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सम्मेलन में भाषण

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा 17-18 नवम्बर, 2014 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में पंडित जवाहरलाल नेहरू (1889-1964) की 125वीं जयंती के अवसर पर आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिया गया भाषण माधव कुमार नेपाल, पूर्व प्रधानमंत्री, नेपाल
सम्मेलन की माननीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँघी, अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह,
श्री आनन्द शर्मा, संयोजक, आयोजन समिति
राजनीतिक नेतागण और संसद सदस्यगण,
अन्य देशों से पधारे विशिष्ट मित्रगण,
विद्वज्जन,
देवियो और सज्जनो

नमस्कार और सुप्रभात,

आधुनिक भारत के लब्ध-प्रतिष्ठ प्रतिरूप पंडित जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती के अवसर पर आयोजित सम्मेलन में यहाँ इतनी सारी नामचीन हस्तियों के बीच अपने आप को पाकर मैं अत्यंत गौरान्वित महसूस कर रहा हूँ। सबसे पहले मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष, श्रीमती सोनिया गाँधीजी और आयोजक समिति को उनके आमंत्रण के लिए धन्यवाद देता हूँ जिसके कारण मैं एक बार पुनः यहाँ आया हूँ। इस सम्मेलन ने मुझे एक अवसर दिया है कि मैं पंडितजी को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि दे सकूँ और इतने सारे पुराने और नए साथियों के साथ बातचीत कर सकूँ और इस महान सभा के समक्ष अपने विचार रख सकूँ। इस ऐतिहासिक शहर में मेरे आगमन पर मेरा गर्मजोशी से स्वागत करने के लिए भी मैं धन्यवाद देता हूँ।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विश्व के प्राचीनतम लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों में से एक है जिसका भारत के स्वतंत्रता संग्राम के साथ लम्बा ऐतिहासिक रिश्ता रहा है जिसमें महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, डा. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे महान नेताओं, और ये सभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, ने और बहुत से अन्य लोगों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दल ने दुनिया भर में औपनिवेशीकरण के खात्मे में और दबे हुए लोगों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों के लिए भी अग्रणी भूमिका निभाई। यह अत्यंत संतोष की बात है कि बी.पी. कोइराला और मनमोहन अधिकारी सहित हमारे कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं ने भी इस विश्वास के साथ भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लिया कि भारत को जल्दी आज़ादी मिलने से नेपाल में राणा के निरंकुश शासन को समाप्त करने में सहायता मिलेगी और हमारे लोग पूर्ण लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का आनन्द उठा सकेंगे।

इस पृष्ठभूमि में मैं इस अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में नेपाल का प्रतिनिधित्व करने को अपना सौभाग्य मानता हूँ। नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में मैं यहाँ वर्ष 2009 में शासकीय दौरे पर आया था और बाद में पुनः 2013 में आया। श्रीमती गाँधी आपके और तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के साथ उस समय की सार्थक चर्चाओं और मेरी उस आधिकारिक यात्रा के पहले और बाद की कई अन्य मुलाकातों में हुई चर्चाओं की स्मृतियाँ आज भी मेरे मानस पटल पर अंकित हैं। डा. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के साथ मेरे शासकीय सम्बंध बहुत अच्छे रहे हैं, मैं उन सम्बंधों को भी स्मरण करता हूँ। नेपाल में जब मेरे नेतृत्व वाली सरकार थी वह समय राजनैतिक दृष्टि से बहुत कठिन था। नेपाल और भारत के बीच अच्छे सम्बंध रहे हैं और मित्रता और सहयोग का यह बंधन बहुत पुराना है और भारत ने बड़ी उदारता से हमारी सहायता की है।

आज़ादी के बाद के 67 वर्षों में भारत के आर्थिक और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरने पर नेपाल को सदियों पुराने उत्कृष्ट राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सम्बंधों वाले निकट पड़ोसी और मित्र होने के नाते भारत पर गर्व है।

श्रीमती गाँधीजी,

यह उल्लेखनीय है कि 1885 में इस प्रतिष्ठित संगठन की स्थापना किए जाने के बाद आपने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में सबसे लम्बे समय तक इसका नेतृत्व किया है और इसकी लगभग एक सौ तीस वर्ष की अवधि में आप इसकी पाँचवीं महिला अध्यक्ष हैं। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद की अधिकांश अवधि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ही शासन का कार्यभार संभाला है। आज जब हम यहाँ पंडितजी को अपनी श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्र हैं, ऐसे अवसर पर उन दो पुरोधाओं को स्मरण करना भी प्रासंगिक होगा जो प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वे दोनों व्यक्ति थे श्रीमती इंदिरा गाँधी, जो लम्बे समय तक और अपने लब्ध-प्रतिष्ठ पिता से केवल लगभग एक वर्ष कम अवधि तक प्रधानमंत्री रहीं और परसों जिनका जन्मदिन है, और दूसरे आपके प्रिय पति राजीव गाँधी, इन दोनों को ही क्रूर अन्त का सामना करना पड़ा।

किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो भारत की राजधानी में कई बार आ चुका है, नई दिल्ली एक चिर-परिचित स्थान है। यमुना के किनारे बसा और फैला हुआ यह महानगर स्वतंत्र भारत की राजधानी बनने से पहले कई सदियों तक विभिन्न राजवंशों और शासनों के उत्थान और पतन का साक्षी रहा है। इंडिया गेट और उसके आसपास के इलाके में केवल चहलकदमी करने से ही पता चलता है कि भारत को स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में उभरने से पहले कितनी परीक्षाओं और पीड़ाओं से होकर गुज़रना पड़ा है।

इससे पहले कि मैं मुख्य विषय पर आऊँ, मुझे इस दो दिवसीय सम्मेलन के आयोजन स्थल के बारे में भी कुछ कहना है। इस सम्मेलन को खूबसूरत विज्ञान भवन में आयोजित किया जाना ही अपने आप में एक सुविचारित निर्णय है और उस महान दृष्टा नेता के प्रति बड़ा सम्मान है। उनके प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती वर्षों में 1956 में निर्मित इस भवन की प्रभावशाली वास्तुकला हर प्रकार से भारत के पहले प्रधानमंत्री की छाप और उनके सामासिक व्यक्तित्व को दर्शाती है जो विभिन्न विचारों और मतों का संयोजन थे।

आधुनिक वास्तुकला के उदाहरण के रूप में यह विज्ञान भवन अनिवार्य रूप से लुटियन की दिल्ली की विशेषताओं और हिन्दू, बौद्ध तथा मुगल वास्तुकला के मौलिक पहलुओं को आत्मसात किए हुए है। कई अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सम्मेलनों तथा उच्च-स्तरीय कार्यक्रमों की मेज़बानी कर चुके इस भवन ने कुछ ऐसे सम्मेलनों की भी मेज़बानी की है जिनका पंडितजी से बहुत जुड़ाव रहा है। इसमें राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन और गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन शामिल हैं जिनका आयोजन वर्ष 1983 में किया गया – नेहरू इन दोनों अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के विकास के प्रवर्तकों में से एक थे।

मैं सोनिया गाँधी जी को बधाई देता हूँ कि उन्होंने इस महान राजनेता को श्रद्धांजलि देने और उनकी विचारधारा, उनकी उपलब्धियों और भारत के लिए उनकी विरासत के विषयों पर पुनःचर्चा करने के लिए आयोजित इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया और भारत तथा विदेश से लोगों को आमंत्रित किया। इस सम्मेलन का विषय "नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश और सशक्तीकरण" दो विषय सत्रों में विभक्त है जो "समावेशी लोकतंत्र और लोगों का सशक्तीकरण" तथा "नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण और 21वीं शताब्दी के लिए लोकतांत्रिक विश्व व्यवस्था" के बारे में हैं। इन विषयों का चयन बहुत सटीक है क्योंकि ये पहलू देश और विश्व के लिए नेहरू के उल्लेखनीय योगदान को सारगर्भित ढंग से परिभाषित करते हैं।

विशिष्ट साथियो,

पंडित नेहरू प्रतिभा, ज्ञान और विद्वता के प्रतिमान थे। अपने समय के कुशाग्र अध्येता के रूप में वे आज़ादी के समय भारत की सबसे बड़ी लब्धि थे क्योंकि वे एक महान दृष्टा और एक सृजनशील नेता थे जो घरेलू और वैश्विक मुद्दों को व्यापक और स्पष्ट परिप्रेक्ष्य में देखते थे। वे बहुसर्जनात्मक लेखक थे जिनके नाम कई प्रामाणिक प्रकाशन हैं जैसे डिस्कवरी ऑफ इंडिया, ग्लिम्प्सेज़ ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री, टूवर्ड्स फ्रीडम और लैटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज़ डॉटर। सलेक्टिड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू के कई खंड उनकी बौद्धिक क्षमता और प्रभावशाली दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उनका बहुत सा लेखन उनके जेल प्रवास के समय का है जो पन्द्रह वर्ष से अधिक रहा, लेकिन लेखन का यह सिलसिला उनके प्रधानमंत्रित्व काल के आखिरी दिनों तक बदस्तूर जारी रहा।

भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका संभालते समय मध्यरात्रि में उनका सबसे यादगार पल उनके "नियति से मुलाकात" वाले भाषण का था जो उनके राजनैतिक जीवन का चरम बिन्दु था। यदि हम उपनिवेश से मुक्ति से लेकर पूर्ण स्वतंत्रता तक के उथल-पुथल भरे और अस्तव्यस्त परिवर्तन काल वाली अन्तरिम सरकार में उपाध्यक्ष की उनकी भूमिका को भी शामिल करें तो पंडितजी ने लगभग अठारह वर्ष तक लगातार देश का नेतृत्व भार संभाला।

देश के भविष्य के नेताओं के रूप में बच्चों को प्रेम और समर्थन देने वाले पंडितजी का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है और उन्हें प्यार से चाचा नेहरू कहकर सम्बोधित किया जाता था। हालाँकि उनका प्रशिक्षण इंग्लैंड में हुआ और ब्रिटिश संसदीय प्रणाली और पाश्चात्य सभ्यता के कुछ पहलुओं के प्रति उनका झुकाव था, लेकिन चूँकि वे विभिन्न क्षमताओं में पाँच दशकों से अधिक समय तक सक्रिय सार्वजनिक जीवन में रहे थे, वे आधुनिक भारत की आकांक्षाओं से पूरी तरह परिचित थे। भारत में अमेरिका के राजदूत जॉन केनेथ गॉलब्रेथ ने एक बार उन्हें "भारत पर शासन करने वाला अन्तिम अंग्रेज़" कहा था और फ्रांसीसी विद्वान आंद्रे मार्लो ने उन्हें "गैर-अंग्रेज़ अंग्रेज़ सज्जन" कहा था।

उपनी कुछ प्रत्यक्ष भूमिकाओं में उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बैरिस्टर के रूप में वकालत की, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सत्रों में महासचिव, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विदेश मामलों सम्बंधी विभाग के प्रमुख और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में, 1937 के प्रान्तीय चुनावों में कांग्रेस पार्टी की विजय के शिल्पकार के रूप में कार्य किया। वे भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रहे, और भारत में पूर्ण स्वराज के उत्साही समर्थक थे और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे।

राजनैतिक स्थिरता और उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता प्राप्ति के सिलसिले में लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण के आधार पर भारत की व्यवस्थित प्रगति सुनिश्चित करने में नेहरू का मुख्य योगदान लगभग 65 वर्ष पहले संविधान प्रख्यापित किए जाने में उनकी केन्द्रीय भूमिका से भी सिद्ध होता है। क्योंकि वे मानते थे कि अकेले राजनैतिक विकास ही लोकतांत्रिक ताने-बाने को कायम नहीं रख सकता है, इसलिए उन्होंने जनसामान्य, विशेषतः दलित और पिछड़े वर्गों को सशक्त बनाने के लिए देश को सामाजिक और आर्थिक विकास के नियोजित मार्ग पर लाने की दृष्टि से योजना आयोग की स्थापना का ऐतिहासिक कदम उठाया। दरअसल उनका यह निर्णय नेहरू द्वारा 1929-31 के दौरान प्रारूपित "मौलिक अधिकार तथा आर्थिक नीति", जिसे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सत्र द्वारा अनुसमर्थित किया गया था, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध से ठीक पहले स्थापित राष्ट्रीय योजना आयोग के क्रम में उठाया गया एक कदम था।

देश के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदानों का ही प्रतिफल था कि लोगों ने उनमें अपनी आस्था और विश्वास प्रकट करते हुए उनके दल को सत्ता चलाने के लिए चुना और वे 1952, 1957 और 1962 में लोकसभा के पहले तीन आम चुनावों के दौरान देश के अभी तक के सबसे लम्बे समय तक प्रधानमंत्री रहे। सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से वंचित वर्गों के लोगों को सशक्त बनाने और देश के संतुलित और सतत विकास पर उनके ज़ोर के कारण कई कदम उठाए गए जिनमें भारत के रजवाड़ों का एकीकरण और राज्यों के पुनर्गठन से लेकर उपयुक्त प्रोत्साहनों के साथ ग्रामीण लोगों को पूर्ण रूप से सशक्त बनाने हेतु कदम शामिल हैं।

