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सम्मेलन में भाषण

समावेशी लोकतंत्र और लोगों का सशक्तीकरण: जवाहरलाल नेहरू की विरासतप्रोफेसर आदित्य मुखर्जी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती के अवसर पर
नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत: लोकतंत्र, समावेशन और सशक्तीकरण विषय पर
अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन
17-18 नवम्बर 2014, नई दिल्ली

समावेशी लोकतंत्र और लोगों का सशक्तीकरण:
जवाहरलाल नेहरू की विरासत

I
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ने किस प्रकार के भारत की 'कल्पना' की थी

भारतीय राष्ट्र या जिसे हम आज भारत के रूप में जानते हैं, उसकी कल्पना आधुनिक राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम या भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ने की, जिसका उदय अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकने के लिए 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। स्वतंत्रता के लिए यह जो संघर्ष था इसने ही 'भारत की कल्पना' (इस अभिव्यक्ति का प्रयोग रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किया) की। 1885 में अपनी स्थापना के समय से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया जिसके अंतर्गत आन्दोलन की विभिन्न लडियां, जिनकी राजनैतिक अधिमान्यताओं में विविधता थी, समाहित थीं किंतु वे सभी 'भारत की कल्पना' के एक साझे केन्द्र से बंधी हुई थीं, जो थी।

जिस प्रकार भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले योजनाकारों ने 'कल्पना' की, वह संभवत: उस समय अद्भुत था। जब यूरोप में उदीयमान राष्ट्र-राज्य अधिकाधिक समांगी समाजों की रचना करने का प्रयास कर रहे थे, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों को नष्ट किया जा रहा था, जिसमें अत्यधिक हिंसा थी, तब भारतीय राष्ट्र के एक होने की कल्पना की गई, जिसमें अनेकता को सहर्ष स्वीकार किया गया। प्रत्येक क्षेत्र की अनेक, प्राय: प्राचीन भाषाओं, धर्मों, जनजातीय संस्कृतियों आदि के विकास को भारतीय राष्ट्र के निर्माण में योगदान करने वाले तत्वों के रूप में स्वीकार किया गया न कि उसके मार्ग की बाधाओं के रूप में। आरंभिक राष्ट्रवादियों ने पूरी जागरूकता के साथ भारतीय राष्ट्र के निर्माण को एक प्रक्रिया के रूप में देखा न कि एक घटना के रूप में। उन्होंने भारत को एक 'निर्माणाधीन राष्ट्र' की संज्ञा दी तथा अपनी भूमिका को इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाले तथा उनका पोषण करने वाले के रूप में समझा।

इससे पहले कि हम भारत की कल्पना को साकार रूप देने में भारत के महानतम नेताओं में से एक जवाहरलाल नेहरू के योगदान का मूल्यांकन करें, भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ने कैसे भारत की कल्पना की, इस विषय पर संक्षेप में विचार कर लेना समीचीन होगा। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आज भारत के उसी विचार को गम्भीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की 'भारत की कल्पना' के तीन मूलभूत तत्व थे। पहला, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता वे आधार बनने थे जिन पर भारतीय राष्ट्र का निर्माण होना था। उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष था।

1देखें टैड फर्नी, एनलाइटनमेंट एंड वायलेंस: मॉडर्निटी एंड नेशन मेकिंग, सेज, 2014, (मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री में सेज सीरीज़ का खंड 15) यूरोप, भारत, ईरान और तुर्की में राष्ट्र निर्माण के प्रयासों की उत्कृष्ट तुलना के लिए देखें। पंकज मिश्रा, "द वैस्टर्न मॉडल इज़ ब्रोकन", द गार्जियन, 14 अक्तूबर 2014 भी देखें।

अनेक भाषाओं और धर्मों वाले देश में सबके लिए लोकतांत्रिक अधिकारों का आवश्यक रूप से यह अर्थ था कि देश धर्मनिरपेक्ष होगा तथा उसमें समाज के सभी वर्गों का समावेश होगा। सम्पूर्ण समावेशन (केवल स्वीकृति के रूप में नहीं, बल्कि अनेकता में उत्सव के रूप में) के अर्थ में धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र को साथ-साथ चलना था। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं था। इसलिए जवाहरलाल नेहरू धर्म-निरपेक्ष लोकतंत्र की बात करते थे।

जिस प्रकार समावेशन के अर्थ में भारतीय अनुभव अधिक सशक्त यूरोपीय आदर्श (मॉडल) से हटकर अलग था, उसी प्रकार लोकतंत्र के अर्थ में भी वह यूरोपीय आदर्श से भिन्न था। 19वीं शताब्दी के अंतिम समय तक भारतीय राष्ट्रवादियों ने व्यस्क मताधिकार की आवश्यकता का अनुभव किया तथा स्वतंत्र भारत ने 26 जनवरी, 1950 को अंगीकृत संविधान में इसे अपना अभिन्न अंग बनाया। पाश्चात्य राष्ट्र-राज्यों में व्यस्क मताधिकार, विशेष रूप से महिलाओं तथा समाज के निम्न वर्गों के लिए, लोकतांत्रिक संस्थाओं का अंगीकरण करने के बाद भी अत्यधिक विलम्ब से प्रकट हुआ।

दूसरा, यह स्पष्ट किया जा चुका है कि भारत में राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया के प्रारंभ का मूल उपनिवेशवाद के विरुद्ध उसके संघर्ष में निहित है। इसलिए संप्रभुता या स्वतंत्रता और उपनिवेशवाद का विरोध भारतीय राष्ट्र का एक मूलभूत सिद्धांत बना। यह माना गया कि स्वतंत्रता और संप्रभुता तभी संभव है जब औद्योगीकरण पर आधारित स्वतंत्र आर्थिक विकास हो। यह एक ऐसा कार्य था जिसे आगे लोकतंत्र की सहायता से किया जाना था। यूरोप में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में एक और प्रमुख अंतर था जो सामान्यत: पूंजीवाद के अभ्युदय तथा वस्तुत: विश्व के अन्य समुदायों को उपनिवेश बनाने से जुड़ा हुआ था। साथ ही, विशेष रूप से अपने आंरभिक चरण में यूरोप में जो औद्योगीकरण हुआ उसमें लोकतंत्र का अभाव था।

तीसरा, भारत की राष्ट्रवादी दृष्टि में निर्धनोन्मुखी विचार मुखर था। राष्ट्रीय आन्दोलन में अनेक ऐसे नेता थे जो समाजवादी आदर्श में विश्वास रखते थे। दक्षिणपंथ और वामपंथ में जो न्यूनतम सम्मति हो सकती थी, उसके अंतर्गत एक समानतावादी, निर्धनोन्मुखी सामाजिक आदर्श की संभावना थी। भारतीय राष्ट्रवाद के दादाभाई नौरोजी, एम.जी. रानाडे, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, आर.सी. दत्त जैसे संस्थापकों ने गरीबी उन्मूलन को उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष का प्रमुख उद्देश्य माना क्योंकि उनके विश्लेषण के अनुसार गरीबी औपनिवेशिक शोषण की उपज थी।2

भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की एक प्रमुख विशेषता है कि वह एक दीर्घकालीन आन्दोलन था, जो लगभग एक शताब्दी तक चला, जो जन साधारण पर आधारित था। लाखों लोगों ने इसे विश्व इतिहास का संभवत: सबसे बड़ा जनांदोलन बना दिया था। वह एक बलात् सत्ता परिवर्तन या काडर आधारित पेशेवर क्रांतिकारियों या गुरिल्लों या क्रांतिकारी सेना द्वारा संचालित तख्ता-पलट नहीं था। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एक दीर्घकालीन जनांदोलन था। इसका आशय है कि इस आन्दोलन के तीन मूलभूत विचार - धर्म-निरपेक्ष और समावेशी लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता, संप्रभुता तथा उपनिवेशवाद का विरोध तथा निर्धनोन्मुखी विचार, भारतीयों के अंतर्मन में सुस्थापित होकर प्रधान हो गए। इसका मतलब यह हुआ कि इस आन्दोलन से उपजे स्वतंत्र भारतीय राज्य को राष्ट्र निर्माण का कार्य करने के लिए इन्हीं मूल विचारों की सीमा के अंतर्गत कार्य करना था। ऐसा इसलिए है क्योंकि क्रांति के बाद उभरने वाला राज्य आवश्यक रूप से उस आन्दोलन की विचारधारा, कार्यनीति, पद्धति, सामाजिक आधार तथा आदर्शों की छाप लिए हुए होता है जिसके कारण उसका जन्म हुआ होता है।

2देखें बिपन चंद्र, राइज़ एंड ग्रोथ ऑफ इकॉनॉमिक नेशनलिज़्म इन इंडिया, पीपल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1966

जवाहरलान नेहरू (महात्मा गांधी के बाद) भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे, जिन्होंने 'भारत की कल्पना' को मूर्त रूप दिया तथा इस कल्पना को करोड़ों भारतीय तक पहुंचाया। भारत अत्यधिक भाग्यशाली था क्योंकि उसके पास अनेक महान नेता थे, जो भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के द्वारा प्रकट किए गए थे, जिन्होंने नेहरू के कंधे से कंधा मिलाकर इस कार्य को किया। तथापि भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के स्वप्न को, 1947 में प्राप्त स्वतंत्रता के बाद नवजात भारतीय राष्ट्र राज्य में, क्रियान्वित करने की चुनौती मुख्यत: जवाहरलाल नेहरू के कंधों पर आई। स्वतंत्रता के 6 माह के भीतर ही हिन्दू सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित एक हत्यारे ने, जो धर्म-निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक भारत के स्वप्न से सहमत नहीं था, राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख नेता महात्मा गांधी की हत्या कर दी। सरदार पटेल जो विभिन्न घुमावदार रास्तों से भारतीय गणतंत्र के संविधान को उसके लक्ष्य तक ले जाने के कार्य में नेहरू के साथ दृढ़तापूर्वक खड़े रहे तथा जिन्होंने बिना हिचकिचाये महात्मा गांधी की हत्या करने वाली जिम्मेदार शक्तियों को कड़ाई से रोका, आर.एस.एस. (राष्ट्रीय स्वयं संघ) जो हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों का प्रमुख संगठन था, उस पर प्रतिबंध लगाते हुए 25,000 आर.एस.एस. कार्यकर्ताओं को जेल भेजा, उनकी भी 1950 के अंत तक मृत्यु हो गयी।

यह कार्य नेहरू के लिए शेष रहा, जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे, और जो 18 वर्ष की लम्बी अवधि के लिए प्रधानमंत्री थे। उन्हें ही नवजात भारतीय राज्य का पोषण करना था तथा उसे परिपक्व बनाना था। आगे के पृष्ठों में मैं बताने का प्रयत्न करूंगा कि नेहरू ने इस वृहत् तथा ऐतिहासिक दृष्टि से कई मायनों में एक विविधतापूर्ण समाज में जो औपनिवेशिक राज्य के सक्रिय गुप्त समझौतों से अन्दर तक बंटा हुआ था, एक आधुनिक लोकतंत्रात्मक राष्ट्र राज्य के निर्माण के अद्भुत कार्य को किस प्रकार अपने हाथ में लेकर आरंभ किया। उन्हें एक पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था में, जिसकी संरचना उपनिवेशवाद ने की थी, लोकतंत्र की सीमाओं के भीतर आधुनिक औद्योगीकरण का विकास करना था। उन्हें एक निर्धन तथा दुर्भिक्ष ग्रस्त देश में विकास और समता के बीच संतुलन भी बनाना था, उन्हें लोगों को सशक्त भी बनाना था तथा उनसे यह भी अपेक्षा रखनी थी कि वे राष्ट्र के लिए एकजुट होकर कमर कसे रहें। उन्हें सर्वोच्च स्तर की वैज्ञानिक शिक्षा को भी बढ़ावा देना था। यह एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें उपनिवेशवाद ने बंजर बना रखा था। संक्षेप में उन्हें उपनिवेशवादी संरचना को ध्वस्त करते हुए तीव्र गति से आर्थिक विकास करना था। यह कार्य भी उन्हें सर्व सहमति से बिना किसी शक्ति का प्रयोग करते हुए करना था। उन्हें यह सब राष्ट्र के निर्माण के शुरुआती वर्षों में उन सिद्धांतों के अक्षुण्ण रखते हुए करना था, जिन्हें 'नेहरूवादी सर्वसम्मति' कहा जाता है। इस जटिल कार्य को करने के लिए भगीरथ प्रयत्न की आवश्यकता थी। उन्होंने इसे सफलतापूर्वक करने की योग्यता दिखाई। इसमें उन्होंने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। इस प्रक्रिया में उन्होंने एक ऐसी विरासत छोड़ी है, जो केवल भारतीयों के लिए ही नहीं है बल्कि उपनिवेशवाद से आक्रान्त विश्व के सभी लोगों के लिए है, जो अपने अतीत से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहे थे लेकिन यह सब मानवीय और लोकतांत्रिक तरीके से किया जाना था।

II
धर्म-निरपेक्ष समावेशी राष्ट्र का निर्माण

1946 से 1952 की अवधि, जब जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया तब से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र भारत को पहले आम चुनाव तक ले जाने का समय वह दौर था, जिसमें 'भारत की कल्पना' की परीक्षा अत्यधिक शक्तिशाली विषमताओं के विरुद्ध हुई। स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन हुआ तथा व्यापक धार्मिक और साम्प्रदायिक हिंसा हुई। यह विनाशलीला जैसी स्थिति थी जिसमें अनुमानत: 5,00,000 लोगों की हत्या हुई तथा लाखों लोग बेघर हो गए (लगभग 60 लाख शरणार्थी भारत आए, जो साम्प्रदायिक घृणा और हिंसा के कारण शरणार्थी बने। परिणाम यह हुआ कि कुछ वर्ष की छोटी अवधि में ही मानव इतिहास में जनसंख्या के स्थानांतरण की सबसे बड़ी घटना घटी। इन सबके बीच एक ऐसा भारतीय राष्ट्र जो उस पक्षी की भांति था जिसने अभी उड़ना सीखा था, उसके महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक हत्यारे की गोली से धराशायी हो गए, एक ऐसा हत्यारा जो भारत के उस स्वप्न को चुनौती देने के लिए प्रस्तुत किया गया था जिसके लिए महात्मा जीए और जिसके लिए उनकी मृत्यु हुई। घृणा और हिंसा के इस वातावरण में पूर्णत व्यस्क मताधिकार पर आधारित प्रथम लोकतांत्रिक आम चुनाव के लिए पथ प्रदर्शित करना लगभग असंभव सा कार्य था। किंतु जवाहरलाल नेहरू ने चुनौती का खुलकर सामना किया। उन्होंने अदम्य ऊर्जा से भारत को, राष्ट्र के रूप में जन्म के समय ही सबसे बड़े संकट से बाहर निकाला। एक भारतीय इतिहासकार के शब्दों में यह उनकी 'सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि' थी।3

स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन की समयावधि में भारत धार्मिक और साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा था। मुस्लिम लीग की अगस्त, 1946 में प्रत्यक्ष कार्रवाई की मांग के फलस्वरूप कलकत्ता में बड़ा भारी नरसंहार हुआ। यह तो शुरूआत थी, जो नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन से एक माह के भीतर हो गई थी। इस अंतरिम सरकार का गठन ब्रिटिश शासकों ने सितम्बर में सत्ता के हस्तांतरण की प्रस्तावना के रूप में किया था। अगले ही माह अक्तूबर में नोवाखाली में व्यापक हिंसा भड़की। नोवाखाली बंगाल में दूरदराज का एक जिला है। उस समय बंगाल प्रांत में मुस्लिम लीग की सरकार थी, उस सकार ने इस हिंसा को रोकने के लिए कोई कारगर उपाय नहीं किया। यह हिंसा जो कलकत्ता और नोवाखाली के रूप में मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक हिंसा पड़ोसी बिहार में जंगल की आग की तरह कुछ ऐसे फैली कि पहली बार ग्रामीण क्षेत्र भी इसकी चपेट में आ गए।

गांधी जी तुरन्त नोवाखाली के गांवों में 6 नवम्बर, 1946 को गए। वहां उन्होंने साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने का अति दुष्कर कार्य किया वह भी ऐसे में जब प्रांत की मुस्लिम लीग सरकार प्रतिकूल थी। राष्ट्रीय आन्दोलन के महानायक ने 4 मार्च, 1947 तक, यानि कि 4 माह तक गांवों की पगडंडियों पर चलकर उन ग्रामीण बस्तियों की झोंपड़ियों में सोकर, जहां पहुंचना मुश्किल है, जो भारत के दूरदराज के क्षेत्र में हैं, वहां के कर्म क्षेत्र में व्यतीत किए। यह एक ऐसा समय था जब सत्ता के हस्तांतरण से संबंधित जटिल वार्ता भी चल रही थी। इससे दिखाई दिया कि साम्प्रदायिकता से संघर्ष करना गांधी जी के लिए कितना महत्वपूर्ण था। गांधी जी के साथ वस्तुत: सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, अनुग्रह नारायण सिंह तथा अन्य उच्च नेताओं ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। वे सब हिंसा को तुरंत रोकने के लिए प्रतिबद्ध थे। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक-एक करके उन्होंने (नेहरू ने) अपने सभी शस्त्रों का प्रयोग किया जैसे राज्य की कड़ी शक्ति, स्वतंत्रता संघर्ष की प्रतिष्ठा और आदर्श, गांधी जी की प्रतिष्ठा और आदर, अपनी निजी प्रतिष्ठा तथा और भी बहुत कुछ। उन्होंने अपने जीवन को दाव पर लगाया तथा बिहार पहुंचते ही तुरन्त घोषणा की:

"मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बीच खडा रहूंगा। दोनों ही समुदायों के सदस्यों को एक-दूसरे को मारने से पहले मेरे शव पर से गुजरना होगा।"5

