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सम्मेलन में भाषण

नेहरू और विश्व एकता की संकल्पना – आदर्शवादी कल्पना या व्यावहारिक आवश्यकता? श्री श्याम सरन, पूर्व सचिव, भारत सरकार
आज हम यहाँ भारत के सबसे सबसे लब्ध प्रतिष्ठ सपूतों में से एक, जवाहरलाल नेहरू को स्मरण करके उन्हें सम्मानित करने और देश के भविष्य के लिए उनके विचारों, न केवल उनके प्रिय देश भारत के लिए बल्कि सम्पूर्ण विश्व के भविष्य के लिए उनकी कल्पना के बारे में विचार करने के लिए एकत्र हुए हैं। नेहरू एक राष्ट्रभक्त थे लेकिन साथ ही वे एक प्रतिबद्ध अन्तरराष्ट्रीयतावादी भी थे। इतिहासकार आर्नल्ड टॉयन्बी ने उनके बारे में कहा है:

“नेहरू इस दृष्टि से पथप्रदर्शक थे कि उन्होंने अपनी सार्वजनिक कर्मभूमि के लिए समूचे विश्व से छोटा दायरा स्वीकार नहीं किया।”

इस संदर्भ में विश्व एकता के लिए नेहरू का उत्साहपूर्ण समर्थन उनका एक महत्वपूर्ण योगदान है, एक ऐसा योगदान जिस पर उतना ध्यान नही गया है जितना दिया जाना चाहिए। नेहरू वैंडेल विल्की के उन विचारों से प्रभावित हुए जो उन्होंने नेहरू का ध्यान आकृष्ट करने वाली अपनी पुस्तक ‘वन वर्ल्ड’ में व्यक्त किए थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों के संघ, जिसमें एल्बर्ट आइन्स्टाइन भी शामिल थे, ने भी इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट किया कि किस प्रकार परमाणु हथियारों के प्रादुर्भाव के बाद मानव जाति को बचाए रखना सुनिश्चित करने के लिए विश्व एकता की स्थापना करना आवश्यक हो चुका था। इस शोधपत्र में इस बात का अन्वेषण किया गया है कि किस प्रकार नेहरू ने इन विचारों को एक अनूठे भारतीय और नेहरुआना कलेवर में ढाल कर अपना लिया और किस प्रकार उन्हें साकार करने के प्रयासों को बढ़ावा दिया। नेहरू के विश्व एकता के दृष्टिकोण की प्रासंगिकता को हिंसा और युद्ध के खेमों में बंटे और अतिवादी विचारधाराओं तथा कट्टरतावाद के फैलते विष से प्रभावित विश्व में प्रतिध्वनित होते हुए अनुभव किया जा सकता है। साथ ही प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीव्र विकास और वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था के दृष्टिगत राष्ट्रीय या क्षेत्रीय हस्तक्षेप न तो पर्याप्त हैं और न ही प्रभावी हैं।

एक राजनैतिक नेता के रूप में, और साथ ही एक मानवतावादी के रूप में भी नेहरू की संवेदना दोनों विश्व युद्धों के भयावह और नृशंस अनुभव और औपनिवेशिक शासन के अधीन भारत की अपनी दयनीय दशा और दमन के कारण गहरे तौर पर प्रभावित हुई थी। उनका मानना था कि टकराव और युद्ध की प्रवृत्ति 1648 में वैस्टफेलिया के शांति समझौते के माध्यम से स्थापित अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था में ही अन्तर्निहित थी। साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का जन्म उसी अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था से हुआ। इसलिए उनकी दृढ़ मान्यता थी कि यदि शांति को कायम किया जाना है और राष्ट्रों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जाना है तो औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को वैस्टफेलियाई राष्ट्र व्यवस्था को समाप्त करने की मुहिम के साथ साथ चलना चाहिए। नेहरू ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा था:

“हमें अलग-अलग राष्ट्रों की व्यवस्था को खत्म करना होगा और एक ऐसी सामूहिक व्यवस्था बनानी होगी जो न किसी को नीचा दिखाती हो और न ही दूसरों को गुलाम बनाने वाली हो।”

