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सम्मेलन में भाषण

समापन भाषण: 18.11.2014 डा. मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत
यहाँ इस ऐतिहासिक सम्मेलन में सम्मिलित होने पर मुझे वास्तविक प्रसन्नता हो रही है। यह संस्मारक सम्मेलन जवाहरलाल नेहरू को श्रद्धांजलि या उन आदर्शों एव विचारों के प्रति सम्मान का प्रदर्शन मात्र नहीं है जिनके वे प्रतीक थे। अपितु यह हमारे वर्तमान समय के लिए, और चिरकाल के लिए नेहरू के वैश्विक दृष्टिकोण की सतत प्रासंगिकता को स्मरण करने का एक आयोजन भी है।

हम आज यहाँ पंडित नेहरू की 125वीं जयंती के उपलक्ष में एकत्रित हुए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने कल यहाँ एक उत्कृष्ट भाषण दिया जिसने इस सम्मेलन के विचार-विमर्श को नेतृत्व प्रदान किया। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई, घाना के पूर्व राष्ट्रपति जॉन क्युफुअर और नाइजीरिया के जनरल ओबासांजो जैसे विशिष्ट वक्ताओं ने नेहरू की भावना का सार और 21वीं शताब्दी में उसकी प्रासंगिकता के स्थायित्व पर प्रकाश डाला। दक्षिण अफ्रीका के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी अहमद कथरादा, और अरब लीग के आमरे मूसा सहित अन्य प्रतिष्ठित वक्ताओं ने नेहरू के वैश्विक दृष्टिकोण के विभिन्न पहलुओं और विश्व पर उसके प्रभाव के बारे अपने विचार व्यक्त किए। मेरा मानना है कि यह विचार-विमर्श अन्तर्दृष्टिपूर्ण और सृजनात्मक रहा है। इन वक्ताओं ने उन आधारभूत सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला जिन्हें नेहरू ने अपनाया और जो आज भी प्रासंगिक हैं।

इस भव्य सम्मेलन के लिए विश्व भर से जो प्रतिक्रिया मिली है उससे भारत में हम स्वयं को सम्मानित और अभिभूत अनुभव करते हैं। मैं अपने प्रत्येक सम्मानित अतिथि का अभिवादन करता हूँ कि वे यहाँ पधारे और वैश्विक महत्व के इस विषय पर उन्होंने अपने विचार हमसे साझा किए।

पंडित जवाहरलाल नेहरू एक स्वतंत्रता सेनानी, अपार करुणा और दृढ़ विश्वास के धनी नेता थे। समावेशी लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और सभी लोगों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण में उनकी अटल आस्था थी। उन्होंने वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया और वे चाहते थे कि देशवासी इस सोच को अपनाएं। वे एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण वाले रीति निर्माता और उत्कृष्ट राजनेता थे। स्वतंत्रता आन्दोलनों के समर्थन और एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए उनके उल्लेखनीय योगदान को दुनिया भर में सराहा गया है।

जवाहरलाल नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित है। राजनैतिक विचारधाराएं विचारधाराएं आती-जाती रहती हैं। उनमें से कुछ ऐसी हैं जिनकी विरासत संशय के घेरे में है तो दूसरी कुछ ऐसी हैं जिनके भयावह परिणाम हुए हैं। बहुत से 'वादों' ने हमारी सोच पर कब्ज़ा जमाने के लिए लड़ाई लड़ी है, लेकिन बहुत कम ही ऐसे हुए हैं जिन्होंने हमारे हृदय को जीता हो। नेहरू के लिए समाजवाद सिर्फ एक आर्थिक सिद्धान्त ही नहीं था, बल्कि एक जीवन पद्धति थी जो लोगों की आदतों और प्रवृत्तियों में गहन बदलाव की अपेक्षा करती है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि समाजवाद भारत की समस्याओं के समाधान की कुंजी है। भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने सामाजिक न्याय के साथ विकास के लिए एक व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त किया। मिश्रित अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रकों का सह-अस्तित्व उनकी विचार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण तत्व था। नेहरू मानते थे कि समाजवाद मूलतः न्याय और समानता के लिए एक उत्कट इच्छा है।

नहरू की प्रतिभाशीलता इस बात में निहित है कि वे भारत में समाजवाद को वैश्विक संदर्भ में ढाल पाए। वे बौद्ध धर्म का उदाहरण देते थे जिसका जन्म तो भारत में हुआ, लेकिन वह जिस किसी देश में गया उसने अपने आप को उसी देश के अनुसार ढाल लिया। दूसरे शब्दों में बौद्ध धर्म जिस देश में गया, उसकी राष्ट्रीय आत्मा का अंश बन गया। इसलिए नेहरू कहते थे कि समाजवाद के उस रूप को अपनाया जाना चाहिए जो देश की प्रकृति और विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप हो।