8 नवम्बर तक बिहार में स्थिति नियंत्रण में आ गई।

3देखें मृदुला मुखर्जी, "जवाहरलाल नेहरूज़ फाइनेस्ट ऑवर:द स्ट्रगल फॉर ए सेक्युलर इंडिया", स्टड़ीज़ इन पीपल्स हिस्ट्री, खंड 1 सं. 2, 2014 तथा मृदुला मुखर्जी, "कॉम्यूनल थ्रेट एंड सेक्युलर रेज़िस्टेंस: फ्रॉम नावखाली टू गुजरात" अध्यक्षीय भाषण (मॉडर्न इंडिया), इंडियन हिस्ट्री काँग्रेस, मालदा, फरवही 2011। यह जानने के लिए देखें कि राष्ट्रवादियों ने किस प्रकार नेहरू और गाँधीजी के नेतृत्व में साम्प्रदायिकता की चुनौती का सामना किया और वर्तमान समय के लिए उससे क्या सबक सीखे जा सकते हैं। इस खंड में इन दो कृतियों की जानकारी का भरपूर उपयोग किया गया है।
4देखें वहीं
5बिहार शरीफ में दिया गया भाषण, 4 नवम्बर, 1946, सिलेक्टिड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू (यहाँ इसके बाद एस.डब्ल्यू.जे.एन. के रूप में उल्लिखित),
सीरीज़ 2, खंड 1, 1984, पृ. 57

स्वतंत्रता के साथ ही सैंकडों हज़ार शरणार्थी पूर्वी पंजाब और दिल्ली आए तथा इस क्षेत्र में व्यापक हिंसा हुई। 16 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में नेहरू ने स्पष्ट किया कि साम्प्रदायिक संघर्ष को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा तथा भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा। वह पाकिस्तान के प्रतिबिम्ब के रूप में एक हिन्दू राज्य नहीं बनेगा। उन्होंने घोषणा की:

"सरकार की पहली जिम्मेदारी होगी कि वह देश में शान्ति स्थापित करे तथा साम्प्रदायिक संघर्ष का कठोरता से दमन करे... यह कहना गलत है कि इस देश में किसी विशेष धर्म या समुदाय का शासन होगा। वे सभी जिनकी निष्ठा और विश्वास राष्ट्र ध्वज के प्रति है, जाति-धर्म के भेदभाव के बिना नागरिकता के समान अधिकारों का उपयोग करेंगे।"6

अगले ही दिन वे पंजाब में थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहले कुछ सप्ताह वे दिल्ली से अधिक पंजाब में थे। पुन: 19 अगस्त, 1947 को राष्ट्र को संबोधित करने वाले एक प्रसारण में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा:

"हमारा राज्य कोई साम्प्रदायिक राज्य नहीं है, बल्कि एक लोकतांत्रिक राज्य है जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हैं। सरकार इन अधिकारों का संरक्षण करने के लिए कृतसंकल्प है।"7

किसी तरह से साम्प्रदायिक स्थिति नियंत्रण में आई ही थी कि महात्मा गॉंधी की हत्या हो गई। नेहरू का विचार स्पष्ट था--'' यह हत्या किसी एक व्यक्ति या किसी छोटे समूह का कृत्य नहीं था।.... हत्यारे के पीछे एक व्यापक संगठन था।'' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिस संगठन की ओर वे संकेत कर रहे थे, वह आरएसएस था।8 वस्तुत: उन्होंने इस हत्या को सत्ता हथिया कर भारतीय राज्य की मूल प्रकृति को परिवर्तित करने के प्रयास के रूप में देखा। 5 फरवरी, 1948 को उन्होंने मुख्यमंत्रियों को जो पत्र लिखा उसमें उन्होंने सीधी बात की:

"ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर बलात् सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई गई जिसमें अनेक लोगों की हत्या करके और अधिकतर क्षेत्रों में अव्यवस्था को बढावा दिए जाने की योजना थी ताकि संबंधित विशेष समूह (आरएसएस) सत्ता हथिया सके। यह षडयंत्र व्यापक प्रतीत होता है, जो कुछ राज्यों तक फैला है।"9

धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में 'आईडिया ऑफ इंडिया' के लिए यह एक खतरा था और नेहरू नहीं चाहते थे कि वह सफल हो। उप-प्रधान मंत्री और गृह मंत्री सरदार पटेल के पूर्ण समर्थन से उन्होंने आर.एस.एस. पर प्रतिबंध लगा दिया तथा उसके 25,000 कार्यकर्त्ताओं को जेल भेज दिया गया। जुलाई 1949 में जब आर.एसएस ने लिखित आश्वासन दिया कि वह आगे से केवल एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करेगा तथा राजनीति से उसका कोई लेना-देना नहीं रहेगा, तब आर.एस.एस. पर लगा प्रतिबंध हटाया गया। फिर भी उन्होंने मुख्यमंत्रियों को आर.एस.एस. की फासीवादी प्रकृति तथा उनकी गतिविधियों के फिर से शुरू होने के खतरे की चेतावनी दी।10

धर्मनिरपेक्षता के आदर्श के प्रति नेहरू की प्रतिबद्धता तथा साम्प्रदायिक फासीवादी शक्तियों से होने वाले खतरे की गम्भीर प्रकृति को भाप लेने की उनकी समझ इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि उन्होंने 1951-52 के पहले आम चुनाव को बहुत ही अच्छी तरह से लगभग एक ऐसे जनमत संग्रह में परिवर्तित कर दिया जो भारतीय राज्य की प्रकृति को तय करने वाला जनमत संग्रह बन गया।

6एस.डब्ल्यू.जे.एन., सीरीज़ 2, खंड 4, पृ. 2
7एस.डब्ल्यू.जे.एन., सीरीज़ 2, खंड 4, पृ. 9
8जवाहरलाल नेहरू: लैटर्स टू चीफ मिनिस्टर्स (इसके बाद एल.सी.एम. के रूप में उल्लिखित), 5 फरवरी 1948, खंड 1, पृ. 56
9वहीं देखें पृ. 57
10एल.सी.एम., 20 जुलाई 1949 तथा 1 अगस्त 1949, खंड 1, पृ. 412-13, 428

उन्होंने साम्प्रदायिक राजनैतिक समूहों के विरुद्ध संघर्ष को अपना प्रमुख उद्देश्य बनाया तथा भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के धर्मनिरपेक्ष स्वप्न की साकार करने के लिए अथक प्रयास किए। ''उन्होंने लगभग 40,000 किलामीटर की यात्रा की तथा अनुमानत: साढे तीन करोड लोगों या भारत की जनसंख्या के दसवें भाग को संबोधित किया। फलस्वरूप विनाशलीला जैसी स्थिति तथा साम्प्रदायिक उन्माद के अत्यधिक भडकने के कुछ ही वर्ष के भीतर शान्तिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव हुए। हिन्दू महासभा, नवगठित जनसंघ तथा रामराज्य परिषद जैसे साम्प्रदायिक दलों को 489 सीटों वाली लोकसभा में केवल 10 सीटें मिल पाईं तथा वे कुल मिलाकर 6 प्रतिशत मत प्राप्त कर सके।'' यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए एक बड़ा सम्मान था।

आने वाले दशकों तक के लिए साम्प्रदायिकता का खतरा टल गया।

दुर्भाग्य यह था कि यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
III
लोकतंत्र का विकास

जवाहरलाल नेहरू के लिए लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता ऐसे सम्पूर्ण मूल्य थे जिनके साथ किसी भी उद्देश्य के लिए समझौता नहीं किया जा सकता था, भले ही वे कितने प्रशंसनीय क्यों न हों, जैसे- योजना, आर्थिक विकास या सामाजिक न्याय। इसके कारण अन्य उद्देश्यों की पूर्ति कर गम्भीर प्रभाव पडा। नेहरू ने घोषणा की, ''मैं किसी भी कीमत पर लोकतांत्रिक मूल्यों को नहीं छोडूंगा।''12 इसमें उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इस मूलभूत तत्व को प्रतिबिम्बित किया कि लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। इसकी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति महात्मा गॉंधी के अति उत्कृष्ट कथन में हुई है- ''अहिंसा के पालन के साथ स्थायी नागरिक स्वतंत्रता... स्वतंत्रता का आधार है। इसे कम करने या इसके साथ समझौता करने की कोई संभावना नहीं है। यह जीवन का जल है। मैंने कभी नहीं सुना कि पानी को और तरल किया जा सकता है।13
लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता को अपने-आप में आवश्यक मूल्य के रूप में देखने के अतिरिक्त नेहरू का दृढ विश्वास था भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को एकता के सूत्र में अहिंसा और जीवन की लोकतांत्रिक पद्धति के द्वारा ही बांधा जा सकता है, शक्ति या जोर-जबरदस्ती से नहीं। केवल एक लोकतांत्रिक ढांचा ही विभिन्न भाषायी, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा सामाजिक-आर्थिक प्रवृत्तियों को अभिव्यक्ति का अवसर दे सकता है और भारत को एक रख सकता है। आज राष्ट्र जिस खतरे का सामना कर रहा है, उसका पूर्वानुमान लगाते हुए उन्होंने कहा:

"यह इतना विशाल देश है, जिसमें इतने प्रकार की मान्य विविधताएं हैं कि इसमें किसी तथाकथित 'शक्तिशाली व्यक्ति' के लिए लोगों और उनके सपनों को कुचलना सम्भव नहीं है।"14

उन्होंने सावधानीपूर्वक अपने आप को लोकप्रियता या जनमत संग्रह वाले/बहुमत वाले लोकतंत्र में का शिकार नहीं बनने दिया और वह भी उस समय जब गॉंधी जी और पटेल की मृत्यु के बाद वे भारतीय राजनीति के बहुरंगी परिदृश्य के शिखर पर थे और अपना या अपनी नीतियों का विरोध करने वालों को आसानी से दबा सकते थे।