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कई वर्षों से विश्व एकता का विचार नेहरू के मन में पनप रहा था। उनके मन में यह विचार विश्व के इतिहास और भारत के इतिहास तथा उसकी दार्शनिक और आध्यात्मिक परम्पराओं के अध्ययन से उत्पन्न हुआ था। उनके अनुसार विश्व भ्रातृत्व या वसुधैव कुटुम्बकम का भारतीय आदर्श, समावेशी संस्कृति के साथ इस आदर्श का जन्मजात तालमेल और आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विविधता की अन्तरधारा युक्त व्यापक विविधता को अंगीकार करने की सहजता, ये सभी ऐसे गुण हैं जिनको विश्व द्वारा अपनाए जाने की आवश्यकता है ताकि स्वतंत्र राष्ट्र एक नई विश्व व्यवस्था में शांति और मेलजोल पूर्वक एक साथ रह सकें। लेकिन विश्व एकता को प्रोत्साहित करने के पीछे एक दूसरा आधुनिक कारण भी था। नेहरू अपने समय से आगे सोचते थे और उन्होंने इस बात को समझ लिया था कि प्रौद्योगिकी के कारण आने वाला व्यापक बदलाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सीमाओं को धुँधला बना रहा था; और यह कि दुनिया एक साझे पड़ोस के रूप में सिमट रही थी और देशों के सामने मुँह बाए खड़ी बहुत सी चुनौतियों का सामना मिलजुल कर सहयोग की भावना से ही किया जा सकता था। परमाणु युग के प्रादुर्भाव ने विश्व एकता के लिए उनकी प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ किया; तब युद्ध के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था क्योंकि उससे दुनिया का विनाश हो जाता। उनके सपनों का भारत एक ऐसा देश था जो सुखी और स्वयं से संतुष्ट हो, एक ऐसा लोकतंत्र जहाँ व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की गारंटी हो, जो अपने नागरिकों को अपनी प्रकृति के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता देता हो, एक ऐसा संघ जो विविधता में एकता के आदर्श को अभिव्यक्त करता हो।

“इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, और कड़ा परिश्रम करना होगा, ताकि हम अपने स्वप्नों को साकार कर सकें। ये स्वप्न भारत के लिए हैं, लेकिन साथ ही ये विश्व भर के लिए भी हैं, क्योंकि सभी राष्ट्र और सभी लोग एक दूसरे के साथ इतनी घनिष्ठता के साथ जुड़े हैं कि उनमें से कोई दूसरों से कट कर अलग रहने की कल्पना भी नहीं कर सकता है। कहा जाता है कि शांति अविभाज्य है; यही बात स्वतंत्रता पर भी लागू होती है, और अब समृद्धि पर भी लागू होती है और अब इस एकीकृत विश्व में विपत्ति को भी अलग-अलग टुकड़ों में बाँट कर नहीं देखा जा सकता है।”

अब जब आज की दुनिया आतंक की शक्तियों से जूझ रही है, इबोला की फैलती महामारी से जूझ रही है, लगातार वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट से जूझ रही है, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभावों और इसी प्रकार की कई और अन्तरराष्ट्रीय चुनौतियों से जूझ रही है, तब नेहरू के शब्द भविष्यवाणी जैसे दिखाई देते हैं।

8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस की कार्यकारिणी द्वारा पारित भारत छोड़ो प्रस्ताव में नेहरू ने विश्व एकता और उसके सम्भावित स्वरूप के बारे में कुछ संकेत दिए थे। उन्होंने महात्मा गाँधी के अहिंसा और यह सुनिश्चित करने के सिद्धान्त से प्रेरणा ली थी कि उद्देश्य और साधन नैतिक दृष्टि से परस्पर अनुरूप होने चाहिए। हालाँकि इस बात को यथार्थ रूप में स्वीकार किया गया था कि विश्व एकता के आदर्श को प्राप्त करने में लम्बा समय लगेगा और यह एक दुष्कर कार्य है, लेकिन यह तर्क भी दिया गया कि यदि विश्व को घृणा, भय और विनाश के दुश्चक्र से बचाना है तो इसे प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य के रूप में अभिव्यक्त किए जाने की आवश्यकता है। प्रस्ताव में कहा गया:

“समिति की यह राय है कि विश्व में भविष्य में शांति, सुरक्षा और व्यवस्थित प्रगति के लिए स्वतंत्र राष्ट्रों का एक संघ बनाए जाने की आवश्यकता है, विश्व की समस्याओं को हल करने का और कोई साधन नहीं है। यह प्रस्तावित संघ अपने सदस्य देशों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा, किसी एक राष्ट्र द्वारा किसी दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण और शोषण से बचाव करेगा, राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों की रक्षा करेगा, सभी पिछड़े क्षेत्रों और जनसमूहों की प्रगति, और सभी के समान हित के लिए विश्व के संसाधनों का संयोजन सुनिश्चित करेगा। ऐसे विश्व संघ की स्थापना हो जाने के बाद सभी देशों में निःशस्त्रीकरण व्यावहारिक तौर पर सम्भव हो सकेगा, राष्ट्रीय सेनाओं, नौसेनाओं और वायु सेनाओं की आवश्यकता नहीं रह जाएगी और एक विश्व संघीय रक्षा बल विश्व में शांति कायम करेगा और आक्रमणों को रोकेगा।”

प्रस्तावित विश्व व्यवस्था की रूपरेखा बताने और उसके संस्थागत ढाँचे का उल्लेख करने के बाद इस प्रस्ताव में उस समय युद्ध की विभीषिका झेल रहे विश्व में ऐसी विश्व व्यवस्था की स्थापना की अव्यावहारिकता को भी स्वीकार किया गया है:

“किन्तु समिति खेदपूर्वक यह भी स्वीकार करती है कि युद्ध के कारण उत्पन्न त्रासदियों से सीखे गए सबकों और दुनिया पर मंडरा रहे खतरों के बावजूद कुछ देशों की सरकारें विश्व संघ की स्थापना के इस अनिवार्य कदम को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं।”

