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सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषण राहुल गाँधी, उपाध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
सम्मेलन की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह
अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम हामिद करज़ई
घाना के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम जॉन क्युफुअर
महारानी आशी दोरजी वांग्मो वांग्चुक, राजमाता,
प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी अहमद मोहम्मद कथरादा
नाइजीरिया के पूर्व राष्ट्रपति ओल्युसेगुन ओबासांजो
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री महामहिम माधव के. नेपाल
श्री आनन्द शर्मा
श्री मुकुल वासनिक
श्री मणिशंकर अय्यर
विभिन्न दलों के अन्य नेतागण
प्रतिनिधिगण
आमंत्रितजन तथा मित्रो,

मैं इस सम्मेलन में आप सभी का स्वागत करता हूँ।

दो रात पहले मैं अपने घर पर इस भाषण के लिए तैयारी कर रहा था और मेरी बड़ी इच्छा हुई कि मैं आप लोगों से केवल बात करने के बजाए आपको नेहरू के भारत का दर्शन कराऊँ। काश मैं आप लोगों को उनके जन्म के शहर इलाहाबाद ले जा पाता और आपको गेहूँ के हरे-भरे खेत दिखा पाता जो इस महान देश की जनता का भरण-पोषण करते हैं।

काश मैं आपको नैनी जेल ले जा पाता जहाँ नेहरू जी को हमारी स्वतंत्रता के आन्दोलन के दौरान कितने ही वीर भारतीयों के साथ बन्दी बनाकर रखा गया था और जहाँ उन्होंने अपने जीवन की कुछ सबसे बड़ी बातों का सबक सीखा। काश मैं आपको कम से कम दिल्ली में उनके घर तीन मूर्ति भवन तो ले ही जा पाता और दिखा पाता कि नेहरू कितना सादगीपूर्ण जीवन जीते थे, और अपना कितना कुछ उन्होंने अपने देशवासियों को वापस लौटाया है। लेकिन दुर्भाग्य से यह सम्मेलन केवल दो दिन का ही है। आपको मुझे वचन देना होगा कि आप लौट कर फिर आएंगे ताकि हम साथ मिलकर उन स्थानों को देखने के लिए जा सकें। लेकिन आज, जो कि इस सम्मेलन का आखिरी दिन है, मैं आपको वह पढ़ कर सुनाना चाहता हूँ जिसे मैंने कुछ दिन पहले पढ़ा था और आपको नेहरू के व्यक्तित्व के कुछ पक्षों से परिचित कराना चाहता हूँ। इसे नेहरू की वसीयत और इच्छापत्र से उद्धृत किया गया है।

इलाहाबाद में मेरे बचपन के समय से ही मुझे गंगा और जमुना नदियों से लगाव रहा है, और जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ, यह लगाव भी बढ़ता गया। गंगा विशेषतः भारत की नदी है, देश के लोगों की प्रिय है। वह भारत की संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक रही है, सदैव परिवर्तनशील, सदैव प्रवाहमान, किन्तु फिर भी वही चिरन्तन गंगा। गंगा मुझे हिमालय, जो मुझे बहुत प्रिय है, के हिम-आच्छादित पर्वत शिखरों और उसकी घाटियों की याद दिलाती है, और निचले क्षेत्र के उन विस्तीर्ण मैदानी क्षेत्रों की याद दिलाती है जहाँ मेरे जीवन और मेरे कर्म को ढल कर आकार मिला है। हालाँकि मैं बहुत सी पुरानी परम्पराओं और रीति-रिवाज़ों को त्याग चुका हूँ, और चाहता हूँ कि भारत उन सभी बेड़ियों से मुक्त हो जो बाँधती और जकड़ती हैं और देशवासियों को एक-दूसरे से अलग करती हैं, और उनमें से बहुत का दमन करती हैं और शरीर तथा आत्मा के मुक्त विकास में बाधक बनती हैं; हालाँकि मैं यह सब चाहता हूँ, फिर भी मैं अपने आप को उस विगत से पूरी तरह अलग नहीं करना चाहता हूँ। हमारी महान विरासत, जो पहले भी महान थी, और अभी भी है, पर मुझे गर्व है और मुझे यह अहसास है कि हम सभी की भांति मैं भी उस अटूट श्रृंखला की कड़ी हूँ जो भारत के पुरातन अतीत में इतिहास के उषाकाल तक जाती है।