नेहरू को केवल इसलिए स्मरण नहीं किया जा रहा है क्योंकि हम उनकी 125वीं जयंती मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं, बल्कि दुनिया भर में उन्हें संसदीय लोकतंत्र और महिलाओं-पुरुषों के बीच समानता, समावेशी सोच और सभी भारतीयों के सशक्तीकरण के लिए उनकी प्रतिबद्धता के लिए याद किया जाता है। जीवनपर्यन्त वे राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर इन सिद्धान्तों का पालन करने के लिए प्रयासरत रहे। मैं मानता हूँ कि एक बहु-जातीय विश्व में भ्रातृघातक संघर्षों को रोकने और शांति और मेल-मिलाप कायम करने में लोकतंत्र, समावेशन और सशक्तीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हम नेहरू के सिद्धान्तों का इसलिए सम्मान करते हैं क्योंकि वे अपनी चित्तवृत्ति और अभ्यास की दृष्टि से एक लोकतंत्रवादी थे। वे लोकतंत्र को एक शासन व्यवस्था के साथ जीवन पद्धति भी मानते थे। इसलिए नेहरू के दृष्टिकोण में लोकतंत्र का एक प्रमुख स्तम्भ के रूप में शामिल होना स्वाभाविक ही था। व्यक्ति की स्वतंत्रता में नेहरू की आस्था को लोकतांत्रिक जीवन पद्धति के लिए उनके समर्थन का कारण कहा जा सकता है। यूनिटी ऑफ इंडिया में नेहरू कहते हैं: "नागरिक स्वतंत्रता हमारे लिए सिर्फ एक असार सिद्धान्त या दिखावे की कामना मात्र नहीं है, बल्कि एक ऐसा लक्ष्य है जिसे प्राप्त करने को हम किसी देश के व्यवस्थित विकास और प्रगति के लिए आवश्यक मानते हैं। यह किसी ऐसी समस्या को हल करने का सभ्य तरीका है जिसके बारे में लोगों के बीच मतभेद हो, यह उस समस्या से निपटने का अहिंसक तरीका है।"

धर्म, जाति, पंथ, वर्ग या समुदाय के आधार पर भेदभाव किए बिना प्रत्येक व्यक्ति का सशक्तीकरण ही नेहरू के राजनैतिक दर्शन का सार है। आधुनिक समाजों ने प्रतिनिधित्वकारी लोकतंत्र की संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से व्यक्तियों का सशक्तीकरण करने का प्रयास किया है। लोकतंत्र का अर्थ केवल समय-समय पर चुनावों का आयोजन करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं को जीवित रखना मात्र नहीं है। इसके लिए मनुष्यों के अन्तर्जात अधिकार का सम्मान करना आवश्यक होता है। लोकतंत्र असहमति व्यक्त करने के अधिकार को व्यक्त करने में सहायक होता है और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा और आत्म-सम्मान की रक्षा करता है।

किसी भी सभ्य समाज में चर्चा और संवाद के लिए स्थान होना चाहिए। समस्त मानव प्रगति सामाजिक प्रगति की सुदढ़ नींव पर आधारित होनी चाहिए। लेकिन किसी आधुनिक लोकतंत्र में हमें उन संस्थाओं की भूमिका का सम्मान करना चाहिए जो आम सहमति बनाने के लिए और उसे नीति के रूप में क्रियान्वित करने का कार्य करती हैं।

नेहरू की विश्व दृष्टि और उनका संदेश आज दुनिया के हर हिस्से में प्रासंगिक है। जहाँ मानव मन संघर्ष और हिंसा से व्याप्त है, नेहरू शांति और सद्भाव की तलाश करते, प्रयास करते कि विश्व में लोकतांत्रिक और बहुपक्षीय व्यवस्था का विकास हो जिसमें एकपक्षीयता के बदले सर्वसम्मति का निर्माण करने वाले पथप्रदर्शक सिद्धान्त हों। इस सम्मेलन से यह संदेश जाना चाहिए।

14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि के समय नेहरू ने संविधान सभा के समक्ष एक प्रस्ताव रखा जिसमें उन्होंने सभा के सदस्यों से आग्रह किया कि वे स्वयं को भारत एवं विश्व की सेवा के लिए समर्पित करें।