भारत उसी समय आज़ाद हुआ जब युद्ध के बाद स्थायी शांति और सुरक्षा के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना के लिए प्रयास चल रहे थे। इस स्थिति ने नेहरू को यह अवसर प्रदान किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ को ऐसा स्वरूप देने का प्रयास किया जाए कि उसे एक शुरुआती व्यवस्था को रूप में प्रयोग करते हुए अन्ततोगत्वा एक विश्व संघ का रूप दिया जा सके। संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में कुछ बातों के बारे में आशंकाओं के बावजूद नेहरू ने इस संगठन का उत्साहपूर्वक समर्थन किया, और लोकतांत्रिक सिद्धान्त से अस्थायी तौर पर अलग होते हुए भी संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार दिए जाने की व्यवस्था को स्वीकार किया। उन्होंने एक ऐसे मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ का स्वागत किया जहाँ स्वतंत्र राष्ट्र समानता के अधिकार से मिलकर वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर सकते थे। वे मानते थे कि कुछ सदस्य देशों की अहंकारी ताकत और प्रभाव के बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व की जनता की राय का प्रतिनिधित्व करता है और यह अपने आप में एक नियंत्रणकारी शक्ति है। उनके नेतृत्व में भारत ने अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे सक्रिय दौर में कदम रखा, जिसकी आज तक कोई मिसाल नहीं है। 1946 में अन्तरिम सरकार का नेतृत्व सम्भालने के समय से उन्नीस सौ पचास के पूरे दशक में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सार्वभौमिक, नियम-आधारित व्यवस्थाओं और मानदंडों की स्थापना के लिए सघन प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित किया ताकि उनकी विश्व एकता की कल्पना साकार हो सके। इन प्रयासों के शुरुआती दौर में भारत के गणतांत्रिक संविधान की रचना की गई और नेहरू ने इस प्रक्रिया को अपने सपनों की विश्व एकता के लिए एक सांचे के तौर पर देखा।

भारत के संविधान में मौलिक मानवाधिकारों को शामिल किया जाना इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण भाग था, साथ ही भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में सार्वभौमिक मानवाधिकार प्रतिज्ञापत्रों के लिए वार्ताओं और उनकी स्वीकृति के लिए कूटनीतिक लड़ाई का नेतृत्व कर रहा था। अपने मूल स्वरूप में इन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के माध्यम से लागू किया जाना था, लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी महासभा को सौंप दी गई। पूर्व तथा पश्चिम के मतभेदों और अविश्वास तथा राष्ट्रीय सम्प्रभुता के उल्लंघनों सम्बंधी चिन्ताओं के कारण शुरू में प्रतिज्ञापत्रों के विचार को त्याग दिया गया और मानवाधिकारों सम्बंधी सार्वजनिक घोषणा का फैसला लिया गया, लेकिन अन्ततः 1966 में एक प्रतिज्ञापत्र को स्वीकार किया गया। लेकिन उल्लेखनीय बात यह थी कि नेहरू अपने विश्व एकता के आदर्श को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सम्प्रभुता के प्रति किस हद तक समझौता करने के लिए तैयार थे। उनका विचार था कि सभी राष्ट्रों के लोगों के व्यक्तिगत मानवाधिकारों की रक्षा एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था द्वारा की जानी चाहिए जो स्वतंत्र राष्ट्रों के एक मंडल द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार कार्य करे। इस दिशा में मिलने वाली सफलता को चरणबद्ध ढंग से दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता था।

समर्थक की इस भूमिका को निभाते समय नेहरू को इस बात का अहसास था कि पहले से ही परस्पर विरोधी वैचारिक और सैन्य गुटों में बंटी हुई दुनिया में सहमति बनाने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा। इस बात की अत्यंत आवश्यकता थी कि एक ऐसा विश्व-व्यापी आन्दोलन चलाया जाए जो इस बढ़ते ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर शांति और सहयोग के लिए बीच का रास्ता बना सके। नेहरू ने क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में कार्य किया। उन्हें एशिया के पुनरुत्थान और एकता में बड़ी आस्था थी और उन्होंने इस महाद्वीप के उभरते हुए देशों को अपने इस आदर्श के समर्थन में एकजुट करने का प्रयास किया। मार्च 1947 में दिल्ली में आयोजित एशियाई सम्बंध सम्मेलन में उन्होंने कहा, “हालाँकि ऐसा करने की राह में कई खतरे और बाधाएं हैं, लेकिन हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ “विश्व एकता” या किसी प्रकार के वैश्विक संघ की स्थापना के आदर्श को प्राप्त करना आवश्यक हो गया है। हमें इस व्यापक वैश्विक समूह की राह में रोड़ा बनने वाले किसी समूह के बजाए इस आदर्श की प्राप्ति के लिए कार्य करना चाहिए। इसलिए हम संयुक्त राष्ट्र संघ के उस ढाँचे का समर्थन करते हैं जो कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने शैशव काल से बाहर निकल रहा है, लेकिन “विश्व एकता” के आदर्श को हासिल करने के लिए हमें एशिया में यहाँ के देशों के परस्पर सहयोग के बारे में भी विचार करना चाहिए ताकि उस ज़्यादा बड़े आदर्श को हासिल किया जा सके”।

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के इन शुरुआती वर्षों में गुट-निरपेक्षता का सिद्धान्त भारत की विदेश नीति के आधार के रूप में उभरने लगा था। नेहरू की दृष्टि में भारत और दूसरे उभरते हुए देश एक मेल-मिलाप कराने वाले देश, एक सहमति का निर्माण करने वाले और सेतु बाँधने वाले देश के रूप में तभी अपनी भूमिका निभा सकते हैं जब वे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले और सैन्य गुटों से अपने आप को अलग रख सकें। गुट-निरपेक्षता इसका स्वाभाविक परिणाम है। साथ ही नेहरू यह भी नहीं चाहते थे कि गुट-निरपेक्षता की व्याख्या नकारात्मक ढंग से की जाए। इस प्रकार शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धान्त या पंचशील जिन्हें 1954 में तिब्बत पर भारत-चीन समझौते में स्वीकार किया गया और 1955 में बांडुंग में आयोजित अफ्रीकी-एशियाई सम्मेलन में जिन्के बारे में विस्तार से व्याख्या की गई, को गुटनिरपेक्षता के साथ-साथ विश्व एकता को बढ़ावा देने के साधन के रूप में प्रयोग किया गया। गुट-निरपेक्षता का अर्थ था प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं वाले और सैन्य गुटों को अस्वीकार किया जाना। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ था राष्ट्रों के बीच वैचारिक मतभेदों और सामाजिक व्यवस्थाओं का सम्मान करते हुए शांति और सहयोग के लिए सक्रियतापूर्वक प्रयास करना। 1957 में नेहरू का प्रभाव उस समय अपने चरम पर पहुँच गया जब महासभा ने शीत युद्ध की खाई को लांघ कर आम सहमति से एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त और संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देशों को अन्तरराष्ट्रीय शांति को सुदृढ़ करने और सहयोगपूर्ण सम्बंध विकसित करने की दिशा में मिलजुल कर कार्य करने के लिए कहा गया था।

1961 में नेहरू ने यूगोस्लाविया के टीटो, मिस्र के नासर, घाना के एन्क्रूमाह और कम्बोडिया के सिंहानुक के साथ मिलकर गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना की, जिसने भारत की अपनी विदेश नीति को एक अन्तरराष्ट्रीय आन्दोलन का आयाम दे दिया। सितम्बर, 1961 में बेल्ग्रेड में आयोजित गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन में पच्चीस देशों ने भाग लिया। नेहरू की विश्व एकता की संकल्पना में यह एक महत्वपूर्ण शुरुआती कदम था। इससे हाल में स्वतंत्र हुए कई देश शीत युद्ध को अस्वीकार करते हुए और शांति तथा समृद्धि की अविभाज्यता को स्वीकार करने वाली समानता पर आधारित न्यायपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था के साझे दृष्टिकोण के साथ इस आन्दोलन के साथ जुड़े। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की कल्पना संयुक्त राष्ट्र संघ के एक सबल सहयोगी के रूप में की गई थी जो विश्व एकता के आदर्श के समर्थन में नैतिक बल प्रदान करते हुए अन्तरराष्ट्रीय जनसमर्थन जुटा सकता था। यह उन सिद्धान्तों पर आधारित था जो आगे चलकर नई विश्व व्यवस्था की विशेषता बन सकते थे।

नेहरू ऐसा नहीं मानते थे कि जिस विश्व एकता की उन्होंने कल्पना की थी वह निकट भविष्य में फलीभूत हो जाने वाली थी, लेकिन उन्हें विश्वास था कि समग्र ऐतिहासिक रुझान उसके साकार होने के पक्ष में था। उन्हें इस बात का भी अहसास था कि उस समय की भौगोलिक-राजनैतिक वास्तविकताएं भारत को ऐसी नीतियाँ अपनाने के लिए बाध्य कर सकती हैं जो उसके उन सिद्धान्तों के प्रति घोषित निष्ठा के विपरीत दिखाईं दें जिनके आधार पर नई विश्व व्यवस्था का निर्माण किया जाना है। फिर भी उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में भी इस आदर्श को नहीं भुलाया जाना चाहिए और अन्ततः उसे साकार करने के प्रयासों में विश्वास को कम नहीं होने देना चाहिए।

13 अक्तूबर, 1949 को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में दिए गए एक भाषण में नेहरू ने अपने इस विचार को विस्तार से प्रकट किया:

“हमें स्वतंत्रता को प्राप्त करना है और उसकी रक्षा करनी है। हमें आक्रमण का मुकाबला करना है और उस पर काबू पाना है और इस प्रयोजन के लिए प्रयोग किया जाने वाला बल प्रयोजन सिद्धि के लिए पर्याप्त होना चाहिए। लेकिन आक्रमण का मुकाबला करने की तैयारी करते समय भी, अन्तिम लक्ष्य, शांति और मेल-मिलाप के लक्ष्य को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए और दिल और दिमाग इस सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनुकूलित होने चाहिए और घृणा तथा भय से प्रभावित या धूमिल नहीं होने चाहिए।”

व्यवहार में इस सूक्ष्म भेद को बरकरार रखना हमेशा कठिन रहने वाला था और 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण ने स्वयं नेहरू को अपने विचारों में बड़े बदलाव करने के लिए बाध्य कर दिया। जब उनका इस संकट, जिसे उस समय देश के अस्तित्व का संकट कहा गया, से सामना हुआ तो नेहरू ने अव्यक्त रूप से विश्व एकता के लिए अपने पूर्व के समर्थन की आलोचना की जिसे उन्होंने बड़े दुख और मोहभंग की दशा में व्यक्त करने वाले शब्दों में प्रकट किया:

“हम एक भ्रम की दुनिया में जी रहे थे... आधुनिक विश्व की वास्तविकता से हमारा सम्पर्क टूट रहा था और हम अपनी बनाई हुई एक कृत्रिम दुनिया में जी रहे थे। ठोकर खाकर हम उससे बाहर आ गए हैं।”

हो सकता है कि उस समय की अप्रत्याशित और कड़वे अनुभव वाली घटनाओं ने स्थिति को विपरीत दिशा में कुछ अधिक ही मोड़ दिया हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि विश्व एकता का वह अभियान शीघ्र ही ठंडा पड़ गया और नेहरू के बाद शायद ही किसी विश्व नेता ने उसके समर्थन में विरले ही आवाज़ उठाई होगी। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि हालाँकि विश्व एकता की संकल्पना पृष्ठभूमि में चली गई, लेकिन इस संकल्पना को साकार करने के लिए नेहरू ने जो बुनियादी व्यवस्थाएं तैयार की थीं वे बरकरार हैं और बाद के वर्षों में उनकी ताकत बढ़ी है। जिस विश्व व्यवस्था के लिए वे एशिया के पुनरुत्थान को आवश्यक मानते थे वह एक वास्तविकता बन चुकी है, हालाँकि हो सकता है कि वह विश्व को ऐसे तौर-तरीकों से प्रभावित कर रही हो जिन्हें नेहरू अच्छा नहीं मानते। शीत युद्ध के बाद के युग में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन फीका पड़ जाने के बावजूद कायम है लेकिन दुनिया भर के विकासशील देशों में उसका उल्लेख होता रहता है। आज भारत अपने आप को बहुत से गुटों के साथ मिला हुआ या रणनीतिक तौर पर स्वायत्त देश कह सकता है लेकिन वास्तविकता यह है कि बहुत थोड़े भारतीय ही इस विचार को पसंद करेंगे कि उनका देश किसी सैन्य गठबंधन का कम महत्व वाला भागीदार बने या किसी दूसरी शक्ति के नेतृत्व को स्वीकार करे। भारत के हितों को आगे बढ़ाने के लिए बहुपक्षीयता के लिए सतत प्रतिबद्धता की ही भांति यह भी नेहरू की विरासत की ही एक हिस्सा है। अन्तर केवल इतना है कि वह व्यापक आधार और वह वैश्विक दृष्टिकोण मौजूद नहीं है जिसे नेहरू ने भारत के हितों को साधने के लिए तैयार किया था। मनु भगवान ने अपने अध्ययन ‘द पीसमेकर्स’ में 1962 की घटना के बाद उठाए गए एक प्रभावशाली राजनैतिक कदम, 1963 में भारत के संविधान में किए गए 16वें संशोधन का उल्लेख किया है। भगवान ने लिखा है कि इस संशोधन के माध्यम से “पूरे दस्तावेज़ में भारत की सम्प्रभुता और अखंडता को बनाए रखने सम्बंधी विशिष्ट शब्दावली” को घटना के घटित हो जाने के बाद जोड़ा गया है। यह उद्देश्य अब किसी भी दूसरे उद्देश्य से अधिक प्राथमिकता वाला उद्देश्य बन चुका था। नेहरू ने जिस वैस्टफेलियाई राज्य से दूर जाने का प्रयास किया था वह एक बार फिर प्रभावशाली हो गया था।

क्या नेहरू एक ऐसे अव्यावहारिक आदर्शवादी थे जिन्होंने विश्व एकता के अप्राप्य लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को ऐसे जोखिमों में डाला जिनसे बचा जा सकता था?

क्या विश्व एकता की संकल्पना की कोई समकालीन प्रासंगिकता है ?

क्या विश्व की वर्तमान चुनौतियों और उनका समाधान करने के लिए मिल-जुल कर प्रयास करने की आवश्यकता पर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पुनः केन्द्रित करने के लिए नेहरू द्वारा व्यक्त किए गए विश्व एकता के आदर्श पर पुनर्विचार करने की कोई उपादेयता है?