अपने प्रिय देश के साथ एकात्म हो जाने की इसी इच्छा के कारण नेहरू ने कहा था कि उनकी राख को गंगा और भारत की धरती पर छितरा दिया जाए।

नेहरू के भारत में हम आपका स्वागत करते हैं। नेहरू स्वयं एक चिरंतन विचार हैं, इस देश की महान नदियों और खेतों की भांति जिनसे उन्हें बेहद लगाव था। जी हाँ, वे एक चिरन्तन विचार हैं, लेकिन वे इस समकालीन भारत का एक अभिन्न हिस्सा भी हैं। उनके विचार और उनकी राजनीति आज भी विद्यमान हैं, हालाँकि ऐसे लोग भी हैं जो इन्हें मिटा देना चाहते हैं उस देश से उनकी विरासत को खत्म कर देना चाहते हैं जिससे उन्हें अगाध प्रेम था और जिसके निर्माण में उन्होंने सहयोग किया था।

नेहरू स्वयं को भारत से अलग करके नहीं देखते थे। वे खुद को यहाँ की भूमि और प्रकृति से अलग नहीं मानते थे। इंदिरा गाँधी ने एक बार लिखा था कि उनके पिता उस समय बहुत नाराज़ हुए जब मई 1953 में उन्हें बताया गया कि एवरेस्ट पर्वत को फतह कर लिया गया है। उन्होंने जवाब दिया कि एवरेस्ट पर्वत पर चढ़ा जा सकता है, लेकिन उसे कभी फतह नहीं किया जा सकता। नेहरू भारत के लोगों और अपने बीच कोई भेद नहीं मानते थे। नेहरू और भारत आपस में घुले-मिले हुए थे।

नेहरू की दृष्टि का भारत एक ऐसा देश है जहाँ एक अरब लोग अपनी नियति स्वयं चुनते हैं और सौहार्दपूर्वक आपस में मिल-जुल कर रहते हैं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ लोकतांत्रिक सिद्धान्तों को संजोकर रखा जाता है। नेहरू ने उन्ही लोकतांत्रिक सिद्धान्तों को विकसित और संरक्षित किया और यही कारण है कि भारत एक ऐसा देश है जहाँ मानवजाति का छठवाँ हिस्सा शांतिपूर्वक रहता है।

आज हमारे साथ शामिल होने के लिए मैं आपका आभारी हूँ क्योंकि यह बात विशेषतया महत्वपूर्ण है कि हम नेहरू के इस भारत – भारत जो पंथनिरपेक्ष और सहिष्णु है- को सम्भाल कर रखें। आज उनकी यह विरासत, जहाँ किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति से वंचित नहीं किया जाता है, और जिसे हमने लगभग 70 वर्षों तक संजो कर रखा है, हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

नेहरू अपने देशवासियों भावनाओं को प्रतिध्वनित करते थे क्योंकि वे देशवासियों के विचारों की अभिव्यक्ति का साधन थे। वे एक विचारशील व्यक्ति थे, लेकिन किसी विचारधारा के कट्टर समर्थक कभी नहीं रहे।

वे लाखों-लाख भारतीयों और विश्ववासियों के लिए भी एक मार्गदर्शक प्रकाश-स्तम्भ थे क्योंकि वे स्वतंत्रता का प्रतीक थे। नेहरू ने पूरी मानव जाति के लिए संघर्ष किया। यही कारण है कि नेहरू की छाप अकेले भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में देखी जा सकती है।

नेहरू की पीढ़ी के लोगों ने बड़ी संख्या में साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष किया। साम्राज्यवाद उस समय का एक दमघोंटू चलन था। उस समय के ताकतवर और सम्पन्न देश हमारे जैसे देशों पर अपना अधिकार मानते थे।

उन दिनों में, जब दुनिया की शक्ति का संतुलन आपके खिलाफ झुका हुआ था, साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने के लिए स्वतंत्रता में गहरी आस्था होना अत्यन्त आवश्यक था।

नेहरू ने अपने इस प्रिय विचार को समझने और आत्मसात करने, उसे हृदय से अनुभव करने के लिए जीवन भर साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध संघर्ष किया।