हालाँकि देश की जनता पर उनके पूर्ण प्रभाव के कारण वे एक लोकतांत्रिक तानाशाह की भूमिका निभा सकते थे, जैसाकि उपनिवेश से मुक्त हुए बहुत से देशों में हुआ, लेकिन नेहरू पक्के लोकतंत्रवादी थे जो सामूहिक नेतृत्व और देश निर्माण के कार्य में व्यापक हिस्सेदारी के सिद्धान्त में विश्वास रखते थे। हालाँकि भारत को आज़ादी मिलने के छह महीने से कम समय बाद ही महात्मा गाँधी की हत्या हो गई और आज़ादी के पहले कुछ वर्षों में ही उनके वरिष्ठ सहयोगी सहदार पटेल का निधन हो चुका था, लेकिन वे केन्द्र और राज्यों के स्तर पर पार्टी और सरकार में अपने सहयोगियों की सलाह और सहायता से अपना काम करते रहे।

पंडित नेहरू पर समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव था और वे मार्क्सवाद से भी प्रभावित थे, लेकिन उनका दृष्टिकोण पूर्णतः उदार और लचीला था और उन्होंने किसी मत को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया जो भारत की प्रगति को आगे ले जाने के लिए सरकारी और निजी क्षेत्रों पर उनके संतुलित बल को देखकर समझा जा सकता है। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान, इंजीनियरी, प्रौद्योगिकी, शोध, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान के उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनका स्वप्न था कि भारत उच्च कौशल वाली जनशक्ति का भंडार बने जो न केवल देश के विकास में योगदान करे बल्कि वैश्विक समृद्धि को बढ़ाने के लिए भी अपनी भूमिका निभाए। एक बार उन्होंने विशाल भाखड़ा नांगल परियोजना को "उभरते भारत के नए मंदिर" और "भारत की प्रगति का प्रतीक" कहा था, साथ ही उन्होंने मेहनतकश लोगों के सामाजिक और आर्थिक स्तर को सुधारने और देश में खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के लिए व्यापक भूमि सुधारों पर भी बल दिया था।

प्रिय साथियो और सहभागियो,

पंडित नेहरू भारत की विदेश नीति के शिल्पकार थे। एक प्रकार से वे 1964 में अपनी दुखद मृत्यु के समय तक भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का साकार रूप थे और देश को आज़ादी मिलने से पहले दो दशकों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की विदेश नीति के प्रवर्तक और उसके पीछे का विचार थे। पंडितजी को विदेश सम्बंधी मामलों में बहुत रुचि थी क्योंकि एक बार उन्होंने कहा था कि वे प्रधानमंत्री के पद से बहुत पहले ही त्यागपत्र दे चुके होते क्योंकि यह उनका "व्यवसाय" नहीं था बल्कि उन्हें विदेश मामलों में "रुचि" थी। जब वे 1927 में मोन्टाना, स्विट्ज़रलैंड में अपनी पत्नी कमला नेहरू के इलाज के सिलसिले में गए थे और उनका मन अच्छा नहीं था, उस समय उन्होंने 27 पृष्ठ वाला 7,000 से अधिक शब्दों का एक नोट लिखा था। "ए फॉरेन पॉलिसी फॉर इंडिया" शीर्षक से लिखे इस उत्कृष्ट दस्तावेज़ में उन्होंने भारत की विदेश नीति की रूपरेखा प्रस्तुत की है जिसमें निरन्तरता और बदलाव जैसी शक्तियों का संयोजन किया गया है।

भारत की विदेश नीति पर उनका प्रभाव और उनकी विशेषज्ञता इतनी सम्पूर्ण थी कि 1952 में महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था कि विदेश नीति के मामले में पंडितजी "मेरे गुरु" हैं। 1936 में विदेश विभाग की स्थापना का विचार उनका मौलिक विचार था जिसे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के लखनऊ अधिवेशन में उसी वर्ष स्वीकृति दी गई थी। अपनी मृत्यु के समय तक अपने प्रधानमंत्रित्व काल में वे स्वयं विदेश मंत्री रहे और भारतीय विदेश सेवा का गठन उनका दूसरा बड़ा योगदान था जिसे अस्थायी सरकार के मंत्रिमंडल ने भारत को स्वतंत्रता मिलने के लगभग एक वर्ष पहले 09 अक्तूबर, 1946 को मंज़ूरी दी थी। उन्होंने दूसरे देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों को बढ़ावा देने के लिए सांस्कृतिक सम्बंध परिषद की भी स्थापना की थी।