यह प्रस्ताव भारत के हितों को विश्व के हितों के अनुरूप बनाने की नेहरू की सच्ची इच्छा का स्पष्ट प्रमाण है। संकल्प में कहा गया है: "इस पावन अवसर पर, जब भारत के लोगों ने कष्ट भोगते हुए त्याग के माध्यम से स्वतंत्रता हासिल कर ली है, मैं... भारत की संविधान सभा का एक सदस्य, पूरी विनम्रता के साथ स्वंय को इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारत की सेवा में समर्पित करता हूँ कि यह प्राचीन देश विश्व में अपना समुचित स्थान प्राप्त कर सके और विश्व शांति तथा मानवता के कल्याण के लिए अपना पूर्ण तथा तत्परतापूर्वक सहयोग दे सके।"

नेहरू विश्व शांति और समृद्धि के लिए कार्य करने की दृष्टि से सहर्ष प्रस्तुत रहते थे और उनकी इच्छा थी कि भारत के लोग एक वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करें। उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय मामलों में भारत के लोगों को भय या पक्षपात के बिना स्वतंत्र निर्णय लेना सिखाया। उन्होंने हमें एक व्यवहार्य सर्वसम्मति का निर्माण करने के महत्व की भी सीख दी। यह एक ऐसी क्षमता है जो दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति सहिष्णुता को बढ़ाती है। हिंसापूर्ण संघर्ष कभी इसे सम्भव नहीं होने देता है।

गुट-निरपेक्षता का जन्म भारत के औपनिवेशिक अनुभव और स्वतंत्रता के लिए अहिंसक संघर्ष से हुआ। इससे भारत को शीत युद्ध से राजनैतिक तौर पर प्रभावित अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपने भाग्य का स्वयं नियंता बनने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ बनाया। नेहरू ने गुट-निरपेक्षता के जिन सिद्धान्तों को अभिव्यक्त किया उनमें किसी गुट या गठबंधन के साथ जुड़े बिना अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करने की भारत की स्वतंत्रता, और अन्तरराष्ट्रीय विवादों के निपटान के लिए अहिंसा और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के सिद्धान्त शामिल थे।

गुटनिरपेक्षता से भारत को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर काफी प्रतिष्ठा मिली, विशेषतः उन नए स्वतंत्र हुए राष्ट्रों के बीच जो महाशक्तियों के बीच सैन्य युद्ध और पूर्व औपनिवेशिक शक्तियों के प्रभाव के बारे में नई दिल्ली की ही भांति चिन्तित थे। गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त से विकासशील देशों को एकजुट होने में मदद मिली, और आज भी यह सिद्धान्त एक परस्पर आश्रित वैश्विक अर्थव्यवस्था और राज्य व्यवस्था को विकसित करने के लिए उदीयमान और विकासशील देशों को एकजुट होने में सहायता कर सकता है। दरअसल गुटनिरपेक्षता के मूल सिद्धान्त आज भी प्रासंगिक हैं और भारत को 21 शताब्दी में विश्व राजनीति में एक अधिक सक्रिय भूमिका निभाने में सहायक हो सकते हैं।

हम अपने समाज और राज्य-व्यवस्था को किस प्रकार प्रबंधित करें इससे सम्बंधित विषयों पर भी नेहरू के विचार बहुत प्रासंगिक हैं। ये विचार हमारे राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मामलों को संचालित करने की पद्धति के लिए भी सुसंगत हैं। वे विकास के उस मार्ग के लिए भी सुसंगत हैं जिसके माध्यम से हम विकास करना चाहते हैं।

बहुलवादी लोकतंत्र का विचार एक ऐसा ही नेहरूवादी विचार है जिसे डिस्कवरी ऑफ इंडिया में बड़े स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया गया है: "मेरा दृढ़ विश्वास है कि राष्ट्रवादी भावना को केवल हिन्दू, मुस्लिम, सिख और भारते के दूसरे समुदायों के बीच वैचारिक एकीकरण के माध्यम से ही विकसित किया जा सकता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी एक समूह की वास्तविक संस्कृति को नष्ट होना पड़े, बल्कि इसका अर्थ यह है कि एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण हो जिसके आगे दूसरे विषय गौण हों।"

नेहरू के सपनों का भारत 'विविधता में एकता' वाला भारत है। बहुलता का विचार, और यह विचार कि "सभ्यताओं के बीच संघर्ष" नहीं होना चाहिए, "सभ्यताओं के संगम" की दिशा में बढ़ने की सम्भावना का आधार है। मैं मानता हूँ कि इस विचार की प्रासंगिकता सार्वभौमिक है। संघर्ष और घृणा के वातावरण से घिरे विश्व में ये विचार प्रकाश की किरण की तरह हमें आशान्वित करते हैं और मानवता के समान लक्ष्यों में हमारी आस्था को पुनर्जीवित करते हैं। मेरी आशा और विश्वास है कि यह सम्मेलन विश्व को यह संदेश दे पाएगा। मैं आभारी हूँ कि आपने मुझे अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया।