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सम्मेलन में भाषण

जवाहरलाल अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर कांग्रेस अध्यक्ष का प्रारम्भिक उद्बोधन सोमवार, 17 नवम्बर 2014, विज्ञान भवन, ऩई दिल्ली। श्रीमती सोनिया गाँधी, अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
डा. मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई
घाना के राष्ट्रपति जॉन क्युफुअर
महारानी राजमाता, भूटान
श्री माधव नेपाल
श्री आमरे मूसा
राजनैतिक दलों के माननीय नेतागण
श्री आनन्द शर्मा
प्रतिनिधिगण
माननीय जन

देवियो और सज्जनो

मैं इस सम्मेलन में विशिष्ट आमंत्रितगण का हार्दिक स्वागत करती हूँ। आप में से बहुत से लोग सुदूर स्थानों से यात्रा करके यहाँ पधारे हैं। आपका पुनः हार्दिक स्वागत है। हमारे बीच उपस्थित होने के लिए मैं आप सभी के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।

जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि धन-सम्पत्ति कोलाहल करती है, जबकि ज्ञान धीमे स्वर में सरसराहट करता है। हाल के वर्षों में हमारे देश में नेहरू के जीवन और उनके सत्कार्यों के बारे में ज्ञान का ह्रास हुआ है, अयथार्थ रूप में प्रस्तुत किए जाने और तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किए जाने के कारण वह दब गया है। लेकिन उन्होंने जिन विचारों का समर्थन किया और जिन सिद्धान्तों के पक्ष में वे खड़े हुए, वे आज और भी अधिक प्रासंगिक हैं। इसी भाव के साथ उनकी 125वीं जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करने और उनके गुज़र जाने के आधी शताब्दी बाद उनकी विरासत के कुछ पहलुओं के बारे में विचार करने के लिए इस सम्मेलन का आयोजन किया गया है।

नेहरू ऐसे कद्दावर नेताओं में से एक थे जिन्होंने भारत और विश्व भर पर अपनी छाप छोड़ी है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था, पूर्व और पश्चिम के श्रेष्ठ गुणों का संयोग था: विचारशील और कर्मयोगी; एक विद्वान लेखक जिन्होंने स्वयं भारत के लिए और विश्व के लिए भारत की व्याख्या की, और भारत के लिए विश्व की व्याख्या की; उत्कट राष्ट्रवादी जो उस्ताही अन्तरराष्ट्रीयतावादी भी था, एक दृष्टा जिसने भारत की प्रगति के पथ को एक निर्णयात्मक दिशा दी। एक बार उनकी तुलना किसी ऐसे मूर्तिकार से की गई थी जिसे मानव जाति के छठे हिस्से के आकार की विशालकाय शिला को तराशने का कार्य सौंपा गया हो। उस शिला को गढ़ कर नेहरू ने एक देश, एक राष्ट्र और एक लोकतंत्र का निर्माण किया।

यह कार्य उन्होंने कठिनतम चुनौतियों का सामना करते हुए किया। 1947 में भारत एक नया जन्मा देश था जो बटवारे के बाद के खूनखराबे और हिंसक उन्माद के दौर से गुज़र रहा था जिसकी परिणति महात्मा गाँधी की हत्या के रूप में हुई। नेहरू ने संकट से गुज़र रहे देश को आश्वस्त किया, स्थायित्व दिया और आशा दी और उसे दृढ़तापूर्वक प्रगति और आधुनिकता के पथ पर आरूढ़ कर दिया। नेहरू राजनीति को परिवर्तन साधन के रूप में देखते थे। उनके भीतर अन्याय के प्रति आक्रोश की ज्वाला थी, तो साथ ही साथ एक बेहतर विश्व की आशा की लौ भी जलती थी। ये दोनों ज्वालाएं उनके जीवन को दिशा दिखाने वाले संकेत-दीप थे।

उनका अन्तिम लक्ष्य केवल भारत की स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि वे मनुष्य जाति की स्वतंत्रता चाहते थे, और चाहते थे कि अन्ततः किसी भी देश या वर्ग द्वारा किए जाने वाले शोषण का खात्मा हो। उन्होंने साम्राज्यवाद को जल्दी खत्म किए जाने के लिए दुनिया भर में उपनिवेशवाद का दंश झेल रहे देशों के स्वतंत्रता आन्दोलनों के पीछे भारत की पूरी शक्ति लगा दी। वे अफ्रीका में जातिभेद की कड़ी निन्दा करते थे और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया। उन्होंने विश्व के मामलों में एशिया के उत्थान का स्वर बुलंद किया। वे फिलिस्तीनियों के अधिकारों के दृढ़ हिमायती थे। अपनी कथनी और करनी से नेहरू विकासशील विश्व के नायक बन गए और शीत युद्ध के कठिनतम वर्षों में सभी स्थानों पर स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठाने वाले लोगों के लिए आशा का ध्रुवतारा बन गए। उनकी मृत्यु के लम्बे समय बाद तक भी नेल्सन मंडेला और आंग सान सू ची जैसे अनेक नेताओं ने प्रेरणा ग्रहण की है।

हालाँकि वे समाजवाद की धारणा में आस्था रखते थे और एक समतामूलक समाज के निर्माण के लिए समर्पित थे, लेकिन स्वभाव से नेहरू व्यक्तिवादी थे। वे व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते थे। भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल देश की आज़ादी के लिए ही नहीं था, बल्कि व्यक्ति की आज़ादी के लिए भी था। भारत का लोकतंत्र जिसके मूल्य को हम आज नहीं पहचानते हैं, दरअसल नेहरू की सबसे बड़ी उपलब्धि थी और उनकी सबसे स्थायी विरासत भी।

आज़ादी मिलने से बहुत पहले ही नेहरू ने इस परम्परागत सोच को अस्वीकार कर दिया था कि व्यापक गरीबी और निरक्षरता के बीच लोकतंत्र सफल नहीं हो सकेगा; उन्होंने अपने भविष्य के लोकतंत्र को वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकारों और पंथनिरपेक्ष राज्य के मूल सिद्धान्तों पर आधारित करने की वकालत की थी। भारत के लोकतंत्र के विकास के महत्वपूर्ण शुरुआती वर्षों में नेहरू के प्रेरणादायी नेतृत्व ने उसका पोषण किया और उसकी जड़ों को गहराई तक पहुँचने में सहायता की। उन्होंने लोकतंत्र की परवरिश वैसे ही की जैसे कोई माँ अपने बच्चे का लालन-पालन करती है। उन्होंने बल प्रयोग की ऐसी विचारधाराओ को अस्वीकार कर दिया जो आर्थिक विकास को मानवाधिकारों से अधिक महत्व देते हैं। उनके लिए लोकतंत्र स्वयं एक ऐसी निधि था जिसे संजो कर रखा जाना चाहिए। वे मानते थे कि एक समावेशी और सहभागिता पर आधारित आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव तैयार करने के लिए लोकतंत्र ही एकमात्र रास्ता है।

अपने प्रधानमंत्रित्व की 17 वर्ष की पूरी अवधि के दौरान नेहरू लोकतंत्र को भारत की चेतना में स्थापित करने के लिए समर्पित रहे। उन्होंने सांसदों का आह्वान किया कि वे अपने दायित्वों का पूरा निर्वहन करें, जनसमुदायों को यह समझाने के लिए अथक परिश्रम किया कि वे अपने मताधिकार के महत्व को समझें और अपना वोट देने से पहले विवेक का प्रयोग करें। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता पर बल दिया। 1951 में पहले आम चुनाव की पूर्व संध्या पर लोगों दिए गए उनके सम्बोधन में उनका व्यक्तित्व और उनके विचार स्पष्ट तौर पर झलकते हैं। उन्होंने कहा, “...लोकतंत्र में हमें सीखना होगा कि शालीनता से जीता और हारा किस प्रकार जाता है। जीतने वालों को जीत का दंभ नहीं होना चाहिए; हारने वालों को निरुत्साहित नहीं हो जाना चाहिए। जीत या हार को ग्रहण करने का तरीका परिणाम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उचित तरीके से हारना गलत तरीके से जीतने से बेहतर है”।