11मृदुला मुखर्जी, ऊपर पाद टिप्पणी 3 देखें
12करंजिया, द फिलॉसॉफी ऑफ मिस्टर नेहरू, पृ. 123 बिपन चंद्र, "जवाहरलाल नेहरू इन हिस्टॉरिकल पर्सपेक्टिव, द राइटिंग्स ऑफ बिपन चंद्र: ओरिएंट ब्लैकस्वॉन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 136 में उद्धृत
13हरिजन, 24 जून 1939, कलेक्टिड वर्क्स ऑफ महात्मा गाँधी, खंड 69, पृ. 356, बिपन चंद्र के लेखों में उद्धृत, पूर्व उद्धृत, पृ. 169
14करंजिया, पूर्व उद्धृत, पृ. 139


उन्होंने उचित ही देखा कि लोकतंत्र का हृदय मतभेद का सम्मान करने में है, भले ही वह मतभेद विपक्षी ही क्यों न हो या फिर उनका हो जिनकी संख्या कम है। पहले आम चुनाव से पूर्व 2 जून, 1950 को उन्होंने कहा:

"मैं इस देश में विपक्ष से भयभीत नहीं हूँ। मुझे आपत्ति नहीं है यदि विपक्षी-समूह किसी सिद्धांत, व्यवहार या सृजनात्मक विचार के आधार पर विकसित हो। मैं नहीं चाहता कि भारत एक ऐसा देश हो जिसमें करोडों लोग एक ही व्यक्ति की सारी बातें मानते रहें। मैं एक सशक्त विपक्ष चाहता हूँ।"15

उन्होंने जागरूकतापूवर्क एक शक्तिशाली विपक्ष का पोषण किया जो प्रेस तथा अन्य लोकतंत्र के महत्वपूर्ण क्रियाशील संस्थाओं जैसे कि संसद में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए अधिकार प्राप्त है। उन्होंने संसद तथा संसदीय प्रक्रिया एवं आचार संहिता का अपने अंतिम समय तक सम्मान किया। इस संबंध में वे अनुकरणीय हैं तथा हमारे वर्तमान के सांसद उनसे बडी सीख ले सकते हैं। उन्होंने बडी सावधानी से सरकार की मंत्रिपरिषद व्यवस्था को संस्था का रूप दिया। ऐसा नहीं है कि उन्होंने शक्तियों का केन्द्र स्वयं को बना रखा था। उनके सहकर्मियों में ऐसे अनेक थे जिनकी प्रवृत्ति महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय उनपर छोडने की थी। उन्हें यह स्वीकार्य नहीं था। सी.डी. देशमुख, जो नेहरू की मंत्रिपरिषद में 1950 तक वित्त मंत्री थे, ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ''मंत्रिपरिषद के प्रमुख के रूप में नेहरू सौम्य, संवेदनशील तथा लोकतांत्रिक थे। अपने सहकर्मियों पर कभी अपना निर्णय थोपते नहीं थे।...."16

मतभेद तथा विपक्ष के लिए नहरू का आदर अनुकरणीय था। एक छोटी-सी घटना, इसका उदाहरण है। प्रधानमंत्री के रूप में डा. मनमोहन सिंह ने एक बार अपने आवास पर एक पुस्तक विमोचन समारोह में अपने उस समय अनुभव का स्मरण किया, जब वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष (1985-87) थे। नेहरू के समय की फाइलों का अवलोकन करते हुए उन्होंन पाया कि नेहरू अपने अधिकारियों से तब अप्रसन्न हुए जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके अनुदेश कि 1950 के दशक में विशेषत: दूसरी योजना (जिसने नेहरू-महालनोबिस मॉडल को प्रस्तुत किया) के समय जो योजना दस्तावेज प्रारूप तैयार किए गए थे, उन्हें राय के लिए सारी दुनिया में भेजा जाए का अनुपालन उन दस्तावेजों के द्वारा हुआ जो आवश्यक रूप से उन्हें भेजे गए थे, जो नेहरू से सहमत थे। इस पर रोष व्यक्त करते हुए उनका विचार था कि उनका प्रयास पूरी तरह असफल हो गया था। उन्होंने जोर दिया कि उन दस्तावेजों को शिकागो स्कूल के मिल्टन फ्रेडम्न जैसे लोगों को भेजा जाए जिनकी नेहरू के दृष्टिकोण से सहमत होने की संभावना बहुत कम थी।

एक और भी ज्यादा मुखर उदाहरण- नेहरू विपक्ष तथा अपने इस विश्वास का सम्मान करते थे कि भारत के चेहरे पर किसी तानाशाह या अन्य किसी शक्तिशाली व्यक्ति अभ्युदय की प्रवृत्ति वाले भावों की अभिव्यक्ति न हो। उन्होंने उपनाम धारण करते हुए उस समय लिखा था, जब वे अपनी लोक प्रियता के शिखर पर थे कि वे स्वयं के समीक्षक थे। यह ऐसा था जैसे वे अपने आप को तथा भारत के लोगों को सचेत कर रहे थे कि स्वयं उनमें या भारत की राजनीति में इस प्रकार की प्रवृत्ति उपजने न पाए। लगातार दो वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 'चाणक्य' उपनाम का प्रयोग करते हुए अक्तूबर, 1937 में एक लोकप्रिय पत्रिका में 'राष्ट्रपति' या 'प्रेसिडेन्ट' शीर्षक का एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने चेतावनी दी:

“Men like Jawaharlal with all their capacity for great and good work, are unsafe in a democracy…. A little twist and Jawaharlal might turn a dictator sweeping aside the paraphernalia of a slow-moving democracy. He might still use the language and slogan of democracy and socialism, but we all know how fascism has fattened on this language…. He has all the makings of a dictator in him—vast popularity, a strong will directed to a well defined purpose, energy, pride, organisational capacity, ability, hardness and with all his love of the crowd, an intolerance of others and a certain contempt for the weak and the inefficient…. His over-mastering desire to get things done, to sweep away what he dislikes and build anew, will hardly brook for long the slow process of democracy…. Caesarism is always at the door, and is it not possible that Jawaharlal might fancy himself as a Caesar?"17

15त्रिवेन्द्रम में दिया गया भाषण, 2 जून 1950, नेशनल हेरल्ड, 3, जून 1950। एस. गोपाल, जवाहरलाल नेहरू, ए बायोग्राफी, खंड 2, 1947-1956, पृ. 68 में उद्धृत
16सी.डी. देशमुख, द कोर्स ऑफ माइ लाइफ, दिल्ली, 1974, पृ. 205.
17यह लेख नवम्बर 1937 में चाणक्य के नाम से "राष्ट्रपति" शीर्षक के साथ मॉडर्न रिव्यू ऑफ कैलकटा में प्रकाशित हुआ, देखें एस.डब्ल्यू.जे.एन., सीरीज़ 1, खंड 8, पृ. 520-523
लेख में आगे तर्क दिया गया कि नेहरू को तीसरी बार अध्यक्ष निर्वाचित करने की सभी बातों की उपेक्षा की जानी चाहिए क्योंकि इससे वे सोच सकते हैं कि वे 'अपरिहार्य' हैं तथा किसी को भी ऐसा सोचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।'' अत्याधिक प्रशंसा से हमें उन्हें पथभ्रष्ट नहीं करना चाहिए। उनका अहंकार विकट है। उसे रोकना चाहिए। हम कोई सीजर नहीं चाहते। 18

नेहरू स्वयं को तथा अपने लोगों को सचेत कर रहे थे कि वे लोकतंत्र तथा नागरिक स्वतंत्रता से कोई समझौता न करें। वे लोकतंत्र के मार्ग पर काफी सफलतापूर्वक और सावधानी से डटे रहे तथा उन्होंने लोकतंत्र के मार्ग को भारतीयों की सहज-बुद्धि का अंग बना दिया किन्तु जिन खतरों की ओर वे संकेत कर रहे थे वे नेहरू-युग की समाप्ति की आधी शताब्दी के बाद भी महत्वहीन नहीं हुए हैं।

IV
लोकतंत्र और सम्प्रभुता पर आधारित विकास

यदि भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन से स्वतंत्र भारत को में सम्प्रभुता और नागरिक अधिकारयुक्त लोकतंत्र के रूप में दो ऐसे सिद्धान्त विरासत के रूप में मिले जिन पर समझौता नहीं किया जा सकता था, जो ज़ाहिर है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में परिवर्तन के लिए सभी प्रकार के प्रयास इन दो मानदंडों के दायरे में ही किए जा सकते थे। किन्तु इससे पहले इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि औद्योगिकीकरण की ओर अवस्थांतरण या पूँजी का प्रारम्भिक संचयन लोकतंत्र की सहायता से किया गया हो। इस दृष्टि से औद्योगिक परिवर्तन के लिए नेहरू का प्रयास अनूठा था। नेहरू को इस बात का गहराई से अहसास था और उन्होंने कई बार इसका उल्लेख "इतिहास में अप्रतिम" और पहले कभी न चुने गए मार्ग के रूप में किया था।19

