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सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषण श्री हामिद करज़ई, पूर्व राष्ट्रपति, अफगानिस्तान
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की माननीय अध्यक्ष, श्रीमती सोनिया गाँधी,
माननीय डा. मनमोहन सिंह, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री,
घाना के राष्ट्रपति, जॉन क्युफुअर,
नाइजीरिया के राष्ट्रपति ओबासांजो,
भूटान की महारानी राजमाता दोरजी वांग्मो वांग्चुक,
माननीय आबुसा,
नेपाल के माननीय प्रधानमंत्री, माधव नेपाल,
स्वतंत्रता सेनानी श्री कथरादा,
और मेरे मित्र श्री आनन्द शर्मा,
सम्मानित प्रतिनिधिगण,
माननीय नेतागण, मित्रो और साथियो,

मेरे लिए यह एक बहुत बड़े सम्मान की बात है कि मुझे एक ऐसी शख्सियत की स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया है जिनसे मैं एक अफगान होने के नाते और भौगोलिक, भावनात्मक और राजनैतिक दृष्टि से भारत के साथ निकट सम्बंध होने के कारण अपनी युवावस्था और किशोरावस्था से ही परिचित रहा हूँ। अक्सर पंडित नेहरू हमारी घरेलू चर्चाओं का विषय हुआ करते थे। लेकिन एक अफगान के तौर पर नेहरू के साथ मेरी निकटता उस समय बढ़ी जब मैंने छात्र के रूप में शिमला में अध्ययन कर रहा था। विश्व की इस महान शख्सियत और भारत के इस महान सपूत से मेरा पहला परिचय तब हुआ जब कॉलेज के पहले वर्ष में मैंने अंग्रेज़ी भाषा सीखना शुरू किया और अंग्रेज़ी भाषा के मेरे पाठ्यक्रम में “ए ट्रिब्यूट टू द इंगलिश लैंग्वेज” नाम की पुस्तक में पंडित नेहरू का लिखा एक निबंध शामिल किया गया था। उस निबंध का एक हिस्सा इस प्रकार था, “और जब मैं कोयला खदान से बाहर निकला तो मेरा सिर चकरा रहा था”। पंडित नेहरू औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत में किसी स्थान पर कोयला खदान देखने के लिए गए थे। विदेशी शासन के अधीन कोयला खान मजदूरों की हालत और विदेशी शासन के बीच के सम्बंध को देखकर जब वे बाहर निकले तो उन्होंने कहा, जब मैं बाहर निकला तो मेरा सिर चकरा रहा था। उस समय मेरे लिए यह एक जिज्ञासा थी कि वे चकराया हुआ सिर लेकर खदान से बाहर क्यों निकल रहे थे।

लेकिन बाद में जब मैंने उनकी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एक उत्कृष्ट पुस्तक जिसे सभी को पढ़ना चाहिए, को पढ़ा तो मैं समझ पाया कि उनकी उस बात का मतलब भारत के लिए स्वतंत्रता था।

भारत के लिए स्वतंत्रता अपने आप में एक लक्ष्य था लेकिन साथ ही भारत की स्वतंत्रता भारत के लोगों के बेहतर जीवन और भारत के आसपास के क्षेत्र में और फिर शेष विश्व भर के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का साधन थी।

इस प्रक्रार इस निबंध के माध्यम से मैंने पंडित नेहरू और भारत के सभी स्वतंत्रता सेनानियों के भारत के लोगों, भारत के जनसाधारण के साथ सम्बंध को समझा और जाना।

पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में बड़ी बड़ी सभाओं में लोगों के साथ अपनी मुलाकातों का किस्सा बयान किया है। पंडित नेहरू ने लिखा है कि स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन के दौरान, स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वे सभाओं में जाया करते थे और वहाँ लोग “भारत माता की जय” के नारे लगाते थे। बहुत समय तक वे इन नारों को सुनते रहे और फिर एक दिन उन्होंने पूछ लिया, “यह भारत माता कौन है? यह भारत माता क्या है?” और भीड़ में से किसी ने जवाब दिया ‘धरती’। और वे बोले “हाँ, धरती,” “भारत के पेड़-पौधे, भारत की नदियाँ, शायद हिमालय के पवर्तों से लेकर कन्याकुमारी तक।“ लेकिन साथ ही उन्होंने उस व्यक्ति से कहा “भारत के सभी लोग”। भारत के सभी लोग और जब हम भारत के सभी लोगों की बात करते हैं तो वही इस संदेश का सार है। कोई इससे अछूता नहीं है, स्वतंत्रता से और भारत के सामाजिक आर्थिक बदलाव के आन्दोलन से। यह अपने आप में एक महान गाथा है जहाँ एक राष्ट्र एक महात्मा के निर्देश पर ऐसे नेतृत्व के माध्यम से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा है, और, जैसाकि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के नेताओं का भी कहना था, मानव जाति के व्यापक हितों के लिए संघर्ष कर रहा है।

और फिर स्वतंत्र भारत को बाकी दुनिया के साथ जोड़ना, भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा विरासत और विरासत के पूरे सौन्दर्य के साथ।

आप सभी जानते हैं कि पंडित नेहरू महात्मा गाँधी को छोड़कर और किसी से कम नहीं थे। वे उनके शिष्य थे लेकिन साथ ही वे उनके बौद्धिक प्रतिरूप भी थे, वफादार लेकिन चनौतीपूर्ण।

