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  • नेहरू के उद्गार

नेहरू के उद्गार

  • लोकतंत्र
    लोगों को कानूनों को और यहाँ तक कि सरकारों को भी बदलने का अधिकार होता है और वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से अपने इस अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन हिंसा का मार्ग चुनने वाले लोग लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते। यदि उनका तरीका सफल हो जाए तो देश में पूरी तरह अव्यवस्था फैल जाएगी और लोगों की दशा और भी खराब हो जाएगी।
    आप लोकतंत्र को सैकड़ों तरीकों से परिभाषित कर सकते हैं, लेकिन समाज का आत्मानुशासन निश्चित तौर पर उसकी परिभाषाओं में से एक है। थोपा गया अनुशासन जितना कम होगा और आत्मानुशासन जितना अधिक होगा, लोकतंत्र उनता ही अधिक विकसित होगा।

    मुझे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में होने वाले विलम्ब का अच्छी तरह से भान है, लेकिन फिर भी मुझे विश्वास है कि मेरे देश के लिए संसदीय लोकतंत्र की यह व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त है।
    लोकतंत्र का अर्थ सहनशीलता है, सहनशीलता केवल उन्हीं लोगों की नहीं जो हमसे सहमत होते हैं, बल्कि उन लोगों की भी जो हमसे असहमत होते हैं।
    लोकतंत्र के लिए अपनी पूर्ण श्रद्धा और प्रेम के बावजूद मैं इस कथन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ कि सबसे बड़े बहुमत वाले लोग हमेशा सही होते हैं।
    यदि लोकतंत्र का कोई अर्थ है तो वह है समानता; केवल अपना मत होने की समानता नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक समानता।
    आधुनिक विश्व में आप अपने सामने एक ही लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं कि लोगों के जीवन स्तर में व्यापक सुधार हो। यह केवल निष्पक्ष ही नहीं है, बल्कि दूसरों पर भी लागू होता है। कोई भी सरकार जन साधारण की आकांक्षाओं को अनदेखा नहीं कर सकती है। आखिर ये जन आकांक्षाएं ही तो लोकतंत्र का आधार हैं, और यदि कोई सरकार इनका अनादर करती है तो उसे धकेल कर किनारे कर दिया जाता है और दूसरी सरकार उसका स्थान ले लेती है।
    लोकतंत्र का अर्थ सहिष्णुता है, केवल उन लोगों के प्रति सहिष्णुता नहीं जो हमसे सहमत हों, बल्कि उन लोगों के प्रति भी जो हमसे सहमत नहीं हैं।
  • आज़ादी
    आज़ादी सिर्फ एक राजनैतिक निर्णय या नए संविधान का मुद्दा नहीं है, मुद्दा यह भी नहीं कि क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण है, यह तो आर्थिक नीति हुई। यह मन-मस्तिष्क का मुद्दा है और यदि बुद्धि संकुचित और भ्रमित हो जाए और हृदय में कड़वाहट और घृणा भरी हो, तो आज़ादी पलायन कर जाती है।
    स्वतंत्रता की पहली वर्षगाँठ पर संदेश, 15 अगस्त 1948
    यदि स्वतंत्रता को डराया जाता है या न्याय के लिए खतरा उत्पन्न किया जाता है या यदि कहीं आक्रमण होता है, तो हम न तो हम न तो तटस्थ रह सकते हैं और न ही रहेंगे।
    भाषण, वॉशिंगटन डी.सी. 13 अक्तूबर 1949
    यह न समझें कि यदि एक बार आज़ादी हासिल कर ली तो वह हमेशा बनी रहेगी। थोड़ी सी असावधानी या लापरवाही हमारी आज़ादी को खतरे में डाल सकती है। हमारे इतिहास में बहुत बार ऐसा हो चुका है।
    भाषण, नई दिल्ली, 26 अक्तूबर 1962
  • सशक्तीकरण
    लोकतंत्र और समाजवाद किसी उद्देश्य की प्राप्ति के साधन हैं, अपने आप में उद्देश्य नहीं हैं। हम समाज के हित की बात करते हैं। क्या यह समाज का निर्माण करने वाले व्यक्तियों के हित से कोई भिन्न या ऊँचा उद्देश्य है? यदि हम जिसे समाज का हित मानते हैं, उसकी खातिर व्यक्ति के हितों को अनदेखा करते हैं और उनका त्याग कर देते हैं, तो क्या ऐसा उद्देश्य निर्धारित करना उचित होगा?

    यह सहमति हुई थी कि व्यक्ति के हितों का त्याग नहीं किया जाना चाहिए और वास्तविक सामाजिक प्रगति केवल तभी हो सकेगी जब व्यक्ति को अपने विकास के लिए अवसर दिए जाएं, बशर्ते कि “वह व्यक्ति” कोई चुना हुआ समूह न होकर पूरे समुदाय का हिस्सा हो। इसलिए कसौटी यह होनी चाहिए कि कोई राजनैतिक या सामाजिक सिद्धान्त किस सीमा तक व्यक्ति को अपने क्षुद्र स्वार्थ से ऊपर उठने और सभी के हित की दृष्टि से विचार करने के लिए सक्षम बनाता है। जीवन का सिद्धान्त प्रतिस्पर्धा या अर्जनशीलता न होकर सहयोग, प्रत्येक व्यक्ति द्वारा सभी के हित के लिए योगदान होना चाहिए।
    वर्ल्ड मार्क्सिस्ट रिव्यू: प्रॉब्लम्स ऑफ पीस एंड सोशलिज़्म (1958), पृ. 40 में यथा उद्धृत
    हमारे युग के महानतम लोगों की यह अभिलाषा रही है कि हर व्यक्ति की आँख के आँसू को पोंछ दिया जाए। हो सकता है कि ऐसा कर पाना हमारी पहुँच से बाहर हो, लेकिन जब तक लोगों की आँखों में आँसू हैं और तकलीफ है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। और इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, काम करना होगा, कड़ी मेहनत करनी होगी ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें। ये सपने भारत के लिए हैं, लेकिन ये सपने समूचे विश्व के लिए भी हैं, क्योंकि आज सभी राष्ट्र और समुदाय एक-दूसरे के साथ इतनी घनिष्ठता के साथ जुड़े हैं कि वे दूसरों के कट कर अलग-थलग जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
    हमने राजनैतिक आज़ादी तो हासिल कर ली है लेकिन हमारी क्रांति अभी पूर्ण नहीं हुई है और वह जारी है, क्योंकि जीवन जीने और खुशी हासिल करने के अधिकार के आश्वासन, जो केवल आर्थिक प्रगति से ही सम्भव हो सकता है, के बिना कोई जनसमूह कभी संतुष्ट नहीं हो सकता है। इसलिए हमारे सामने सबसे पहला काम तो यह है कि हमारे लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाया जाए, राष्ट्र की आर्थिक प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी रुकावटों को दूर किया जाए। हमने भारत की प्रमुख समस्या, कृषि क्षेत्र की समस्या, क्योंकि आज यह एशिया की बड़ी समस्या है, का समाधान कर लिया है। हमारी पट्टेदारी व्यवस्था में व्याप्त सामंतवादी तत्वों को बदला जा रहा है ताकि खेती के लाभ ज़मीन को जोतने वाले के पास पहुँच सकें और वह निश्चिन्त हो सके कि जिस ज़मीन पर वह खेती करता है वह उसी के कब्ज़े में रहेगी। एक ऐसे देश में जहाँ कृषि अभी भी प्रमुख उद्योग है, यह सुधार न केवल व्यक्ति की संतुष्टि के लिए बल्कि समाज की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है...