लोकतंत्र के विषय पर समझौता न किए जा सकेने की स्थिति का अर्थ था कि औद्योगिकीकरण हासिल करने की प्रक्रिया में सहायता करने के लिए आवश्यक 'अतिरिक्त' धनराशि भारत के कामगारों और किसानों से उपनिवेशकाल की भांति बलपूर्वक खरीद के माध्यम से नहीं जुटाई जा सकती जैसाकि विगत में दूसरे देशों में किया गया था।20 नेहरूवादी राज्य के कार्यक्रम या योजना का सहमति पर आधारित होना आवश्यक था वह आदेशात्मक नहीं हो सकता था। लगान या अनिवार्य सामुहिकीकरण के माध्यम से कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त उत्पादन को जबरन जमा करने; श्रमिक संघों के अधिकारों की अनुपस्थिति में दासता, अनुबंधित श्रम के माध्यम से अतिरिक्त उत्पादन को हड़पने या उपनिवेशों से नज़राना वसूल करने जैसे माध्यमों के विकल्प भारत को उपलब्ध नहीं थे। औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय किसान को अक्सर अपने कुल उत्पादन का आधा से अधिक भाग भूमि कर और लगान के रूप में देना पड़ता था, लेकिन आजादी के बाद की जनभावनाओं पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में कृषि के क्षेत्र में (जिस पर भारत की अधिकांश जनता निर्भर थी) भूमि कर और दूसरे तरीकों से अतिरिक्त उत्पादन की जबरन वसूली को तो बन्द कर ही दिया गया, साथ ही राज्य की ओर से राजसहायता के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में एक निवल आय भी अन्तरित की जाने लगी। इसके अलावा शुरुआत से ही श्रमिकों के अधिकारों की गारन्टी दी गई और इन अधिकारों को लागू करने के लिए कड़े प्रयास किए गए। ज़ाहिर है कि औपनिवेशिक नज़राने के रूप में किन्हीं दूसरे देशों से वसूली का तो प्रश्न ही नहीं था। दरअसल भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी नेहरू ने दुनिया के अन्य भागों में भी उपनिवेशवादी आधिपत्य के खिलाफ मुक्ति आन्दोलनों का लगातार समर्थन जारी रखा।

18देखें वहीं
19देखें उदाहरणार्थ, राष्ट्रीय विकास परिषद की चौथी बैठक, नई दिल्ली, 6 मई, 1955, फाइल संख्या 17(17 तथा/56-पी.एस.एस. सिलेक्टिड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू, सेकंड सीरीज़, खंड 28, पृ. 371। आदित्य मुखर्जी, संपा., ए सेंटिनरी हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेश्नल कांग्रेस, खंड 5, 1964-84, एकेडेमिक फाउंडेशन, नई दिल्ली, 2011 में मेरी "प्रस्तावना" देखें।
20पाश्चात्य जगत में औपनिवेशिक जबरन अतिरिक्त वसूली ने किस प्रकार प्रारम्भिक संचयन में सहायता की के बारे में विस्तृत चर्चा के लिए देखें आदित्य मुखर्जी, "एम्पायर: हाउ कॉलोनियल इंडिया मेड मॉडर्न ब्रिटेन", इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीक्ली, खंड XLV, संख्या 50, 11 दिसम्बर 2010

इसी प्रकार सम्प्रभुता के लिए समझौता न किए जाने योग्य प्रतिबद्धता का अर्थ यह था कि विदेशी सहायता, विदेशी पूँजी या किसी भी स्वरूप में विदेशी हस्तक्षेप, जिसमें भारत किसी उन्नत देश, चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो, का पिछलग्गू भागीदार बने, के आधार पर आधुनिकता को हासिल करना सम्भव नहीं था। सम्प्रभुता को कायम रखने की आवश्यकता द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शीत युद्ध की स्थिति में जहाँ दुनिया सत्ता के दो धड़ों में बँटी हुई थी, गुटनिरपेक्षता की ओर एक स्वाभाविक सूचक था। दूसरे शब्दों में, गुटनिरपेक्षता की नीति भारत द्वारा चुनी गई आर्थिक विकास की रणनीति उतनी ही जुड़ी हुई थी जितना कि भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रतिबद्धता विश्व शांति और राष्ट्रों की सम्प्रभुता के साथ जुड़ी हुई थी।

नेहरू और भारत के दूसरे शुरुआती योजनाकारों ने ठीक ही समझा था कि यदि राजनैतिक आज़ादी का उपयोग पहले आर्थिक और फिर बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए नहीं किया जा सकता तो फिर वह किसी काम की नहीं है। भारत को जिस प्रकार की औपनिवेशिक व्यवस्था से शासित किया गया था उसके कारण वह स्वतंत्रता प्राप्ति के समय किसी प्रकार का निवेश करने के लिए पूँजीगत वस्तुओं और प्रौद्योगिकी के लिए उन्नत देशों पर पूरी तरह निर्भर था। 1950 में भारत मशीनों और मशीनी औज़ारों की लगभग 90 प्रतिशत आवश्यकता को आयात के माध्यम से पूरा करता था। इसका अर्थ यह हुआ कि राजनैतिक स्वतंत्रता के बावजूद, भारत निवेश के माध्यम से आर्थिक प्रगति हासिल करने के लिए उन्नत देशों पर पूरी तरह निर्भर था।

यह एक नव-उपनिवेशवाद की स्थिति थी जिसका तत्काल समाधान किए जाने की आवश्यकता थी। और नेहरू-महालनोबिस रणनीति ने भारी उद्योग या पूँजीगत वस्तु उद्योग आधारित औद्योगिकीकरण की व्यवस्था को अपना कर इसी स्थिति को उलटने का प्रयत्न किया। पहली तीन पंच वर्षीय योजनाओं (1951-65) के दौरान भारत में 7.1 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से औद्योगिक विकास हुआ। यह 19वीं शताब्दी की वि-उद्योगीकरण की प्रक्रिया और 1914-47 के बीच के धीमे औद्योगिक विकास से एकदम अलग स्थिति थी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि, "उपभोक्ता वस्तु उद्योग में 70 प्रतिशत वृद्धि, मध्यवर्ती वस्तु उद्योग में चार गुना वृद्धि और पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादन में दस गुना वृद्धि के कारण 1951 से 1969 तक की अवधि में औद्योगिक उत्पादन के सकल सूचकांक में तीन गुना वृद्धि हुई।"21 औद्योगिक विकास के इस पैटर्न से औपनिवेशिक विरासत के ढाँचे का रूपान्तरण हुआ। एक ऐसी स्थिति से जहाँ भारत में किसी भी प्रकार का पूँजी निवेश करने के लिए लगभग सभी उपकरणों (90 प्रतिशत) को आयात करना पड़ता था, आयातित उपकरण के रूप में कुल निश्चित निवेश का हिस्सा 1960 में घटकर 43 प्रतिशत पर और 1974 में केवल 9 प्रतिशत तक आ गया, जबकि इस अवधि (1960-74) में भारत में स्थिर पूँजी निवेश में लगभग ढाई गुना वृद्धि हुई।22

21ए. वैद्यनाथन, "दी इंडियन इकॉनॉमी सिंस इंडिपेंडेंस (1947-70), धर्म कुमार, सम्पा. द केम्ब्रिज इकॉनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया, खंड II, दिल्ली, 1983, पृ. 961

यह एक बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि इसके कारण भारत को बहुत हद तक अपनी पूँजी संचयन या विकास की दर को उन्नत देशों से स्वतंत्र रहते हुए स्वयं तय करने की स्वायत्तता मिली, और इससे गुट-निरपेक्षता या सत्ता के दोनों गुटों से अपेक्षाकृत स्वतंत्रता की एक महत्वपूर्ण शर्त पूरी हुई। मैं मानता हूँ कि यदि आर्थिक आधार पर सापेक्षिक स्वायत्तता का आधार तैयार न किया गया होता तो कितना ही कूटनीतिक कौशल का उपयोग करके गुटनिरपेक्षता के लक्ष्य को हासिल करना और उसे बनाए रखना सम्भव नहीं हो पाता। औपनिवेशिक व्यवस्था को खत्म करने की इस प्रक्रिया ने ही बाद में भारत को वैश्वीकरण की प्रक्रिया में भाग लेने और उसका लाभ उठाने का अवसर प्रदान किया।

चूँकि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के पास पर्याप्त बड़ा देशी निजी क्षेत्रक नहीं था जो पूँजीगत वस्तु उद्योग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे पाता, इसलिए एकमात्र उपलब्ध विकल्प यही था कि इस क्षेत्रक को सार्वजनिक क्षेत्रक के माध्यम से विकसित किया जाए। इस क्षेत्रक को विदेशी पूँजी की सहायता से विकसित करने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि नेहरूवादी सर्वसम्मति का अर्थ यह था कि सम्प्रभुता को केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब औद्योगिक विकास विदेशी पूँजी के बजाए देश के अपने प्रयासों से हासिल किया जाए। विभिन्न मतों के लोग, जिनमें पूँजीवादी और वामपंथी भी शामिल थे, स्पष्ट तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र को विदेशी पूँजी के आधिपत्य के विकल्प के रूप में देखते थे, लेकिन उसे आवश्यक रूप से निजी उद्मशीलता, यदि वह उपलब्ध हो, का विकल्प नहीं मानते थे।23