अधिकांश लोग मानते हैं कि आज़ादी इच्छानुसार कार्य करने का नाम है। आप जो चाहें कर सकते हैं, मैं जैसा चाहूँ वैसा कर सकता हूँ। लेकिन आज़ादी के सच्चे अर्थ को स्वतंत्रताविहीन होने के अनुभव को नज़दीकी से समझे बिना नहीं जाना जा सकता है।

नेहरू को नैनी जेल से रिहा करते समय उनके बन्दीकर्ताओं ने उन्हें वहाँ की आगन्तुक पुस्तिका में हस्ताक्षर करने के लिए कहा। वहाँ नेहरू ने यह लिखा: उन्होंने ब्रिटिश बन्दीकर्ताओं को उन्हें बन्दी बनाने के लिए धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होंने कहा कि जेल में रहकर वे अपने भीतर के क्रोध से मुक्त हो गए। नेहरू एक स्वतंत्र व्यक्ति बनकर जेल से बाहर निकले।

हो सकता है कि कोई व्यक्ति कई वर्षों तक जेल में रहे, बेड़ियों में जकड़ा रहे, और अपनी सज़ा की अवधि काट लेने के बाद उसे रिहा कर दिया जाए, लेकिन तब भी वह ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ हो सकता है। आपके भीतर का क्रोध आपके कैदखाने को भी आपके साथ ढोता रहता है। कवि समीह उल क़ासिम ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘जेलर के साथ वार्ता का अन्त’ में लिखा है:

अपनी कोठरी के संकरे जंगले से,
मैं देखता हूँ पेड़ जो मुझे देख मुस्कराते हैं
और छतों पर मेरे परिजनों की भीड़ जमा है
और खिड़कियाँ मेरे लिए अश्रुपूरित प्रार्थना में लीन हैं।
अपनी कोठरी के संकरे जंगले से –
मैं देखता हूँ तुम्हारी बड़ी कोठरी को!

नेहरू के 3262 दिन कारावास में बीते। नेहरू ने यह समझ ला था कि स्वतंत्र होने के लिए केवल ज़ंजीरों को हटा दिया जाना ही काफी नहीं है, स्वतंत्र होना इस बात पर निर्भर है कि जब दुनिया ने आपके साथ क्रूर व्यवहार किया हो उसके बाद आप कैसी प्रतिक्रिया करते हैं।

नेहरू जेल से आज़ाद होकर निकले, और विंस्टन चर्चिल, जो लम्बे समय तक उनके विरोधी रहे थे, को भी कहना पड़ा कि नेहरू ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने घृणा और भय को जीत लिया है।

लेकिन अभी वर्तमान की बात करें। आज के युग में मुझे यह बात चिन्ताजनक लगती है कि किस तरह हम दूसरों की निन्दा केवल इसलिए कर देते हैं क्योंकि उनके विचार हमारे विचारों से मेल नहीं खाते। नेहरू इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का अधिकार है। वे अपने विरोधियों को भी स्थान देते थे, हालाँकि उनके विरोधी लगभग थे ही नहीं। उस समय जब संसद में विपक्ष का संख्याबल बहुत कम था, तब भी वे विपक्ष से संवाद रखने के लिए हाथ बढ़ाते थे, उन्हें यह बोध कराते थे कि चुनावी दृष्टि से उनकी स्थिति भले ही कमज़ोर हो, लेकिन राष्ट्र निर्माण के कार्य में वे महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। वे मानते थे कि हर दृष्टिकोण अलग और महत्वपूर्ण होता है, उन लोगों का भी जिनके खिलाफ वे मज़बूती से लड़ा करते थे। वे उन लोगों के अधिकारों की भी रक्षा करते थे जिनसे वे असहमत होते थे, और ऐसे लोगों की आवाज को दबाने की कल्पना भी नहीं करते थे।

जब नेहरू अपनी सत्ता के चरम पर थे, जब देश का हर नागरिक उन्हें प्रेम करता था, उस समय किसी व्यक्ति ने एक बड़े अखबार को एक अनाम पत्र लिखा जिस पर चाणक्य नाम से हस्ताक्षर किया गया था। पत्र में लिखा गया था कि नेहरू भारत भर के प्रिय हैं, हर कोई उन पर विश्वास करता है और ऐसी स्थिति में उन्हें अहंकार हो सकता है। नेहरू लोकतंत्रवादी हैं, लेकिन इतनी प्रशंसा और इतना स्नेह उन्हें तानाशाह बना देगा। और फिर कुछ महीने बाद उस पत्र के वास्तविक लेखक की पहचान उजागर हुई, और वह व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू स्वयं ही थे।