पिछले 50 वर्षों में भारत का लोकतंत्र विकसित हुआ है, कभी-कभी ऐसे ढंग से कि नेहरू उससे हैरान हो जाते। फिर भी नेहरू की यह धारण सही साबित हुई है कि एक बहुजातीय, बहुधार्मिक, बहुभाषिक, बहुक्षेत्रीय समाज में संसदीय लोकतंत्र और पंथनिरपेक्ष राज्य ही देश को एकजुट रख सकता है। नेहरू धर्म को राजनीति के साथ मिलाने के परिणामों के बारे में भविष्यदर्शी थे। उनकी इस धारणा की सच्चाई को दुनिया के विभिन्न भागों में धर्म के नाम पर चल रहे संघर्षों के रूप में देखा जा सकता है।

पंथनिरपेक्षता – एक ऐसा राज्य जो धर्म के मामले में निष्पक्ष हो, सभी मतों का समान रूप से सम्मान करता हो – में नेहरू का दृढ़ विश्वास था। एक बार उन्होंने चेताया था, और मैं उद्धृत करती हूँ “यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को मारने के लिए अपना हाथ उठाता है तो मैं सरकार का मुखिया होने के नाते और सरकार के बाहर रहकर भी अपने जीवन की अंतिम श्वास तक उसके खिलाफ लड़ूँगा” उद्धरण समाप्त। धर्मनिरपेक्षता के बिना न भारतीयता रहेगी न भारत। धर्मनिरपेक्षता मात्र एक सिद्धान्त से बढ़ कर थी, और है, भारत जैसे विविधता वाले देश की यह एक अकाट्य आवश्यकता है।

इस बात को समझते हुए कि भारत में आधारभूत ढांचे और उद्योग को शीघ्र विकसित किए जाने की आवश्यकता है, उन्होंने देश के आर्थिक उत्थान के लिए एक मज़बूत सरकारी क्षेत्र की स्थापना की। 1950 के दशक में शुरू की गई प्रमुख परियोजनाएं उनकी सोच को प्रमुखता से दर्शाते हैं। वे इन परियोजनाओं को परिवर्तन और आधुनिकीकरण के प्रभावशाली प्रतीकों के रूप में देखते थे। भारत की सबसे बड़ी जल-विद्युत परियोजना का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था: मैं उद्धृत करती हूँ “मेरे लिए तो ये स्थान आज के मंदिर, गुरुद्वारे, गिरजे, मस्जिदें हैं जहाँ मनुष्य दूसरे मनुष्यों, और पूरी मानव जाति के हित के लिए परिश्रम करते हैं।” उद्धरण समाप्त।

नेहरू की उपलब्धियाँ केवल बीते समय की बातें नहीं हैं। उनके लाभ आज भी हमें मिल रहे हैं। उन्होंने एक नए बौद्धिक दृष्टिकोण, एक नई सामाजिक अनुभूति, भारतीयता के एक नए बोध, भारत की क्षमताओं में एक नए विश्वास को आकार दिया। उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर बल देते हुए देश को आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण, सामाजिक सुधार, और योजनाबद्ध आर्थिक विकास के मार्ग पर प्रशस्त किया।

विशिष्ट अतिथिगण,

यह समय इस बात के लिए उपयुक्त है कि हम भारत के महानतम सपूतों में से एक के जीवन, विचारों और योगदान के बारे में एक बार फिर चर्चा और विचार करें। यह उनकी 125वीं जयंती तो है ही, साथ ही उनकी विरासत की प्रासंगिकता, टिकाऊपन और अपरिहार्यता को पुनः सिद्ध करने का भी यह एक अवसर है। दुनिया के किसी भी अन्य देश से अधिक विविधता, जटिलता और वैविध्यपूर्ण इस देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के महत्वपूर्ण वर्षों में नेहरू एकीकरण करने वाली एक महान शक्ति थे। यह सुनिश्चित करना हमारी पीढ़ी का दायित्व है कि हम उस मज़बूत नींव को और सुदृढ़ करें जिसे बनाने में उन्होंने सहायता की थी। मुझे पूरा विश्वास है कि यह सम्मेलन उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण योगदान करेगा।

मैं आशा करती हूँ कि आपका विचार-विमर्श उपयोगी साबित होगा।

धन्यवाद,