    भारत बहुत से ऐसे देशों से औद्योगिक दृष्टि से अधिक विकसित है जो इतने भाग्यशाली नहीं हैं और उसकी गणना विश्व के औद्योगिक देशों में सातवें या आठवें स्थान पर की जाती है। लेकिन यह अंकगणितीय श्रेष्ठता बड़ी संख्या में हमारे लोगों की गरीबी को नहीं छुपा सकती है। अधिक उत्पादन, अधिक न्यायसंगत वितरण, बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य के माध्यम से इस गरीबी को मिटाना ही हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा कार्य दायित्व है और हम इस कार्य को करने के लिए कृतसंकल्प हैं।
    अमेरिकी कांग्रेस में दिया गया भाषण (13 अक्तूबर 1949)
    मैं चाहता हूँ कि धर्म या जाति, भाषा या प्रान्त के नाम पर आज के संकीर्ण झगड़े खत्म हों, और एक ऐसे वर्ग रहित और जाति रहित समाज का निर्माण हो जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और सामर्थ्य के अनुसार पूरी तरह विकसित होने का अवसर हो।
    भारत – आज और कल, 1959
    हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति की यह अभिलाषा रही है कि हर व्यक्ति की आँख से हर आँसू को पोंछा जाए। हो सकता है कि हम ऐसा कर पाने की स्थिति में न हों, लेकिन जब तक आँसू हैं, जब तक दुख है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। और इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, काम करना होगा, कड़ी मेहनत करनी होगी ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें।
  • पंचायती राज तथा सहकारी संस्थाएं
    आज़ादी मिलने के बाद जब हमने जनतंत्र की स्थापना की तो भारत के हर नागरिक को मतदान करने का अधिकार दिया गया। लोगों ने राज्य विधान मंडलों और लोकसभा में अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए अपने अधिकार का प्रयोग किया। यह एक सही दिशा में उठाया गया कदम था, लेकिन इतना भर किए जाने से सच्चा लोकतंत्र स्थापित नहीं हो गया। भारत केवल तभी तरक्की करेगा जब गाँवों में रहने वाले लोग राजनैतिक दृष्टि से जागरूक हो जाएंगे। हमारे देश की प्रगति हमारे गाँवों की प्रगति के साथ जुड़ी है। यदि हमारे गाँव प्रगति करेंगे तो भारत एक मज़बूत राष्ट्र बनेगा और कोई भी उसकी प्रगति की यात्रा को नहीं रोक सकेगा।

    कुछ लोग ज़िम्मेदारी अपने हाथ में ले लेते हैं। कुछ लोगों का मानना था कि यदि लोगों को ज़िम्मेदारी सौंप दी गई तो शायद वे उसे वहन नहीं कर पाएंगे। लेकिन लोगों को ज़िम्मेदारियाँ वहन करने के लिए प्रशिक्षित तभी किया जा सकता है जब उन्हें इसका अवसर दिया जाए। यह आवश्यक हो गया था कि कोई ऐसा साहसिक कदम उठाया जाए जिसके माध्यम से लोगों को अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी सौंपी जा सके। लोगों से केवल सलाह-मशवरा किया जाना ही काफी नहीं था बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से सत्ता सौंपे जाने की आवश्यकता थी।

    इसलिए हमने तय किया कि हर गाँव में एक ग्राम पंचायत होनी चाहिए जिसे और अधिक अधिकार प्रदान किए जाएं, साथ ही साथ एक एक सहकारी समिति भी होनी चाहिए जो गाँव के आर्थिक प्रयासों में सहायता करेगी।

    पंचायत गाँव के दैनिक प्रशासनिक कार्यों में सहायता करेगी और सहकारी समिति गाँव के आर्थिक कार्यों का संचालन करेगी। प्रशासनिक दायित्व केवल बड़े-बड़े अधिकारियों के ही हाथ में न हों बल्कि इन्हें हमारे 400 मिलियन लोगों के बीच बांटा जाना चाहिए। हमें लोगों को सहकारिता की भावना के साथ परस्पर सलाह-मशवरे के आधार पर काम करने के लिए एकजुट करना चाहिए।
    राजस्थान राज्य में पंचायती राज के उद्घाटन के अवसर पर 2 अक्तूबर 1959 को नागौर, राजस्थान में दिए गए भाषण से उद्धृत
  • एकता
    देश की एकता को बनाए रखना ही भारत में हमारी पहली आवश्यकता है, केवल राजनैतिक एकता ही नहीं, बल्कि दिल-दिमाग के स्तर की एकता जो फूट का कारण बनने वाली संकीर्ण भावनाओं को रोकती है और धर्म या राज्यों के नाम पर या किसी भी अन्य प्रकार की बाधाओं को तोड़ती है। हमारी आर्थिक और सामाजिक संरचना बहुत पुरानी हो चुकी है और हमारे लिए यह आवश्यक हो गया है कि हम इन संरचनाओं का इस प्रकार पुनर्गठन करें कि वे भौतिक और आध्यात्मिक स्तरों पर हमारे सभी लोगों के लिए शुभकारी हों। हमें विचारपूर्वक एक ऐसे सामाजिक सिद्धान्त को अपनाना होगा जो इस संरचना में आमूल परिवर्तन कर सके, एक ऐसे समाज की रचना कर सके जहाँ निजी लाभ और व्यक्तिगत लोभ का प्राधान्य न हो बल्कि जिसमें राजनैतिक और आर्थिक अधिकारों का न्यायपूर्ण बटवारा हो। हमें एक ऐसे वर्गहीन समाज की स्थापना करनी होगी जो मिल-जुल कर किए गए प्रयासों पर आधारित हो और जहाँ सभी के लिए अवसर उपलब्ध हों। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण उपाय अपनाने होंगे।
    आकाशवाणी, दिल्ली से 31 दिसम्बर 1952 को प्रसारित
    ज्यों-ज्यों सभ्यता आगे बढ़ती है और समाज की जटिलताएं बढ़ती जाती हैं, मिल-जुल कर प्रयास करने का महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि आपसी सहयोग की भावना न हो तो हमारी सारी शिक्षा व्यर्थ है क्योंकि संघर्ष और टकराव के कारण उसकी उपयोगिता कुछ हद तक नष्ट हो जाती है।
    सह-अस्तित्व का एकमात्र विकल्प सह-विनाश ही है।
    सुन्दर भवन, उत्कृष्ट चित्र और पुस्तकें और सभी सुन्दर वस्तुएं निश्चित तौर पर सभ्यता के लक्षण हैं। लेकिन एक भला मनुष्य जो निःस्वार्थ हो और सभी के हित के लिए दूसरों के साथ मिल कर काम करता हो, इनसे भी बेहतर प्रमाण है। मिल-जुल कर काम करना अकेले काम करने से बेहतर होता है, और सर्वहित के लिए दूसरों के साथ मिल कर काम करना सर्वश्रेष्ठ है।
    हम आर्थिक कठिनाइयों के दौर से गुज़र रहे हैं और हमारे लिए यह आवश्यक है कि, चाहे हमारा पद या स्थिति जो भी हो, हम सभी अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार इस भार को वहन करें... यह अहसास कि हम दूसरे असंख्य लोगों के साथ मिलकर अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं, अपनी हिस्सेदारी का भाव उत्पन्न करता है और बड़ा संतोष देने वाला होता है। इससे साझा प्रयास कर रहे लोगों में एक आत्मीयता का भाव उत्पन्न होता है और राष्ट्र को एक ऐसी शक्ति मिलती है जिसके आगे सभी बाधाएं मिट जाती हैं।
  • धर्मनिरपेक्षता
    हम भारत के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने की बात करते हैं। शायद हिन्दी भाषा में "secular" शब्द के लिए कोई अच्छा पर्याय तलाश कर पाना सम्भव भी नहीं है। कुछ लोग मानते हैं कि इसका अर्थ धर्म का विरोधी होना है। ज़ाहिर है कि यह अर्थ सही नहीं है। इसका अर्थ है कि यह एक ऐसा राज्य है जो सभी मतों का समान रूप से सम्मान करता है और उन्हें समान अवसर प्रदान करता है; कि एक राज्य के तौर पर वह ऐसे किसी एक मत या धर्म से जुड़ा नहीं है जो आगे चल कर राज्य का धर्म बन जाए।
    टी.एन. मदान की पुस्तक लॉक्ड माइंड्स, मॉडर्न मिथ्स (1997) में यथाउद्धृत 1961 का वक्तव्य
    हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि भारत एक सामासिक देश है, यह अनेक प्रकार से सामासिक है, धर्म की दृष्टि से, परम्परा की दृष्टि से, भाषाओं, जीवन पद्धतियों आदि की दृष्टि से। बहुसंख्यक समूह द्वारा अपने आप को दूसरों पर थोपने का प्रयास आंतरिक टकरावों का कारण बनेगा, जो कि बाहरी टकरावों से कम नुकसानदेह नहीं होंगे। भारत में आज हमारे सामने मूल समस्या सच्चे और आन्तरिक अर्थ में, यानी, हमारे लोगों के मानसिक संगठन के तौर पर संगठित भारत का निर्माण करने की है...
  • राष्ट्रवाद
    ...जब कोई देश विदेशी आधिपत्य के अधीन होता है तो राष्ट्रवाद की भावना उसे मज़बूती प्रदान करने और संगठित करने वाली शक्ति के रूप में कार्य करती है। लेकिन एक ऐसी स्थिति भी आती है जब यह शक्ति दृष्टि को संकुचित करने वाला प्रभाव भी डाल सकती है। कभी-कभी, जैसा कि यूरोप में हुआ, यह भावना आक्रामक और उग्र राष्ट्रवादी रूप धारण कर लेती है और अपने आप को दूसरे देशों और लोगों पर थोपने का प्रयास करती है। प्रत्येक जनसमूह को यह विचित्र भ्रम होता है कि वह विशिष्ट और दूसरों से बेहतर है... वे अति महत्वाकांक्षी हो जाते हैं, चूक करते हैं और उनका पतन हो जाता है। जर्मनी और जापान के अतिराष्ट्रवाद का वही हश्र हुआ। लेकिन राष्ट्रवाद का इससे भी घातक स्वरूप तब सामने आता है जब किसी देश के भीतर कोई बहुसंख्यक समूह अपने आप को सम्पूर्ण राष्ट्र मान बैठता है और अल्पसंख्यक समूह को अपने आप में समाहित कर लेने की कोशिश में दरअसल उन्हें अपने से और अधिक दूर कर देता है। हमारे यहाँ की जाति और अलगाववाद की परम्परा के कारण हमें भारतीयों को इस दृष्टि से विशेष तौर पर सावधान रहने की आवश्यकता है। अलग-अलग समूहों में बंट कर व्यापक एकता को भूल जाना हमारी प्रवृत्ति है।
    यदि कुछ लोग मुझे याद करते हैं, मुझे याद करने के बारे में सोचते हैं, तो मैं चाहूँगा कि वे मेरे बारे में कहें कि इस व्यक्ति ने अपने दिल और मन से भारत और भारत के लोगों को चाहा, और उन्होंने भी उसे अपना भरपूर प्यार और स्नेह दिया।
    भाषण, मद्रास, 9 अक्तूबर 1952
  • धर्म
    भारत में या अन्यत्र जिसे धर्म कहा जाता है, या जिसे संगठित धर्म कहा जाता है, का प्रदर्शन मुझे भयाक्रान्त करता है और मैंने बार-बार इसकी निन्दा की है और चाहा है कि मैं इसे हटा कर अलग कर दूं। मुझे हमेशा यह अंध श्रद्धा और प्रतिक्रियावाद, रूढ़ि और कट्टरपन, अंधविश्वास, शोषण और निहित स्वार्थों के पक्ष में खड़ा हुआ प्रतीत हुआ है।
    मैं पूरी ईमानदारी के साथ यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मेरी मृत्यु के बाद किसी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान न किए जाएं। मैं ऐसे अनुष्ठानों को नहीं मानता हूँ, और इन्हें औपचारिकता के रूप में भी स्वीकार करना पाखंड होगा और स्वयं को और दूसरों को धोखा देने जैसा होगा।
    मैं किसी भी ऐसे धर्म से कोई सम्बंध नहीं रखना चाहता हूँ जो जनसामान्य को भूख, गंदगी, और अज्ञान में संतुष्ट रहना सिखाता हो। मैं किसी भी ऐसी धार्मिक या अन्य प्रकार की व्यवस्था कोई सम्बंध नहीं रखना चाहता हूँ जो लोगों को यह शिक्षा न देती हो कि वे इस पृथ्वी पर सुख प्राप्त करने और अधिक सभ्य बनने के लिए सक्षम हैं।
    तो फिर धर्म (इसके प्रकट दोषों के बावजूद यदि इस शब्द का प्रयोग किया जाए तो) क्या है? सम्भवतः इसका आशय व्यक्ति के आन्तरिक विकास, उचित समझी जाने वाली किसी निश्चित दिशा में उसकी चेतना की क्रमिक उन्नति से है। वह दिशा क्या है, इस बात को लेकर एक बार फिर विवाद हो सकता है। लेकिन जहाँ तक मुझे समझ आता है, धर्म इस आन्तरिक बदलाव पर बल देता है और बाहरी बदलाव को आन्तरिक विकास के प्रदर्शन के रूप में देखता है। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है कि आन्तरिक विकास बाहरी वातावरण पर गहरा प्रभाव डालता है। लेकिन यह बात भी उतनी ही स्पष्ट है कि बाहरी वातावरण आन्तरिक विकास को गहराई से प्रभावित करता है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
    वाल्टेयर ने कहा था, यदि ईश्वर का अस्तित्व न होता, तो उसके आविष्कार की आवश्यकता पड़ती... सम्भवतः यह सच है, और इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य सदा से ही ऐसी किसी मानसिक छवि या धारणा को आकार देने का प्रयास करता रहा है जो उसके मन के विकास के साथ विकसित होती चली गई। लेकिन इसके विपरीत कथन में भी कुछ तत्व है: यदि ईश्वर का अस्तित्व है, तब भी यह अभीष्ट है कि उसके प्रति आदर भाव न रखा जाए या उस पर निर्भर न रहा जाए। अलौकिक शक्तियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण ऐसा हो सकता है, और अक्सर ऐसा हुआ भी है, कि मनुष्य की आत्म-निर्भरता नष्ट होती है, और उसकी क्षमता और सृजनात्मक योग्यता कुंठित होती है। लेकिन फिर भी ऐसे आध्यात्मिक विषयों में आस्था आवश्यक दिखाई देती है भौतिक जगत के विस्तार से परे हैं, नैतिक, आध्यात्मिक और आदर्शवादी धारणाओं पर कुछ निर्भरता आवश्यक दिखाई देती है, नहीं तो फिर हमारे जीवन में कोई ठहराव, कोई उद्देश्य या प्रयोजन नहीं रहेगा। चाहे हम ईश्वर को मानते हों या न मानते हों, किसी ऐसी जीवनदायिनी सृजनात्मक शक्ति, या पदार्थ को स्वतः आन्दोलित होने और परिवर्तित होने की क्षमता प्रदान करने वाली प्राणाधार ऊर्जा, या किसी अन्य नाम से जानी जाने वाली ऐसी किसी शक्ति में विश्वास न करना सम्भव नहीं है, शक्ति जो दुर्ग्राह्य होने के बावजूद मृत्यु के सापेक्ष जीवन के समान वास्तविक है।
    यदि कोई व्यक्ति धर्म के आधार पर किसी दूसरे व्यक्ति पर प्रहार करने के लिए अपना हाथ उठाता है, तो मैं अपनी अन्तिम सांस तक उसके खिलाफ लड़ूँगा।
    भाषण, नई दिल्ली, 2 अक्तूबर 1951
  • सांप्रदायिकता
    दरअसल हम देख चुके हैं कि सांप्रदायिकता ने हमें कहाँ पहुँचा दिया है; हम सभी को याद है कि हम किन गम्भीर खतरों से होकर गुज़रे हैं और उनके कैसे भयावह परिणाम हमने देखे हैं। अब कोई और विकल्प नहीं है; और हमें अपने मन में और देश को अपने मन में यह समझ लेना चाहिए कि सांप्रदायिकता के रूप में धर्म और राजनीति का गठजोड़ सबसे खतरनाक गठजोड़ है, और इस गठजोड़ से सबसे विकृत प्रकार की गैर-कानूनी संतति उत्पन्न होती है।

    हमने राजनीति के आचार-नीति के साथ जुड़े होने के बारे में बहुत चर्चा की है; यह एक ऐसी बात है जिसका, मैं आशा करता हूँ, हम सदैव समर्थन करेंगे। पिछली एक चौथाई शताब्दी या उससे भी अधिक समय तक महात्मा गाँधी ने हमें राजनीति को नैतिकता के धरातल पर रखने की शिक्षा दी है। ऐसा करने में हम कहाँ तक सफल हुए हैं यह तो विश्व समुदाय ही तय करेगा या भविष्य की पीढ़ियाँ ही इसका निर्णय करेंगी। लेकिन हमने कम से कम उस महान सिद्धान्त को अपने सामने रखते हुए इस पर अमल करने का प्रयास किया। लेकिन राजनीति और अपने संकीर्णतम अर्थ में धर्म का राजनीति के साथ मेल, जिसकी परिणति सांप्रदायिक राजनीति के रूप में होती है, निःसंदेह सबसे खतरनाक मेल है और इसे समाप्त किया जाना चाहिए।
    संविधान सभा (विधायी), नई दिल्ली में 3 अप्रैल, 1948 को दिया गया भाषण। यह भाषण संविधान सभा के सदस्य श्री अनन्तशायनम अय्यंगर द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान दिया गया था।
    हम जितना साथ मिलकर आगे बढ़ेंगे, भारत की शक्ति उनती ही बढ़ेगी। सांप्रदायिकता किसी पिछड़े राष्ट्र की पहचान है, आधुनिक युग की नहीं। लोगों का अपना धर्म होता है और उन्हें अपने धर्म का दृढ़ता से पालन करने का अधिकार है, लेकिन राजनीति में धर्म को लाने और देश को तोड़ने का कार्य 300 या 400 वर्ष पहले यूरोप में किया गया था। भारत में हमें इससे बचना चाहिए।

    हमने घोषणा की है कि हम हर प्रकार से सांप्रदायिक संगठनों, चाहे वे मुस्लिम संगठन हों या हिन्दू संगठन हों या सिख या कोई दूसरे संगठन हों, के विरुद्ध संघर्ष करेंगे। राष्ट्रवाद सम्प्रदायवाद के साथ मिलकर नहीं चल सकता है। राष्ट्रवाद का अर्थ हिन्दू राष्ट्रवाद, मुस्लिम राष्ट्रवाद या सिख राष्ट्रवाद नहीं है। जैसे ही आप हिन्दू, सिख या मुस्लिम की बात करते हैं, आप भारत के हक में नहीं बोल रहे होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने आप से यह प्रश्न पूछना चाहिए: मैं भारत को कैसा बनाना चाहता हूँ, एक देश, एक राष्ट्र या 10, 20, या 25 राष्ट्र, एक ऐसा बिखरा और बंटा हुआ राष्ट्र जिसमें की शक्ति न हो, जो हल्के से आघात से ही टुकड़े-टुकड़े हो कर बिखर जाए? प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए। अलगाव हमेशा से भारत की कमज़ोरी रहा है। विखंडनकारी प्रवृत्तियाँ, चाहे वे हिन्दुओं के बीच हों, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों या दूसरे धर्मों में हों, बहुत खतरनाक और अनुचित प्रवृत्तियाँ होती हैं। ये क्षुद्र और पिछड़े दिमागों की उपज होती हैं। कोई भी व्यक्ति जो युग की भावना को समझता है, सांप्रदायिक विचार नहीं रख सकता है।
    श्रीनगर में 19 जुलाई 1961 को दिए गए भाषण से उद्धृत
    राष्ट्रवाद का चोला ओढ़ कर गर्वित चाल चलने वाले सांप्रदायिक संगठन अति संकुचित दृष्टिकोण के स्पष्टतम उदाहरण हैं। एकता के नाम पर ये अलगाव पैदा करते हैं और विनाश करते हैं।
    20 सितम्बर 1953 के पत्र, एल.सी.एम., खण्ड 2, पृष्ठ 375-80 से उद्धृत
  • शांति
    यदि हम शांति चाहते हैं तो हमें शांति का स्वभाव विकसित करना होगा और उन लोगों के भी मन को जीतने का प्रयास करना होगा जो हमें संदेह की दृष्टि से देखते हों या जो यह मानते हों कि वे हमारे विरोधी हैं। हमें दूसरों को समझने के लिए उसी प्रकार प्रयास करने होंगे जैसे हम अपेक्षा करते हैं कि वे हमें समझें। हम युद्ध या धमकियों की भाषा से शांति की स्थापना नहीं कर सकते हैं। आपको वह उदाहरण तो याद ही होगा जिस पर इंग्लैंड और भारत दोनों को ही गर्व है। लम्बे समय तक के संघर्ष के बावजूद हम दोनों ने ही शांति की भावना के साथ अपनी समस्याओं को हल करने का प्रयास किया और हमने न केवल उन्हें हल किया बल्कि साथ ही साथ स्थायी समझबूझ और मित्रता भी कायम की। यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है जिसे हमें उस समय ध्यान में रखना चाहिए जब राष्ट्रों के बीच सम्बंधों को लेकर कोई संकट हमारे सामने उपस्थि हो। समस्याओं के समाधान का यही एकमात्र सभ्य तरीका है और इससे पीछे कोई द्वेष का भाव या कड़वाहट भी नहीं रह जाती।