भारत को आपचारिक तौर पर स्वतंत्र देश की मान्यता मिलने से पहले भारत अधिक से अधिक एक अनियमित उपनिवेश था जिसे कुछ अन्तरराष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता प्राप्त थी जो अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में पूरी क्षमता से भाग ले सकता था और उसने एक दर्जन से अधिक अर्ध-कूटनयिक मिशनों में भागीदारी की थी। पंडित नेहरू सहित कुछ बुद्धिजीवियों के एक समूह द्वारा 1943 में स्थापित विश्व मामलों सम्बंधी भारतीय परिषद ने स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ महीने पहले मार्च-अप्रैल, 1947 में नई दिल्ली के पुराना किला में एशियाई सम्बंधों पर एक सम्मेलन आयोजित किया था जिसमें एशिया और अफ्रीका के देशों और अन्तरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था।

एशिया और अफ्रीका के देशों के लिए एक नए मार्ग का निर्धारण करने के उद्देश्य से आयोजित इस सम्मेलन के प्रेरणा के स्रोत पंडितजी स्वयं थे, और इसका उद्घाटन महात्मा गाँधी ने किया और भारत कोकिला सरोजिनी नायडू, जिन्होंने 1925 में महात्मा गाँधी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता संभाली, इस समारोह की अध्यक्ष बनीं। पहले एशियाई सम्बंध सम्मेलन को गुट-निरपेक्षता आन्दोलन के पूर्व लक्षण और अग्रदूत के रूप में देखा जाता है, जो सम्भवतः विकासशील देशों का सबसे बड़ा संघ था और नेहरू उसके प्रमुख प्रवर्तकों में से एक थे। एक ऐसे समय पर जब विश्व सत्ता के विरोधी खेमों में बंटा हुआ था और शीतयुद्ध अपने चरम पर था, उस समय उन्होंने परस्पर विरोधी खेमों से अलग रहते हुए पंचशील और गुट-निरपेक्षता के सिद्धान्तों के समर्थन में हर अन्तरराष्ट्रीय मामले का निर्णय गुण-दोष के आधार पर लेने का सैद्धान्तिक फैसला लिया। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में उपनिवेशवाद की उत्तरोत्तर समाप्ति गुट-निरपेक्षता आन्दोलन के सबसे बड़े योगदानों में से एक है।

विशिष्ट साथियो,

चूँकि नेहरू पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बंधों को मज़बूत करने के प्रबल पक्षधर थे, इसलिए नेपाल-भारत के सम्बंधों का यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। जैसाकि मैंने पहले कहा, हमारे इन दोनों देशों के बीच राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्बंध बहुत प्रगाढ़ हैं। पंडित नेहरू दो अवसरों पर नेपाल के दौरे पर गए और उन्होंने 1951 में एक शताब्दी पुराने राणा परिवार के निरंकुश शासन से मुक्त हो कर लोकतांत्रिक देश बनने की हमारी यात्रा को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नेपाल की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए हमारी भरपूर सहायता की और हमारे देश की जनता उन्हें नेपाल के सबसे अच्छे मित्र के रूप में सम्मान देती है। वे दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में दखल न देने की नीति के प्रति सजग थे, लेकिन उन्होंने 1960 में राजा द्वारा चुनी हुई संसद और नेपाल के पहले चुने हुए प्रधानमंत्री बी.पी. कोइराला के नेतृत्व वाली सरकार को भंग करने के निर्णय को लोकतंत्र के लिए धक्का बताते हुए कड़ी आलोचना करने में कोई संकोच नहीं किया।

व्यापक शांति समझौते और बारह सूत्री समझौते के साथ शुरू हुई शांति की प्रक्रिया को उसके तार्किक अंजाम तक पहुँचाने और एक लोकतांत्रिक संविधान को यथाशीघ्र लागू करने के हमारे वर्तमान कार्य में हमें भारत के लोगों और यहाँ की सरकार का निरन्तर सहयोग मिल रहा है। इस समय जब नेपाल व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलाव के एक नए युग की दहलीज़ पर खड़ा है, हम आपने परस्पर हित और अपने लोगों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाने की दृष्टि से भारत से और अधिक निजी निवेश का स्वागत करते हैं। आने वाले वर्षों में नेपाल के विपुल जल संसाधन, पर्यटन विकास, आधारभूत संरचनाओं का निर्माण, कृषि का आधुनिकीकरण और नेपाल की जड़ी-बूटियों और दूसरे संसाधनों का उपयोग परस्पर सहयोग की दृष्टि से लाभ की सम्भावना के क्षेत्र हो सकते हैं।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं एक बार पुनः राजनैतिक और बौद्धिक दृष्टि से पंडित नेहरू जैसे महापुरुष को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और इस सम्मेलन की सफलता की कामना करता हूँ।

धन्यवाद।

नई दिल्ली,
नवम्बर 17, 2014