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सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वेश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषण श्री शेर बहादुर देउबा, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री तथा नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता
माननीय अध्यक्ष, राजीव गाँधी फाउंडेशन,
महामहिमो,
विशिष्ट मित्रगण,

देवियो और सज्जनो!

न केवल स्वतंत्र भारत, बल्कि उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद की नई विश्व व्यव्सथा की नियति को स्वरूप देने वाले उत्कृष्ट राजनेता स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती के अवसर पर इस विशिष्ट सभा को सम्बोधित करते हुए मैं स्वयं को सम्मानित अनुभव कर रहा हूँ।

प्रारम्भ में ही मैं अपनी ओर से और नेपाल की जनता, जिसे भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक बाद से ही हमारी लोकतंत्र की यात्रा में नेहरू का पूरा समर्थन मिला, की ओर से पंडित नेहरू को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ

स्वर्गीय बी.पी. कोइराला, के.पी. भट्टाराइ और मनमोहन अधिकारी जैसे हमारे महान नेताओं पर महात्मा गाँधी और नेहरू का गहरा प्रभाव था, और इसीलिए उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लिया और कारावास का दंड तक सहन किया। स्वतंत्रता और लोकतंत्र के साझे सिद्धान्तों ने हमारे दोनों राष्ट्रों के नेताओं को एकजुट किया और महात्मा गाँधी की दुखद हत्या के बाद भी नेपाली कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में लोकतंत्र के लिए नेपाल का अभियान उन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर और पंडित नेहरू के समर्थन से जारी रहा। पंडित नेहरू ने नेपाली कांग्रेस के साथ एकजुटता दिखाते हुए नेपाल में राणा अल्पतंत्र की शासन व्यवस्था की समाप्ति के लिए मध्यस्थता की। उस रोमांचक युग के ये कद्दावर नेता मानते थे कि कोई भी देश सही मायने में केवल तभी स्वतंत्र हो सकता है जब वहाँ लोकतंत्र की स्थापना की गई हो।

अपने जन्म से प्राप्त सुख-सुविधाओं और विशेषाधिकारों का त्याग करके अपने पूरे जीवन को स्वतंत्रता के आन्दोलन के लिए समर्पित कर देने वाले नेहरू से अधिक स्वतंत्रता की ताकत को कौन समझ सकता था? व्यापक उद्देश्य की प्राप्ति और भारत की स्वतंत्रता के स्वप्न को साकार करने और सभी के लिए लोकतंत्र की स्थापना के लिए उन्होंने स्वयं बन्दी बनने का विकल्प चुना।

एक बार सत्ता मिलने पर कोई भी सामान्य राजनीतिज्ञ आराम से बैठ सकता है, लेकिन एक राजनेता शान्त होकर नहीं बैठ सकता। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के सामने जहाँ एक ओर एक पूर्व उपनिवेश की गरिमा और सम्मान को स्थापित करने की चुनौती थी, तो वहीं दूसरी ओर उन्हें देश के लाखों-लाख लोगों के जीवन स्तर को भी ऊपर उठाना था। उन्होंने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपना कर सबसे अधिक दबे हुए और वंचित वर्गों पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक समाजवादी व्यवस्था का प्रयोग किया। उन्होंने एक समृद्ध भारत की नींव रखी। जब विश्व अलग-अलग सैन्य गुटों में बंटा हुआ था तब उन्होंने गुटनिरपेक्षता आन्दोलन की अपनी पहल के माध्यम से एक अधिक सुरक्षित विश्व व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने के लिए भी पहल की।

समय परिवर्तनशील है। उसके साथ ही राजनैतिक सिद्धान्त भी बदलते हैं। लेकिन एक राजनेता पूर्वनिश्चित वास्तविकताओं और उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए विश्व के भविष्य के बारे में सोचता है, और नेहरू ने भी यही किया। लोकतंत्र की स्थापना के लिए न्याय और सभी के लिए समानता के जिन आदर्शों का उन्होंने समर्थन किया, वे आज भी समय की कसौटी पर खरे हैं। हमने वर्तमान समय में देखा है कि आधारभूत अधिकारों और आज़ादी के लिए देशों के अन्दर और अलग-अलग देशों के बीच युद्ध हुए हैं, इसे ध्यान में रखते हुए हमें नेहरू की दूरदृष्टि का सम्मान और सराहना करनी चाहिए।