नेहरू में यह क्षमता थी कि वे प्रश्न उठा सकते थे – रुक कर सवाल पूछ सकते थे और मालूम कर सकते थे कि क्या चल रहा है, और यह उनकी एक बड़ी ताकत थी।

सच्चा लोकतंत्र केवल मतदान करने के अधिकार तक ही सीमित नहीं है। इसका अर्थ सत्ता या अधिकारों का हस्तांतरण होता है। इसका अर्थ सबसे कमज़ोर वर्ग को सत्ता सौंपना है। भारत किसी और दिशा में भी जा सकता था लेकिन उसने विधि के शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, और यहाँ मौजूद प्रैस के मेरे मित्रों की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध एक उदार लोकतंत्र बनने का मार्ग चुना तो इसमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की एक प्रमुख भूमिका थी। जैसा कि मणिशंकर अय्यरजी ने बताया कि यहाँ भारत में तीस लाख स्थानीय चुने हुए प्रतिनिधि हमारे गाँवों और नगरों की व्यवस्था का संचालन करते हैं। और मुझे इस बात पर गर्व है कि इन तीस लाख प्रतिनिधियों में आधी संख्या महिलाओं की है। इस बात का श्रेय नेहरू और उनके देशवासियों और सहयोगियों की दूरदृष्टि और योजना कौशल को जाता है कि पृथ्वी पर प्रत्येक 6 व्यक्तियों में से एक को अपनी नियति खुद चुनने का अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि भारत आज अपने स्थान पर गर्व से खड़ा है।

यूरोप को एक लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा करने के लिए एक आधी शताब्दी, दो विश्व युद्धों, बिखरे परिवारों की त्रासदियों से होकर गुज़रना पड़ा। वहीं तीन गुना अधिक आबादी वाले भारत ने एक अहिंसक आन्दोलन के माध्यम से लोकतंत्र की नींव तैयार कर ली थी। कोई विश्व युद्ध नहीं। कोई हिंसा नहीं।

नेहरू की पीढ़ी ने भारत के लिए जिन चीज़ों का निर्माण किया वही सब वे अपने देश के आसपास के विश्व में भी देखना चाहते थे।

नेहरू का नेतृत्व बल या हिंसा के बजाए समावेश और सहानुभूति पर आधारित था। नेहरू ऐसा नहीं मानते थे कि हिंसा का प्रयोग करके विधिमान्यता प्राप्त की जा सकती है। वे मानते थे कि विधिमान्यता तो केवल सहानुभूति, संवाद, विरोधियों की बात को सुनने और उनके दृष्टिकोण को समझने से ही मिलती है। जैसाकि नेहरू ने कहा था, “शांति देशों के बीच का सम्बंध नहीं है। यह चित्त की वह स्थिति है जो आत्मा की स्थिरता से आती है। शांति केवल युद्ध न होने की स्थिति मात्र नहीं है। यह चित्त की एक अवस्था भी है। स्थायी शांति केवल शांतिपूर्ण लोगों को ही प्राप्त हो सकती है।”

हमारी प्रवृत्ति होती है कि हम महान लोगों को पूजने लगते हैं। ऐसा करके हम उन्हें पत्थर की मूर्तियों में ढाल देते हैं। उन्हें समय के दायरे में बाँध देते हैं। इसमें संदेह नहीं कि नेहरू एक महान व्यक्ति थे। लेकिन नेहरू एक व्यक्ति होने से भी बढ़कर एक गतिशील चिन्तन शैली थे, सदैव विकासशील, सदैव सहानुभूतिशील।

इसलिए हम नेहरू के व्यक्तित्व को बौना न बनाएं बल्कि उनसे सीखें। हम सीखें कि हम उस बात के समर्थन में खड़े हो सकें जो हमें उचित लगती हो, चाहे उसकी कुछ भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। हम घृणा और असहिष्णुता के निष्क्रिय बोझ से मुक्त हों। हम नेहरू के उदाहरण से सीखें और विचारों को प्रवाह की आज़ादी दें, हम किसी विचार को केवल इसलिए न दबाएं कि वह विचार हमारे मन से नहीं उपजा है।

धन्यवाद।