने का खतरा भी उत्पन्न हुआ, लेकिन वे किसी प्रकार इन बाधाओं को पार करने में सफल हुए। टकराव की इन कुछ घटनाओं को छोड़कर यह संयत प्रगति का अपेक्षाकृत लम्बा समय रहा है, और प्रगति के लिए बहुत अधिक परिश्रम भी नहीं करना पड़ा है।

यहाँ भारत में कुछ परिस्थितियाँ हमारे पक्ष में हैं तो कुछ बातें हमारे खिलाफ जाती हैं। पिछले तीस या चालीस सालों में हमने एक अनूठे किस्म का आन्दोलन खड़ा किया है। मोटे तौर पर यह एक शांतिपूर्ण आन्दोलन था, लेकिन फिर भी यह एक क्रान्तिकारी आन्दोलन था। क्रान्तिकारी तत्व और शांतिपूर्ण तरीकों के इस अनूठे संयोग ने एक पीढ़ी के चरित्र को बदल कर रख दिया। आज़ादी सीधे हमारी झोली में नहीं डाल दी गई थी। हमने उसके लिए संघर्ष किया; उसके लिए अपने आप को ढाला; उसके लिए हमने बहुत दुख-तकलीफें झेलीं। लेकिन यह बदलाव दूसरे किसी भी देश से कम तकलीफदेह था क्योंकि हम शांतिपूर्ण तरीकों को अपनाने के लिए ढल चुके थे। कटुता और टकराव ने ज़्यादा समय तक हमारा पीछा नहीं किया और हम मन और स्वभाव के स्तर पर अपने आपको नई परिस्थिति के अनुसार ढाल पाए। साथ ही, चूँकि हमारा पूरा प्रशिक्षण विरोधी पक्ष के रूप में काम करने का रहा है, इसलिए हमारे लिए यह आसान नहीं रहा कि हम अपने लोगों को इस ढंग से सोचने और व्यवहार करने से उबार सकें जैसे वे विपक्ष में हों। यह एक सहज भावना है, और सभी देशों में उत्पन्न हुई है, विशेष तौर पर ऐसे देशों में जहाँ बड़ी क्रान्तियाँ हुई हैं। कई बार ऐसा भी हुआ है कि जिन लोगों ने क्रान्ति की उन्हें ही मार डाला गया। जवाबी क्रान्तियाँ भी हुई हैं। जब किसी देश में बड़ी उथल-पुथल होती है तो कई तरह के परिणाम सामने आते हैं। सैद्धान्तिक तौर पर यह तय करना कठिन है कि पहले क्या होना चाहिए और फिर उसके बाद क्या होना चाहिए। जब लाखों-करोड़ों लोग आन्दोलित होते हैं, तो वे अपने-अपने तरीके अपनाते हैं। देश जितना अधिक बड़ा हो उसका नेतृत्व करना उतना ही कठिन होता है। यदि हमारे तरीके शांतिपूर्ण न रहे होते, और यदि हमने अपने आन्दोलन के दौरान इतना आत्मानुशासन न बरता होता, तो हमारी समस्या असाध्य भले ही न रही होती, लेकिन उसे हल करना बड़ा कठिन रहा होता। यदि हमने और अधिक आत्मानुशासन विकसित किया होता तो देश और अधिक मज़बूत होता। हमारे आत्मानुशासन ने ही हमें बचाकर रखा। इस आत्मानुशासन ने ही हमें इस योग्य बनाया कि हम अपने संघर्ष के दौरान जमा की गई ताकत को सही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर सके। नहीं तो, जैसाकि क्रान्तिकारी संघर्षों में अक्सर होता है, वही ताकत हमारे ही खिलाफ खड़ी हो जाती और आन्तरिक टकराव आदि के रूप में हमें बहुत नुकसान पहुँचा सकती थी। कोई भी क्रान्ति, भले ही वह हिंसक हो या शांतिपूर्ण, अनुकूलन की कठिन समस्याएं उत्पन्न करती है। हिंसक क्रान्ति में स्वाभाविक है कि यह टूट और बिखराव बहुत अधिक होता है। आप एशिया के कई देशों को देख सकते हैं – मैं उनके नाम नहीं लेना चाहता – जो क्रान्ति के संकटकाल और संघर्षों से होकर गुज़रे हैं, उन्हें अभी भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। आप देख सकते हैं कुछ और भी ऐसे देश हैं जहाँ बदलाव हुए हैं और वे अपने देश के ही हालात और परिस्थितियों से नहीं उबर पाए हैं।

संक्षेप में, हमारी संसदीय संस्थाओं सहित हमारी संस्थाएं अन्ततोगत्वा हमारे लोगों की प्रकृति, विचारों और उद्देश्यों को ही प्रतिबिम्बित करते हैं। वे इस दृष्टि से मज़बूत और अधिक टिकाऊ हैं कि वे हमारे लोगों की प्रकृति और उनके विचारों के अनुरूप हैं। यदि ऐसा न हो तो ये संस्थाएं टूटने लगती हैं।

संसदीय लोकतंत्र के विषय पर पहले अखिल-भारतीय सम्मेलन में दिया गया भाषण, नई दिल्ली, 25 फरवरी, 1956