    मैं कोई शांतिवादी नहीं हूँ। दुर्भाग्य से आज का विश्व मानता है कि बल के प्रयोग के बिना उसका काम नहीं चल सकता। हमें अपनी रक्षा करने और हर आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। हमें आक्रमण और अन्य प्रकार की बुराइयों का मुकाबला करने की आवश्यकता है। बुराई के सामने समर्पण कर देना हमेशा बुरा माना जाता है। लेकिन हमें अपनी भावनाओं और भयों के कारण स्वयं ऐसा कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए जो बुरा हो। बुराई के विरुद्ध संघर्ष करते समय और आक्रमण का मुकाबला करते समय भी हमें हमेशा शांति की भावना को बनाए रखना चाहिए और उन लोगों की ओर भी मित्रता का हाथ बढ़ाना चाहिए जो भय या अन्य कारणों से हमारा विरोध कर रहे हों। हमारे महान नेता महात्मा गाँधी ने हमें यही शिक्षा दी है, और अपनी कमियों के बावजूद हम उनकी महान शिक्षा से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
    6 दिसम्बर 1950 को संसद, नई दिल्ली में विदेशी मामलों पर चर्चा आरम्भ करते हुए दिया गया भाषण
    शांति कोई देशों के बीच का सम्बंध नहीं है। यह तो मन की एक अवस्था है जो आत्मा की शांति से उत्पन्न होती है। शांति का अर्थ युद्ध की स्थिति का अभाव मात्र नहीं होता है। यह मन की एक अवस्था भी है। स्थायी शांति केवल शांतिप्रिय लोगों को ही मिल सकती है।
    शांति के बिना शेष सभी स्वप्न ओझल हो जाते हैं और भस्म हो जाते हैं।
    राष्ट्र का कार्य कभी समाप्त नहीं होता। मनुष्य आते हैं और चले जाते हैं, पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं लेकिन राष्ट्र का जीवन तो निरन्तर चलता रहता है। हम चाहे कोई भी नीति अपनाएं, हमें इस मूल तथ्य को याद रखना चाहिए कि जब तक देश में शांति न हो, हम कुछ अधिक हासिल नहीं कर सकते हैं।
    शांति को अविभाज्य कहा जाता है, स्वतंत्रता भी अविभाज्य है, अब सम्पन्नता पर भी यही बात लागू होती है, और इस एकीकृत विश्व में, जिसे अब अलग-अलग टुकड़ों में बांटना सम्भव नहीं है, यही बात लागू होती है।
    युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है, और भविष्य में मानवता के सामने नई परीक्षाएं और आपत्तियाँ आ सकती हैं। लेकिन शांति की पक्षधर शक्तियाँ मज़बूत हैं और मानवता चेत चुकी है। मुझे विश्वास है कि शांति की ही विजय होगी।
    आज विश्व बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कर चुका है, लेकिन मानवता के लिए अपने सम्पूर्ण घोषित प्रेम के बावजूद वह मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले गुणों की अपेक्षा घृणा और हिंसा पर अधिक टिका है। युद्ध सत्य और मानवता को नकारता है। कभी-कभी युद्ध अपरिहार्य हो सकता है, लेकिन उससे उत्पन्न होने वाले परिणामों की कल्पना भी भयावह होती है। केवल हत्याओं की बात नहीं है, क्योंकि मनुष्य नश्वर है, बल्कि जानबूझकर और लगातार फैलाई जाने वाली घृणा और झूठ की है जो धीरे धीरे लोगों की सामान्य आदतों में शामिल हो जाते हैं। जीवन में घृणा और द्वेष की भावनाओं के वशीभूत होना खतरनाक और नुकसानदेह होता है क्योंकि इनसे हमारी ऊर्जा का अपव्यय होता है और हमारी सोच इस प्रकार सीमित और विरूपित हो जाती है कि हम सत्य को नहीं देख पाते हैं।
  • विश्व व्यवस्था
    हम परिवर्तन के एक क्रांतिकारी दौर से गुज़र रहे हैं। एक ओर हम देखते हैं कि दुनिया बंटी हुई है और विखंडित हो रही है, अनेक प्रकार के संघर्ष चल रहे हैं और विश्व युद्ध की सदैव आशंका बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर हम देखते हैं कि सृजनात्मक और मिलकर काम करने वाली प्रवर्तक शक्तियाँ एक नई एकता और नए एकीकरण के लिए कार्य कर रही हैं।
    आज दुनिया भर में राजनैतिक और आर्थिक संघर्षों के पीछे एक आध्यात्मिक संकट, पुराने मूल्यों और मान्यताओं को चुनौती देने की प्रवृत्ति, और इस उलझाव से बाहर निकलने का मार्ग ढूँढने की छटपटाहट छुपी है।
    आज विश्व में संघर्ष फैला है, और विपदा मुँह बाए खड़ी है। लोगों के हृदय में घृणा और भय और संदेह के भाव हैं जो उनकी दृष्टि को धूमिल कर रहे हैं।
    मेरे विचार में इस दुनिया में समझने वाली पहली बात यह है कि दुनिया के अलग-अलग भागों में लोगों के सोचने के ढंग अलग-अलग हैं, जीवन जीने के तौर-तरीके अलग-अलग हैं और जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी भिन्न हैं। हमारी अधिकांश समस्याएं तब उत्पन्न होती हैं जब कोई एक देश अपनी इच्छा और जीवन पद्धति को दूसरे देशों पर थोपने का कार्य करता है।
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी
    विज्ञान युग की भावना है और आधुनिक विश्व का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। वर्तमान से भी अधिक भविष्य विज्ञान का होने वाला है और उन लोगों का होने वाला है जो विज्ञान को अपना मित्र मानते हैं और मानवता की प्रगति के लिए विज्ञान की सहायता लेते हैं।

    हालाँकि मैं लम्बे समय तक भारतीय राजनीति के रथ में जुते हुए गुलाम की भांति काम करता रहा हूँ जहाँ मुझे दूसरे विचारों के लिए अधिक समय नहीं मिला, लेकिन मेरे विचार अक्सर उन दिनों की ओर भटक जाते हैं जब मैं विज्ञान के उस आश्रय, कैम्ब्रिज की प्रयोगशालाओं में बार-बार आया-जाया करता था। और हालाँकि परिस्थितियों के कारण विज्ञान से मेरा साथ छूट गया लेकिन बाद के वर्षों में भी मेरे विचारों में विज्ञान की ललक बनी रही, घुमाव-फेराव के साथ मैं एक बार फिर विज्ञान के निकट पहुँचा जब मैंने यह समझा कि विज्ञान केवल एक रुचिकर बहलाव का साधन और कपोल-कल्पना मात्र नहीं है, बल्कि जीवन की रचना का आधार है जिसके बिना आधुनिक विश्व ओझल हो जाएगा। राजनीति की राह मुझे अर्थशास्त्र तक लेकर पहुँची जो अपरिहार्य रूप से विज्ञान और हमारी समस्त समस्याओं और स्वयं जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण तक पहुँचती है। केवल विज्ञान ही भूख और गरीबी, अस्वच्छता और निरक्षरता, अंधविश्वास और रूढ़ियों और परम्पराओं, भूखे लोगों वाले इस सम्पन्न देश के संसाधनों के अपव्यय की इन समस्याओं को हल कर सकता है।
    कलकत्ता में 3 जनवरी 1938 को आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन की रजत जयंती के अवसर पर भेजा गया संदेश, जवाहरलाल नेहरू ऑन साइंस, सम्पादक बलदेव सिंह, पृष्ठ 12