देश के भीतर निवेश की व्यवस्था करने के लिए विदेशी पूँजी और प्रौद्योगिकी पर निर्भरता को कम करना तो देश की सम्प्रभुता को अक्षुण्ण रखने का एक तरीका था ही, साथ ही कुछ और रणनीतियाँ भी अपनाई गईं। भारत ने अपने विदेशी व्यापार में जानबूझकर विविधता लाने की रणनीति को चुना ताकि किसी एक देश या देशों के गुट पर उसकी निर्भरता को कम किया जा सके। इसके परिणामस्वरूप बाहरी देशों के साथ व्यापार के भौगोलिक केन्द्रीकरण सूचकांक (जी.सी.आई.) में तेज़ी से गिरावट आई। भारत के निर्यात का जी.सी.आई. 1947 में 0.69 के स्तर से घटकर 1975 में 0.22 के स्तर पर आ गया। आयात के मामले में भी जी.सी.आई. में इसी तरह की गिरावट आई। जी.सी.आई. में गिरावट का महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि पहले भारत के विदेशी व्यापार पर प्रभुत्व रखने वाले पश्चिम के मुख्य देशों के हिस्से में भारी गिरावट आई। उदाहरण के लिए, 1947 में भारत के निर्यात में इंग्लैंड और अमेरिका की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत हुआ करती थी जो घटकर आधे से भी कम हो गई और 1977 तक आते-आते घटकर 20 प्रतिशत के स्तर पर आ गई।24 यह सफलता अंशतः सोवियत ब्लॉक (जिसने वस्तुविनिमय और रुपए में व्यापार की सुविधा देकर भारत को उस स्थिति से उबरने में सहायता की जब भारत के पास विदेशी मुद्रा का सर्वथा अभाव था) और दूसरे विकासशील देशों के साथ भारत के व्यापार को बढ़ाकर हासिल की गई।

जवाहरलाल नेहरू को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन का बहुत शिद्दत से अहसास था, यह एक ऐसा क्षेत्र था जिसे उपनिवेश काल में जानबूझ कर अनदेखा किया गया था, और इसलिए उन्होंने इस कमी को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए। नतीजा यह हुआ कि विश्वविद्यालयों और संस्थानों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अध्ययन करने अवसरों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। हर योजना अवधि के साथ वैज्ञानिक शोध और विकास के कार्यों पर राष्ट्रीय व्यय की राशि तेज़ी से बढ़ती चली गई। उदाहरण के लिए व्यय की यह राशि 1949 में 10 मिलियन रुपए थी जो 1977 में बढ़कर 4.5 बिलियन हो गई। लगभग उसी अवधि में भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी जनशक्ति में भी 12 गुना से अधिक वृद्धि हुई और यह संख्या 1,90,000 से बढ़कर 2.32 मिलियन हो गई। किसी भी लिहाज़ से इसे शानदार वृद्धि कहा जा सकता है, ऐसा विकास जिसका लाभ आज 'ज्ञान' आधारित समाज के रूप में विकसित हो रहे विश्व में भारत को मिल रहा है।25 नेहरू ने वैज्ञानिक शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित करके आने वाली ज्ञान क्रांति का पूर्वानुमान तो लगा ही लिया था जिसके आर्थिक दृष्टि से बहुत लाभ मिले, साथ ही नेहरू की दृष्टि एक और महत्वपूर्ण लक्ष्य पर केन्द्रित थी। वे अंधविश्वास और रूढिवादी मान्यताओं में गहराई तक डूबे समाज में "वैज्ञानिक दृष्टिकोण" को प्रचलित करने के लिए इच्छुक थे। (यह एक ऐसा कार्य है जिसे अभी भी पूरा किया जाना शेष है क्योंकि हमारे बहुत से शीर्ष स्तर के नेता अभी भी पौराणिक मान्यताओं को इतिहास समझ बैठते हैं और पौराणिक कथाओं की कल्पना को वैज्ञानिक उपलब्धि बताते हैं।)

22देखें आदित्य मुखर्जी, "प्लान्ड डेवलपमेंट इन इंडिया 1947-65: द नेहरुवियन लीगेसी", शिगेरु अकिता, सम्पा. साउथ एशिया इन द ट्वैंटियथ सेंचुरी इन्टरनेशनल रिलेशंस, टोक्यो, 2000। साथ ही देखें बिपिन चंद्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, इंडिया सिंस इन्डिपेंडेंस, पेंग्विन, नई दिल्ली, 25 वाँ पुनर्मुद्रण, 2014, अध्याय 25। ये आँकड़े विजय केलकर के अत्यंत विश्वसनीय लेख "इंडिया एंड द वर्ल्ड इकॉनॉमी: ए सर्च फॉर सैल्फ रिलाएंस" शीर्षक वाले शोधपत्र से लिए गए हैं जिसे जवाहरलाल नेहरू और नियोजित विकास विषय पर सम्मेलन में नई दिल्ली में 1980 में पढ़ा गया था, और इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, खंड 15, सं. 5/7, फरवररी 1980 में पुनर्मुद्रित किया गया।
23देखें आदित्य मुखर्जी, इम्पीरियलिज़्म, नेशनलिज़्म एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन कैपिटलिस्ट क्लास, सेज, 2002, अध्याय 10 तथा 11
24ये आँकड़े विजय केलकर, पूर्व उद्धृत लेख से लिए गए हैं
25देखें आदित्य मुखर्जी, "इंडियन इकॉनॉमी, 1947-65: द नेहरूवियन लीगेसी", बिपिन चंद्र, मृदुला मुखर्जी तथा आदित्य मुखर्जी, इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस, पूर्व उद्धृत


भारत की सम्प्रभुता और गुट-निरपेक्ष बने रहने की क्षमता को बनाए रखने के लिए भारत की खाद्य सुरक्षा चिन्ता का दूसरा क्षेत्र था। औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत के कृषि उत्पादन में ठहराव आ गया था और उसमें गिरावट तक आई थी और आज़ादी मिलने के समय भारत में कई क्षेत्रों में खाद्य वस्तुओं के गम्भीर अभाव और अकाल की स्थिति थी। 1946 से 1953 के बीच की अवधि में 14 मिलियन टन खाद्यान्नों का आयात करना पड़ा था। यदि भारत अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए खाद्य सहायता पर निर्भर रहता तो उसकी सम्प्रभुता कायम नहीं रह सकती थी। भारतीय कृषि के क्षेत्र में क्रांति लाने की आवश्यकता थी और नेहरू ने युद्ध स्तर पर यह काम शुरू किया। अक्सर यह गलत आरोप लगाया जाता है कि नेहरू ने अपना ध्यान औद्योगिकीकरण पर केन्द्रित किया और कृषि की अनदेखी की। उन्होंने लोकतांत्रिक दायरे में भूमि सुधार के अत्यंत कठिन कार्य पर ज़ोर दिया 'हरित क्रांति' की आधारशिला रखी जिसने बहुत छोटी सी अवधि में भारत को अतिरिक्त खाद्य उत्पादन करने वाला देश बना दिया।26 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की अवधि में भारतीय कृषि का सबसे नज़दीकी से अध्ययन करने वाले डेनियल थॉर्नर ने लिखा:

"कभी-कभी ऐसा कहा जाता है कि (शुरुआती) पंच वर्षीय योजनाओं में कृषि की अनदेखी की गई। इस आरोप को गम्भीरता से नहीं लिया जा सकता। सच्चाई यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के पहले इक्कीस वर्षों में कृषि के क्षेत्र में बदलाव करने के लिए इतना कुछ किया गया है और दरअसल इतने बदलाव हुए हैं जितने आजादी से पहले के दो सौ वर्षों में भी नहीं हुए।"27

V
लोगों का सशक्तीकरण

प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारत को लोकतांत्रिक, नागरिक स्वतंत्रता के पथ पर बनाए रखने (हालाँकि अधिकांश औपनिवेशिक देश इस दृष्टि से विफल हुए थे) में नेहरू की सफलता ने यह सुनिश्चित किया कि गरीब लोग विकास की प्रक्रिया से पूरी तरह अछूते न रह जाएं या उनकी दशा की एकदम अनदेखी न हो। अब इस बात को पूरी तरह स्वीकार किया जाता है कि लोकतंत्र गरीबों के अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। भारत में लोकतंत्र ने ही यह सुनिश्चित किया कि गरीबों को सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला स्फीतिकारक विकास का मार्ग कभी नहीं अपनाया गया। आज़ादी के बाद से पिछले कई दशकों में भारत में मुद्रास्फीति की दर ने दो अंकों के स्तर को नहीं छुआ है। भारत में किसी भी सरकार ने, चाहे उसकी राजनैतिक विचारधारा कुछ भी हो, अनियंत्रित मुद्रास्फीति के राजनैतिक परिणामों को अनदेखा नहीं किया है।

26 बिपन चंद्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस, पेंग्विन, नई दिल्ली, 25वां पुनर्मुद्रण, 2014 में मेरे अध्याय (29-33) देखें।
27डेनियल थॉर्नर, द शेपिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया, एलाइड, नई दिल्ली, 1980, पृ. 245, कोष्ठक में दिए गए शब्द मेरे अपने हैं।


इसके अलावा, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के कारण ही यह सुनिश्चित हो सका कि भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जलवायु सम्बंधी कारणों से उत्पन्न अत्यंत कठिन स्थितियों में भी अकाल के कारण बड़े पैमाने पर लोगों की मौत नहीं हुई, जबकि 1950 के दशक के उत्तरार्ध और 60 के दशक में चीन में 40 मिलियन लोगों की मौत हुई जिसके बारे में दुनिया को बहुत बाद में जानकारी मिली क्योंकि वहाँ स्वतंत्र मीडिया उपलब्ध नहीं है। अमर्त्य सेन ने ऐसी मानवजनित आपदाओं को रोकने में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्र प्रैस की भूमिका पर बल दिया है। 70,000 समाचारपत्रों और लगभग 700 सैटेलाइट चैनलों और एक मिलियन से अधिक दैनिक पाठकों वाले लगभग 30 समाचारपत्रों के होते हुए भारत में अकाल की स्थिति को प्रकट होने से रोक पाना आसान नहीं है।