इतिहास में नेहरू के स्थान का पुनर्मूल्यांकन करते समय हमें इन प्रश्नों के उत्तर तलाश करने की आवश्यकता है।

हालाँकि नेहरू ने भारत पर चीन के आक्रमण के बाद स्वयं विश्व एकता के विचार को त्यागने का फैसला लिया, लेकिन भारत-चीन युद्ध के पीछे दूसरे कारण भी थे। 1959 के तिब्बती विद्रोह और परम पावन दलाई लामा को भारत में आश्रय दिए जाने के बाद भारत के बारे में चीन के दृष्टिकोण को समझने में आधारभूत चूक हुई थी। जो बात उस समय सीमा विवाद के निपटारे से पहले ज़मीन पर अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए सीमा पर झड़पों तक ही सीमित थी, उसने चीन की धारणा में एक रणनीतिक स्वरूप धारण कर लिया। सीमा पर भारत द्वारा की जाने वाली कार्रवाइयों को तिब्बत के ऊपर चीन के नियंत्रण को कमज़ोर करने के लिए जानबूझ कर किए जाने वाले प्रयासों के रूप में देखा जाने लगा था। यह वह समय भी था जब खराब योजना के कारण ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ (1959-61) की बड़ी विफलता के बाद दरकिनार कर दिए गए चेयरमैन माओ ने पार्टी और पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.ए.) पर अपनी सर्वोच्च सत्ता को दृढ़तापूर्वक प्रकट किया था। अगस्त 1962 से वही भारत सम्बंधी नीति का नेतृत्व कर रहे थे और उन्होंने ही फैसला किया कि तिब्बत के ऊपर नियंत्रण में भारत की ओर से दिखाई देने वाले खतरे को भारतीय फौज पर सीमा पार जा कर बड़ा हमला करते हुए उसे कमज़ोर बना कर खत्म किए जाने की आवश्यकता है। नेहरू और उनके नागरिक और सैन्य अधिकारी इन संकेतों को चूक गए और इसी विश्वास में रहे कि सीमा पर होने वाली झड़पें कभी पूरे युद्ध के पैमाने पर नहीं पहुँचेंगी। यदि नेहरू सतर्क रहे होते और यदि उन्होंने 1959 के बाद के बदले हुए माहौल की स्थिति का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया होता तो भारत चीन के खतरे से बेहतर ढंग से निपटने की स्थिति में रहा होता। निश्चित तौर पर यह उनके नेतृत्व की विफलता थी लेकिन विश्व एकता के लिए उनके समर्थन का इससे शायद ही कुछ लेना-देना था, वैसे भी इसका विचार एक लम्बी अवधि में हासिल किए जाने वाले लक्ष्य के रूप में किया गया था, किसी तात्कालिक लक्ष्य के रूप में नहीं। विश्व एकता के लिए उनका समर्थन 1962 की घटना की भेंट चढ़ गया जबकि वह घटना इसके कारण से नहीं हुई थी। यदि नेहरू और लम्बे समय तक जीवित रहे होते तो शायद उनका विश्वास उस आदर्श के प्रति पुनः जागृत हो गया होता जो भविष्य के लिए उनकी आकांक्षा थी। ऐसा होता या नहीं, हम कभी नहीं जान पाएंगे क्योंकि 1964 में इस मलाल के साथ उनकी मृत्यु हो गई कि उन्होंने अपने देश और अपने देशवासियों को निराश किया था। विश्व एकता के लिए उनका समर्थन दृढ़ था और तेज़ी से बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप था जिसके साथ वैस्टफेलियाई राज्य व्यवस्था को तालमेल बिठाना कठिन था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत-चीन युद्ध और लगभग उसी समय उत्पन्न हुए क्यूबा के मिसाइल संकट, जिसने परमाणु युद्ध के खतरे को भयावह रूप से नज़दीक ला दिया था, के बाद यह संकल्पना संदेह के घेरे में आ गई। दरअसल गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इन दोनों घटनाओं ने एक ऐसी नियंत्रणकारी और मेल-मिलाप कराने वाली संस्था की आवश्यकता को रेखांकित किया जो ऐसे खतरों को टाल सके और विश्व शांति के लिए ऐसे खतरों के समय में बीच-बचाव कर सके, एक संस्था जो केवल एक विश्व संघ के रूप में ही हो सकती थी जो मौजूदा अन्तर-राज्य व्यवस्था से ऊपर उठ कर काम कर सके।

क्या आधुनिक संदर्भ में विश्व एकता की कोई प्रासंगिकता है और क्या वह आज मानव जाति के सामने खड़ी चुनौतियों के समाधान ढूँढने में सहायक हो सकती है?