नेपालवासी होने के नाते स्वर्गीय नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए मेरे पास और भी विशेष कारण हैं। 1960 में जब शासक राजा ने मंत्रिमंडल और पहली निर्वाचित संसद को भंग करते हुए बी.पी. कोइराला, गणेश मान सिंह और के.पी. भट्टाराइ जैसे शीर्ष नेताओं को कैद कर दिया था तब नेहरू ने हमें अपना नैतिक समर्थन दिया था, उसी विरासत की परम्परा को जारी रखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपना पूरा समर्थन दिया था जब राजा ज्ञानेन्द्र ने 2005-06 में राजनैतिक दलों को अलग-थलग करके सत्ता अपने हाथों में ले ली थी। पहली संविधान सभा में विफल हो जाने के बाद इन दिनों हम नेपाल में एक नया संविधान लिखने का कठिन कार्य कर रहे हैं। भारत में संविधान निर्माण का एक समृद्ध इतिहास है। इस प्रयास में हमें आपकी सद्भावना और सहयोग की आवश्यकता है। हमें इस बात का पूरा अहसास है कि लोकतंत्र के बिना शांति और विकास सम्भव नहीं है।

पंडित नेहरू लोकतंत्र के समर्थक थे और उन्होंने इसके लिए संघर्ष किया। वे मानते थे कि यही एक ऐसी व्यवस्था है जो जनसामान्य की सत्ता को सर्वोपरि मानती है, और उन्होंने जनसामान्य की स्वतंत्रता और उनके उत्थान के लिए राजनीति को एक माध्यम के रूप में प्रयोग किया। वे एक ऐसे विश्व के समर्थक थे जो समानता के धागे से गुँथा हुआ हो। यही धारण वर्तमान विश्व में अधिक स्पष्टता से, विशेष तौर पर यातायात की सुविधाओं और प्रौद्योगिकी द्वारा लोगों को और अधिक पास लाए जाने के कारण, प्रतिध्वनित होती है। विश्व भर के नेतागण मानने लगे हैं कि लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करने वाले और वैश्विक चुनौतियों को दूर करने वाले मंचों के माध्यम से एकजुट होने की आवश्यकता है। नेहरूजी सच्चे अर्थ में एक ऐसे दृष्टा नेता थे जिन्होंने समय से पहले ही एक स्वतंत्र विश्व व्यवस्था की कल्पना की थी। स्वतंत्र भारत की स्थापना करने के बाद उन्होंने अफ्रीका और एशिया के पूर्व उपनिवेशों को भी स्वतंत्रता और स्वाधीनता के लिए प्रेरित किया। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पंडित नेहरू विश्व भर में औपनिवेशिक शासन तंत्रों को समाप्त करने में एक प्रमुख उत्प्रेरक थे।

एक और बात का मैं उल्लेख करना चाहूँगा – और यह बात मुझे सबसे अधिक प्रिय है – भारत में लोकतंत्र को सहेजने में उनके नेतृत्व की भूमिका। हम देखते हैं कि ऐसे बहुत से देश हैं जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आज़ादी मिली और उनमें लोकतंत्र स्थापित हुआ, लेकिन भारत एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ इस महान आदर्श को मज़बूती मिली और उसका विकास हुआ। मैं सचमुच ऐसा मानता हूँ कि पंडित नेहरू ने भारत के लिए जो मार्ग तैयार किया और उस मार्ग पर उन्होंने जो नेतृत्व प्रदान किया उसी का परिणाम है कि भारत आज अपने वर्तमान स्वरूप में विद्यमान है।

स्वतंत्रता, लोकतंत्र और समानता में नेहरू की दृढ़ आस्था उन्हें चिरप्रासंगिक नेता के रूप में स्थापित करती है। इस नई सदी में भी जब विश्व में शांति, सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए नई चुनौतियाँ सामने हैं, नेहरू द्वारा समर्थित आधारभूत सिद्धान्त इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए प्रासंगिक हैं।

मैं एक बार पुनः आप सभी को धन्यवाद देता हूँ, और विशेषतया माननीया सोनिया गाँधी को धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने मुझे यह सम्मान दिया है।

धन्यवाद।