हालाँकि नेहरू राजनैतिक लोकतंत्र को लोगों के सशक्तीकरण की आवश्यक शर्त मानते थे, उनकी दृष्टि में केवल इतना मात्र ही पर्याप्त नहीं था। जैसाकि उन्होंने 1952 में उल्लेख किया:

"यदि गरीबी और निम्न स्तर बने रहें तो फिर अपनी सभी उत्कृष्ट संस्थाओं और सिद्धान्तों के बावजूद लोकतंत्र कोई मुक्तिकारी शक्ति नहीं रह जाता है। इसलिए उसे लगातार गरीबी के उन्मूलन के लिए प्रयास करते रहना चाहिए... दूसरे शब्दों में, केवल राजनैतिक लोकतंत्र ही काफी नहीं है। उसे आर्थिक लोकतंत्र के रूप में भी विकसित किया जाना चाहिए।" 28

नेहरू को गहराई से इस बात का अहसास था कि सक्रियतापूर्वक प्रयास करने होंगे और ऐसे संस्थागत ढाँचे तैयार करने होंगे जो जनसाधारण को एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए सक्षम बना सकें। उन्होंने दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन के सभी पहलुओं को सुधारने के लिए, कृषि क्षेत्र में सुधार लाने से लेकर संचार, शिक्षा और स्वास्थ्य तक में सुधार के लिए 1952 में बड़े पैमाने पर सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के माध्यम से उनका मूल उद्देश्य "हमारे लोगों के बीच निचले स्तर से ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना था जो नीचे के स्तर से सहज विकास को सम्भव बना सकें।" इसका अन्तिम उद्देश्य अवसर प्रदान करने और अन्य दृष्टियों से धीरे-धीरे समानता लाना था।"29 इसे सम्भव बनाने के लिए देश भर में ग्राम स्तर के कार्यकर्ताओं (ग्राम सेवकों) और प्रखंड विकास अधिकारियों की एक फौज तैयार की गई। जब इस कार्यक्रम में दफ्तरशाही के हावी होने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी तो नेहरू ने इस कार्यक्रम को पंचायती राज संस्थाओं (निर्वाचित स्थानीय स्वशासी निकायों) के साथ जोड़ने का प्रयास किया और बैंकिंग, विपणन और अन्य सेवाओं के क्षेत्र में देश के लाखों-लाख किसानों के लाभ के लिए एक विशाल सहकारिता कार्यक्रम शुरू किया।30 ग्राम स्तर की स्थानीय स्वशासी सहकारी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में नेहरू ने कहा:

"मुझे और अधिक विश्वास होने लगा है कि हमें ऊपर के स्तर पर कार्य करने के बजाए निचले स्तर पर अधिक कार्य करना चाहिए। निःसंदेह ऊपर का स्तर महत्वपूर्ण है और इस आधुनिक विश्व में एक बड़ी सीमा तक केन्द्रीयकरण होना अवश्यंभावी है। लेकिन बहुत अधिक केन्द्रीयकरण का अर्थ होगा कि जड़ें नष्ट होंगी और अन्ततः शाखाएं और पत्तियाँ और फूल भी मुरझा जाएंगे। इसलिए हमें गाँवों में इस आधारभूत संस्थाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए।" 31

लेकिन वर्ग, जाति और लिंग भेद के आधार पर बंटे समाज में सर्वाधिक सुविधावंचितों के हित में इन स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से कार्य करना कोई आसान बात नहीं थी। दरअसल नेहरू की मृत्यु के कई दशकों बाद राजीव गाँधी ने पंचायती राज व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की दृष्टि से पहल करते हुए प्रस्ताव किया कि इन निकायों में चुनाव अनिवार्य होना चाहिए और वंचित जातियों, जनजातियों और महिलाओं को इन संस्थाओं में समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप 1993 में भारत के संविधान में 73वां और 74वां संशोधन किया गया। गरीब और सुविधावंचित वर्गों को सशक्त बनाने के प्रयास की प्रक्रिया अभी भी जारी है और भविष्य में भी उसे जारी रखा जाना चाहिए, लेकिन इसकी नींव जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी।

28एल.सी.एम., 16 जून 1952, खंड 3, पृ. 18
29जवाहरलाल नेहरू, स्पीचेज़, 5 खंड, खंड 2, पृ. 50-56
30बिपन चंद्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस, पूर्व उद्धृत में सहकारिताएं तथा भूमि सुधार पर मेरा अध्याय देखें।
31एल.सी.एम., 5 जुलाई, खंड 3, पृ. 38-39


1920 के दशक के उत्तरार्ध से ही नेहरू पर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव पड़ा था। भारत की जनता के बीच गरीबों को सशक्त बनाने के समाजवादी सिद्धान्त को स्वीकार्य बनाने में नेहरू का बड़ा योगदान था। भारत में केवल साम्यवादी और समजावादी विचारधारा के लोग ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों ने भी 1930 के दशक में समाजवाद को प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जिसका श्रेय बहुत हद तक नेहरू को जाता है। (भारत की जनता के बीच इस विचार ने इतनी गहरी पैठ बनाई थी कि 1980 में जनसंघ, जोकि निश्चित तौर पर एक दक्षिणपंथी संगठन था और जिसका समाजवाद या राष्ट्रीय आन्दोलन से कोई सम्बंध नहीं था, जब भारतीय जनता पार्टी (बी.जे.पी.) के नए रूप में अवतरित हुआ तो उसने 'गाँधीवादी समाजवाद' को अपने स्वीकृत मत के रूप में घोषित किया!

नेहरू समाजवादी आदर्श को भारत में इतना स्वीकार्य अंशतः इसलिए बना सके क्योंकि उन्होंने शुरुआत में ही स्वयं को मार्क्सवाद की संकीर्ण, कट्टरतावादी और कठोर व्याख्या से अलग कर लिया था जिसे आधुनिक और समकालीन भारत के प्रमुख इतिहासकार बिपन चंद्रा ने "स्टालिन-मार्क्सवाद" कहा था।32 नेहरू दुनिया में पहले उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने अपने आप को स्टालिन-मार्क्सवाद से अलग किया था। लगभग उसी समय 1930 के दशक के उत्तरार्ध में प्रसिद्ध इतालवी मार्क्सवादी एंटोनियो ग्राम्स्की के ही समय पर नेहरू भी एक लोकतांत्रिक या अर्धलोकतांत्रिक व्यव्स्था में सामाजिक बदलाव की कोई ऐसी रणनीति तलाश कर रहे थे जो बगावती और हिंसक बोलशेविक मॉडल से अलग हो क्योंकि वह मॉडल इन स्थितियों के लिए उपयुक्त नहीं था। नेहरू इस मायने में भाग्यशाली थे कि उन्हें स्वतंत्रता के लिए गाँधी के संघर्ष का साक्षी बनने और उसमें हिस्सा लेने का मौका मिला जो उस समय तक और शायद आज भी "किसी अर्ध-लोकतांत्रिक या लोकतांत्रिक प्रकार की राज्य व्यवस्थआ को बदले जाने या रूपान्तरित किए जाने का वास्तविक ऐतिहासिक उदाहरण है, मोटे तौर पर सत्ता की लड़ाई के लिए ग्राम्स्कीवादी सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य को सफलतापूर्वक लागू किए जाने का उदाहरण है।" यह बात कि ग्राम्स्की "पश्चिम के विकसित देशों में" सामाजिक परिवर्तन की "एकमात्र सम्भावित रणनीति" मानते थे, दुनिया के लिए गाँधीवादी आन्दोलन के महत्व को रेखांकित करती है। 33

गाँधी के आन्दोलन के अभ्यास से मिली सीख के आधार पर नेहरू के लिए स्टालिन-मार्क्सवाद के आदर्श से अलग होना और समय से थोड़ा पहले ही यह तर्क देना आसान हो गया कि हालाँकि समाजवाद के बिना सच्चा लोकतंत्र सम्भव नहीं है, लेकिन लोकतंत्र के बिना समाजवाद भी सम्भव नहीं है। वे इस बात पर ज़ोर देते थे कि नागरिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र को समाजवाद का आधारभूत अंग बनाया जाना चाहिए। समाजवादी बदलाव के लिए समाज की सर्वसम्मति आवश्यक थी, लोगों के बहुमत की सहमति आवश्यक थी। इसे बहुत प्रतिबद्ध कुछ अल्पसंख्यक क्रांतिकारियों के विद्रोह, 'श्रमजीवी वर्ग की तानाशाही' के रूप में नहीं देखा जा सकता था। इसकी सफलता के लिए यह आवश्यक था कि ऐसे समाजवाद को सभी वर्गों, अधिसंख्य बहुमत द्वारा स्वीकार किया जाए। नेहरू ने उस स्थिति को पहले ही भांप लिया था जिसे बाद की घटनाओं ने सही सिद्ध किया और दुनिया भर में बड़ी संख्या में वामपंथी गुटों ने धीरे-धीरे स्वीकार किया।