    विज्ञान में मेरी रुचि मुख्यतः स्वयं विज्ञान के कारण न होकर विज्ञान के सामाजिक परिणामों के कारण है। हमें एक बढ़ते हुए देश की प्रमुख राजनैतिक, आर्थिक और मुख्यतः सामाजिक समस्याओं का सामना करने और अपने करोड़ों देशवासियों के स्तर को ऊँचा उठाने की चनौतियों का सामना करना है। यह बात स्पष्ट है कि हम विज्ञान और उसके प्रयोगों का सहारा लिए बिना इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते हैं। इसलिए हमें इन प्रमुख समस्याओं का समाधान जानने के लिए अनिवार्य रूप से वैज्ञानिकों के पास जाना पड़ता है। विज्ञान इस सीमा तक विकसित हो चुका है कि उसमें मानवता का हित करने की व्यापक सम्भावनाएं हैं और विपदा खड़ी करने की आशंका भी उत्पन्न हो गई है।
    बम्बई में 3 जनवरी 1960 को आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन के 47वें सत्र में दिया गया उद्घाटन भाषण, जवाहरलाल नेहरू ऑन साइंस, सम्पादक बलदेव सिंह, पृष्ठ 73
    केवल विज्ञान ही भूख और गरीबी, अस्वच्छता और निरक्षरता, अंधविश्वास और रूढ़ियों और परम्पराओं, भूख से अकुलाते गरीबों वाले इस सम्पन्न देश के संसाधनों के अपव्यय की समस्याओं को हल कर सकता है... आज ऐसा कौन है जो विज्ञान की अनदेखी कर सके? हल मोड़ पर हमें उसकी सहायता लेनी पड़ती है... भविष्य उन लोगों का होगा जो विज्ञान को अपना मित्र मानते हैं।
  • परमाणु ऊर्जा
    यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों के लिए किया जा सकता है, मानव जाति के अपरिमित लाभ के लिए किया जा सकता है। इसके प्रयोग को सस्ता बनाने में कुछ वर्षों का समय लग सकता है... शांतिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रयोग विद्युत के सीमित संसाधनों वाले भारत जैसे देश के लिए औद्योगिक दृष्टि से उन्नत फ्रांस जैसे देश की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। हम अमेरिका का ही उदाहरण लें जहाँ बिजली उत्पन्न करने के दूसरे संसाधनों के विशाल भंडार उपलब्ध हैं। परमाणु ऊर्जा जैसे बिजली के अतिरिक्त संसाधन का उनके लिए बहुत अधिक महत्व नहीं है। निःसंदेह वे इसका उपयोग कर सकते हैं; लेकिन उनके लिए भारत जैसे ऊर्जा के अभाव वाले देश या एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देशों जैसी अनिवार्यता नहीं है। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जिन देशों के पास विद्युत उत्पादन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं उनके लिए परमाणु ऊर्जा के प्रयोग को नियंत्रित करना या उस पर प्रतिबंध लगाना उनके हित में हो सकता है क्योंकि उन्हें इस ऊर्जा की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यदि इस पर प्रतिबंध लगाया जाता है या इसे बंद किया जाता है तो उससे भारत जैसे देश को नुकसान होगा।
    लोकसभा में 10 मई 1954 को दिया गया भाषण
  • भारत
    मेरी पीढ़ी एक बीत रही पीढ़ी है और जल्द ही हम भारत की जलती मशाल, जो भारत की महान और शाश्वत भावना को साकार करती है, को युवा पीढ़ी के मज़बूत हाथों में सौंप देंगे। यही प्रार्थना है कि वे इसे ऊँचा उठाए रखें, इसकी लौ को मंदा न होने दें, ताकि उसका प्रकाश हर घर तक पहुँचे और हमारी जनता में विश्वास और साहस का संचार करे।
    कल का भारत वैसा ही होगा जैसा हम उसे अपने आज के उद्यम से बनाएंगे। मुझे इसके बारे में कोई संदेह नहीं है कि भारत औद्योगिक और अन्य प्रकार से प्रगति करेगा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में आगे बढ़ेगा, कि हमारे लोगों का स्तर ऊँचा उठेगा, शिक्षा का प्रसार होगा और स्वास्थ्य की दशा बेहतर होगी और कला और संस्कृति लोगों के जीवन को समृद्ध बनाएंगे। हमने मज़बूत इरादे और सद्भावना के साथ यह पुण्य यात्रा प्रारम्भ की है, और सफर कितना भी लम्बा क्यों न हो, हम इस यात्रा के गंतव्य तक पहुँचेंगे।
    हम एक महान देश के वासी हैं, एक ऐसा देश जो केवल भौतिक दृष्टि से ही महान नहीं है बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण दृष्टियों से भी महान है। यदि हमें अपने देश के योग्य बनना है तो हमें अपना दिल और दिमाग बड़ा करना होगा, क्योंकि तुत्छ विचारों वाले व्यक्ति बड़ी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते।
    भारत ने बचपन के भोलेपन और अल्हड़पन, युवावस्था के उत्साह और उन्मुक्तता, और पीड़ा तथा आनन्द के दीर्घ अनुभव से मिलने वाले विवेक और परिपक्वता को अनुभव किया है; और फिर-फिर उसने अपने बचपन और युवावस्था को तरोताज़ा किया है।
    अतीत की ही तरह, भारत अनेक धर्मों वाला देश होगा जहाँ सभी धर्मों का समान सम्मान और आदर होगा, लेकिन उसका केवल एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण होगा, जो अपने ही खोल में सीमित संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं होगा, बल्कि एक सहिष्णु सकारात्मक राष्ट्रवाद होगा जिसे अपने आप पर और अपने लोगों की प्रकृति पर विश्वास होगा और जो एक अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना में पूरा सहयोग करेगा।
    अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिया गया भाषण, 24 जनवरी 1948
    हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि भारत एक सामासिक देश है, यह अनेक प्रकार से सामासिक है, धर्म की दृष्टि से, परम्परा की दृष्टि से, भाषाओं, जीवन पद्धतियों आदि की दृष्टि से। बहुसंख्यक समूह द्वारा अपने आप को दूसरों पर थोपने का प्रयास आंतरिक टकरावों का कारण बनेगा, जो कि बाहरी टकरावों से कम नुकसानदेह नहीं होंगे। भारत में आज हमारे सामने मूल समस्या सच्चे और आन्तरिक अर्थ में, यानी, हमारे लोगों के मानसिक संगठन के तौर पर संगठित भारत का निर्माण करने की है।
  • अतीत और भविष्य
    हमें अतीत से कई सौगातें मिली हैं : हमें अपनी संस्कृति, सभ्यता, विज्ञान, या सत्य के कुछ पहलुओं के बारे में जो ज्ञान मिला है, वह हमारे सुदूर और हाल के इतिहास से मिली सौगातें हैं। यह उचित भी है कि हम अपने इतिहास के प्रति आभार प्रकट करें। लेकिन केवल हमारे विगत के कारण ही हमारी जिम्मेदारी या दायित्व समाप्त नहीं हो जाते हैं, भविष्य के प्रति भी हमारा दायित्व है, और शायद वह दायित्व हमारे इतिहास के प्रति आभार के दायित्व से भी बड़ा है।