ये किस्सा, देवियो और सज्जनो, हम सभी को प्रेरणा देता है और स्वतंत्रता के संघर्ष के माध्यम से भारत ने न केवल आज़ादी हासिल की, बल्कि पूरी मानव जाति को एक अधिक व्यापक और अधिक बड़ा संदेश भी दिया ... अहिंसा का संदेश जो मानव जाति के सबसे प्रिय सिद्धान्तों में से एक है ... शांति और सह-अस्तित्व का संदेश।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जैसाकि अभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की माननीय अध्यक्ष ने अभी उल्लेख किया, पंडित नेहरू और उनके सहयोगियों के परिश्रम से भारत विश्व का सबसे बड़ा और महानतम लोकतंत्र बन गया।

कई साल पहले भारत के किसी चुनाव के दौरान टाइम्स मैगज़ीन या न्यूज़ वीक ने बड़ा सुन्दर शीर्षक छापा था “भारत का चुनाव- विश्व की सबसे बड़ी प्रदर्शनी”। निःसंदेह यह विश्व की सबसे बड़ी प्रदर्शनी है। और फिर आधुनिक संदर्भों में लोकतंत्र के माध्यम से भारत की संस्थाओं का पुनरुद्धार किया गया। संसदीय लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता और भारत की संस्कृति और संगीत और भाषाओं को मजबूत करके और हज़ारों साल पुरानी सभ्यता को विश्व के सामने प्रस्तुत करके और विश्व को उसके साथ जोड़कर ऐसा किया गया।

सहयोग और सैन्य गुटों से स्पष्टतः अलग रहने की भावना पर आधारित नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण गुट-निरपेक्षता आन्दोलन का आधार बना।

एक अफगान के तौर पर मैं कहना चाहूँगा, और चूँकि अफगान लोग दूसरे अफगानों को प्रेरित करते हैं, हमारा देश पहले उन देशों में से था जो गुट-निरपेक्षता आन्दोलन में शामिल हुए। सौभाग्य से हमारा देश भी भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ा और उस आन्दोलन में उसकी भी एक भूमिका रही।

1915-16 में राजा महेन्द्र प्रताप, मौलवी रहमतुल्लाह, मौलवी वाइदुल्ला अफगानिस्तान आए और उन्होंने कुछ समय के लिए अफगानिस्तान में एक निर्वासित सरकार का गठन किया। उसके बाद फारुख अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें भारत में सीमान्त गाँधी कहा जाता है, और उसके बाद 1940 के दशक में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अफगानिस्तान आने वाली सभी शख्सियतों और नेताओं से अफगानिस्तान को भी सीखने के लिए मिला।

इसलिए अनेक कारणों से हम अफगान लोगों को स्वतंत्रता के लिए इस महान संघर्ष से जुड़े होने की बहुत खुशी है और इस आन्दोलन ने उपनिवेशवादी ताकत के प्रति भी जिस प्रकार की सहनशीलता का प्रदर्शन किया उससे भी हमें सीखने के लिए मिला है।

देवियो और सज्जनो, पिछले तेरह वर्षों में हमने भी भारत और उसके महान नेताओं के पदचिह्नों पर चलते हुए अफगानिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना करने, उसे बहुजातीय समाज को मान्यता देने वाले देश के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।

प्रैस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और सामाजिक सौहार्द का सिद्धान्त, निःसंदेह इन्हें अपनाने से अफगानिस्तान की स्थिति में सुधार हुआ है और यही कारण है कि मैं आज अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति के रूप में आप लोगों के समक्ष उपस्थित हो सका हूँ। लोकतंत्र की भावना और अफगान लोगों की इच्छा मुझे आज यहाँ लेकर आई है।

एक राष्ट्रवादी के रूप में नेहरू का कहना था कि उन्हें विदेशी आधिपत्य स्वीकार नहीं था। राष्ट्रवादी नेहरू यह भी कहते थे इस स्वतंत्रता से भारत में आर्थिक और सामाजिक बदलाव भी आना चाहिए। इस सिद्धान्त को हम पूरे विश्व में भर में लागू होते हुए देखना चाहते हैं।

भारत ने अपने लिए कुछ सिद्धान्त तय किए थे जो बाकी दुनिया के लिए मिसाल हैं, और उन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर भारत पर एक दायित्व है। दुनिया भर में ऐसे असंख्य लोग हैं जो अभी भी किसी न किसी प्रकार के दमन का शिकार हैं और उनकी मदद किए जाने की आवश्यकता है। और मुझे यकीन है कि भारत दुनिया भर में हम जैसों की सहायता करके अपने उस दायित्व को पूरा करेगा।

“गहन सघन मनमोहक वन तरु मुझको आज बुलाते हैं
किन्तु किए जो वादे मैंने याद मुझे वो आते हैं
अभी कहाँ आराम, बड़ा यह मूक निमंत्रण छलना है
अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।”

पंडित नेहरू जब हमें छोड़ कर चले गए उसके अगले दिन रॉबर्ट फ्रॉस्ट की यह सुन्दर कविता उनकी मेज़ पर मिली थी।
उनका सपना कई मायनों में साकार हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनकी आत्मा आज एक महान, मज़बूत और विकसित भारत देख कर प्रसन्न होगी।

और बिना रुके काम करते रहने का उनका यह स्वप्न और उनकी यह लालसा अफगानिस्तान में हमें भी प्राणवान और सक्रिय बने रहने की प्रेरणा देती है। हालाँकि गहन वन तरु मनमोहक हैं, लेकिन अफगानिस्तान में हमें अभी मीलों-मील आगे जाना है और इस कार्य में हमें भारत का सहयोग मिलता रहा है। और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी प्रगति की इस यात्रा में भारत हमारे साथ चलता रहेगा।

बहुत, बहुत धन्यवाद।