32बिपन चंद्र, "जवाहरलाल नेहरू इन हिस्टॉरिकल पर्सपेक्टिव" द राइटिंग्स ऑफ बिपन चंद्र: द मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया फ्रॉम मार्क्स टू गाँधी, ओरिएंट ब्लैकस्वॉन, नई दिल्ली, 2012। नेहरू के बारे में बेहतरीन विश्लेषण, विशेष तौर 'समाजवाद' और सामाजिक परिवर्तन पर उनके दृष्टिकोण के लिए देखें। इस खंड में मैंने जो तर्क दिए हैं उनके लिए विचार इस लेख से और इस पुस्तक के दूसरे लेखों से लिए गए हैं।
33देखें वही


1930 के दशक के उत्तरार्ध तक आते-आते नेहरू मानने लगे थे कि समाजवाद ज़बरदस्ती या बलपूर्वक नहीं लाया जा सकता है। आम सहमति बलपूर्वक कैसे बनाई जा सकती है? उनका तर्क था कि समाजवाद के इच्छित लक्ष्य को पाने के लिए घृणा और हिंसा का मार्ग नहीं अपनाया जाना चाहिए, और समाज में समाजवादी व्यवस्था अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीकों से ही स्थापित की जा सकती है। उनकी राय गाँधी के इस विचार से पूरी तरह मेल खाती थी कि गलत साधनों की सहायता से सही ध्येय हासिल नहीं किए जा सकते। उन्होंने कहा:

"हम जो ध्येय प्राप्त करना चाहते हैं और उसे हासिल करने के लिए जो साधन अपनाते हैं उनके बीच हमेशा एक घनिष्ठ सम्बंध होता है। यदि ध्येय सही हो और अपनाए गए साधन गलत हों तो उससे ध्येय भ्रष्ट हो जाएगा या हम गलत दिशा में चले जाएंगे।" 34

इसके अलावा, समाजवादी सर्वसम्मति का अर्थ होगा कि हम उसे किसी 'क्रांति के क्षण' के परिणाम में प्राप्त घटना के बजाए एक प्रक्रिया के रूप में देखें। ऐसी प्रक्रिया बड़ी लम्बी होगी जिसके अपने उतार-चढ़ाव होंगे, एक ऐसी प्रक्रिया जिसे सभी लोगों, जिनमें विपरीत मत रखने वाले लोग भी शामिल होंगे, को साथ ले कर चलने के लिए कभी-कभी धीमा भी करना पड़ेगा। 1940 के दशक में जेल से लिखते हुए नेहरू ने वर्णन किया है कि उनके विचार में कांग्रेस द्वारा 1938 में स्थापित की गई राष्ट्रीय योजना समिति (एन.पी.सी.) को समाजवादी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए:

"...यह बात मेरे सामने स्पष्ट हो गई कि हमारी योजना (एन.पी.सी.)... हमें अपरिहार्य रूप से समाजवादी ढाँचे की स्थापना के लिए आवश्यक कुछ मूलभूत तत्वों की दिशा में ले जा रही थी। वह समाज में संग्रहणशील तत्वों को सीमित कर रहा था... यह योजना सामान्य व्यक्ति के हित के लिए नियोजन, उसके स्तर में सुधार करने, उसे विकास के अवसर प्रदान करने पर आधारित थी... और यह सब कार्य लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के संदर्भ में उन सभी समूहों के सहयोग से किए जाने थे जो सामान्यतः समाजवाद के सिद्धान्त के विरुद्ध थे। मुझे लगा कि यदि इस सहयोग को हासिल करने के लिए योजना के प्रभाव को कुछ दृष्टियों से कमज़ोर भी करना पड़े तो ऐसा करने में बुराई नहीं है।" 35

यहाँ समाजवाद की दिशा में कदम उठाने की भावना स्पष्ट है (बजाए इसके कि मौजूदा व्यवस्था को तुरन्त उखाड़ कर समाजवाद स्थापित किया जाए), और इस कार्य को लोकतांत्रिक व्यवस्था के ढाँचे में करने की भावना भी दिखाई देती है, उपयुक्त कदम उठाने के लिए ऐसे ढाँचे को अपनाने के तर्क को स्वीकार करते हुए, जिसमें ऐसे आंशिक समझौते भी शामिल हैं जिन्होंने समाज के एक बड़े वर्ग को साथ लेकर चलना सम्भव बनाया।

नेहरू ने अपने उद्देश्यों के प्रति दढ़ रहते हुए इस सूक्ष्म भेद वाली समझाने-बुझाने की इस शैली को जीवनपर्यन्त अपनाया जिसके कारण उन्हें लाखों-लाख लोगों का प्रेम, समर्थन और सम्मान हासिल हुआ, इससे अधिक प्रेम और सम्मान केवल गाँधीजी को ही प्राप्त हुआ था। और गाँधीजी के सच्चे अनुयायी के रूप में उन्होंने समाज के सभी वर्गों से अपील की, अपनी नज़र को गरीब, दबे हुए और सुविधावंचित लोगों के वर्ग पर केन्द्रित रखा। उनकी महान उपलब्धि यह थी कि वे भारतीय समाज के एक बहुत बड़े हिस्से, व्यक्तियों और संस्थाओं को अपने समाजवादी दृष्टिकोण के पक्ष में सहमत किया। नेहरू के दौर में योजना आयोग और सरकारी क्षेत्र की दफ्तरशाही से लेकर मीडिया और लोकप्रिय सिनेमा में समाजवाद के लक्ष्य को एक अभीष्ट लक्ष्य में प्रस्तुत किया गया, जिसे किसी संकीर्ण कट्टरवादी ढंग से परिभाषित नहीं किया गया था, बल्कि नेहरू के बताए गए अनुसार व्यापक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया था।

34जवाहरलाल नेहरू, स्पीचेज़, खंड 2, पृ. 392 बिपन चंद्र के लेखों में उद्धृत... पूर्व उद्धृत
35जवाहरलाल नेहरू, द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एशिया, 1961, पृ. 400


उनकी मृत्यु के बाद आधी शताब्दी बीत जाने के बाद गरीबों को सशक्त बनाने के लिए बहुत अधिक आर्थिक क्षमता के बावजूद जब हम ऐसा करने में चूक करते हैं, तो हमें समझ में आता है कि नेहरू की विरासत को याद रखना कितना महत्वपूर्ण है।

VI
निष्कर्ष

हमारे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नायकों में से एक रहे जवाहरलाल नेहरू ने न केवल स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस महान आन्दोलन की मशाल को जलाए रखा बल्कि उन्होंने उस आन्दोलन के मूलभूत सिद्धान्तों और लक्ष्यों को भी नवनिर्मित राष्ट्र के समाज और उसकी संस्थाओं में अन्तःस्थापित किया। बड़ी-बड़ी कठिनाइयों के बावजूद भारत को आधुनिक, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, मानवतावादी और गरीबोन्मुखी विकास के पथ पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ करने में उनका योगदान अपरिमित है।

लेकिन आज, उनकी मृत्यु हुए आधी शताब्दी बीत जाने बाद उनकी विरासत के सामने गम्भीर चुनौतियाँ हैं। और यह चुनौती "पिछड़े", "परम्परागत" लोगों की ओर से नहीं हैं बल्कि उनके नेताओं और शासनतंत्र की ओर से खड़ी की जा रही हैं। सत्तारूढ़ राजनैतिक दलों द्वारा पौराणिक मान्यताओं से लिए गए दकियानूसी विचारों के माध्यम से आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को चुनौती दी जा रही है और वे इन मान्यताओं को स्कूली बच्चों पर थोपते हैं; बड़ी सावधानी और परिश्रम से बुना गया पंथनिरपेक्षता का ताना-बाना शासन की सत्ता की सांठ-गांठ से तार-तार होने लगा है; अभूतपूर्व वृद्धि, लम्बे समय तक किए गए जन-आन्दोलनों की सहायता से परिश्रमपूर्वक प्राप्त किए गए अधिकारों (रोज़गार, शिक्षा, सूचना आदि के अधिकार) को शासन की ओर से उलटने की कोशिशें की जा रही हैं; नेहरू ने व्यक्तियों के हाथ में सत्ता के केन्द्रित हो जाने से लोकतंत्र के लिए जिन खतरों के प्रति हमें आगाह किया था, वही खतरे सन्निकट दिखाई देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो राजनैतिक नेताओं ने अपनी भूमिका को उलट दिया है। समाज को आगे बढ़ाने और उसे वैश्विक सभ्यता के उच्चतम मूल्यों के स्तर तक लाने की भूमिका, जिसे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं और उस आन्दोलन से प्रेरित व्यक्तियों ने निभाया था, के बजाए सम्प्रदायवादी अस्मिताओं, संग्रहणशील प्रवृत्ति और रूढ़िवादी पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देकर समाज को पिछड़ेपन की ओर धकेला जा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के माध्यम से विकसित किए गए प्राधान्यपूर्ण 'भारत की संकल्पना', भारत के लोगों के 'सहज विवेक' को चनौती दी जा रही है।

इस चुनौती का सामना करने में जवाहरलाल नेहरू की लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्षता के सिद्धान्तों, और लोगों के सशक्तीकरण, विशेषतः गरीबों के सशक्तीकरण पर आधारित विरासत लोगो को सशक्त बनाने और उन्हें प्रेरणा देने का कार्य करती रहेगी।

प्रो. आदित्य मुखर्जी
समकालीन इतिहास के प्रोफेसर
सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़
तथा
डीन, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज़
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
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