    जो विगत है वह बीत चुका है, हम उसे बदल नहीं सकते, भविष्य अभी आना शेष है, और शायद हम उसे आकार देने के लिए थोड़ा-बहुत कुछ कर सकते हैं। यदि विगत ने हमें सत्य के कुछ पहलुओं से अवगत कराया है, तो भविष्य भी सत्य के कुछ पहलुओं को छिपाए बैठा है, और हमें आमंत्रण दे रहा है कि हम उनकी खोज करें।
    बीते कल के आदर्श और लक्ष्य आज के भी आदर्श हैं, लेकिन जब हम उनकी ओर बढ़े तो उनकी चमक कुछ फीकी पड़ती हुई दिखाई दी, उनकी सुन्दरता की वह चमक न रही जो हमारे दिल और शरीर में उत्साह का संचार करती थी। अनेक बार बुराई की जीत हुई, लेकिन उससे भी खराब बात यह थी कि जो उचित दिखाई देता था वह भद्दा और विरूपित हो गया। क्या मानव स्वभाव मूलतः इतना बुरा था कि उसे उचित व्यवहार करने और मनुष्य को एक लोलुप और हिंसक तथा धूर्त प्राणी से ऊपर के स्तर पर उठाने में युगों के अभ्यास, कष्ट और दुर्भाग्य से होकर गुज़रना पड़ता? और, इस दौरान वर्तमान में या निकट भविष्य में अपने को मूलतः बदलने के हर प्रयास के भाग्य में क्या विफल होना ही बदा था।
    उस उत्साह और उत्कट इच्छा के बिना आशा और चेतनत्व शनै-शनै झर जाते हैं, अस्तित्व के निचले स्तरों पर समझौता हो जाता है, और धीरे-धीरे अस्तित्व अनस्तित्व के तलछट में बैठ जाता है। हम अपने अतीत के गुलाम बन गए और उसकी गतिहीनता का कुछ हिस्सा आज भी हमसे चिपका हुआ है।
    हम सभी पथिक और मुसाफिर बन चुके हैं जो आगे बढ़ते ही जा रहे हैं... फिर भी, जो अपने आप को इस लगातार यात्रा के लिए ढाल सकते हैं उन्हें कोई पछतावा नहीं होता है और वे इससे अलग स्थिति को स्वीकार भी नहीं करेंगे। पुराने घटनारहित अतीत की ओर लौटना अकल्पनीय है।
  • समाजवाद
    मेरा दृढ़ विश्वास है कि दुनिया की और भारत की समस्याओं के समाधान की कुंजी समाजवाद के पास है, और जब मैं इस शब्द का प्रयोग करता हूँ तो किसी अनिश्चित मानवतावादी दृष्टि से नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक-आर्थिक अर्थ में करता हूँ। लेकिन समाजवाद एक आर्थिक सिद्धान्त से बढ़ कर भी कुछ है। यह एक जीवन दर्शन है और मुझे भी प्रभावित करता है। मुझे समाजवाद के अलावा गरीबी, व्यापक बेरोज़गारी, भारत के लोगों की पराधीनता और उनके अपकर्ष से मुक्ति के लिए कोई और मार्ग दिखाई नहीं देता। इसके लिए हमारी राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव करने, भूमि और उद्योग के क्षेत्रों में निहित स्वार्थों को खत्म करने के साथ-साथ भारत की राज्य व्यवस्था में सामंती और स्वेच्छाचारी व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि निजी सम्पत्ति को, एक सीमित अर्थ में निजी सम्पत्ति को छोड़कर, समाप्त किया जाए, और मौजूदा मुनाफे की व्यवस्था के बदल कर सहकारी सेवाओं के उच्च आदर्शों वाली व्यवस्था को स्थान दिया जाए। अर्थात अन्ततोगत्वा हमारी प्रवृत्तियों, आदतों और इच्छाओं में बदलाव किया जाए। संक्षेप में इसका अर्थ यह है कि एक नई सभ्यता विकसित की जाए जो वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था से मूलतः भिन्न हो। इस प्रकार समाजवाद मेरे लिए मात्र एक पसंदीदा आर्थिक सिद्धान्त मात्र नहीं है, यह एक महत्वपूर्ण मत है जिसका मैं अपने दिल और दिमाग से पूरा समर्थन करता हूँ। मैं भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्यरत रहता हूँ क्योंकि मेरे भीतर का राष्ट्रवादी विदेशी आधिपत्य को स्वीकार नहीं कर सकता है, मैं इसके लिए और भी अधिक प्रयास इसलिए करता हूँ क्योंकि मेरी दृष्टि में सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए यह एक अनिवार्य कदम है। मैं चाहूँगा कि कांग्रेस एक समाजवादी संगठन बने और नई सभ्यता की स्थापना के लिए प्रयासरत दुनिया की दूसरी शक्तियों के साथ मिल कर काम करे।
    कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण, 12 अप्रैल 1936, सिलेक्टिड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू, खण्ड 7, पृष्ठ 180-181
    किसी पूँजीवादी समाज की शक्तियों को यदि अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वे अमीरों को और अधिक अमीर और गरीबों को और अधिक गरीब बनाने का कार्य करती हैं।
  • संविधान और शासन
    यदि कोई संविधान अपरिवर्तनशील और गतिहीन हो – तो वह चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, कितना ही दोष रहित क्यों न हो – ऐसा संविधान अपनी उपयोगिता खो चुका है। वह पुराना पड़ चुका है और धीरे-धीरे अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। किसी संविधान को जीवन्त बने रहने के लिए उसका विकास होना चाहिए, उसे अनुकूलनशील होना चाहिए, लचीलापन होना चाहिए, और उसमें बदलाव की क्षमता होना चाहिए। और यदि राजनैतिक घटनाचक्र हमें कुछ सिखाता है, तो वह यही बात है।
    कोई भी ऐसी सरकार जो स्पष्ट विचारों से रहित एक कमज़ोर समूह मात्र हो, अपने नाम या कर्म से सरकार कहलाने के योग्य नहीं है। वहीं दूसरी ओर कोई ऐसी सरकार जो मानती है कि उसने सत्य को जान लिया है – पूर्ण सत्य को जान लिया है – और उसे दूसरों से कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं है या जिसे चीज़ों को उनके वास्तविक अर्थ में जानने की आवश्यकता नहीं है, ऐसी सरकार भी विफल होती है या उसे विफल होना चाहिए क्योंकि जीवन एक जटिल और सदैव परिवर्तनशील प्रक्रिया है।
    हमने अपने संविधान में यह निर्धारित किया है कि भारत एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। इसका अर्थ अधार्मिक होना नहीं है। इसका अर्थ है कि सभी धर्मों का समान सम्मान हो और किसी भी धर्म को मानने वालों को समान अवसर उपलब्ध हों।
    भाषण, नई दिल्ली, 10 जुलाई 1961
  • विपक्ष की भूमिका
    विपक्ष के माननीय सदस्य विचारों की विविधता का प्रतिनिधित्व करत हैं – मैं इस बात को पूरे सम्मान के साथ कहता हूँ – और यदि इस विविधता को रंगों के माध्यम से दर्शाया जाए तो इसमें लाल, लाल रंग के विभिन्न भेद, गुलाबी, पीला और गहरा नीला रंग शामिल होंगे। यदि मैं पश्चिम की भाषा में इस प्रतिनिधित्व का उल्लेख करूँ तो हमारे यहाँ विपक्ष में धुर वामपंथ से लेकर धुर दक्षिणपंथ तक विचारधाराओं के सभी रंग मौजूद हैं। ये विभिन्न विचारधाराएं परिस्थितियों के दबाव में एक साथ आती हैं, इनके बीच सुविधा के आधार पर अक्सर गठजोड़ होते हैं, और बाद में जल्दी ही विच्छेद भी हो जाते हैं। कुल मिलाकर ये अस्थायी साथी एकजुट बने रहते हैं क्योंकि वे बहुमत वाले समूह के विरोध की भावना से जुड़े होते हैं।
    मुझे आश्चर्य होता है कि विपक्ष के कुछ माननीय सदस्य अपने वक्तृत्व कौशल और अपने अच्छे गुणों के बावजूद बदली हुई स्थिति को समझ नहीं पा रहे हैं। उनकी दशा उन धार्मिक कट्टरपंथियों जैसी है जो दाएं या बाएं देखने के लिए तैयार नहीं होते और सिर्फ एक ही दिशा में बढ़ते जाते हैं। सारी दुनिया बदल जाए लेकिन उनकी मानसिक आदतें नहीं बदलती हैं। चाहे जो भी हो, वे एक ही नारे को दोहराते रहेंगे।
    विपक्ष के लिए सरकार का विरोध करने का विकल्प खुला है लेकिन केवल किसी सरकार को डिगाने या कमज़ोर करने के लिए उन्हीं लोगों का नुकसान करना खतरनाक, हानिकारक और कायरतापूर्ण है जिनकी आप सेवा करने की बात करते हैं।
  • भाषा
    भाषा केवल व्याकरण और शब्द शास्त्र से कहीं बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है। यह किसी जाति और संस्कृति की प्रकृति का एक अलंकृत साक्ष्य होता है, और उन लोगों गढ़ने वाले विचारों और कल्पनाओं की जीवन्त अभिव्यक्ति होती है।
    हमारे संविधान निर्माताओं ने यह निर्णय करके अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है कि सभी 13 या 14 भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं होंगी। इनमें से किसी एक भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में किसी दूसरी भाषा की तुलना में अधिक महत्व दिए जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है। बंगाली या तमिल या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा का भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में उतना ही महत्व है जितना कि हिन्दी भाषा का है।