पूर्व में इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि नेहरू अपने समय से आगे की सोच रखते थे और उन्होंने इस बात को समझा था कि प्रौद्योगिकी और आर्थिक बदलाव के कारण ऐसी चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं जिन्हें केवल राष्ट्रीय समाधानों की सहायता से हल करना सम्भव नहीं होगा। उन्होंने यह भी देख लिया था कि राष्ट्रों, चाहे वे कितने ही सम्पन्न या शक्तिशाली क्यों न हों, के ऊपर कुछ ऐसे प्रभाव पड़ेंगे जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होगा। परमाणु युद्ध का खतरा एक ऐसी ही वास्तविकता थी, लेकिन यह बात भी सच थी कि अमानवीय गरीबी के सागर में कुछ थोड़े से लोगों की समृद्धि का टिके रहना असम्भव हो जाएगा। राष्ट्र अपनी सीमाओं के बाहर घटित हो रही घटनाओं से अपने आप को अलग नहीं रख पाएंगे और ऐसी चुनौतियों का सामना मिले-जुले प्रयासों से ही सम्भव हो सकेगा। यदि हम अपने आसपास की दुनिया को देखें तो हम पाते हैं कि नेहरू ने जैसी कल्पना की थी अब वैसा स्पष्ट तौर पर होता दिखाई दे रहा है। पिछले पचास या उससे अधिक वर्षों में वैश्विक और अन्तरराष्ट्रीय समस्याएं तेज़ी से बढ़ रही हैं। अफ्रीका के दूर-दराज के गाँव में मुट्ठी भर लोगों को संक्रमित करने वाला इबोला वाइरस वैश्विक स्तर महामारी का खतरा बन कर मंडरा रहा है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन की समस्या पारिस्थितिकीय आपदा के रूप में पूरे ग्रह के लिए खतरा बन चुकी है और देश या क्षेत्र के स्तर पर की जाने वाली कार्रवाई इससे निपटने के लिए अपर्याप्त है। जातीय संघर्ष और आतंकवाद अब सम्प्रभु राष्ट्रों की सीमाओं तक ही सीमित नहीं हैं और जो लोग अल्प अवधि में ऐसी शक्तियों को प्रोत्साहन देकर फायदा उठाने का प्यास करते हैं वे स्वयं अब इसका शिकार हो रहे हैं। कुछ मायनों में सफलताएं भी मिली हैं। चेचक और पोलियो जैसी पुरानी महामारियों को देशों के सम्मिलित प्रयासों से लगभग समाप्त किया जा चुका है। पृथ्वी के ऊपर ओज़ोन की परत के नष्ट हो जाने की समस्या को देशों के बीच के प्रशंसनीय सहयोग की सहायता से सुधारा गया। सफलताएं और विफलताएं दोनों ही ऐसी संस्थाओं और प्रक्रियाओं को अविलम्ब स्थापित किये जाने की आवश्यकता की ओर इंगित करती हैं जो राष्ट्रीय हितों के लिए प्रयासों को पूरी मानवजाति के हितों के साधन के प्रयासों के अनुकूल बना सकें। यदि किसी वैश्विक शासन व्यवस्था की बात करना जल्दबाजी भी हो तब भी वैश्विक चुनौतियों का सामना करने की कार्रवाई करने के लिए किसी प्रकार के मंच की आवश्यकता होगी और ऐसा करने के लिए अनिवार्यतः पूर्ण सम्प्रभुता, जो हमारी वर्तमान राज्य व्यवस्था का मूल आधार है, के सिद्धान्त से थोड़ा समझौता करना पड़ेगा। यह बात 1993 में स्वीकार किये गए मानवाधिकार प्रतिज्ञापत्र और बाद में रक्षा के अधिकार के सिद्धान्त में अन्तर्निहित है। लेकिन यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इनका प्रयोग कमज़ोर और असुरक्षित समूहों की रक्षा के बजाए पक्षपातपूर्वक और व्यावहारिक राजनीति के लिए किया जाता रहा है।