    मैं उच्चतर वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी सम्बंधी अध्ययनों के लिए पूरी तरह अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग के पक्ष में हूँ। फिर भी, यदि हमें अपने विद्यालयों में विज्ञान के ज्ञान का प्रसार करना है तो हमें इसका अध्यापन व्यापक तौर पर राष्ट्रीय भाषाओं के माध्यम से करना चाहिए। नहीं तो अनिवार्यतः इसका यह परिणाम होगा कि लोगों की विज्ञान की समझ और महत्व सीमित हो जाएगा। उसका प्रसार नहीं हो सकेगा।

    हमें इसे हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी या अंग्रेज़ी बनाम हिन्दी की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। यह गलत दृष्टिकोण है। हमें इनमें से प्रत्येक का प्रयोग उसके उचित क्षेत्र में करना चाहिए। राष्ट्रीय भाषाओं के दायरे में केवल राष्ट्रीय भाषाओं को ही स्थान मिलना चाहिए। उस संदर्भ में हम अंग्रेज़ी की बात नहीं कर सकते हैं। दूसरे कई क्षेत्रों में हम अंग्रेज़ी की बात कर सकते हैं।
    राजभाषा विधेयक पर चर्चा के दौरान लोकसभा में दिए गए भाषण से उद्धृत, 24 अप्रैल 1963
  • युवा वर्ग
    आपने भारत में युवा आन्दोलन का नेतृत्व किया है और आपने एक मजबूत और जीवन्त संगठन का निर्माण किया है। लेकिन याद रखें कि संगठन और संस्थाएं तो मनुष्य के हाथ में निष्क्रिय औज़ार हैं। वे तभी जीवन्त और महत्वपूर्ण बनते हैं जब उन्हें महान विचारों की शक्ति से आगे बढ़ाया जाता है। अपने लिए ऊँचे आदर्शों का लक्ष्य रखें और तुच्छ समझौतों से उनका महत्व कम न होने दें। उन लाखों लोगों की ओर देखें जो खेतों और कारखानों में कड़ी मेहनत करते हैं और भारत की सीमाओं के पार देखें जहाँ आप जैसे लोग आपके जैसी ही समस्याओं से जूझ रहे हैं। देशभक्त बनें, अपनी प्राचीन मातृभूमि की मुक्ति के लिए कार्यरत मातृभूमि के बेटे-बेटियाँ बनें; और अन्तरराष्ट्रीयतावादी बनें, सीमाओं और सरहदों या राष्ट्रीयताओं के भेदभाव से मुक्त और विश्व को सभी प्रकार की दासता और अन्याय से मुक्त करने के लिए कार्यरत युवाओं के गणतंत्र के सदस्यों के रूप में योगदान करें।
    बॉम्बे प्रेज़िडेंसी यूथ काँफ्रेंस, पूना में अध्यक्षीय भाषण, 12 दिसम्बर 1928, इम्पॉर्टेन्ट स्पीचेज़ ऑफ जवाहरलाल नेहरू, 1922-46, सम्पादक जे.एस. ब्राइट, पृष्ठ 60-61
    मैं चाहता हूँ कि आप जीवन का आनन्द लें। लेकिन साथ ही मैं चाहता हूँ कि आप भारत के निर्माण के कार्य में भी अपना मन लगाएं और इससे कम महत्व वाली चीज़ों को भूल जाएं। आप एक ऐसे प्रांत में रहते हैं जिसका एक समृद्ध इतिहास है, जिसने स्वतंत्रता की लड़ाई में, भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    हमेशा याद रखिए कि आपकी विरासत क्या है और मेरी विरासत क्या है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप किस गाँव से आए हैं या किस शहर के रहने वाले हैं। आपकी विरासत तो हिमाच्छादित हिमालय से लेकर सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम और कन्याकुमारी तक फैली है। यह पूरा देश आपकी विरासत है।

    आप मुझे बताएं कि मुझे इलाहाबाद में या दूसरे किसी स्थान में जहाँ से मैं आता हूँ, मेरी विरासत से कौन वंचित कर सकता है? इसलिए, याद रखिए कि भारत आपकी विरासत है और हम सभी भारतवासियों की विरासत है, अतीत का भारत, वर्तमान समय का भारत और भविष्य का भारत जिसका निर्माण हम करेंगे... हमारी संस्कृति, हमारा पाँच हज़ार या दस हज़ार वर्ष पुराना इतिहास हमारी परिपक्वता का प्रमाण है। इसलिए हमें ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसे हमारी कोई संस्कृति न रही हो, कोई अनुशासन न रहा हो। संयम बनाए रखने की क्षमता ही किसी परिपक्व व्यक्ति या परिपक्व राष्ट्र की कसौटी है। संयमित होने का यह अर्थ नहीं है कि आप स्वयं को दबा लें या अपने दमन को स्वीकार कर लें। इसका अर्थ आत्मानुशासन, आत्म-संयम होता है। इसके माध्यम से आप अपने अंदर की ऊर्जा के भंडार का उपयोग कर सकेंगे, और एक महान कार्य के लिए उपयोग कर सकेंगे।
    कलकत्ता में 11 नवम्बर 1956 को युवा सम्मेलन में दिया गया भाषण, ए.आई.आर. स्पीचेज़, (एन.एम.एम.आई.), खण्ड 4, पृष्ठ 1994-2001
  • जनजातीय लोग
    जब हम जनजातीय लोगों की बात करते हैं तो मैं जानना चाहता हूँ कि क्या हमारे दिमाग में एक जैसा ही विचार होता है। जहाँ तक मेरी अपनी बात है, हम सभी जनजातीय हैं, चाहे हमें दिल्ली में रहते हों या मद्रास या बम्बई या कलकत्ता या पहाड़ों पर या मैदानी इलाकों में रहते हों। कुछ लोगों को असभ्य बताकर अपने आपको बहुत सभ्य समझना मूलतः गलत है। निःसंदेह लोगों के बीच अन्तर होते हैं। उदाहरण के लिए पंजाब और मद्रास में रहने वाले लोगों के बीच स्पष्ट अन्तर होते हैं। पहाड़ों पर रहने वाले और मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच अन्तर होते हैं। खान-पान, रहन-सहन और जीवन की परिस्थितियों में अन्तर भूगोल और जलवायु के कारण होते हैं। ऐसा होना लाज़मी है। उदाहरण के लिए हम चीनी और जापानी लोगों से बहुत अलग हैं, फिर भी शायद हमारे और चीनी तथा जापानी लोगों के बीच समानताएं हमारे और यूरोप के कुछ लोगों के बीच समानताओं से अधिक होंगी। वहीं दूसरी ओर भाषा की दृष्टि से हमारे और यूरोप के बीच समानताएं अधिक हैं। इस सबसे यही सिद्ध होता है कि अन्तर विभिन्न प्रकार के होते हैं। लेकिन मेरा पूरा विश्वास है कि आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच गुणों के आधार पर अन्तर करना गलत है। हमारे संविधान में अनुसूचित जातियों के विवरण को देखें। जैसा कि आप जानते हैं, यह थोड़ा मनमानीपूर्ण लगता है कि सरकार विचार करने के बाद तय करे कि कोई जाति अनुसूचित जाति है या नहीं। इस दृष्टि से कोई स्पष्ट विभाजक रेखा खींचना सम्भव नहीं है। इसीलिए अन्ततोगत्वा हम लोगों को दलित वर्ग, हरिजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों आदि जैसी संज्ञाओं, विवरणों और नामों के आधार पर वैचारिक और भौतिक दृष्टि से अलग करने वाली व्यवस्थाओं को खत्म करना चाहते हैं।
    जनजातीय कार्य सम्बंधी सम्मेलन, नई दिल्ली, में 4 दिसम्बर 1954 को दिया गया उद्घाटन भाषण
  • ग्रामीण उद्योग / खादी
    हम अपने बड़े उद्योगों को कितना ही विकसित क्यों न कर लें, भारत जैसे देश में ग्रामोद्योग के विस्तार की फिर भी बहुत सम्भावना बनी रहती है। प्रश्न देश की समग्र अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों के समन्वय का है। हम खादी और दूसरे लघु उद्योगों को विकसित करने के लिए चिन्तित हैं, दिखावे के लिए या किसी दूसरे कारण से प्रदर्शन करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि हम ठोस परिणाम हासिल करना चाहते हैं। लेकिन कोई भी आधुनिक राष्ट्र बड़े उद्योगों, जो सरकार के स्वामित्व और नियंत्रण के अधीन होने चाहिए, की सहायता के बिना अपनी स्वतंत्रता को बनाए नहीं रख सकता है।

    हम सचमुच यह विश्वास करते हैं कि लघु उद्योग राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में बड़ा योगदान कर सकते हैं। जैसाकि आप जानते हैं कि बेरोज़गारी हमारे सामने आज की सबसे कठिन चुनौती है और ग्रामोद्योग का विकास इसके समाधान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। निःसंदेह, जब तक प्रत्येक व्यक्ति के पास रोज़गार न हो और राष्ट्र निर्माण के कार्य-कलापों में उसकी भूमिका न हो तब तक कल्याणकारी राज्य का कोई अर्थ नहीं है। यदि उचित सहयोग बना रहे तो मुझे नहीं लगता कि बड़े उद्योगों और ग्रामोद्योगों के बीच किसी प्रकार का टकराव होगा।
    खादी ग्रामोद्योग बोर्ड, नई दिल्ली में 2 फरवरी 1953 को दिए गए भाषण से अनूदित
  • जनसेवा
    मुझे भारत का प्रधानमंत्री कहा जाता है, लेकिन यदि मुझे भारत का प्रथम सेवक कहा जाता तो ज़्यादा उपयुक्त होता। इस युग में पदनाम या पद का महत्व नहीं है बल्कि सेवा करना अधिक महत्वपूर्ण है।
    प्रसारण, 1 दिसम्बर 1947