आज जिन अन्तर्समूह चुनौतियों से हमारा सामना है उनमें से अधिकांश का समाधान अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था में अन्तर्निहित व्यवस्थाओं के माध्यम से नहीं किया जा सकता है। ये व्यवस्थाएं समाधान के लिए समझौता वार्ताओं पर निर्भर होती हैं जहाँ प्रत्येक देश कम से कम रियायत देकर अधिक से अधिक लाभ पाने का प्रयास करता है। ऐसी समझौता वार्ताओं से अधिक से अधिक साझा सहमति के कुछ बिन्दु ही उभर कर सामने आ सकते हैं जबकि हमें अक्सर अधिक से अधिक सहयोग के आधार पर प्रयास की आवश्यकता होती है। जलवायु सम्बंधी आपात स्थिति इसी बात का एक उदाहरण है, और चालू वैश्विक वित्तीय तथा आर्थिक संकट भी एक ऐसा ही उदाहरण है। प्रत्येक देश अपने अन्दर के किसी संकट का समाधान करने की प्रक्रिया में कुछ ऐसी नीतियाँ अपनाता है जो वैश्विक संकट को और गम्भीर बना देती हैं। साइबर क्षेत्र एक और उदाहरण लें। सभी प्रकार के मानवीय और आर्थिक कार्यकलापों के लिए यह एक अपरिहार्य प्रयोग का क्षेत्र है लेकिन फिर भी इसमें अव्यवस्था बनी हुई है। साइबर सुरक्षा एक बड़ी चिन्ता का विषय बन चुकी है लेकिन फिर भी इसके अन्तरराष्ट्रीय तौर पर स्वीकार्य नियम बनाने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। ऐसे प्रयासों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ एक तर्कसंगत मंच हो सकता है लेकिन उसे मज़बूत करने के बजाए उसे दरकिनार करने का एक सामान्य चलन चल निकला है। सूचना प्रौद्योगिकी और इन्टरनेट का युग आने से पहले नेहरू की मृत्यु हो गई। लेकिन यह बात उल्लेखनीय है कि उन्होंने एक ऐसे विश्व की पहले ही कल्पना कर ली थी जहाँ प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आने वाले बदलाव सम्प्रभु राष्ट्रों को नई उभरने वाली चुनौतियों का सामना करने में अक्षम दिखाई देने लगेंगे। इसलिए उनकी विश्व एकता की धारणा आज स्पष्ट तौर पर प्रतिध्वनित होती सुनाई देती है और हाल के वर्षों में आए बदलावों को ध्यान में रखते हुए उसके बारे में पुनर्विचार किए जाने और उसे परिष्कृत किए जाने की आवश्यकता है।

नेहरू ऐसा क्यों मानते थे कि उनका देश भारत विश्व एकता के विचार को आगे ले जाने के लिए विशेषतः उपयुक्त है? भारत के इतिहास और दर्शन का अध्ययन करने से उन्हें यह विश्वास हो गया था कि भारत की संस्कृति विश्वादी है, और भारत मध्य एशिया से आने वाले कारवानों के मार्ग और प्रायद्वीपीय भारत के पूर्व और पश्चिम में समुद्री मार्गों पर स्थित होने के परिणामस्वरूप परत दर परत विकसित हुई है। दूसरी प्राचीन सभ्यताओं की ही भांति भारत ने भी इतिहास में उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन उसने अपनी पहचान को बरकरार रखा है। नेहरू का दृढ़ विश्वास था कि एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत का उदय एक ऐसा ऐतिहासिक अवसर है जब भारत की दार्शनिक और आध्यात्मिक विरासत से मिले सिद्धान्तों का उपयोग करते हुए विश्व को एक नया आकार दिया जा सकता है।

आज हम पाते हैं कि कुछ संशोधनवादी नेहरू के भारत प्रेम और भारत के भविष्य के लिए उनके सपनों पर संदेह व्यक्त करते हैं। भारत में राष्ट्र निर्माण के लिए उन्होंने जो महत्वपूर्ण योगदान किया है और विश्व शांति और सुरक्षा के लिए एक ऐसे युग में जहाँ अनेक प्रकार के खतरे और समस्याएं थीं, उनके योगदान की सराहना में कमी दिखी देती है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उनकी विरासत का मूल्यांकन इतिहास के उस कालखंड के संदर्भ में करें जिसमें वे जिए और जिसमें उन्होंने नेतृत्व का दायित्व सम्भाला। हमें बाद के इतिहास का बोझ उनके कंधों पर डालने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। मैं अपनी बात को जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के एक उद्धरण के साथ समाप्त करना चाहूँगा जहाँ उन्होंने अपनी भारत माता को बहुत भावपूर्ण शब्दों में स्मरण करने के साथ साथ उसकी सभ्यता के गुणों का भी वर्णन किया है:

“और फिर भी अपनी पूरी गरीबी और बदहाली के बावजूद भारत माता में एक श्रेष्ठता और महानता का बोध था और हालाँकि वह अपनी प्राचीन परम्परा और वर्तमान दयनीय हालत से बोझिल थी, और उसकी आँखें थकान से थोड़ी बोझिल थीं, फिर भी उसमें असाधारण विचारों और विलक्षण दिवास्वप्नों और उत्कृष्ट अभिलाषाओं का अन्तर्जात सौंदर्य था जो उसकी देह उसके पोर-पोर से प्रस्फुटित हो रहा था। उसकी पस्तहाल देह के पीछे और भीतर आत्मा के तेज की झलक दिखाई देती थी। वह युगों-युगों की लम्बी यात्रा करके आई थी और मार्ग में उसने ज्ञान की विपुल राशि संचित की थी, और अजनबियों से मेल-जोल के बाद उसने उन्हें भी अपने बड़े कुनबे में शामिल कर लिया था, उसने वैभव और अपकर्ष के दौर देखे थे और अपमान और गहरे दुखों को सहा था; लेकिन अपनी लम्बी यात्रा के दौरान उसने अपनी पुरातन संस्कृति को थामे रखा, उस संस्कृति से संबल और उत्साह पाया, और दूसरे देशों के साथ उसे साझा किया।”

एक असाधारण मानव, राजनेता और देशवासियों के उत्कृष्ट नेता की स्मृति का सम्मान करने के अवसर पर ये उद्गार स्मरणीय हैं।